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गुरुवार, 2 मई 2013

येल विश्वविद्यालय में कथा गोष्ठी का आयोजन


अप्रैल २०१३ में, येल विश्वविद्यालय में वहीं के दक्षिण एशियाई अध्ययन परिषद् और सीमा खुराना जी के सहयोग एवं सुषम जी के निर्देशन में कथा-गोष्ठी (कहानी-वर्कशॉप) का आयोजन किया गया जिसमें कई सम्मानित, स्थापित एवं नए कथाकारों ने भाग लिया। सुषम जी येल विश्वविद्यालय में ‘राइटर इन रेज़िडेंस’ के तौर पर आमंत्रित थीं इसलिए इस बार वहीँ पर कथा गोष्ठी हुई और गोष्ठी का विषय था ‘डायस्पोरा से सम्बंधित कहानियां!’

इस कहानी-वर्कशॉप में सभी कथाकारों ने क्रम से अपनी लिखी हुई कहानी पढ़ी और हर कहानी सुनने के बाद श्रोताओं ने उस कहानी विशेष के बारे में अपना विचार व्यक्त किया और सुषम जी ने कहानी के विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए टिपण्णी दी। कथा-गोष्ठी में येल विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में पढ़ाने वालों एवं कई हिंदी प्रेमिओं ने भाग लिया। इनमें सुषम बेदी और सीमा खुराना के साथ-साथ वरिष्ठ लेक्चरर गीतांजलि चंदा, स्वप्ना शर्मा, स्वदेश राणा, आस्था नवल, राधा गुप्ता, चारु अग्रवाल, राहुल बेदी, सुनील खुराना, संगीता जग्गी, विशाखा ठाकर, सविता नायक इत्यादि ने भाग लिया। इसके साथ ही येल विश्वविद्यालय के हिंदी पढ़ने वाले कुछ विद्यार्थियों, अखिल सूद, शौनक बक्शी, शांतनु गंगवार, आनंद खरे, स्मिता शुक्ला ने भी भाग लिया। कुछ कथाकार एवं भाग लेने वाले लोग काफी दूर से या दूसरे राज्यों से भी आये थे। पहले से कुछ अलग और विशेष यह था कि इस बार विद्यार्थिओं ने भी इस वर्कशॉप में हिस्सा लिया, सबकी कहानियां सुनीं और हर कहानी पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

कथा गोष्ठी का शुभारंभ करते हुए सुषम जी ने कहानी वर्कशॉप के विषय में कुछ शब्द कहे और फिर एक-एक करके सभी कथाकारों को अपनी कहानी पढ़ने के लिए आमंत्रित किया।

सर्प्रथम सविता नायक ने अपनी कहानी ‘वीकेंड’ पढ़ी। कहानी पर अपना विचार व्यक्त करते हुए सुषम जी ने कहा कि इस कहानी में यह बात उठाई गई है कि हर किसी में संवेदनशीलता तो रहती है पर कैसे सरोकार बदल जाते हैं।

तत्पश्चात आस्था नवल ने अपनी कहानी ‘एमी’ पढ़ी जो एक तलाकशुदा लड़की के बारे में है और पूछा कि वह इसको लेख कहें या कहानी कहें, क्या यह कहानी होगी? इस पर स्वदेश राणा जी ने कहा कि इस कहानी में संवेदनशीलता है और साथ में यह भी कहा कि अगर संवेदनशीलता हो तथा कलम उठाने की ताकत हो तो कहानी अपने आप बन जाती है।

सुषम जी ने कहानी पर अपना विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि नए प्रवासी कहानीकार ‘ऑन लुकर’ की तरह होते हैं। उनकी भागीदारी जितनी अपनी संस्कृति में होती है उतनी भागीदारी यहाँ की ज़िंदगी में नहीं होती है इसलिए उनको कहानी ‘एमी’ ‘ऑन लुकर’ की दृष्टि से लिखी गई कहानी की तरह लगती है। आगे कहानी विषय पर चर्चा और अपने विचार व्यक्त करते हुए सुषम जी ने कहा कि कहानी पर अपनी ज़िंदगी की बातों का, पृष्ठभूमि का प्रभाव होता है। कोई भी कलाकार हो, उसकी कलाकृति या कहानी में उसकी पृष्ठभूमि रहती है।

तत्पश्चात स्वदेश राणा जी ने अपनी कहानी ‘निष्कलंकिनी’ की पृष्ठभूमि बताई। उन्होंने कथा गोष्ठी में अपनी कहानी के मुख्य पात्रों ‘अम्बुजम’, ‘फिलिप’ इत्यादि का परिचय दिया और कहानी के कुछ अंश पढ़े। सुषम जी ने कहा कि स्वदेश जी का ‘अंदाज़े बयान’ काबिले तारीफ़ होता है। अखिल सूद ने ‘निष्कलंकिनी’ कहानी के बारे में कहा कि वह इस कहानी से बहुत आनंदित हुए और जिस तरह से कहानी शुरू हुई, मुख्य पात्रों का परिचय इत्यादि जिस ढंग से बताया गया वह सब कुछ इतना समृद्ध लगा कि इस कहानी के कुछ अंश सुनना निसंदेह सम्मोहित कर देने वाला अनुभव था। सविता नायक ने कहा कि स्वदेश जी की कहानी की भाषा बहुत समृद्ध और विवरण शैली अद्भुत है। एक और प्रश्न के उत्तर में सुषम जी ने कहा कि लेखक ‘क्रिएट(सृजन) करता है। अतः लेखक अपने पात्रों को बनाता है पर वह पात्र स्वयं को खुद ही जीते हैं।’

कथा गोष्ठी के दूसरे भाग की शुरुआत में सर्वप्रथम विशाखा ठाकर ने अपनी कथांतर में प्रकाशित कहानी ‘गलीचा’ पढ़ी। सीमा खुराना ने अपनी कहानी ‘बूढ़ा शेर’ पढ़ी। सुषम बेदी ने अपनी कहानी ‘चेरी फूलों वाले दिन’ पढ़ी। विद्यार्थिओं ने तीनों कहानिओं पर एक साथ अपनी प्रतिक्रिया देते हुए ‘गलीचा’ कहानी को रोमांचक, ‘बूढ़ा शेर’ कहानी को ‘संबंधों पर केंद्रित’ तथा ‘चेरी फूलों वाले दिन’ को भावपूर्ण और नाना-नानी एवं दादा-दादी की याद दिला देने वाली कहानी बताया। अखिल सूद ने ‘गलीचा’ कहानी के बारे में कहा कि यह एक सुखद कथा थी जिसकी कि शुरुआत ने ही सुन्दर ढंग से पूरी कहानी को स्वर प्रदान किया और सुनने वालों को सचेत रखा और कहा कि सुषम जी और सीमा जी की कहानियां अच्छी और भावपूर्ण थीं और कथा गोष्ठी में सभी लेखकों को सुनना निश्चय ही अच्छा अनुभव रहा।
 
कथा गोष्ठी में कहानी के विभिन्न भागों, लेखन प्रक्रिया इत्यादि पर हो रही चर्चा को सुनकर स्मिता शुक्ला ने कहा कि ‘कभी सोचा नहीं था कि कहानी के किरदारों के लिए इतना सोचना पड़ता है!’ और डायस्पोरा से सम्बंधित कहानिओं को सुनकर उन्होंने यह भी कहा कि ‘डायस्पोरा हमारी कहानी का हिस्सा है और वह कथा गोष्ठी में ऐसी कहानिओं को सुनकर स्वयं को उनसे ‘रीलेट’ (जुड़ा हुआ महसूस) कर पायीं।’

डायस्पोरा की बात पर गीतांजलि चंदा ने विद्यार्थिओं से उनका मत जानने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया कि उन्होंने कहानी सुनने के बाद किस बात से जाना कि कहानी डायस्पोरा से सम्बंधित थी या नहीं? कुछ और लोगों ने भी ‘डायस्पोरा से जुड़ी कहानी’ को अधिक स्पष्ट भाव से जानना चाहा। इस विषय पर चर्चा हुई और स्पष्ट किया गया कि ‘डायस्पोरा’ वह स्थिति है जिसमें जब किसी एक संस्कृति के लोग दूसरी संस्कृति के लोगों से मिलते हैं तो जिस तरह से उस स्थिति को देखते, समझते और निभाते हैं, उन्हीं को दर्शाती/बताती हुई बातों/कहानिओं को हम ‘डायस्पोरा से सम्बंधित’ कहते हैं।

सीमा खुराना ने विद्यार्थिओं से उनका मत जानने के लिए प्रश्न किया कि क्या (उनके द्वारा) कहानी को पसंद करने के लिए उस कहानी का डायस्पोरा से सम्बंधित होना ज़रूरी है? इस प्रश्न के उत्तर में सभी छात्रों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की जिसका संक्षेप में निष्कर्ष यह रहा कि उनको प्रवासी जीवन के बारे में पढ़ना अच्छा लगता है मगर उनके द्वारा कहानी को पसंद करने के लिए हर कहानी का प्रवासी जीवन से जुड़ा होना आवश्यक नहीं है। अतः उनको ऐसी कहानी पढ़ना अच्छा लगता है जो रोचक हो और उनकी उत्सुकता को बनाए रखे।

सुषम जी ने कथा गोष्ठी के विषय में कहा कि कहानी वर्कशॉप शुरू करने का मुख्य उद्देश्य यही था कि लिखने वाले आपस में मिल कर चर्चा कर सकें। उन्होंने कहा कि जब लिखने और सुनने वाले मिलते हैं तो कई बार कहानीकार जो कुछ भी लिख रहा था उससे हटकर कुछ और लिखने का प्रयास भी करने लगता है और कहा कि यह बात उन्होंने स्वयं पर भी लागू होती पाई और इसीलिए इस बार उन्होंने पहले जैसे विषयों पर कहानी लिखने से हटकर एक अलग विषय पर कहानी लिखने की कोशिश की।

हर बार की तरह इस बार भी कथा गोष्ठी बहुत सफल रही। विस्तृत विचार-विमर्श एवं विद्यार्थिओं की सह-भागिता ने इसको अद्वितीय बना दिया। ‘कनेटिकट’ दूर होने की वजह से हिंदी, पंजाबी और उर्दू के कई रचनाकार एवं न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के बहुत से साहित्य प्रेमी इस बार की कथा गोष्ठी में भाग नहीं ले सके और आशा करते हैं कि शीघ्र ही कथा गोष्ठी का आयोजन न्यू यॉर्क या किसी निकट स्थान पर भी होगा।

- सविता नायक

बुधवार, 9 मई 2012

कोलंबिया विश्वविद्यालय में कथा गोष्ठी का आयोजन

शुक्रवार ४ मई, २०१२ को कोलंबिया विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर, सुप्रसिद्ध उपन्यासकार और रंगमंच, आकाशवाणी एवं अभिनय क्षेत्र में अपने कौशल का अमिट प्रभाव रखने वाली सुषम बेदी जी के नेतृत्व में “हिंदी, उर्दू और पंजाबी कहानी गोष्ठी” का आयोजन किया गया। इस कहानी गोष्ठी में बहुत से अनुभवी एवं स्थापित कहानीकारों ने भाग लिया। इसके साथ ही उभरते हुए कहानीकारों एवं साहित्य में रूचि रखने वाले बहुत से लोगों ने भी भाग लिया। गोष्ठी का शुभारंभ भाग लेने वाले लोगों के परिचय से हुआ। उपस्थित स्थापित गल्प लेखकों और उभरते हुए प्रतिभावान लेखकों ने क्रमशः अपनी-अपनी रचनाओं को पढ़ा। इनमें सर्वप्रथम न्यू यार्क विश्वविद्यालय की हिंदी विभाग की प्रोफ़ेसर, हास्य-व्यंग्य की प्रसिद्ध कवियित्री एवं रचनाकार बिंदेश्वरी अग्रवाल जी ने “चली आ सुनंदा” नाम की कहानी पढ़ी। यह समीर, सुनंदा और मारिया की कहानी है। इस कहानी में प्रवासी जीवन की विषमताओं को दर्शाया गया है। 

तत्पश्चात येल विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर, लेखिका एवं साहित्यिक रूचि रखने वाली सीमा खुराना जी ने कहानी “बूढ़ा शेर” पढ़ी। इस कहानी में सार्थकता, प्रभाविकता और कहानी के अन्य तत्वों का समावेश बहुत संतुलित रूप में हुआ है। इस कहानी की सभी ने सराहना की। रवि जी ने कहा कि ‘कहानी “बूढ़ा शेर” बहुत कुछ प्रवासी लोगों के अनुभव की तरह है जिसमें पुराने तरीकों को छोड़कर नए तरीकों को अपनाया जाता है परन्तु शायद पुरानी मान्यताओं का ही परिणाम है कि कहीं न कहीं यह एक-दूसरे से ऐसे गुंधे हैं कि यह ‘पुराना और नया’ अविभाज्य हो जाते हैं।

सुषम जी ने अपनी नई लिखी कहानी “पड़ोस” पढ़ी। यह कहानी एमा और अरविन की कहानी है। एमा यहूदी है और महायुद्ध के समय की विषमताओं से पीड़ित है, इसीलिए दुखी रहती है। इस बात का ज्ञान पाठक को लगभग कहानी के अंत में होता है और एमा की पीड़ा जानकार मन दुःख और सहानुभूति से भर उठता है। आफताब जी ने कहा कि उपरोक्त तीनों कहानीकारों की कहानी की सार्थकता संभवतः लेखक के द्वारा उस पल को जीने में निहित है। रवि जी ने “पड़ोस” कहानी के विषय में विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह कहानी विदेशों में रह रहे प्रवासिओं के अनुभव की मर्मस्पर्शी कथा है जिसमें कहानी के प्रारंभ में पाठक के मन में बहुत से प्रश्न आते हैं पर लेखिका अंत में बखूबी उनका उत्तर दे देती हैं। इस गोष्ठी के अवसर पर अनिलप्रभा जी की लघु-कथाओं पर आधारित प्रथम प्रकाशित पुस्तक “बहता पानी” का विमोचन हुआ और उस पर विशेष रूप से चर्चा हुई। कहानी गोष्ठी की आयोजक सुषम बेदी जी ने अनिलप्रभा जी की पुस्तक की प्रस्तावना में कहा कि अनिलप्रभा जी की कहानियों में सार्थकता और पाठक के मन को छू लेने की प्रभाविकता है। सुषम जी ने बताया कि कैसे अनिलप्रभा जी की सर्जनात्मकता शक्ति को देखते हुए वे अक्सर उनको लिखना प्रारम्भ करने को कहती रहीं लेकिन अनिलप्रभा जी ने हमेशा अपने परिवार को प्राथमिकता दी लेकिन अब जब उनको अपने उत्तरदायित्वों से कुछ अवकाश मिला तो उन्होंने ये कहानी संग्रह लिखा। उन्होंने अनिलप्रभा जी के संकलन में से कुछ कहानियों के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अनिलप्रभा जी की कहानी “उसका इंतज़ार” प्रवासी भारतीयों के जीवन, उनकी समस्याओं और मूल्यों के टकराव के बारे में है। सुषम जी ने बताया कि “बहता पानी” कहानी उनको विशेष रूप से अच्छी लगी और ज़िक्र किया कि “मैं रमा नहीं हूँ” कहानी में औरतों को तुलनात्मक दृष्टि से देखा गया है। 

इसके पश्चात प्रोफ़ेसर सीमा खुराना जी ने, अनिलप्रभा जी की पुस्तक “बहता पानी” के बारे में लिखी गई ‘रूपसिंह चंदेल जी’ की समीक्षा पढ़ी। चंदेल जी द्वारा लिखी गयी समीक्षा न केवल रचनाकार बल्कि पाठकों के लिए भी बहुत उपयोगी और प्रेरित करने वाली है। चंदेल जी के शब्दों में “अनिलप्रभा कुमार का कथाकार रचना की अंतर्वस्तु की मांग को बहुत बखूबी जानता पहचानता है और उसे अपने सुगठित शिल्प और सारगर्भित भाषा में पाठकों से परिचित करवाता है।” अशोक व्यास जी ने अनिलप्रभा जी की कहानी “बहता पानी” के विषय में कहा कि उनकी कहानी पढ़कर ऐसा लगता है जैसे कोई संवेदना की सोई हुई नदी को जगा देता है और कहानी “उसका इंतज़ार” को सयंत और भावनात्मक बताया।

कोलंबिया विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग के प्रोफ़ेसर और उभरते हुए कहानीकार संदीप जी ने “फुलकारी” नाम की पंजाबी कहानी पढ़ी। अपनी कहानी की प्रस्तावना में उन्होंने बताया कि यह कहानी स्त्री की उन भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है जो दिन-ब-दिन हमारे समाज से लुप्त होती जा रही हैं। इस कहानी में ‘फुलकारी/ओढ़नी’ दहेज की एक वस्तु मात्र न होकर स्त्री के अरमानों की एक ऐसी पुष्पमय लता है जिसके ऊपर कढ़ाई किए गए रंग-बिरंगे बेल-बूटों को स्त्री अपने जीवन में सर्वदा खिला हुआ देखना चाहती है। इसके साथ ही यह कहानी हमारे सभ्याचार में पड़ रही दरार को भी दर्शाती है और उन प्रवासी भारतीयों की विचारधारा पर भी कटाक्ष करती है जो विवाह तो पंजाब में करना चाहते हैं किन्तु पंजाबी नैतिक मूल्यों को घटिया समझ कर धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। आगे संदीप जी कहते हैं कि यही कारण है कि “फुलकारी” कहानी में लड़की मन ही मन सोचती है कि उसका पति इतना पढ़-लिख कर भी केवल काले अक्षरों को ही पहचान पाया है, उसकी भावनाओं की कद्र करना नहीं जान पाया इसलिए वो शिक्षित होकर भी अशिक्षित के समान है। संदीप जी ‘गागर में सागर’ की तरह कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कहने की क्षमता रखते हैं।

अशोक व्यास जी ने बहुत वर्षों तक आकाशवाणी में भी कार्य किया है और दूरदर्शन एवं साहित्य जगत में भी खूब जाने जाते है। इन्होंने “बस दो कदम” शीर्षक वाली ‘काव्यगत एवं नाटकीय’ कहानी पढ़ी। कहानी में एक स्त्री का डॉक्टर से वार्तालाप है जिसमें वो अपने बीमार पति को लेकर बात कर रही है। क़ुतुब मीनार को कहानी का सन्देश देने का माध्यम बनाया गया है। कहानी में रोचकता और रसमयता को बनाए रखने में यह शैली सफल रही है। इस रचना के द्वारा कुछ पृथक ढंग से यह सन्देश देने की कोशिश की गई है कि कैसे हम अपने स्वार्थ में डूबकर छोटे हो रहे हैं, बौने हो रहे हैं और हम में ‘ऊँचाई’ यानि महानता कम होती जा रही है। गोष्ठी में विद्यमान लोगों ने इस रचना की अनूठी शैली की सराहना की और रवि जी ने कहा कि “बस दो कदम” सर्जनात्मक है और ‘जादुई यथार्थवाद’ की शैली में है। 

कहानी गोष्ठी में, हर कहानी के पश्चात उस कहानी पर प्रश्न-उत्तर, चर्चा और आलोचना अपेक्षित है। अतः इस गोष्ठी में भी हर कहानी सुनने के पश्चात गोष्ठी में विद्यमान साहित्य प्रेमी अपनी प्रतिक्रिया प्रगट करते और प्रश्न-उत्तर और प्रतिक्रियाओं का सिलसिला चलता; जैसे “इस कहानी की प्रेरणा कहाँ से मिली?” “कहानी में लेखक का हस्तक्षेप अधिक है” “कहानी में यथार्थता है” “कहानी का शिल्प अति सुंदर है” “इस कहानी का अंत ऐसा क्यों किया गया?” इत्यादि। इसके साथ ही कोलंबिया यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर राकेश रंजन जी ने भारतीय साहित्य के इतिहास के महत्वपूर्ण तथ्यों इत्यादि पर विस्तृत जानकारी दी जोकि उनके साहित्यिक अनुभव एवं रूचि को दर्शाती है। वे कितनी ही महत्पूरण बातें कितने कम समय और कम शब्दों में झट से बता देने की क्षमता रखते हैं और उनसे हमेशा कुछ न कुछ उपयोगी साहित्यिक जानकारी मिलती है।
 
कहानी विधा पर अपने शोधपूर्ण विचार प्रगट करते हुए कोलंबिया विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफ़ेसर दलपत जी ने कहा कि दुनिया की हर सभ्यता में कहानी एक प्रमुख माध्यम रहा है जिसके द्वारा नीति, धर्म, लोक विश्वास, लोक व्यवहार, परंपरिक और सांस्कृतिक ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी संचरित होता रहा है। कहानी कहना मनुष्य की सहज कलात्मक वृत्ति है इसलिए इसकी रक्षा करना अपने आप में एक सांस्कृतिक दायित्व को निभाना है। फिर दलपत जी ने नामवर सिंह जी की कहानी संबंधी आलोचना पर बात करते हुए ये भी कहा कि ‘उन्होंने कहानी का सौंदार्यशास्त्र निर्मित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया और उनके द्वारा दिया गया पारिभाषिक शब्द ‘सार्थकता’ कहानी को प्रभावशाली विधा के रूप में स्थापित करता है क्योंकि वे कहते हैं “कहानी जीवन की छोटी से छोटी घटना में भी अर्थ ढूँढ लेती है या उसे अर्थ प्रदान करती है।”

कोलंबिया विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के प्रोफ़ेसर आफताब जी ने कहानी में रूचि रखने वाले एक पाठक की दृष्टि से अपने अनुभव एवं विचार बताते हुए कहा कि समय के साथ-साथ कुछ कहानियों को पसंद करने के विषय में उनकी विचारधारा में परिवर्तन आया है किन्तु कुछ कहानियाँ आज भी पहले की तरह अच्छी लगती हैं। हमेशा अच्छी लगने वाली कहानियों में कौन सी बात एक जैसी थी? इसके बारे में विचार करने पर उनको ये अनुभव हुआ कि कहानी में ‘कहानीपन’ होना कहानी को ‘पठनीय’ बनाता है और कहानी का शिल्प सशक्त होना आवश्यक है यानि अगर कहानी में ऐसे तत्व हों जो पाठक के विचारों और भावनाओं के जगत में कुछ हलचल मचाते हैं, उसके अंतर्मन में कुछ भूला बिसरा जगा देते हैं, तो ऐसी कहानी अच्छी होगी। अच्छी कहानी की समाप्ति पर पाठक को लगता है कि उसके अंदर कुछ नया जुड़ गया है, वह मानव जीवन और समाज के कुछ पहलुओं के बारे में ज़्यादा सजग और संवेदनशील हो गया है, उसके कुछ पूर्वाग्रह टूटे हैं, उसकी दृष्टि में कुछ नयापन और गहराई आ गई है, और उसका हृदय कुछ और कोमल हो गया है।
  
इस गोष्ठी की चर्चा में, हिंदी यू एस ए और युवा हिंदी संस्थान की कार्यकर्ता और सिटी कॉलेज की प्राध्यापक सविता नायक, तथा अंकिता ननचहल जोकि भारत से कुछ ही समय के लिए अमेरिका आई हैं और न्यू योर्क विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं, उन्होंने भी भाग लिया। इस गोष्ठी में मीना जी ने प्रथम बार भाग लिया। मीना जी वास्तुकार हैं और पिछले ४३ वर्षों से मनहट्टन, न्यू योर्क में रह रही हैं। उन्होंने गोष्ठी के बारे में अपना अनुभव बताते हुए हार्दिक प्रसन्नता दर्शायी और कहा कि संभवतः वास्तुकला जैसे रचनात्मक क्षेत्र में होने के फलस्वरूप ही वे साहित्य के क्षेत्र में भी रूचि रखती हैं क्योंकि यह भी तो रचनात्मक क्षेत्र है! उनके साथ ही गोहली मदान जी ने भी गोष्ठी में भाग लेने को अद्भुत अनुभव बताया और कहा कि वह अगले वर्ष की गोष्ठी में भी अवश्य आना चाहेंगी! गोष्ठी में विविध सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले एवं विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के साथ मनोवैज्ञानिक विश्लेषणात्मक सामाजिक कार्य करने का अनुभव एवं साहित्य में रूचि रखने वाले मनोचिकित्सक रवि भसीन जी ने भी भाग लिया। वह पिछले ३० वर्षों से न्यू योर्क में रह रहे हैं। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उनको इस सांस्कृतिक और साहित्यिक तौर पर समृद्ध, लाभप्रद और संतोषप्रद अधिवेशन में आकर बहुत ख़ुशी हुई और कहा कि इस गोष्ठी में कई रचनाकारों की रचनाएं, पुस्तक और ‘काव्यगत एवं नाटकीय कहानी’ शामिल थे। इसके साथ ही उन्होंने मिल-जुलकर गोष्ठी के रूप में इस प्रवासी शिक्षाप्रद प्रक्रिया को जारी रखने की बात कही।  

अंत में यही कहना चाहूंगी कि कोलंबिया विश्वविद्यालय में ज्ञानवान और स्थापित लेखकों की छत्रछाया और साहित्य प्रेमी एवं विचारकों के मध्य मिल-जुलकर होने वाली इस गोष्ठी की चर्चा से नए उभरते, प्रतिभावान रचनाकारों को लेखन के लिए सुझाव और मन को उत्साह मिला। इस गोष्ठी में प्रथम बार भाग लेने वाले लोगों को भी इस गोष्ठी में सुनी रचनाओं और उन रचनाओं पर हुई चर्चा से लाभ हुआ है। आशा है कि भविष्य में भी ऐसी चर्चाएँ होती रहेंगी, और रचनाकार अपनी काल्पनिक और सर्जनात्मक शक्ति का प्रयोग करते हुए ऐसी रचनाओं को लिखते रहेंगे जो पढ़ने-सुनने वालों के मन में अपने देश की मिट्टी, भाषा, संस्कृति और साहित्य के प्रति स्नेह और सम्मान पैदा करें।

-- सविता नायक

मंगलवार, 8 मई 2012

डॉ. अनिल प्रभा कुमार की पुस्तक “बहता पानी” का विमोचन

न्यूयॉर्क के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में ४ मई को अनिलप्रभा कुमार के कहानी –संग्रह “बहता पानी” का विमोचन हुआ। दक्षिण- एशिया संस्थान के अन्तर्गत “कहानी- मंच” की ओर से इस कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध लेखिका सुषम बेदी ने की। डॉ. सुषम बेदी ने अनिल प्रभा के लेखन का परिचय देते हुए कहा कि संवेदनशीलता का प्रेषण उनके कहानी-लेखन की विशेषता है। उन्होंने कहा कि अनिलप्रभा की कहानियाँ अमरीका में रहने वाले भारतीयों के मूल्यों से जुड़ी हुई कहानियाँ हैं। उनकी कहानियों में यहाँ की रोज़मर्रा की स्थितियों को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। वह कहानियों में गहरे तक डूबकर उसको गहन संवेदना के साथ व्यक्त करती हैं। वह शिल्प के प्रति भी सजग हैं और यह शिल्प की विशिष्टता उनकी कहानियों में दृष्टव्य है। येल विश्वविद्यालय की सीमा खुराना ने भारत के प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार रूपसिंह चन्देल द्वारा “बहता पानी” कहानी संग्रह पर व्यक्त किए गए विचार पढ़े।

इस लेख में अनिलप्रभा कुमार की कहानियोंका बहुत गहन और सूक्ष्म विवेचन किया गया। चन्देल जी ने अनिल प्रभा की कहानियों के विषय में कहा कि वे “गहन संवेदना की सूक्ष्म अभिव्यक्ति” हैं। उन्होंने इन कहानियों में छुपे हुए रंगों को बहुत कलात्मकता के साथ उजागर किया। उनके विचार में, अनिलप्रभा कुमार की कहानियाँ ही नहीं, कविताओं की भी मौलिकता, भाषा की प्रांजलता और शिल्प वैशिष्टय अनूठा है।

न्यूयॉर्क स्थित आई.टी.वी के कार्यक्रम निर्देशक और लेखक श्री अशोक व्यास ने कहा कि अनिलप्रभा जी की कहानियाँ पढ़ना- सुनना संवेदना की सोई नदी को जगा देता है। उन्होंने इस संग्रह की कहानी “उसका इंतज़ार” की प्रशंसा करते हुए कहा कि अनिलप्रभा की शैली संवेदनशील पर संयत, भावनात्मक पर व्यावहारिक, विस्तृत आयामों वाली पर बारीक़ी से गढ़ी हुई शैली है। “उसका इंतज़ार” कहानी में नायिका का अवसाद पाठक के भीतर रुलाई बन कर फूट पड़ता है। उन्होंने संग्रह की एक और कहानी “किसलिए” के विषय में कहा कि जिस तरह इस एक छोटी सी कहानी में एक विस्तार को सहेजा गया है वह कहानी कथन में अनिलप्रभा जी के कौशल का प्रमाण है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

वर्जीनिया में काव्य संध्या का आयोजन

दिनांक ७ अप्रैल २०१२ को अमेरिका के वर्जीनिया राज्य में स्थित राजधानी मंदिर के प्रांगण में ‘अखिल विश्व हिंदी समिति’ की ओर से एक काव्य संध्या का आयोजन किया गया। इस काव्य गोष्ठी में स्थानीय रचनाकारों के अलावा न्यूजर्सी, फिलाडेल्फिया तथा न्यूयार्क से पधारे रचनाकारों ने भाग लिया। गोष्ठी का मुख्य विषय था ‘होली मिलन’।

आमंत्रित कवियों ने होली के त्यौहार से सम्बंधित सतरंगी रचनाओं का पाठ तो किया ही साथ में हास्य रस की रचनाओं से श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया। मंच संचालन किया विश्व प्रसिद्ध कवि श्री राकेश खंडेलवाल ने और अध्यक्षता की डॉ बिन्देश्वरी अग्रवाल ने। श्री राकेश खंडेलवाल ने समधुर गीतिकाव्य के रूप में प्रत्येक रचनाकार का मंच पर स्वागत किया तथा अपने गीतों से सब का मन मोह लिया। इस काव्य गोष्ठी में श्री घनश्याम गुप्ता, गुलशन मधुर,धनंजय कुमार, ललित आहलुवालिया अनूप भार्गव रजनी भार्गव, शशि पाधा, मधु महेश्वरी, डॉ बिन्देश्वरी अग्रवाल, विद्या पुरोहित ने रचना पाठ किया।

अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ बिन्देश्वरी अग्रवाल ने तथा अखिल विश्व हिंदी समिति की स्थानीय शाखा के अध्यक्ष श्री राकेश खंडेलवाल ने सभी अतिथियों का धन्यवाद करते हुए अनुरोध किया कि भविष्य में भी इस प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन में सहायता प्रदान करें ताकि हिंदी भाषा एवं संस्कृति के प्रचार–प्रसार की धारा अविरल गति से बहती रहे। कार्यक्रम का समापन राजधानी मंदिर कमेटी की ओर से आयोजित रात्रि भोज से हुआ।

राजधानी मंदिर के सहयोग से यह छठा कवि सम्मेलन आयोजित किया गया था| हर वर्ष होने वाले कवि सम्मेलन में अमेरिका के विभिन्न राज्यों से चुने हुये कवि इसमें भाग लेते हैं।

शशि पाधा

सोमवार, 30 मई 2011

"कौन सी ज़मीन अपनी" का विमोचन

चित्र में --दाएँ से बाएँ-- डॉ. अफ़रोज़ ताज, श्रीमती सरोज शर्मा,
श्रीमती ऊषा देव, श्रीमती बिंदु सिंह, रमेश शौनक
हिन्दी जगत की जानी- मानी कवयित्री, कहानी लेखिका, पत्रकार, रेडियो, टी.वी. तथा रंगमंच की कलाकार सुधा ओम ढींगरा के कहानी संग्रह "कौन सी ज़मीन अपनी" का विमोचन, यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलाईना के तत्त्वाधान में प्रो. अफ़रोज़ ताज द्वारा आयोजित समारोह में संपन्न हुआ। सभा का आरम्भ श्री जान काल्डवेल की स्वागत पंक्तियों और हिंदी विकास मंडल की अध्यक्षा श्रीमती सरोज शर्मा के आशीर्वाद से हुआ।

डॉ. अफ़रोज़ ताज ने सुधा ओम ढींगरा की कृतियों पर चर्चा करते हुए उनकी सीधी सरल भाषा में कहानियाँ लिखने के अंदाज़ की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने यह भी कहा कि कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वे भारत से इतनी दूर बैठी लिख रही हैं। उनकी कहानियों में आधुनिकता के साथ- साथ परम्परावाद भी है। जहाँ एक ओर पंजाब के किसानों की बात करतीं हैं तो दूसरी ओर अमरीका के अत्याधुनिक परिवेश का चित्रण भी करतीं हैं। इस समारोह में हिंदी- उर्दू जगत के कई विशिष्ट व्यक्तित्व शामिल हुए जिन्होंने न केवल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की बल्कि "कौन सी ज़मीन अपनी" की बहुत सराहना की। प्रो.अफ़रोज़ ने कहा कि सुधा जी की रचनाएँ अमेरिका के कई विश्विद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती हैं। रमेश शौनक ने सुधा जी की कहानियाँ को 'समाज की जमी हुई सिल' को तोड़ती कहानियाँ बताया और बिंदु सिंह ने " कौन सी ज़मीन अपनी" के नारी पात्रों पर चर्चा की। उनके अनुसार सुधा जी की कहानियों के नारी पात्र चुप रह कर प्रतिवाद करते हैं, शोर-शराबा नहीं करते। इनकी कहानियों की नारियाँ कभी भी अपनी परम्पराओं को नहीं भूलतीं, जो ग़लत है उसका प्रतिरोध करते हुए अपने आप को सक्षम और सशक्त बनातीं हैं। श्रीमती सीमा फ़ारूखी ने सुधा जी की "एग्ज़िट" कहानी को अपनी ही कहानी बताते हुए कहा कि इन की कहानियाँ हमारी आम ज़िन्दगी से बहुत जुड़ी हुई हैं।

श्रीमती उषा देव ने पंकज सुबीर और अदिति मजूमदार ने अखिलेश शुक्ल की "कौन सी ज़मीन अपनी" पर लिखी समीक्षाएं पढ़ीं। अंत में सुधा जी की 'एग्ज़िट' कहानी का उन्हीं के द्वारा पाठ हुआ।  रंगमंच और रेडियो से जुड़े होने के कारण उनके कहानी पढ़ने के अंदाज़ से लोग मन्त्र -मुग्ध हो गए। रात्रि -भोज के साथ सभा का समापन हुआ।

नॉर्थ कैरोलाईना में कपूर परिवार को संगीत, दृश्य, नाटक, ध्वनि व प्रकाश का नज़राना

गत दिवस हिन्दी विकास मंडल एवं शिडोरी प्रोडक्शंज़ ने बालीवुड के कपूर परिवार को हिन्दू भवन (मोर्रिस्विल्ल, नॉर्थ कैरोलाईना) के सभागार में संगीत, दृश्य, नाटक , रौशनी एवं ध्वनी के सम्मिश्रण से सजा शो प्रस्तुत कर श्रद्धांजलि भेंट की। २५ कलाकारों ने इस शो में हिस्सा लिया। स्टेज पर आर. के. स्टूडियो का सेट बनाया गया था और शो का आरंभ आर. के. स्टूडियो का दरवाज़ा खुलने पर हुआ और साथ ही आरंभ हुई इसकी कहानी।

देवयानी नाम की फ़िल्म अभिनेत्री जो अपने समय में राज साहब को चाहती थी पर राज कपूर ने उसे स्वीकार नहीं किया था...उसकी रूह आर. के. स्टूडियो में भटकती रहती है और जब भी स्टूडियो के दरवाज़े खुलते हैं तो वह स्वयं को जिंदा महसूस करने लगती है। स्टेज पर वह यूवी लाईट में उभरती है यानि एक सफेद साड़ी दर्शकों के सामने आती है और बोलना शुरू करती है तभी आर. के. स्टूडियो में टंगे चाँद में से समय की आवाज़ उभरती है। इस तरह से दोनों के संवादों से चार पीढ़ियों की कहानी कही गई।

इसकी परिकल्पना की थी रवि देवराजन ने और निर्देशक भी वही थे। कपूर परिवार के बारे में शोध किया था बिंदु सिंह ने। सुधा ओम ढींगरा और बिंदु सिंह ने पटकथा और संवाद लिखे। आवाज़ दी रवि देवराजन और सुधा ओम ढींगरा ने। नाटकीय सहयोग था अफ़रोज़ ताज, जॉन काल्डवेल और रमेश कलाग्नानम का। रूह का रोल निभाया सुधा ओम ढींगरा ने। स्वरों का जादू बिखेरा -भारती जावलकर, रवि कल्मथ, श्रीराम कृष्णास्वामी, प्रशांति श्रीनिवासन, एवं जयशंकर स्वामीनाथन। आर. के. स्टूडियो का सेट और कॉस्टयूम डिज़ाईन किए हिमगौरी देशमुख, वनश्री सेलुकर, अनु वीरकर, विद्या अर्वपल्ली, भावना सिंह, बिंदु सिंह एवं अंनत सिंह ने। गीत- संगीत के परामर्श दाता थे -कृष्ण जोशी एवं सम्पदा जोशी। रौशनी, विडिओ एवं ध्वनी अभियंता क्रमशः थे -संजय भस्मे, वेणु रावी, शिवा रघुनानन, राजीव रामराजन, राज पटेल एवं मोहन वेंकटाचलम।

सुवास शाह, अतीश कटारिया, अदिति मजूमदार, समिता तोशनिवाल की सहायता और भावना सिंह, अर्जुन देवराजन और नफीसा शेख़ के नेतृत्व में युवा वर्ग का सहयोग सराहनीय था। करीना जावेलकर, अनामिका, अपर्णा एवं चिराग़ सत्संगी का साथ अतुलनीय था। कार्यक्रम का संयोजन किया था बिंदु सिंह ने। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि हॉल खचाखच भर गया था और बहुत से लोगों को कार्यक्रम देखे बिना निराश लौटना पड़ा। यह कार्यक्रम स्थानीय कलाकारों ने मिल कर तैयार किया था और यह अपनी तरह का पहला कार्यक्रम नॉर्थ करोलाईना के ट्राईएंगल एरिया में हुआ। इससे प्राप्त धन हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगाया जायेगा।