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शनिवार, 29 जून 2013

महुआ घटवारिन को १९वां कथा यू.के. सम्मान

कथा (यू के) के अध्यक्ष एवं प्रतिष्ठित मीडिया हस्ती श्री कैलाश बुधवार ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष २०१३ के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कथाकार श्री पंकज सुबीर को उनके सामयिक प्रकाशन से २०१२ में प्रकाशित कहानी संग्रह महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ पर देने का निर्णय लिया गया है। श्री कैलाश बुधवार ने बताया कि इस वर्ष सम्मान के लिए केवल कहानी विधा पर ही ध्यान केन्द्रित किया गया क्योंकि पिछले दो वर्षों में बहुत से स्तरीय कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। पंकज सुबीर के अतिरिक्त अजय नावरिया, मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रेम भारद्वाज एवं विवेकानन्द के कहानी संग्रह अंतिम पाँच की दौड़ तक पहुंचे। विजेता का चुनाव करने में निर्णायकों को ख़ासी कठिनाई का सामना करना पड़ा।

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा, भगवान दास मोरवाल, हृषिकेश सुलभ, विकास कुमार झा एवं प्रदीप सौरभ को प्रदान किया जा चुका है।

इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली - लंदन - दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित), एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री पंकज सुबीर को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा।

पंकज सुबीर का जन्म ११ अक्टूबर १९७५ को मध्यप्रदेश के होशँगाबाद जिले के सीवनी मालवा कस्बे में हुआ । पिता के शासकीय सेवा में चिकित्सक होने के कारण मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में शिक्षा दीक्षा हुई। बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल के अंतर्गत आने वाले शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (अब चंद्रशेखर आज़ाद शासकीय स्नातकोत्तर अग्रणी महाविद्यालय) से जीव विज्ञान विषयों में स्नातक उपाधि तथा उसके बाद वहीं से रसायन शास्त्र (अकार्बनिक रसायन शास्त्र) में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की । अब तक सौ से ज्यादा साहित्यिक रचनाएँ जिनमें कहानियाँ, कविताएँ, ग़ज़लें, लेख तथा व्यंग्य लेख शामिल हैं देश भर की शीर्ष साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। सम्मानित कृति के अतिरिक्त पंकज का एक कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी और एक उपन्यास ये वो सहर तो नहीं प्रकाशित हो चुके हैं। ३८ वर्षीय पंकज सुबीर को बहुत से पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं जिनमें उपन्यास ये वो सहर तो नहीं के लिए भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार, इंडिपेंडेंट मीडिया सोसायटी (पाखी पत्रिका) द्वारा शब्द साधक जनप्रिय सम्मान, गोरखपुर उत्तर प्रदेश की संस्था नवोन्मेष द्वारा साहित्य का नवोन्मेष सम्मान शामिल हैं। वर्तमान में फ्रीलांस पत्रकारिता के साथ साथ कम्प्यूटर हार्डवेयर, नेटवर्किंग तथा ग्राफिक्स प्रशिक्षक के रूप में कार्यरत हैं । जब से सम्मान को अन्तर्राष्ट्रीय किया गया है तब से अब तक पंकज सुबीर सबसे छोटी आयु के साहित्यकार हैं जिनको सम्मानित किया जा रहा है।

वर्ष २०१३ के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान बर्मिंघम के डा. कृष्ण कन्हैया को उनके कविता संग्रह किताब ज़िन्दगी की (२०१२ – वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया जा रहा है। डा. कृष्ण कन्हैया का जन्म पटना, बिहार में हुआ था और उन्होंने रांची विश्वविद्यालय से एम.बी.बी.एस. की शिक्षा प्राप्त की जबकि पटना विश्वविद्यालय से सर्जरी में मास्टर्स पूरी की। इसके अतिरिक्त उन्होंने एडिनबरा से मेडिकल की अन्य डिग्रियाँ हासिल की हैं। उनकी प्रकाशित रचनाओं में सूरज की सोलह किरणें, कविता-२००७ (कविता संग्रह),शामिल हैं। उनका एक कविता संग्रह किताब संवेदना की प्रकाशनाधीन है। डॉ. कृष्ण कन्हैया का कहना है कि विदेश आने के बाद अपनी संस्कृति का गर्व, अपने संस्कारों की गरिमा, अपने गांव की शुद्ध सौंधी ख़ुशबू और अपनी मातृभूमि से अनवरत लगाव मेरी अनतरात्मा को ज़्यादा उद्वेलित करता था जिसकी झलक अब मैं अपनी कविताओं में महसूसता हूँ।

इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्सेबना, गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव, उषा वर्मा, मोहन राणा, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, नीना पॉल एवं सोहन राही को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
कथा यू.के. परिवार विशेष तौर पर श्रीमती चित्रा मुद्गल, श्री भारत भारद्वाज, श्रीमती उर्मिला शिरीष, श्रीमती सुधा ओम ढींगरा, श्री सुशील सिद्धार्थ, श्रीमती साधना अग्रवाल एवं श्री आलोक मेहता का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया।

- तेजेन्द्र शर्मा

रविवार, 11 नवंबर 2012

निदा फ़ाज़ली एवं शोभित देसाई को वातायन कविता सम्मान


५ नवम्बर लन्दन के हाउस ऑफ़ लार्डस में बैरोनैस फ्लैदर के संरक्षण में वातायन: पोएट्री ऑन साउथ बैंक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में प्रसिद्ध कवि और लेखक श्री निदा फ़ाज़ली को वातायन शिखर पुरस्कार एवं मूलतः गुजराती कवि श्री शोभित देसाई को वातायन पुरस्कार से अलंकृत किया गया। वातायन संस्था २००४ से प्रति वर्ष भारत के एक कवि को उसकी साहित्यिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित करती चली आ रही है। पिछले वर्ष, इसी स्थान पर श्री प्रसून जोशी को वातायन सम्मान और जावेद अख्तर साहब को शिखर सम्मान से अलंकृत किया गया था।

केम्ब्रिज के पूर्व-प्राध्यापक और जाने-माने लेखक, डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव, की अध्यक्षता में सर्वप्रथम स्वर्गीय डा गौतम सचदेव के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए एक मिनट का मौन रखा गया। साउथ एशियन सिनेमा फ़ौंडेशन के संस्थापक/सम्पादक श्री ललित मोहन जोशी ने इस कार्यक्रम के संचालन की बागडोर संभाली, यू.के. हिन्दी समिति के अध्यक्ष और पुरवाई के सम्पादक, डॉ पद्मेश गुप्त ने स्वागत वक्तव्य और पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन से समारोह का शुभारम्भ किया, स्वतंत्र पत्रकार और लेखिका शिखा वार्ष्णेय ने सम्मान-पत्र का वाचन किया, मेज़बान बैरोनेस श्रीला फ्लैदर ने श्री शोभित देसाई को शॉल ओढ़ाई और डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने श्री देसाई को सम्मान-पत्र एवं पुरस्कार प्रदान किए। इसके बाद, प्रसिद्द गायक राजन शगुन्शे और उदीयमान गायिका उत्तरा सुकन्या जोशी ने निदा फाजिली साहब का मशहूर गीत, 'ये जो दुनिया है ये जादू का खिलौना है' प्रस्तुत किया। एन.आर.आई. वेब-रेडियो एवं हेल्थ एंड हैपीनेस पत्रिका के सम्पादक और हिस्ट्री.कौम के निर्माता विजय राणा के सम्मान पत्र के वाचन के पश्चात बैरोनेस श्रीला फ्लैदर ने निदा फाज़ली को शाल ओढ़ा कर उनका स्वागत किया और डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने उन्हें सम्मान-पत्र और पुरस्कार प्रदान किए।

दूसरे सत्र के आरम्भ में पाकिस्तानी विद्यार्थी मलाला यूसफज़ाई को याद किया गया और उसके पश्चात यू.के. हिन्दी समिति के उन्नीसवें अंतर्राष्ट्रीय कवि सम्मलेन का शुभारम्भ हुआ, जिसकी बागडोर स्वयं शोभित देसाई ने संभाली। स्थानीय कवि मोहन राणा, तितिक्षा शाह, चमनलाल चमन और सोहन राही ने अपनी दो दो रचनाओं का पाठ और फिर निदा फाज़ली ने मंच संभाला। निदा साहब के क़िस्से, कविताएँ और गज़लें एक से बढ़ कर एक थीं। अपने स्वर्गीय पिता पर लिखी उनकी एक कविता ने श्रोतागणों को झिंझोड़ कर रख दिया, जिसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं, 'तुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़न हूँ, तुम मुझमें ज़िंदा हो।' अपने अध्यक्षीय-भाषण में डॉ। सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने जवाहरलाल नेहरु से सम्बंधित एक घटना सुनाई कि पिक्केडल्ली से गुज़रते वक्त नेहरु जी एक बार पोएट्री सोसाइटी के दफ्तर के सामने रुक कर बोले कि क्या ही अच्छा हो कि यहाँ भारतीय कवि भी अपना कविता-पाठ कर पाएं। उनका सपना सच हुआ; आज भारतीय कवि हाउस ऑफ लॉर्ड्स में कविता पाठ करने में सक्षम हैं। यह गर्व और हर्ष का विषय है कि वातायन संस्था भारतीय कवियों को वैश्विक मंच दे रही है।  अंत में, मेज़बान बेरोनेस फ्लैदर एवं वातायन की संस्थापक और जानी मानी लेखिका दिव्या माथुर ने सभी मेहमानों का ह्रदय से धन्यवाद किया। समारोह में लन्दन की कई सांस्कृतिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के अलावा साहित्य और पत्रकारिता से जुड़े हुए बहुत से गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। यह शाम अपने आप में एक अविस्मरणीय शाम रही और श्रोताओं की तालियों और वाह वाह से हॉल लगातार गूँजता रहा।

जाने-माने पत्रकारों में शामिल थे श्री सी बी पटेल (गुजरात समाचार, एशियन वौइस), रवि शर्मा (सनराइज़ रेडियो), ध्रुव घडावी (ज़ी टी वी), कुलदीप भारद्वाज (एम् ए टी वी), स्काइलार्क के सम्पादक, डा योगेश पटेल, अनवर सेन राय (बीबीसी प्रोड्यूसर-उर्दू), लवीना टंडन (सी वी बी न्यूज़), श्री विभाकर और हिना बक्शी (नवरस रिकॉर्डस), पुष्पिंदर चौधुरी (टंग्स औन फ़ायर), डा हिलाल फ़रीद और मुस्तफा शहाब (अलिगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलुमनाई), अय्यूब औलिया (अल्ला रखा फाउंडेशन), कुसुम पन्त जोशी (साउथ एशियन सिनेमा), रीनी ककाती (असामीज कम्यूनिटी), अख्तर गोल्ड (कृति-यूके), यावर अब्बास (फिल्म निर्माता), अरुणिमा कुमार (मशहूर कुचीपुडी नृत्यांगना), जेरू रॉय (स्त्री विमर्श, कलाकार), इन्दर सियाल (गायक), बज माथुर (वास्तुकार), ग़ुलाम अहमद (वकील) और शारदा, विनीता और आश्विन तवाकली (माथुर एसोसिएशन-यूके) के अलावा हिन्दी के बहुत से लेखक और कवि भी इस कार्यक्रम में शामिल हुए - प्रो श्याम मनोहर पांडे, इस्माइल चूनारा, उषा राजे सक्सेना, साथी लुधियानवी, जितेन्द्र बिल्लू, डा कविता वाचक्नवी, दीपक मशाल और स्वाति भालोटिया।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

उषा राजे सक्सेना को ‘विद्या वाचस्पति’- डी.लिट् की मानद उपाधि

साहित्य साधना में मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए, पं. रामखेलावन पाण्डेय की स्मृति में राष्ट्र-भाषा प्रचार परिषद- प्रयाग द्वारा ‘साहित्य प्रवीण’ की मानद उपाधि से सम्मानित, विदुषी लेखिका उषा राजे सक्सेना को साहित्य, संस्कृति, समाज एवं विदेश में अमूल्य हिंदी सेवा के लिए ‘देवगुरू वृहस्पति अकादमी’- कानपुर, उत्तर प्रदेश, ने दिनांक २९ नवंबर २०११ को ‘साहित्य वाचस्पति’- डी.लिट. की मानद उपाधि से विभूषित और पुरस्कृत किया। तत्पश्चात जनवरी २०१२ को प्रवासी दुनिया एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद- दिल्ली ने विष्णु प्रभाकर जन्म शताब्दी समारोह एवं अक्षरम् के दसवें अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव में उन्हें ‘अक्षरम साहित्य सम्मान’ से अलंकृत किया।

हिंदी के प्रति समर्पित उषा जी, हिंदी से संबंधित विभिन्न आयोजनों में सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर ब्रिटेन में वैश्विक स्तर पर आयोजित हिंदी आयोजनों में आपका उल्लेखनीय योगदान रहा है। ब्रिटेन में प्रकाशित हिंदी की त्रैमासिक पत्रिका पुरवाई से जुड़ी उषा जी पिछले बीस वर्षों से ब्रिटेन के साहित्यिक परिदृश्य से जुड़ी हुई हैं।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

वातायन : कविता सम्मान – २०११

नेहरु सेंटर और यू के हिंदी समिति के तत्वाधान एवं बैरोनैस फ्लैदर के संरक्षण में ३० जून के दिन लन्दन के हाउस ऑफ़ लोर्डस के एक एतिहासिक कमरे में वातायन : पोएट्री ऑन साउथ बैंक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में प्रसिद्ध कवि और लेखक श्री प्रसून जोशी एवं श्री जावेद अख्तर को वातायन अवार्ड से सम्मानित किया गया। मुख्य अथिति के रूप में प्रसिद्ध अभिनेत्री शबाना आज़मी, लोर्ड देसी एवं डा मधुप मोहता ने इस समारोह की शोभा बढाई।

लेखक , संगीत कार, और फिल्मकार डॉ संगीता दत्ता ने संचालन की बागडोर सुविज्ञतापूर्वक संभाली। रीना भारद्वाज (गायिका ‘यह रिश्ता’) द्वारा सरस्वती वंदना से समारोह का आगाज़ हुआ। लेखक, फिल्मकार नसरीन मुन्नी कबीर ने प्रसून जोशी के साहित्यिक योगदान पर प्रकाश डाला। प्रसून जोशी के गीत ‘तारे जमीं पर’ का अंग्रेज़ी अनुवाद और प्रस्तुति की कवयित्री, लेखक और फिल्मकार रुथ पडेल ने तो प्रसून जोशी के एक दूसरे गीत ‘मेरी मां’ की प्रशंसनीय प्रस्तुति की कवयित्री और लेखक इंडिया रस्सल ने समारोह की अध्यक्षता कैम्ब्रिज विश्विद्यालय के प्राध्यापक एवं लेखक डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव ने की तथा प्रस्तावना यू के हिंदी समिति के अध्यक्ष और पुरवाई के संपादक डॉ पद्मेश गुप्त की रही। वातायन की संस्थापक अध्यक्ष दिव्या माथुर ने सभी मेहमानों का धन्यवाद किया।

सम्मान समारोह के दौरान प्रसून जोशी ने ‘धूप के सिक्कों’ के साथ अपनी कई अन्य कविताएँ अपनी दिलकश आवाज में सुनाईं शब्दों की जादूगरी के साथ साथ प्रसून के मधुर कंठ के भी मालिक हैं, अपने कुछ गीतों को स्वर में गाकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया। जावेद साहब एक पूर्ण शख्सियत के मालिक हैं; गहरी आवाज़ और मोहक अंदाज में उन्होंने अपनी ‘वक़्त’ और ‘शतरंज’ जैसी कई कविताओं से सबका मन मोह लिया। समारोह के पश्चात एक भव्य भोज के साथ इस सितारों भरी खूबसूरत शाम का समापन हुआ।

शिखा वार्ष्णेय

भारतीय उच्चायोग,लन्दन द्वारा घोषित हिंदी सेवा सम्मान

ब्रिटेन में २१ मार्च को विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय उच्चायोग, भारत भवन,ऑल्डविच लन्दन में एक समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में भारतीय उच्चायोग,लन्दन द्वारा घोषित हिंदी सेवा सम्मान योजना के अंतर्गत भारतीय उच्चायुक्त महामहिम नलिन सूरी ने वर्ष २०१० के सम्मानों से रचनाकारों को सम्मानित किया।

इस कार्यक्रम में साहित्यकार उषाराजे सक्सेना को डॉ हरिवंशराय बच्चन सम्मान, स्वर्गीय पत्रकार महावीर शर्मा को डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी सम्मान (पत्रकारिता- मरणोपरांत), कैम्ब्रिज के शिक्षक श्री एश्वर्य कुमार को डॉ जॉन गिलक्रिस्ट सम्मान (अध्यापक), संस्था कथा यू के को फ्रेड्रिक पिन्कॉट सम्मान, प्रदान किये गए। सभी गुणीजनों को शॉल, प्लाक, स्मृति चिह्न, प्रशस्तिपत्र एवं २५१ पौंड की धनराशि प्रादान करके सम्मानित किया गया। शिखा वार्ष्णेय को उनके संस्मरण के लिए डॉ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी हिंदी साहित्य प्रकाशन योजना के अंतर्गत २५० पौंड की राशि का अनुदान दिया गया।

आयोजन में लन्दन में भारतीय उच्चायुक्त श्री नलिन सूरी सहित उप-उच्चायुक्त श्री प्रसाद, संस्कृति मंत्री श्रीमती मोनिका मोहता और लंदन में हिंदी साहित्य के सभी गणमान्य व्यक्ति एवं मीडिया कर्मी उपस्थित थे। उच्चायुक्त श्री नलिन सूरी ने पुरस्कार वितरण किये और अपने बहुमूल्य शब्दों से संबोधित किया। आयोजन का संचालन उच्चायोग के हिंदी अताशे श्री आनंद कुमार ने किया, तदुपरांत श्रीमती पद्मजा जी ने धन्यवाद ज्ञापन के साथ समारोह का समापन किया।

शिखा वार्ष्णेय

सोमवार, 30 मई 2011

लन्दन में हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता

रविवार १५ मई लन्दन के नेहरु केंद्र में यू के हिंदी समिति द्वारा वर्ष २०११ की हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता के पुरस्कार समारोह एवं बच्चों की भाषण प्रितियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें लन्दन और उसके आसपास के बहुत से बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।भाषण प्रितियोगिता के ३ मुख्य वर्ग थे एक ९ वर्ष से कम आयु के बच्चे, ९ से १३ वर्ष तक के बच्चे एवं १४ वर्षऔर उससे अधिक तक के बच्चे।सभी बच्चों ने " मित्रता, सिगरेट के दुर्प्रभाव, हिंदी सिनेमा और काश मेरे माता पिता अमीरहोते ।जैसे विषयों पर भाषण पूरे आत्मविश्वास और निपुणता से दिया।

समारोह का सञ्चालन श्री पद्मेश गुप्त, सुरेखा चोफ्ला और लन्दन में हिंदी के छात्र कार्तिक सुब्बुराज और कमलेश वालिया ने किया। सभी विजेताओं को पुरस्कारों का वितरण लन्दन में उच्चायुक्त में हिंदी विभाग के अताशे श्री आनंद कुमार,श्री सतेन्द्र श्रीवास्तव और नेहरु केद्र की दिव्या माथुर ने किया बच्चों का उत्साह वर्धन करते हुए आनंद कुमार ने कहा कि हिंदी पढने और सीखने के लिए जिस भी तरह की सामग्री किसी को भी चाहिए वह उच्चायुक्त से उपलब्ध कराई जाती है और जो भी इसके इच्छुक हो वह इन्हें ले सकता है। भाषण प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती उषा राजे सक्सेना और पत्रकार, लेखक शिखा वार्ष्णेय ने निभाई । निर्णय के सन्दर्भ में उषा राजे ने कहा कि उन्हें बच्चों का उच्चारण देख कर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई है क्योंकि अब तो भारत में भी बच्चों में हिंदी का इतना अच्छा ज्ञान नहीं देखा जाता और इस प्रतियोगिता के निर्णय में निर्णायकों को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ा।

यू के हिंदी समिति द्वारा आयोजित यू के हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता का यह दसवा वर्ष है। इस प्रतियोगिता के चयनित विजेताओं को भारतीय उच्चायुक्त और भारत के विदेश मंत्रालय के सहयोग से प्रतिवर्ष एक शैक्षिक भ्रमण के लिए भारत भेजा जाता है जहाँ उनकी देख रेख अक्षरम और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा की जाती है। हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता का यह कार्यक्रम यूरोप के और सात देशों में चलाया जाता है। और यू के में इसके संयोजक श्री वेद मित्र मोहला ( एम बी ई ) हैं। लन्दन में हुई इस भाषण प्रतियोगिता के पुरस्कारों को श्री सत्येन्द्र श्रीवास्तव अपनी माताजी के नाम पर प्रायोजित करते हैं। और हिंदी ज्ञान की लिखित प्रतियोगिता के पुरस्कारों को डॉ पियूष गोयल द्वारा प्रायोजित किया गया था।

बच्चों को बधाई देते हुए सत्येन्द्र जी ने कहा कि - जब भी घर मे बात करें हिंदी में करे और भारत जब भी जाएँ तो २ हिंदी की किताबें जरुर खरीद कर लायें। अगर इन दो बातों का ध्यान रख लिया जाये तो हिंदी सीखने में बहुत आसानी होगी। इस तरह चाय नाश्ते के साथ इस सफल आयोजन का समापन हुआ। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए किये गए इस बेहतरीन आयोजन के लिए यू के हिंदी समिति के संस्थापक अध्यक्ष श्री पद्मेश गुप्तसहित सभी टीम के सदस्य बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं। समारोह में श्री सतेंदर श्रीवास्तव, श्री पद्मेश गुप्त, श्री वेदमोहला, श्री आनंद कुमार ,श्रीमती उषाराजे सक्सेना, श्री के बी एल सक्सेना, श्रीमती शशि वालिया, देविना ऋषि, डॉ पियूष गोयल और श्री ब्रिज गोयल के अलावा लन्दन के बहुत से गणमान्य व्यक्ति और हिंदी प्रेमी उपस्थित थे।

शिखा वार्ष्णेय
लन्दन।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

डर्बी की पीयर-ट्री लायब्रेरी में मुशायरा


(बाएं से फ़रज़ाना ख़ान, श्री अख़्तर, बासित कानपुरी, तेजेन्द्र शर्मा, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, अक़ील दानिश, मारग्रेट जे, श्रीमती इफ़्फ़त ख़ान, श्री अहसन ख़ान)

ब्रिटेन के शहर डर्बी की पीयर-ट्री लायब्रेरी ने हाल ही में एक मुशायरे का आयोजन किया जिसमें लंदन के उर्दू शायरों अक़ील दानिश एवं बासित कानपुरी; हिन्दी और उर्दू की शायरा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, हिन्दी के शायर/कवि तेजेन्द्र शर्मा एवं नॉटिंघम की शायरा फ़रज़ाना ख़ान ने श्रोताओं को अपनी रचनाओं का रसास्वादन करवाया।

मुशायरे के संयोजक श्री अहसन ख़ान ने सभी शायरों का स्वागत किया। उनका मानना है कि बेशक मुशायरा मूलतः उर्दू शायरी को लेकर है मगर शायरों में मौजूद हिन्दी के कवि तेजन्द्र शर्मा और श्रोताओं में मौजूद मुसलमान, सिख, हिन्दू और ईसाई इस बात का सबूत है कि साहित्य का कोई मज़हब नहीं होता। भाषा किसी मज़हब से जुड़ी नहीं है।

पीयर-ट्री लायब्रेरी की लाइब्रेरियन मारग्रेट जे ने प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा कि, “हमारी लायब्रेरी के लिये यह गर्व का विषय है कि यहां एक बहुभाषीय मुशायरा आयोजित किया जा रहा है। मार ग्रेट ने आगे कहा कि उन्हें उर्दू या हिन्दी भाषा समझ नहीं आती मगर यह सच है कि साहित्य भाषाओं की दीवारें तोड़ कर अपनी बात श्रोता को समझा देता है। ”
फ़रज़ाना ख़ान ने संचालक का पद संभालते हुए प्रत्येक शायर का परिचय दिया और एक एक कर उन्हें अपनी रचना सुनाने का आमंत्रण दिया।
वरिष्ठ शायर अक़ील दानिश ने पहले मां के सम्मान में अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी -
"बच्चे बद भी हों तो सीने से लगा लेती है
मां के अंदाज़ में अंदाज़-ए-ख़ुदा मिलता है।"
फिर वे नॉस्टेलजिक हो कर अपने वतन को याद करते हुए कह उठे –


बेवतन हम हैं मगर यादे वतन आती है
इस अंधेरे में भी सूरज की किरण आती है।

बासित कानपुरी ने अपने मधुर स्वर में तरन्नुम से अपने रचनाएं पेश कीं। वे पहले तो शमां की लौ लगने और रात भर जलने की बात कहते रहे -
मालूम नहीं शम्मां की लौ किससे लगी है
शब भर दिले सोज़ां की तरह वो भी जली है।
और फिर दिल में शमा जला बैठे -
उनके आने की आस में बासित
दिल में शम्में जलाए बैठे हैं।

तेजेन्द्र शर्मा ने बात को नया मोड़ देते हुए नॉस्टेलजिया से बाहर आने की बात की और श्रोताओं से कहा कि हम लोग ब्रिटेन में ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आकर बसे हैं मगर इसे आजतक अपना मुल्क़ नहीं मान पाए। इसलिये ब्रिटेन हमें कहता है -
जो तुम न मानों मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है
यहां जो आ गया इक बार वो हमारा है।
उनका अगला शेर रिश्तों और दोस्ती की गहरी पड़ताल करता दिखा -
जग सोच रहा था कि है वो मेरा तलबगार
मैं जानता हूं उसने ही बरबाद किया है।

काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने अपनी दो नज़्मों का पाठ किया। पहली नज़्म में उन्होंने कांटेदार झाड़िंयों का बिम्ब इस्तेमाल करते हुए उनके ज़िन्दगी पर छा जाने की बात कही। तो वहीं दूसरी नज़्म में पाकिस्तान में हाल ही में आए सैलाब की तस्वीर खींच कर श्रोताओं की आंखों को नम कर दिया –
वो ख़ूंख़ार कांटों भरी झाड़ियां सब
मुंडेरों पे फैली दरख़्तों से लिपटीं
कि फूलों को ताक़त से अपनी कुचलतीं
हवाओं की लहरों में चीख़ें समोती
खड़ी हैं कतारें बनाए हुए अब
न जाने क्यों चुपचाप ख़ामोश हैं सब।
जब फ़रज़ाना ख़ान की बारी एक शायरा के तौर पर आई तो उन्होंने अपनी दो भावनात्मक नज़्मों का पाठ किया। दर्द की नीली रगों का बिम्ब एकदम नया और अनूठा था –
दर्द की नीली रगें, यादों में जलने के सबब
सारी चीख़ें रोक लेती हैं समझने के सबब

दर्द की नीली रगें तो शोर करती हैं बहुत
पैकर-ए-नाज़ुक में इस दिल के मचलने के सबब।

कार्यक्रम के अंत में मारग्रेट जे ने धन्यवाद ज्ञापन दिया, और सम्पन्न हुई ग़ज़लों की ख़ुशबू और नज़मों की अंतरात्मा लिये एक शाम।

लंदन में प्रथम हिंदी छात्र सम्मेलन


‘यू.के हिंदी समिति’ के २० वर्ष एवं ‘हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता’ के दस वर्ष के उपलक्ष्य में लंदन के नेहरू केंद्र में में दिनांक २६ सितंबर को प्रथम हिंदी छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में यू.के. के विभिन्न शहरों से सैकड़ों हिंदी के विद्यार्थियों ने भाग लिया। सम्मेलन में ४ वर्ष की आयु से लेकर २५ वर्ष की आयु तक के छात्र उपस्थित थें।

इस अवसर पर विद्यार्थी कमलेश वालिया और कार्तिक सुब्बुराज ने इंटरनेट के माध्यम से हिंदी सीखने की विधा बताई और पावर प्वाइंट द्वारा अत्यंत रोचकता से अन्य छात्रों को हिंदी के विभिन्न वेबसाइट से परिचित कराया। ‘यू.के हिंदी समिति’ के अध्यक्ष डॉ. पदमेंश गुप्त ने कहा, ‘इस सम्मेलन का उद्देश्यहै कि ब्रिटेन के हिंदी छात्रों का एक नेटवर्क तैयार हो और इन विद्यार्थियों को एक ऐसा मंच मिले जिससे वे कम से कम साल में एक बार आपस में मिल सकें।’इस अवसर पर हिंदी बाल भवन- सरे, तथा बर्मिंघम के कुछ विद्यार्थियों ने लघु नाटक एवं नृत्य की प्रस्तुति कर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। हास्य-व्यंग्य से भरपूर यह नाटक छात्रों तथा उनकी शिक्षिकाओं ने मिल कर स्वयं रचा। हिंदी अध्यापिका सुश्री सुरेखा चोफला ने इस अवसर पर भारत के नक्शे पर आधारित छात्रों को समूह रचना का अभ्यास करवाया तथा साँप और सीढ़ी के खेल के माध्यम से हिंदी के प्रश्न-उत्तर के सत्र का संयोजन किया जिसमें हिंदी छात्रों ने जम कर भाग लिया।

श्रीमती देवीना रिशी ने ‘हिंदी सिनेमा वाह! वाह!, हिंदी सिनेमा छी! छी!’ पर मनोरंजक बहस का संयोजन किया जिसमें अनेक छात्रों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। ‘यू.के.हिंदी समिति’ की उपाध्यक्ष और ‘पुरवाई’ पत्रिका की सह-संपादक श्रीमती उषा राजे ने छोटी उम्र के बच्चों को स्व रचित बाल कथा ‘जादूई बुलबुला’ के माधयम से भारतीय संस्कृति की महत्ता मनोरंजक ढंग से बताई। इस सत्र में बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी दत्तचित श्रोता थें। हिंदी सभी छात्रों एवं अभिवावकों ने इस अवसर पर अंताक्षिरी के माध्यम से हिंदी गानों की प्रस्तुति की। सम्मेलन के अंत में ब्रिटेन के इन छात्रों ने भारत के वरिष्ठ साहित्यकार स्व. कन्हैया लाल नंदन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की।

यू.के. हिंदी समिति के श्री वेद मोहला, डॉ. ऋषी अग्रवाल, इस्माइल चुनेरा, के.बी.एल. सक्सेना, उषा राजे सक्सेना, सुरेखा चोपला, अंजलि सुब्बुराज, शशि वालिया, देविना रिशि, पियूष गोयल, एवं कृति यू.के. की तितिक्षा शाह, अख्तर गोल्ड, मधु शर्मा, मीना कुमारी, और बाल भवन की शशि वालिया ने अपनी उपस्थिति से आयोजन को गरिमा प्रदान की।

लंदन की एक शाम – तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में


(बाएं से मीरा कौशिक, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, डा. निखिल कौशिक, कैलाश बुधवार एवं. काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी )
कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने नेहरू सेंटर, लंदन में एक अनूठी शाम का आयोजन किया जिसमें वेल्स-निवासी नेत्र विशेषज्ञ, कवि, एवं फ़िल्मकार डा. निखिल कौशिक ने कथाकार-कवियत्री दिव्या माथुर, वरिष्ठ मीडिया हस्ती कैलाश बुधवार के साथ साथ कथाकार, फ़िल्म टीवी तथा मंच कलाकार, कवि व ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा पर निर्मित तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में दिखा कर नेहरू सेंटर में उपस्थित श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने हाल ही में दिवंगत हुए कवि-पत्रकार एवं मीडिया हस्ती डा. कन्हैया लाल नंदन को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपने नज़दीकी संबंधों की चर्चा करते हुए उनके साथ अपनी बहामास, क्यूबा और त्रिनिदाद यात्राओं की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा ने नंदन जी को नये रचनाकारों और ख़ासतौर पर प्रवासी लेखकों का मार्गदर्शक बताया। अपनी धीर गंभीर आवाज़ में तेजेन्द्र ने उनकी एक कविता का पाठ किया जो कि नंदन जी ने ३ अक्टूबर २००५ (यानि कि ठीक पांच वर्ष पूर्व) हस्पताल के बिस्तर पर डायलिसिस करवाने के बाद लिखी थी।
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, / मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं / उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

प्रत्येक डाक्यूमेंटरी क़रीब क़रीब बीस से बाईस मिनट लम्बी थी। सबसे पहले दिव्या माथुर पर बनाई फ़िल्म दिखाई गई। दिव्या को निखिल ने एक ऐसे व्यक्तित्व की तरह पेश किया जो कि अपने काम के प्रति समर्पित, व्यवहार में विनम्र एवं परिवार के प्रति निष्ठा रखती हैं। दिव्या माथुर ने अपने लेखन के विषय में भी विस्तार से बात की और बताया कि जब एक विषय उनके दिमाग़ में पक्की तरह से बैठ जाता है तो वे लगातार उसी विषय पर लिखती चली जाती हैं। उनके क्ई एक कविता संकलन एक ही विषय पर आधारित हैं। डॉक्यूमेंटरी में डा. केसरी नाथ त्रिपाठी, डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डा. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मोनिका मोहता, रवि शर्मा और दिव्या के परिवार के सदस्यों सहित बहुत से लोगों ने दिव्या माथुर के प्रति अपने विचार व्यक्त किये।

कैलाश बुधवार पर बनाई डाक्युमेंटरी एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में है जिसे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं; जो कभी भी किसी के बारे में कुछ ग़लत नहीं कहता; और जो अपने से अधिक अपने से वरिष्ठ लोगों के बारे में बात करके ख़ुश हो लेता है। शायद इसीलिये कैलाश जी ने अपनी डॉक्यूमेंटरी में पापाजी पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर के बारे में अधिक बातें की और अपने व्यक्तित्व को ठीक उसी तरह छिपाए रखा जैसा कि वे पिछले चार दशकों से करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने वरिष्ठ रेडियो की हस्तियों के बारे में बातें कीं जिनमें आले हसन, ज्ञान कौशिक, महेन्द्र कौल जैसे बहुत से लोग शामिल थे। श्रोताओं में बैठे नरेश कौशिक ने स्वीकार किया कि कैलाश जी ही उन्हें बीबीसी लंदन में लाए थे। कैलाश जी ने माइक पर आकर कहा कि वे अपने आपको इस तरह की किसी भी डॉक्यूमेंटरी के क़ाबिल नहीं समझते। वे हैरान भी थे कि मेट्रो स्ट्राइक, बारिश और कॉमनवेल्थ खेलों के सीधे प्रसारण के बावजूद लोग उनके बारे में निर्मित डाक्युमेंटरी देखने पहुंच गये।

ड़ा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र शर्मा को ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य का राजकपूर घोषित किया। उनका कहना था जिस प्रकार दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन में किसी फ़िल्म की शूटिंग करने वाले राजकपूर पहले फ़िल्मकार थे, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कथा यू.के. सम्मान आयोजित करके तेजेन्द्र शर्मा ने हिन्दी का परचम अंग्रेज़ी के गढ़ में लहराया है। निखिल कौशिक ने अपनी डॉक्युमेंटरी के ज़रिये तेजेन्द्र शर्मा को एक कहानीकार, ग़ज़लकार, मंच एवं सिने कलाकार, नाटक निर्देशक, रेडियो पत्रकार एवं एक हिन्दी सेवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। तेजेन्द्र ने अपने अंग्रेज़ी एवं हिन्दी लेखन व टीवी सीरियल लेखन के बारे में बातचीत भी की है। तेजेन्द्र शर्मा की लिखी एक ग़ज़ल ‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है / यहां जो आ गया इक बार, वो हमारा है’ भी इस फ़िल्म में शामिल की गई। इस ग़ज़ल का संगीत बनाया अर्पण पटेल ने और स्वर दिया मीतल ने। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर प्रो. अमीन मुग़ल, कैलाश बुधवार, डा. अचला शर्मा, मोनिका मोहता, रवि शर्मा, राकेश दुबे, आदि ने अपने अपने विचार रखे। अचला शर्मा के अनुसार तेजेन्द्र ने हिन्दी को मंदिरों से बाहर निकाल कर ब्रिटिश संसद में पहुंचा दिया है।

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि किसी भी देश या समुदाय की प्रगति उसकी सांसकृतिक गतिविधियों पर आधारित होती है। डा. निखिल कौशिक लेखक, पत्रकार एवं संस्कृति कर्मियों के कार्यों को उजागर करने के लिये एक नई विधा से हमारा परिचय करवाया है। मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हमें निखिल कौशिक पर निर्मित डाक्युमेंटरी भी देखने को मिलेगी। कार्यक्रम में निखिल कौशिक ने दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मीरा कौशिक, उषा राजे सक्सेना, बीबीसी के नरेश कौशिक और शिवकांत, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती अरुणा अजितसरिया, निखिल गौर, अरुण बेदी आदि भी शाम को सफल बनाने के लिये मौजूद थे।

: दीप्ति शर्मा

रविवार, 26 सितंबर 2010

लंदन में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा "साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक क्रांतिकारी" कार्यक्रम का आयोजन

लंदन के नेहरू सेन्टर में एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा "साहिर लुधियानवी एक रोमांटिक क्रांतिकारी" शीर्षक से एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। बीबीसी उर्दू सेवा के श्री रज़ा अली आबिदी ने साहिर लुधियानवी (मूल नाम अब्दुल हैय) के बचपन, जवानी, साहित्यिक शायरी और फ़िल्मी नग़मों की चर्चा की। साहिर के मुंबई में बसने पर श्री आबिदी ने कहा कि किसी शहर के रंग में रंग जाना बहुत सहज होता है मगर साहिर ने बम्बई को अपने रंग में रंग दिया। तेजेन्द्र शर्मा ने चित्रकार मक़बुल फ़िदा हुसैन, फ़िल्मकार मुज्ज़फ़र अली, एवं संसद सदस्य श्री विरेन्द्र शर्मा की उपस्थिति में अपने पॉवर-पाइन्ट प्रेज़ेन्टेशन की शुरूआत फ़िल्म हम दोनों के भजन अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम से करते हुए कहा कि आज ईद और गणेश चतुर्थी के त्यौहार हैं, तो चलिये हम अपना कार्यक्रम एक नास्तिक द्वारा लिखे गये एक भजन से करते हैं।
एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने ईद के कारण कार्यक्रम में शामिल न होने पर खेद प्रकट करते हुए श्रोताओं के लिये संदेश भेजा कि जो श्रोता आज ईद मना रहे हैं उनको गणेश चतुर्थी की बधाई और जो गणेश चतुर्थी मना रहे हैं उन्हें ईद की मुबारक़बाद। इस तरह ज़कीया जी ने कार्यक्रम की शुरूआत में ही एक सेक्युलर भावना से दर्शकों के दिलों को सराबोर कर दिया।

अपनी प्रस्तुति में तेजेन्द्र शर्मा ने साहिर की एक संपूर्ण रोमांटिक कवि की छवि से लेकर उनके क्रांतिकारी रूप तक की यात्रा को प्रस्तुत करते हुए अनेक फ़िल्मी गीत और ग़ज़लों को पर्दे पर दिखाया। तेजेन्द्र शर्मा ने आगे बताया कि साहिर ने फ़िल्मों में जो भी लिखा वो अन्य फ़िल्मी गीतकारों के लिये एक चुनौती बन कर खड़ा हो गया। उनका लिखा हर गीत जैसे मानक बन गये। उनकी कव्वाली न तो कारवां की तलाश है (बरसात की रात), हास्य गीत सर जो तेरा चकराए (प्यासा), देशप्रेम गीत ये देश है वीर जवानों का (नया दौर), सूफ़ी गीत लागा चुनरी में दाग़ छिपाऊं कैसे (दिल ही तो है) और शम्मी कपूर के तुमसा नहीं देखा के लिये लिखा गया गीत- यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं.. आदि गीतों की याद ताज़ा की। साहिर की भाषा पर टिप्पणी करते हुए तेजेन्द्र का कहना था कि किसी भी बड़े कवि या शायर की लिखी वही शायरी ज़िन्दा रही है जो आम आदमी तक प्रेषित हो पाई है। उन्होंने कहा कि साहिर, शैलेन्द्र और शकील अपने समय के फ़िल्मी गीतों की ऐसी त्रिमूर्ति थे जिन्होंने फ़िल्मी मुहावरे में उत्कृष्ठ साहित्य की रचना की।

कार्यक्रम की शुरूआत में नेहरू केन्द्र की निदेशक मोनिका मोहता ने अतिथियों का स्वागत किया। तेजेन्द्र शर्मा ने कथाकार महेन्द्र दवेसर, ग़ज़लकार प्राण शर्मा एवं जमशेदपुर की विजय शर्मा को धन्यवाद दिया जिन्होंने इस कार्यक्रम की तैयारी में कुछ सामग्री भेजी। कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त नसरीन मुन्नी कबीर, प्रो. अमीन मुग़ल, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार, शिक्षाविद अरुणा अजितसरी, दिव्या माथुर एवं उच्चायोग के श्री जितेन्द्र कुमार भी शामिल थे।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

हिंदी और उर्दू और नज़दीक आयीं


चित्र में बाएँ से- (बाएं से मोनिका मोहता, हरि भटनागर, ज़कीया ज़ुबैरी, आसिफ़ इब्राहिम और तेजन्द्र शर्मा)
“ये बहुत सुकून देने वाली बात है कि कथा यूके और एशियन कम्यूरनिटी आर्ट्स मिल कर यहां यूके में हिंदी और उर्दू के बीच भाषाई पुल बनाने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं लेकिन हमें इस बात को भी देखना होगा कि हमारा आज का पाठक इन कहानियों की विषय-वस्तुर कथानक और लोकेल से जुड़ सके और कहानियों से जुड़ाव महसूस कर सके।” उक्ता विचार कथा यूके और एशियन कम्यूकनिटी आर्ट्स द्वारा प्रकाशित ब्रिटेन की उर्दू क़लम का नेहरू सेटर, लंदन में 21 जुलाई 2010 की शाम लोकार्पण करते हुए हुए भारतीय उच्चाियोग में मंत्री (समन्वसय) श्री आसिफ़ इब्राहिम ने व्यणक्तत किेये।


हिंदी के प्रसिद्ध कहानीकार तेजेन्द्र शर्मा एवं ज़कीया ज़ुबैरी द्वारा संपादित ब्रिटेन की उर्दू क़लम में ब्रिटेन में बसे 8 उर्दू कहानीकारों की 16 कहानियों का हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक की लम्बी भूमिका कथाकार-पत्रकार एवं कथा यूके की उपाध्यक्षा अचला शर्मा ने लिखी है। इस मौक़े पर प्रोफ़ेसर अमीन मुग़ल ने अपनी बात कहते हुए कहा कि बेशक नेचर के हिसाब से हिंदी और उर्दू बहुत नज़दीकी भाषाएं हैं और दोनों भाषाओं के बीच आदान प्रदान की लम्बी परम्प रा है, कथा यूके और एशियन कम्यूदनिटी आर्ट्स की इस बात के लिए तारीफ़ की जानी चाहिये कि वे अपने सीमित साधनों से इतने महत्वनपूर्ण काम को अंजाम दे रहे हैं।

इस अवसर पर भारत से विशेष रूप से पधारे कहानीकार-संपादक-प्रकाशक हरि भटनागर ने अपने लम्बे लिखित लेख द्वारा श्रोताओं का परिचय कहानियों से करवाया। उनके अनुसार संकलन की कहानियां ग़म की कथा को रो पीट कर, चिल्ला चोट कर के नहीं बल्कि बहुत ही ख़ामोश ढंग से व्यक्त करती हैं। कि कथा का कलात्मक वैभव कहीं भी क्षतिग्रस्त नहीं होता और सबसे बड़ी बात यह कि उस निज़ाम का चेहरा बेनक़ाब होता है जो भेदभाव की राजनीति कर के लोगों में फूट डालता है और उन्हें कहीं का नहीं छोड़ता।

कथा यूके के महासचिव, कथाकार ओर किताब के संपादक द्वय में से एक तेजेन्द्र शर्मा का कहना था कि हमें पहले समस्या को स्वीकार करना होगा। अब समय आ गया है कि हम मान लें कि हिन्दी और उर्दू दो भाषाएं हैं और हमें उनके बीच की दूरी को पाटना है। उन्होंने इस किताब और इस तरह की दूसरी किताबें प्रकाशित किये जाने की ज़रूरत की बात कही और बताया कि उनकी कोशिश रहेगी कि कहानी के अलावा, कविता, ग़ज़ल और इतर साहित्ये का भी दोनों भाषाओं में अनुवाद कराते रहें।
नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका मोहता ने इस अवसर पर नेहरू सेंटर और कथा यूके के लम्बेल समय चले आ रहे सार्थक रिश्तों की बात कही और उम्मीरद की कि ये सिलसिला आगे भी चलता रहेग।

भारत से पधारे पत्रकार अजित राय ने कहा कि इस पुस्तक का प्रकाशित होना एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि पहली बार ब्रिटेन के आठ उर्दू लेखकों की कहानियां हिन्दी में एक साथ छपी हैं। हिन्दी और उर्दू एक भाषा नहीं हैं। हम आज़ादी के बाद से ही इनके एक होने का भ्रम पाले रहे और दूरियां बढ़ती गईं।

एशियन कम्यूानिटी आर्ट्स की अध्योक्ष ज़कीया जुबैरी ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार मानते हुए कहा मेरा सपना है कि हिन्दी और उर्दू की गंगा जमुनी तहज़ीब, शब्दों की मिठास, अपनापन, ख़ुलूस सब हमारे साहित्य और ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाएं। हमारे रिश्ते राजनीति से संचालित न हों। हमारे रिश्ते साहित्य, कला और एक दूसरे पर विश्वास से पैदा हों। यह न तो पहला प्रयास है और न ही आख़री । हम इस मुहिम को जारी रखेंगे। हिन्दी उर्दू कहानियों की निशस्तें रखी जाएंगी, और अगला संकलन शायद उन कहानियों का हो जो कि उन नशिस्तों में पढ़ी जाएं।

इसी अवसर पर कथाकार सूरज प्रकाश (भारतीय प्रतिनिधि कथा यूके) की नवीनतम कृति दाढ़ी में तिनका का अनूठा विमोचन भी हुआ जब एक युवा पाठिका हेमा कंसारा ने मंच पर आकर उनकी कृति का लोकार्पण किया। सूरज प्रकाश ने अपने लम्बे लेखकीय सन्नाटे के बारे में बात करते हुए लेखक की न लिख पाने की छटपटाहट का विस्तार से ज़िक्र किया। सूरज प्रकाश पिछले बारह वर्षों से कथा यूके से जुड़े हैं।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त उर्दू कहानीकार जितेन्द्र बिल्लु, सफ़िया सिद्दीक़ि, मोहसिना जीलानी, बानो अरशद एवं फ़हीम अख़्तर, फ़िल्मकार यावर अब्बास, भूतपूर्व बीबीसी हिन्दी अध्यक्ष कैलाश बुधवार, हिन्दी कथाकार दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, कादम्बरी मेहरा एवं महेन्द्र दवेसर, कवि निखिल कौशिक, शिक्षाविद वेद मोहला, नाटककार इस्माइल चुनारा, अयूब औलिया, हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी आनंद कुमार, भारत से आए फ़िल्म आलोचक विनोद भारद्वाज, लदंन और आसपास के शहरों के हिंदी और उर्दू के रचनाकार बड़ी संख्या में मौजूद थे।

सोमवार, 26 जुलाई 2010

उच्चायुक्त नलिन सूरी द्वारा हिंदी लेखकों को कथा यूके सम्मान

लंदन – 10 जुलाई 2010 ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त नलिन सूरी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में हिन्दी लेखक हृषिकेश सुलभ को उनके कथा संकलन ‘वसन्त के हत्यारे’ के लिये ‘सोलहवां अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान’ प्रदान किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन में बसे हिन्दी लेखक महेन्द्र दवेसर और कादम्बरी मेहरा को ग्यारहवां पद्मानंद साहित्य सम्मान भी प्रदान किया। ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सांसद बैरी गार्डिनर और वीरेन्द्र शर्मा ने सम्मान समारोह की मेज़बानी की।

ब्रिटिश सांसद बैरी गार्डिनर ने अपने भाषण की शुरूआत हिन्दी में की। उन्होंने कहा कि जिन सवालों का जवाब राजनीति नहीं दे पाती, उनका जवाब साहित्य में खोजा जा सकता है। साउथहॉल के सांसद वीरेन्द्र शर्मा ने कहा कि कथा यूके यहां सभी भारतीय भाषाओं के बीच संवाद बनाने का जो काम कर रही है उससे हिन्दी को उसका उचित सम्मान दिलाने में बहुत मदद मिलेगी। हमें इसका राजनीतिक समर्थन करना चाहिये। उन्होंने कहा कि भारत को ठीक से समझने के लिये भारतीय भाषाएं जानना ज़रूरी है। श्री नलिन सूरी ने कहा कि कथा यूके का यह आयोजन यहां विभिन्न भाषाई समुदायों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने आश्वासन दिया कि ब्रिटेन के दूर-दराज़ इलाकों में हिन्दी किताबों को पाठकों तक पहुंचाने के लिये भारतीय उच्चायोग हर संभव सहयोग प्रदान करेगा। यहां के हिन्दी लेखक किसी भी मामले में दूसरे देशों के लेखकों से कमतर नहीं हैं।


सोलहवें अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान से अलंकृत कथाकार हृषिकेश सुलभ ने कहा कि उनके लिए लिखना जीने की शर्त है। बिहार की जिस ज़मीन से वे आते हैं वहां एक एक सांस के लिये संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि हमारी साझा संस्कृति को राजनीति की नज़र लग गई है। हम लेखक उसे बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। न्याय का सपना अभी भी अधूरा है और वंचित के पक्ष में खड़ा होना लेखक की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है. ग्यारहवें पद्मानंद सम्मान से अलंकृत महेन्द्र दीपक दवेसर और कादम्बरी मेहरा ने कहा कि इस सम्मान के बाद उनके साहित्य में पाठकों की नई दिलचस्पी पैदा होगी।

कथा यूके के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि यह समारोह ब्रिटेन में बसे एशियाई लेखकों के बीच संवाद का माध्यम बन रहा है। हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, बांग्ला, पंजाबी सहित कई भाषाओं के लेखक हमसे जुड़ रहे हैं। कथा यू.के. द्वारा प्रकाशित इन लेखकों की प्रतिनिधि रचनाओं से ब्रिटेन में साहित्य संस्कृति की नई एशियाई छवि उभरी है। उन्होंने पिछले वर्ष के दौरान दुनियां भर में हुई कथा यूके कि गतिविधियों की जानकारी देते हुए कहा कि हम विभिन्न समुदायों के बीच संवाद की नई पहल कर रहे हैं। यह इस आयोजन के इतिहास में यह महत्वपूर्ण अवसर है जब ब्रिटेन के दो सांसद – बैरी गार्डिनर, वीरेन्द्र शर्मा – हाउस ऑफ़ कॉमन्स में इसकी मेज़बानी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में कथा यूके साहित्य, संस्कृति से जुड़े गंभीर विचार विमर्श आयोजित करेगा।

ब्रिटने में लेबर पार्टी की काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि हिन्दी उर्दू की साझा संस्कृति को बचाने के लिये ब्रिटेन में बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। इससे हम साहित्य को उस नई पीढ़ी तक ले जा सकेंगे जो अपनी जड़ों से कट रही है। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने हृषिकेश सुलभ की कहानियों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सुलभ हिन्दी के उन गिने चुने कथाकारों में हैं जिनकी कहानियों में आजका मुस्लिम परिवेश जीवन्त है। उनकी कहानियों में गज़ब की पठनीयता है जो पाठकों को देर तक बांधे रखती है।

बीबीसी हिन्दी सेवा की पूर्व प्रमुख अचला शर्मा ने पद्मानंद साहित्य सम्मान से अलंकृत महेन्द्र दवेसर और कादम्बरी मेहरा की कहानियों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि दोनों का कथा संसार एक दूसरे से अलग है पर कई मौक़ों पर एक दूसरे के समानांतर भी चलता है क्योंकि परिवेश साझा है। दीप्ति शर्मा ने सम्मानित कथाकार हृषिकेश सुलभ की कहानी वसन्त के हत्यारे के अंशों का नाटकीय पाठ किया। कथाकार सूरज प्रकाश ने हृषिकेश सुलभ, पत्रकार अजित राय ने महेन्द्र दवेसर और जय वर्मा ने कादम्बरी मेहरा के मानपत्र पढ़े। समारोह की शुरूआत में लेखक-फ़िल्मकार निखिल कौशिक ने वन्दना प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन सनराईज़ रेडियो और टीवी की सरिता सभरवाल ने किया।

समारोह में ब्रिटिश सांसद लॉर्ड तरसेम किंग, मोनिका मोहता (निदेशक नेहरू सेन्टर), सुश्री राकेश शर्मा (उपसचिव – विदेश मंत्रालय), आनन्द कुमार (हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी), मोहन कांत गौतम (नीदरलैण्ड), काउंसलर सुनील चोपड़ा, काउंसलर जगदीश गुप्त, प्रो. मुग़ल अमीन, डा. नज़रुल बोस, बीबीसी हिन्दी के पूर्व अध्यक्ष कैलाश बुधवार, विजय राणा, मोहन राणा, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, केबीएल सक्सेना, शमील चौहान, असमा सूत्तरवाला, सहित इस अवसर पर साहित्य, राजनीति, मीडिया, व्यवसाय, समाज सेवा एवं अन्य क्षेत्रों से जुड़े अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

रविवार, 25 अप्रैल 2010

सोलहवें कथा यू.के. सम्मान की घोषणा

कथा (यू के) के महा सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2010 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कहानीकार और रंगकर्मी हृषीकेश सुलभ को राजकमल प्रकाशन से 2009 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह वसंत के हत्यारे पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने-जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास-खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री हृषीकेश सुलभ को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 08 जुलाई 2010 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा। सम्माीन समारोह में भारत और विदेशों में रचे जा रहे साहित्यय पर गंभीर चिंतन भी किया जायेगा।

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा और भगवान दास मोरवाल को प्रदान किया जा चुका है।

15 फ़रवरी 1955 को बिहार के छपरा में जनमे कथाकार, नाटककार, रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ की विगत तीन दशकों से कथा-लेखन, नाट्‌य-लेखन, रंगकर्म के साथ-साथ सांस्कृतिक आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी रही है। आपके तीन कहानी संग्रह बँधा है काल, वधस्थल से छलाँग और पत्थरकट - एक जिल्द में तूती की आवाज़ के नाम से प्रकाशित।
आपको अब तक कथा लेखन के लिए बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, नाट्‌यलेखन और नाट्‌यालोचना के लिए डा. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, और रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान मिल चुके हैं। इस कार्यक्रम के दौरान भारत एवं विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य के बीच के रिश्तों पर गंभीर चर्चा होगी।

वर्ष 2010 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान इस बार संयुक्तन रूप से श्री महेन्द्र दवेसर दीपक को मेधा बुक्सन, दिल्ली् से 2009 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह अपनी अपनी आग के लिए और श्रीमती कादम्बारी मेहरा को सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित उनके कहानी संग्रह पथ के फूल के लिए दिया जा रहा है। दिल्लीु में 1929 में जन्मेल श्री महेन्द्रन दवेसर ‘दीपक’ के इससे पहले दो कहानी संग्रह पहले कहा होता और बुझे दीये की आरती प्रकाशित हो चुके हैं। दिल्ली में ही जन्मीक श्रीमती कादम्बलरी मेहरा अंग्रेज़ी में एम.ए. हैं और उन्हें वेबज़ीन एक्सेलनेट द्वारा साहित्य सम्मान मिल चुका है। इससे पहले उनका एक कहानी संग्रह कुछ जग की प्रकाशित हो चुका है।

इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्से ना,गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव, उषा वर्मा और मोहन राणा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियां भेजीं।

सूरज प्रकाश

लंदन में सचिन देव बर्मन – यादों के साये में कार्यक्रम का आयोजन


लंदन, एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स, लंदन एवं कथा यू.के. द्वारा नेहरू सेन्टर, लदन में आयोजित कार्यक्रम सचिन देव बर्मन – यादों के साये में आयोजित किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजन्द्र शर्मा ने कहा, “अराधना में पहली बार राजेश खन्ना पर किशोर कुमार की आवाज़ का इस्तेमाल करके सचिन देव बर्मन ने हिन्दी सिनेमा के संगीत को एक नई राह दिखाई। इस फ़िल्म के बाद एक नहीं दो दो सुपर स्टारों ने जन्म लिया – राजेश खन्ना ने एक्टर के तौर पर और किशोर कुमार ने गायक के तौर पर।”

अपने पौने दो घन्टे के पॉवर पाइण्ट प्रेज़ेन्टेशन में तेजेन्द्र शर्मा ने सचिन देव बर्मन द्वारा संगीत बद्ध गीतों के विडियो भी दिखाए जिनमें मेरा सुन्दर सपना बीत गया (भाई भाई), ठण्डी हवाएं लहरा के गाएं (नौजवान), जलते हैं जिसके लिये... (सुजाता), ओ रे मांझी... (बंदिनी), तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले (सज़ा), सर जो तेरा चकराए (प्यासा), इक लड़की भीगी भागी सी (चलती का नाम गाड़ी), इक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), कांटों से खींच कर ये आंचल (गाईड), होंठों में ऐसी बात (ज्वैल थीफ़), मेरे सपनों की रानी (अराधना)।

तेजेन्द्र शर्मा ने दिल की रानी (1947) का गीत ऐ दुनिया के रहने वालो बोलो कहाँ गया वो चोर दिखा कर दर्शकों को चकित कर दिया जब उन्होंने राज कपूर को अपनी ही आवाज़ में सचिन देव बर्मन के संगीत में झूम झूम कर गाते हुए देखा।
बर्मिंघम के जाने माने गायक डा. अजय त्रिपाठी ने मंच पर आकर जाने वो कैसे लोग थे जिनके (प्यासा) और बड़ी सूनी सूनी है.. (मिली) के गीत कैरिओकी संगीत पर गा कर दर्शकों का मन जीत लिया।

अपने शोधपूर्ण संचालन में तेजेन्द्र शर्मा ने दर्शकों को बहुत सी ऐसी जानकारी दी कि दर्शक विस्मित हुए बिना नहीं रह पाए। राहुल देव बर्मन द्वारा बचपन में बनाई गई दो धुनों का सचिन देव बर्मन का फ़ंटूश एवं प्यासा फ़िल्मों में इस्तेमाल; ऑल इंडिया रेडियो के प्रख्यात बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष द्वारा अपनी धुन जीना है इस जहान में तो मुस्कुराइये की चोरी का बर्मन दादा पर आरोप; सचिन देव बर्मन द्वारा फ़िल्मों में कैबरे गीतों की शुरूआत; साहिर लुधियानवी, शैलेन्द्र, कैफ़ी आज़मी और मजरू सुल्तानपुरी जैसे साहित्यिक शायरों एवं गीतकारों की रचनाओं का अपनी फ़िल्मों के लिये इस्तेमाल जैसी बहुत सी जानकारी तेजेन्द्र शर्मा के अनूठे संचालन से श्रोताओं को मिली।

नेहरू सेन्टर के उप-निर्देशक श्री राजेश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का परिचय दिया। एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के उपाध्यक्ष श्री शमील चौहान ने श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा, “बंगाल के रवीन्द्र संगीत की मिठास, शास्त्रीय संगीत की गहराई और मॉडर्न संगीत की थाप मिल कर सचिन देव बर्मन का संगीत बनाते हैं।”

कार्यक्रम में लंदन, बर्मिंघम, वूलवरहैम्पटन एवं मैन्चैस्टर शहरों के संगीत प्रेमियों ने भाग लिया जिनमें डा. मधुप मोहता, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार, प्रो. मुग़ल अमीन, प्रो. श्याम मनोहर पाण्डे, डा. बोस, बीबीसी हिन्दी की पूर्व अध्यक्ष डा. अचला शर्मा, दिव्या माथुर, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार, कथाकार महेन्द्र दवेसर, नाटककार इस्माइल चुनारा, रक्षा संघानी, पत्रकार मंजी पटेल वेखारिया आदि शामिल थे।

--दीप्ति शर्मा

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

कथा यू.के. के १५ वर्ष

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) द्वारा २९-३१ जनवरी २०१० को आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी -कथा समय २०१० - के अवसर पर एक अनौपचारिक कार्यक्रम में कथा यू।के. के १५ वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर कथा यू.के. की ओर से अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान पाने वाले लेखकों के साथ एक अंतरंग संवाद संपन्न हुआ। उन्हें कथा यू.के. की ओर से एक प्रतीक चिन्ह एवं उपहार भेंट किया गया। ज्ञात रहे कि कथा यूके ने पिछले १५ वर्षों में हिन्दी के जिन पन्द्रह लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया है वे इस समय हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा के महत्वपूर्ण लेखक हैं।

इस समय कथा साहित्य को लेकर आयोजित होने वाली कोई भी संगोष्ठी या कार्यक्रम इन लेखकों की भागीदारी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। इन लेखकों में असग़र वजाहत, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, संजीव, विभूति नारायण राय, ज्ञान चतुर्वेदी, भगवान दास मोरवाल, एस। आर. हरनोट, गीतांजलिश्री, अखिलेश, देवेन्द्र, धीरेन्द्र अस्थाना, प्रमोद कुमार तिवारी, मनोज रूपड़ा एवं महुआ माजी शामिल हैं।

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कथा समय २०१० (हिन्दी कथा साहित्य के दो दशक) में उपरोक्त कथाकारों में से असग़र वजाहत, संजीव, विभूति नारायण राय, एस. आर हरनोट, भगवान दास मोरवाल और महुआ माजी कार्यक्रम में शामिल हुए। साथ ही कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा एवं भारतीय प्रतिनिधि सूरज प्रकाश और अजित राय भी कार्यक्रम में मौजूद थे। इस अवसर पर आत्मीय संवाद में तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि पिछले दो दशकों में जो भी श्रेष्ठ कथा साहित्य लिखा गया, उसे कथा यू।के. ने हमेशा रेखांकित किया। यही वजह है कि पिछले १५ वर्षों में कथा यू.के. ने हर वर्ष की एक श्रेष्ठ कृति का चुनाव कर उसके लेखक को सम्मानित किया है। यह ख़ुशी की बात है कि कथा यू.के. द्वारा चयनित कृतियों को व्यापक हिन्दी समाज का समर्थन हासिल होता रहा है। और अभी तक इसको लेकर कोई अनावश्यक विवाद खड़ा नहीं हुआ। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) के कुलपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार विभूति नारायण राय की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से यहाँ साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम मिला है।

कथा समय २०१० का उद्धाटन २९ जनवरी की शाम सुप्रसिद्ध कथाकार से।रा. यात्री ने किया। इस सत्र की अध्यक्षता विभूति नारायण राय ने की जबकि बीज वक्तवय असग़र वजाहत ने दिया। कार्यक्रम का संचालन राकेश श्रीवास्तव ने किया और साहित्य विद्या पीठ के डीन सूरज पालीवाल ने स्वागत भाषण में इस संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस अवसर पर विभूति नारायण राय ने तेजेन्द्र शर्मा के कहानी संकलन क़ब्र का मुनाफ़ा (सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली) का लोकार्पण किया।

विश्वविद्यालय परिसर में महात्मा गांधी हिल के प्राकृतिक परिवेश में वरिष्ठ कथाकार और हंस के सहायक संपादक संजीव की अध्यक्षता में एक कहानी पाठ का आयोजन हुआ। इसमें अमरीक सिंह दीप (प्रलय), एस। आर. हरनोट (नदी खो गई), महुआ माजी (चंद्र बिन्दु) और तेजेन्द्र शर्मा (क़ब्र का मुनाफ़ा) ने कहानी पाठ किया। संगोष्ठी के दूसरे दिन (३० जनवरी) वरिष्ठ साहित्यकार गंगा प्रसाद विमल की अध्यक्षता में दो दशक की हिन्दी कहानियों पर खुल कर चर्चा हुई जिसमें संजीव, महुआ माजी, राजेन्द्र राजन, विरेन्द्र मोहन, वंदना राग, सनत कुमार, सुशीला टाक भवरे आदि ने भाग लिया। तेजेन्द्र शर्मा ने 'भारत के बाहर हिन्दी कथा साहित्य' विषय पर अपना लिखित आलेख पढ़ा। उन्होंने दुनिया भर में लिखी जा रही हिन्दी की महत्वपूर्ण कहानियों पर विस्तार से चर्चा की।

३० जनवरी महात्मा गांधी का शहादत दिवस होता है। समारोह की शुरुआत में दो मिनट का मौन रख कर बापू को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसी शाम कथा समय २०१० में सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत लिखित नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जमया हि नइ का मंचन राजेन्द्र नाथ के निर्देशन में श्रीराम सेंटर रंगमण्डल दिल्ली के कलाकारों ने किया। नाटक के मंचन से पहले विश्वविद्यालय के कुलपुति विभूति नारायण राय ने सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय द्वारा संपादित पुस्तक 'जिस लाहोर... नाटक के दो दशक' का लोकार्पण किया।

३१ जनवरी को पिछले दो दशकों की कथा आलोचना पर चर्चा हुई। कथा समय २०१० में उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त अब्दुल बिस्मिल्लाह, विरेन्द्र यादव, सूरज प्रकाश, भगवान दास मोरवाल, वसन्त त्रिपाठी, मीनाक्षी जोशी, मृदुला शुक्ल सहित विश्वविद्यालय के अध्यापकों, और शोध छात्रों ने शामिल हुए।
- सूरज प्रकाश

रविवार, 29 नवंबर 2009

यू.के. में भाषिक कंप्यूटिंग और मल्टी मीडिया कार्यशालाएँ

२७ सितंबर से ११ अक्तूबर २००९ के बीच यू.के. के विभिन्न शहरों में भारत से आए रेल मंत्रालय के पूर्व निदेशक डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा द्वारा संस्कृति यू.के. के महासचिव श्री अरुण त्रिवेदी और लंदन स्थित भारतीय उच्चायुक्त कार्यालय के हिंदी व संस्कृति अताशे श्री. आनंद कुमार के सहयोग से हिंदी और अन्य इंडिक भाषाओं में भाषिक कंप्यूटिंग और मल्टी मीडियी हिंदी शिक्षण पर विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। साथ ही हिंदू सोसायटी और अंकुर आर्टस अँड कल्चरल सोसायटी के तत्वावधान में हिंदी शिक्षकों और शिक्षार्थियों के लिए हिंदी सीखने-सिखाने के लिए मल्टी मीडिया प्रस्तुति का आयोजन भी किया गया। इन कार्यशालाओं में विभिन्न व्यवसायों से जुड़े भारतीयों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। अधिकांश प्रतिभागी अपने लैपटॉप के साथ कार्यशाला में पहुँचे।

कार्यशालाओं की इस शृंखला का आरंभ २७ सितंबर २००९ लंदन के गुजराती बहुल क्षेत्र वेंबले में हुआ। इसकी अध्यक्षता लंदन स्थित भारतीय राजदूतावास के हिंदी व संस्कृति अताशे श्री आनंद कुमार ने की। आशा के विपरीत इस कार्यशाला में गुजराती और हिंदी के अलावा बंगाली प्रतिभागियों ने भी भाग लिया। इस कार्यशाला के प्रतिभागियों में मुख्य रूप से चार्टर्ड अकाउंटेंट, व्यवसायी, शिक्षक, सरकारी कर्मचारी, छात्र और गृहिणियाँ थीं। इस कार्यशाला की उपलब्धि यह रही कि इनमें से अधिकांश प्रतिभागी अब गुजराती, बंगला या हिंदी में ई-मेल आदि भेजने लगे हैं। अगली कार्यशाला १ अक्तूबर २००९ को फिंचले (लंदन) स्थित हिंदू कल्चरल सोसायटी के प्रांगण में आयोजित की गई। इस कार्यशाला में युवा और बुजुर्ग दोनों ही प्रकार के प्रतिभागी थे और ये सब लोग हिंदी में कंप्यूटर पर काम करने के लिए बहुत ही उत्साही थे। तीसरी कार्यशाला वेल्स की राजधानी कार्डिफ़ में इंडिया हाउस में स्थित मंदिर के प्रांगण में आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता 'गोपिओ' के अध्यक्ष श्री के.एन.गुप्ता ने की। इस कार्यशाला में भी अनेक डॉक्टर, पत्रकार, बुद्धिजीवी और स्वयं मंदिर के पुजारी भी शामिल हुए और कई प्रतिभागियों ने उसी दिन हिंदी कंप्यूटिंग की शुरुआत की। चौथी कार्यशाला का आयोजन कलासंगम की अध्यक्षा श्रीमती गीता उपाध्याय और उनके पति श्री उपाध्याय के सान्निध्य में ब्रैडफर्ड के वास्तुकला की दृष्टि से अत्यंत भव्य भवन में किया गया। पाँचवी और अंतिम कार्यशाला का आयोजन हिंदी व संस्कृति अताशे श्री आनंद कुमार के सान्निध्य में लंदन स्थित भारत के राजदूतावास में ६ अक्तूबर २००९ को किया गया, जिसमें हिंदी के अलावा, पंजाबी, नेपाली और मलायलम भाषियों के अलावा हिंदी के प्रसिद्ध लेखक श्री तेजेंद्र शर्मा और हिंदी प्रेमी श्री के बी एल सक्सेना ने भी भाग लिया। इस कार्यशाला में हिंदी और संस्कृत के साथ-साथ भाषिक कंप्यूटिंग में भी निष्णात सुश्री कविता वाचक्नवी ने भी हिंदी में वेबसाइट निर्माण पर अपने अनुभव सुनाए।

रविवार, 30 अगस्त 2009

लन्दन के नेहरू केन्द्र में बी.आर. चोपड़ा का अभिनंदन


एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा लन्दन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक रंगारंग कार्यक्रम में हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा के महत्वपूर्ण निर्माता निर्देशक बी.आर.चोपड़ा की उपलब्धियों का लेखा जोखा श्रोताओं के सामने रखा गया। कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि बी.आर. चोपड़ा अपने समय से बहुत आगे की फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक थे। उन्होंने हमेशा सामाजिक सच्चाइयों से जुड़ी फ़िल्मों का निर्माण किया; आम आदमी की समस्याओं को अपनी फ़िल्मों का विषय बनाया मगर मनोरंजन का दामन नहीं छोड़ा। उनकी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि उन्हें विषयों की तलाश में मदद करती थी। नया दौर (१९५७) संभवतः उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कही जा सकती है। मनुष्य बनाम मशीन जैसे ज्वलंत विषय को बी.आर.चोपड़ा ने बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है साथ ही ओ.पी.नैय्यर के पंजाबी लोक धुनों पर आधारित सुरीले संगीत ने विषय को सार्थक सहयोग दिया है।''

नेहरू केन्द्र की निदेशिका मोनिका मोहता ने कार्यक्रम की शुरुआत में श्रोताओं का स्वागत करते हुए एशिय कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी एवं तेजेन्द्र शर्मा को कार्यक्रम के लिए धन्यवाद दिया। तेजेन्द्र शर्मा, जो नेहरू सेंटर से लंबे अरसे से जुड़े हैं, ने बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित फ़िल्म वक़्त (१९६५) के कुछ दृश्य दिखाए और अनेक फ़िल्मों के पीछे की कहानियाँ दर्शकों को सुनाईं। कार्यक्रम में एक नया रंग भरने के लिए युवा गायक (रॉयल कॉलेज और म्यूज़िक) जटानील बैनर्जी ने फ़िल्म गुमराह की साहिर लिखत नज़म गा कर सुनाई – 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।' गिटार पर उनका साथ दिया निखिल ने।त्रिनिदाद की बहनों कृष्णा एवं कैमिलिता ने 'रेश्मी शलवार कुर्ता जाली का...' पर मज़ेदार नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।शायद बी.आर चोपड़ा की सोच के अनुसार कार्यक्रम में मनोरंजन का पुट डाला गया था। कार्यक्रम की समाप्ति में महाभारत का वह अंश दिखाया गया जिस में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं, ''यदा यदा ही धर्मस्य ग्लनिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य स्वात्मानं सृजाम्यहम, परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम, धर्मसंस्थापनार्थाय, संभवामि युगे युगे।'' उपस्थित दर्शक समूह एकमत से कह उठे कि इस कार्यक्रम से इस से बढ़िया समाप्ति हो ही नहीं सकती थी।

- दीप्ति कुमार

'प्रवास में पहली कहानी' का लंदन में लोकार्पण


कथा यू.के. ने लंदन के नेहरू केन्द्र में उषा वर्मा एवं चित्रा कुमार द्वारा संपादित ब्रिटेन की हिन्दी-उर्दू की महिला कथाकारों द्वारा लिखी गई पहली कहानी के संग्रह प्रवास में पहली कहानी का लोकार्पण समारोह आयोजित किया। समारोह की अध्यक्षता बीबीसी हिन्दी सेवा रेडियो की पूर्व-अध्यक्ष अचला शर्मा ने की जबकि संचालन का भार सँभाला भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार ने। बर्मिंघम से पधारी विदुषी डॉ. वन्दना मुकेश शर्मा ने कहानी संग्रह पर एक लम्बा लिखित लेख पढ़ा। कहानी संग्रह की संपादिका उषा वर्मा ने आने वाली पीढ़ी को सम्बोधित करते हुए कहा, ''यदि मैं तुम्दारी पीढ़ी में इन किताबों के माध्यम से जीवित रहूँ तो यही मेरी मुक्ति है।'' काउंसलर ग्रेवाल ने सुझाव दिया कि इन कहानियों का अंग्रेज़ी में अनुवाद करवाकर ब्रिटेन के पुस्तकालयों में पहुँचाया जाना चाहिए। भारत से पधारे प्रो. अब्दुल सत्तार दलवी (मुम्बई) ने इस पूरी परियोजना की प्रशंसा करते हुए कहा कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को भी बढ़ावा मिलेगा और इस तरह के अन्य संकलन भी निकलने चाहिये। समारोह में कीर्ति चौधरी की कहानी का पाठ बर्मिंघम निवासी कृति यू.के. की अध्यक्ष तितिक्षा शाह ने किया।

अध्यक्ष अचला शर्मा ने इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम के लिए संपादक द्वय एवं कथा यूके को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार के संकलन साहित्य को एक अलग दृष्टि से देखने में सहायक होते हैं। कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि इस प्रकार के संकलन विदेश में बसे भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने सूचित किया कि जल्दी ही एक और कहानी संकलन का विमोचन नेहरू केन्द्र में होगा जिसमें ब्रिटेन के उर्दू कहानीकारों की कहानियों हिन्दी साहित्य-जगत के सामने अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत की जाएँगी। कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, डॉ. कृष्ण कुमार (बर्मिंघम), डॉ. महेन्द्र वर्मा (यॉर्क), कैलाश बुधवार, गौतम सचदेव, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, नरेश भारतीय, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, स्वर्ण तलवाड़, रमा जोशी, सफ़िया सिद्दीक़ि, बानो अरशद, पद्मेश गुप्त, डॉ. श्याम मनोहर पाण्डे, चाँद शर्मा, हमीदा मोइन रिज़वी (हैदराबाद, भारत), डॉ. ख़ूबचन्दानी (पुणे), डॉ. वशीमी शर्मा, डॉ. मुज़फ्फ़र शमीरी, डॉ. सुरेश अवस्थी, डॉ. जयकिशन, डॉ. फ़ातिमा परवीन, मोहम्मद क़ासिम दलवी भी उपस्थित थे।

- नूपुर अहूजा

रविवार, 26 जुलाई 2009

१५ वाँ अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान संपन्न


(बैठे हुए बाएँ से मोहन राणा, ज़कीया ज़ुबैरी, टोनी मैकनल्टी, मधु अरोड़ा, श्रीमती मोहन राणा। खड़े हुएः आनंद कुमार, तेजेन्द्र शर्मा, विभाकर बख़्शी, के.सी. मोहन, रवि शर्मा, इंदिरा, अजित राय) लंदन (१० जुलाई), ब्रिटेन के सांसद और पूर्व आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री टोनी मैक्नल्टी ने ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स में आयोजित एक गरिमामय समारोह में हिन्दी के सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल को उनकी अनुपस्थिति में १५ वाँ अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया। किसी कारणवश मोरवाल पुरस्कार लेने लंदन नहीं आ सके। यह सम्मान मोरवाल के नवीनतम उपन्यास 'रेत' (राजकमल प्रकाशन) के लिये दिया गया। उनकी ओर से यह सम्मान उनके मित्र और दिल्ली के सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय ने प्राप्त किया। इस अवसर पर उन्होंने ब्रिटेन के हिन्दी लेखकों के लिए स्थापित 'पद्मानंद सम्मान' ब्रिटिश हिन्दी कवि मोहन राणा को उनके ताज़ा कविता संग्रह 'धूप के अन्धेरे में' (सूर्यासेत्र प्रकाशन) के लिये प्रदान किया। इस सम्मान का यह दसवाँ साल है।

टोनी मैक्नल्टी ने लंदन एवं ब्रिटेन के अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में आए एशियाई लेखकों और ब्रिटिश साहित्य प्रेमियों को संबोधित करते हुए कहा कि भाषा संगीत की तरह होती है। यदि आप किसी दूसरे की भाषा समझते हैं तो आप ज़िन्दगी की लय को समझ सकते हैं। दूसरों की भावनाओं को समझ सकते हैं। भाषा में आप सपने रच सकते हैं। इस तरह भाषा के माध्यम से आप मनुष्यता तक पहुँच सकते हैं। उन्होंने हिन्दी में अपना भाषण शुरू करते हुए कहा की भाषाओं के माध्यम से हम सभ्यताओं के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि आपकी पहचान होती है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में बसे एशियाई समुदाय के बीच भाषा और साहित्य के माध्यम से संवाद स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रही है।

हाउस ऑफ़ लॉर्डस में भारतीय मूल के सांसद लॉर्ड तरसेम किंग ने कहा कि ब्रिटेन जैसे देश में सारी भाषाएँ एक दूसरे की पूरक हैं। अंग्रेज़ी जानना हिन्दी का विरोध नहीं है। उन्होंने कहा कि कथा यू.के. भाषा और साहित्य के क्षेत्र में काम कर रही संस्थाओं के बीच समन्वय का काम कर रही है।

लेबर पार्टी की काउंसलर और कथा यू.के. की सहयोगी संस्था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्ष ज़कीया ज़ुबैरी ने भगवानदास मोरवाल के पुरस्कृत उपन्यास 'रेत' का परिचय देते हुए कहा कि लेखक ने काफ़ी शोध के बाद एक ऐसी कथा पेश की है जिसका समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाना चाहिए। इस उपन्यास में कंजर जाति की स्त्रियों के जीवन संघर्ष का ऐसा प्रमाणिक चित्रण है कि पाठक चकित रह जाता है।

लंदन में नेहरू सेंटर की निदेशक मोनिका कपिल मोहता ने कहा कि कथा यू.के. को अब ब्रिटेन के साथ साथ युरोप, अमरीका और अन्य देशों में भी अपनी गतिविधियों की नेटवर्किंग करनी चाहिए। भारतीय उच्चायोग में मंत्री समन्वय आसिफ़ इब्राहिम ने कहा कि भाषा एवं संस्कृति के बिना जीवन अधूरा है। इसे बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिये। उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी आनंद कुमार ने कथा यू.के. के प्रयासों की सराहना करते हुए विदेशों में हिन्दी के नाम पर हो रही गतिविधियों में गंभीरता और गुणवत्ता लाने की वक़ालत की।

कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने १५ वर्षों की कथा-यात्रा को याद करते हुए कहा कि मुंबई से शुरू हो कर हम ब्रिटेन की संसद तक पहुँचे हैं। अब हम अपनी गतिविधियों को नया विस्तार देना चाहते हैं। कथा यू.के. आने वाले दिनों में विदेशों में और भारत में हिन्दी भाषा और साहित्य से जुड़े कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन करने जा रही है। इससे विश्व स्तर पर हो रहे निजि प्रयासों की नई नेटवर्किंग सामने आएगी।

इस अवसर पर मोहन राणा ने सम्मान स्वीकार करते हुए अपनी नई कविताओं का पाठ किया। पुरस्कृत उपन्यास रेत उपन्यास पर सुशील सिद्धार्थ एवं मोहन राणा के काव्य संकलन 'धूप के अन्धेरे' में पर गोबिन्द प्रसाद के आलेखों का पाठ किया गया। इंदु शर्मा की पुत्री दीप्ति कुमार ने भगवानदास मोरवाल और ललित मोहन जोशी ने मोहन राणा का परिचय दिया। मधु अरोड़ा (मुंबई) ने कथा यू.के. १५ वर्षों की यात्रा का विवरण दिया। सरस्वती वंदना जटानील बैनरजी ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन किया सनराइज़ रेडियो के लोकप्रिय कलाकार रवि शर्मा ने।

कथा यू.के. के इस आयोजन में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती एवं अंग्रेज़ी भाषा के लेखक बड़ी संख्या में शामिल हुए। पूर्व पद्मानंद सम्मान विजेता डॉ. गौतम सचदेव, दिव्या माथुर एवं गोविन्द शर्मा के अतिरिक्त समारोह की गरिमा बढ़ाने के लिए मौजूद थे सर्वश्री मधुप मोहता, प्रो. अमीन मुग़ल, प्रो. जगदीश दवे, बलवन्त जानी (भारत), के.सी. मोहन (प्रलेस - पंजाबी), डॉ. इतेश सचदेव (सोआस विश्विद्यालय), कैलाश बुधवार, डॉ. नज़रूल इस्लाम, अचला शर्मा, वेद मोहला, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार एवं इन्द्र स्याल, इलाहबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुधीर नारायण सक्सेना, अनुज अग्रवाल (सूर्यास्त्र प्रकाशन), डॉ. हबीब ज़ुबैरी, महेन्द्र दवेसर, जय वर्मा, डॉ. महीपाल वर्मा, विभाकर बख़्शी एवं रमेश पटेल।

दीप्ति कुमार, (संयोजक – कथा यू.के. सम्मान समिति)

रविवार, 24 मई 2009

१५वें कथा यू.के. सम्मान की घोषणा

कथा (यू.के.) के मुख्य सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष २००९ के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए राजकमल प्रकाशन से २००८ में प्रकाशित उपन्‍यासकार श्री भगवान दास मोरवाल के उपन्यास "रेत" का चयन किया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास-खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री मोरवाल को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में ०९ जुलाई २००९ की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जाएगा। इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गई थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान सुश्री चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस.आर. हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असगर वजाहत, महुआ माजी एवं नासिरा शर्मा को प्रदान किया जा चुका है।

२३ जनवरी १९६० को नगीना, मेवात में जन्मे भगवान दास मोरवाल ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल की। उन्हें पत्रकारिता में डिप्लोमा भी हासिल है। मोरवाल के अन्य प्रकाशित उपन्यास हैं काला पहाड़ (१९९९) एवं बाबल तेरा देस में (२००४)। इसके अलावा उनके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दिल्ली हिन्दी अकादमी के सम्मानों के अतिरिक्त मोरवाल को बहुत से अन्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनके लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएँ उभर कर सामने आती हैं। उनके पात्र हिन्दू-मुस्लिम सभ्यता के गंगा जमुनी किरदार होते हैं। कंजरों की जीवन शैली पर आधारित उपन्यास रेत को लेकर उन्हें मेवात में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
वर्ष २००९ के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान श्री मोहन राणा को उनके कविता संग्रह "धूप के अन्धेरे में" (२००८ – सूर्यास्त्र प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया जा रहा है। मोहन राणा का जन्म १९६४ में दिल्ली में हुआ। वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मानविकी में स्नातक हैं, आजकल ब्रिटेन के बाथ शहर के निवासी हैं। उनके ६ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। भारत में साहित्य की मुख्यधारा के आलोचक उन्हें हिन्दी का महत्वपूर्ण लेखक मानते हैं। कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार - हिंदी कविता की नई पीढ़ी में मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है, क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता।

इससे पूर्व इंग्लैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डॉ.अचला शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना, गोविंद शर्मा, डॉ. गौतम सचदेव और उषा वर्मा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियाँ भेजीं।