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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

सृजन द्वारा ‘डॉ हरि‍वंश राय बच्चन का रचना संसार ’ संगोष्ठी आयोजित

विशाखापटनम। ७ जनवरी २०१३ साहि‍त्य, संस्कृति‍ एवं रंगकर्म के प्रति‍ प्रति‍बद्ध स्थानीय संस्था ‘सृजन’ ने टोयो इंजीनीयरिंग कंपनी लिमिटेड के सौजन्य से द्वारकानगर पब्लिक लाइब्रेरी में ‘‘डॉ हरि‍वंश राय बच्चन का रचना संसार‘ पर संगोष्ठी का आयोजन कि‍या। स्वागत भाषण करते हुए डॉ. संतोष अलेक्स, संयुक्त सचि‍व, सृजन ने ‘सृजन’ की गति‍वि‍धि‍यों का वि‍वरण देते हुए इस संगोष्ठी. के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा - स्व. बच्चन जी की ग्यारहवीं पुण्य ति‍थि‍ के अवसर पर यह संगोष्ठीस आयोजि‍त की जा रही है, बच्चन जी के साहित्य पर उतना काम नहीं हुआ जितना होना चाहिए, अभी भी काफी काम किया जाना शेष है।
 
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त प्रसिद्ध कवि, अनुवादक एवं सेवानिवृत्त वरिष्ठ हिन्दी आचार्य प्रो. पी आदेश्वर राव ने हिन्दी साहित्य के इतिहास में बच्चन की अमिट और अमर साहित्य की महत्ता को रेखांकित करते हुये उनके साथ अपनी एक मुलाक़ात का विवरण देते हुये उनकी लोकप्रियता से संबंधित बातें बतायीं। उन्होने कहा ‘’मधुशाला’’ जैसी अजर और अमर कृति‍ के सर्जक बच्चान ने अपनी काव्यतमयी प्रति‍भा का परि‍चय बखूबी दि‍या है साथ ही हि‍न्दीम साहि‍त्यक का अब तक की श्रेष्ठ आत्म्कथा लि‍खकर सि‍द्ध कर दि‍या हे कि‍ गद्य में भी उनका कोई सानी नहीं है। अपनी कवि‍ताओं में, गीतों में, लेखों में और अनुवादों में अपनी वि‍शि‍ष्ट ता का परि‍चय हरि‍वंश राय बच्चमन ने दि‍या है।

कार्यक्रम की अध्येक्षता कर रहे सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने बच्चन के साहित्य संसार को अद्भुत और अमर धरोहर बताते हुये उनके अनुवादों के विषय में बताया की अंग्रेजी, अरबी और उर्दू से हिन्दी में किया गया अनुवाद मौलिकता का आभास देता है और ऐसे सहज लगते हैं जैसे हम शेक्सपियर और उमर खयाम की मूल रचनाएँ पढ़ रहे हैं। संगोष्ठी का संचालन कर रहे सृजन के सचिव डॉ. टी. महादेव राव ने अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा कि बच्चन अपनी सारी रचनाओं में चाहे वह गद्य हो या पद्य हो मानवीयता के प्रति असीम विश्वास रखते थे। उन्होने हालावाद का कभी समर्थन नहीं किया बल्कि वे मधुशाला को प्रतीक के रूप में लेकर मानव जीवन के संघर्ष, नैतिक मूल्य, समसमाज के कल्याण चाहने वाले मानवतावादी रचनाकार रहे। वादों से दूर हटकर उन्होंने साहित्य रचा जो की हर पाठक के हृदय को अब भी छूता है। ऐसे कवि, गद्यकार, अनुवादक जैसे बहुआयामी रचनाकार के प्रति हर हिन्दी प्रेमी नतमस्तक है।

संगोष्ठीज में राघवेंद्र प्रताप अस्थाना ( मधुशाला की रुबाइयाँ), श्रीमती सीमा वर्मा (बच्चन-कविता ने जिन्हें लिखा), श्रीमती सीमा शेखर (बच्चन के गीतों में प्रेमाभिव्यक्ति), रामप्रसाद यादव (बच्चन की रचना प्रक्रिया), डॉ. संतोष एलेक्स (छायावादोत्तर काल और बच्चन), नीरव वर्मा (बच्चन के साहित्य पर बचपन की नारियों का प्रभाव), कपिल कुमार शर्मा (बच्चन और प्रकृति का संबंध), जी अप्पाराव “राज” ( मधुशाला पर कविता), देवनाथ सिंह (बच्चन का रचना संसार), डॉ टी महादेव राव (बच्चन की दर्शनिकता का प्रतीक – मधुशाला) ने अपने अपने पत्र प्रस्तुत किए जिनमें डॉ हरिवंश राय बच्चन जी के साहित्य के विविध पहलुओं पर विश्लेषण थे। योगेंद्र सिंह यादव (मॉर्निंग वॉक), डॉ एम सूर्यकुमारी (माँ की तड़प), के विश्वनाथाचारी (खास और कुछ नहीं) ने भी अपनी बात संगोष्ठी में रखी।

इस कार्यक्रम में डॉ बी वेंकट राव, राजेश कुमार गुप्ता, बी एस मूर्ति, एन शेखर, सीएच ईश्वार राव सहि‍त अन्यव लोगों ने भी सक्रि‍य प्रति‍भागि‍ता की। प्रतिभागियों को स्मृतिचिह्न प्रो. पी. आदेश्वर राव ने वितरित किए। डॉ संतोष एलेक्स के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।


डॉ. टी. महादेव राव
सचिव – सृजन

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

सृजन ने आयोजित की “हिन्दी रचना गोष्ठी”


१० दिसंबर, विशाखापटनम के द्वारकानगर स्थित जन ग्रंथालय के सभागार में हिन्दी साहित्य और रंगमंच के प्रति प्रतिबद्ध संस्था “सृजन” ने हिन्दी रचना गोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने की जबकि संचालन का दायित्व निर्वाह किया संयुक्त सचिव डॉ संतोष अलेक्स ने । डॉ॰ टी महादेव राव, सचिव, सृजन ने आगंतुकों का स्वागत किया और रचनाओं के सृजन हेतु समकालीन साहित्य के अध्ययन और समकालीन सामाजिक दृष्टिकोण को विकसित करना पर बल देते हुये कहा – हमारे पिछले लेखन और सृजन से आज हम कितना आगे बढ़े हैं, बढ़े भी हैं या नहीं इन कमियों और खूबियों का स्व-विश्लेषण करने पर ही हम रचनाओं में स्तरीयता ला सकते हैं, नया सृजन रचनाओं का कर सकते हैं, वरना रूटीन सा सृजन आपको ज्यादा दिन तक संतोष नहीं दे पाएगा, जैसा कि मैं समझता हूँ। निरंतर समकालीन साहित्य का पठन भी हम रचनाकारों के लिए ज़रूरी है।

अपने अध्यक्षीय सम्बोधन में नीरव वर्मा ने कहा कि हमारे आसपास, समाज में और देश में हो रही घटनाओं पर हमारा विशाल और विश्लेषणात्मक अध्ययन होना चाहिए। तब जाकर हम जिन रचनाओं का सृजन करेंगे वह न केवल प्रभावशाली होगा बल्कि पाठक भी उस रचना से आत्मीयता महसूस करेंगे। संयुक्त सचिव डॉ संतोष अलेक्स ने कार्यक्रम के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुये कहा – आज का रचनाकार आम आदमी के आसपास विचरने वाली यथार्थवादी और प्रतीकात्मक रचनाओं का सृजन करता है। इस तरह के रचना गोष्ठी कार्यक्रम आयोजित कर साहित्य के विविध विधाओं, विभिन्न रूपों, प्रवृत्तियों से अवगत कराना ही हमारा उद्देश्य है।

कार्यक्रम में सबसे पहले बीरेन्द्र राय ने अपना लेख “आधुनिक युग का लेखा जोखा” पढ़ा जिसमें आज के समाज में बदलते मानव-मूल्यों और धूमिल होते मानवीय सम्बन्धों की बात कही गई। कपिल कुमार शर्मा ने “पंछी टोली” और “बेटी” शीर्षक कविताओं में वियोग और विरह के दर्द के समेटे व्यक्ति के मन की स्थिति और बेटी की आज समाज में जरूरत का वर्णन था। डॉ एन डी नरसिंहा राव ने “आधुनिक रसखान की सोच” कविता उसी शैली में सुनाई जिसमें रसखान लिखते थे। डॉ शकुंतला बेहुरा ने अपने मौलिक संस्कारों और भोलेपन से बदलते गांवों की बात कविता “भारत के गाँव” में पेश किया। तोलेटी चन्द्रशेखर ने सामाजिक व्यवस्था की विसंगतियों पर दो व्यंग्य कवितायें – “सोचता रहता हूँ” और “कितना बिल हुआ?” प्रस्तुत किया। रामप्रसाद यादव ने एक गजलनुमा कविता और “है नहीं मंजूर अब” कविता आम आदमी की विवशताओं और स्थितियों पर सुनाया। डॉ एम सूर्यकुमारी ने स्त्री विमर्श की कविता “क्षमया धरित्री” सुनाई। बी एस मूर्ति ने शारीरिक अंगों को प्रतीक के रूप में प्रयोग करते हुये कविता “ पाँव विराम” पढ़ी, जबकि देबनाथ सिंह ने स्मृतियों से घिरे एकाकी मनुष्य पर “यादें” एक आशावादी कविता “ आशा ज़िंदगी है” पेश की। कहानी “मशीन और उम्मीद” में नीरव वर्मा ने एक गरीब दीना की व्यथा गाथा मार्मिकरूप में प्रस्तुत की। जी अप्पा राव “राज” ने कुछ व्यंग्योक्तियाँ सुनाई। मीना गुप्ता ने “क्योंकि मैं लड़की हूँ” कविता में समाज में नारी की महत्ता पर बल दिया। डॉ. टी महादेव राव ने दो गीत “क्यों नहीं ये अश्रु बहते?” और “शीत की सुबह” सुनायी जिसमें वर्तमान समाज के बदलते स्वार्थी तौर तरीके और शीत ऋतु में प्रकृति की सुंदरता में अकेलेपन को अभिव्यक्ति दी गई थी। डॉ संतोष एलेक्स कश्मीरी पंडितों की व्यथा गाथा दर्शाती “इंतज़ार” और खास और आम की बात को लेकर “आम” कवितायें पेश कीं।

कार्यक्रम में अशोक गुप्ता, डॉ बी वेंकट राव, योगेंद्र सिंह यादव, सीएच ईश्वर राव ने भी सक्रिय भागीदारी की। सभी रचनाओं पर उपस्थिं‍त कवि‍यों और लेखकों ने अपनी अपनी प्रति‍क्रि‍या दी। सभी को लगा कि‍ इस तरह के सार्थक हि‍न्दीप कार्यक्रम अहि‍न्दीभ क्षेत्र में लगातार करते हुए सृजन संस्थान अच्छाव काम कर रही है। डॉ टी महादेव राव के धन्य‍वाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। ‍
    
डॉ॰ टी महादेव राव

बुधवार, 7 नवंबर 2012

सृजन ने आयोजित किया “हिन्दी व्यंग्य साहित्य” पर चर्चा कार्यक्रम

विशाखापटनम, ४ नवंबर । हिन्दी साहित्य, संस्कृति और रंगमंच के प्रति प्रतिबद्ध संस्था “सृजन” ने आज “हिन्दी व्यंग्य साहित्य” पर चर्चा कार्यक्रम का आयोजन विशाखापटनम के द्वारकानगर स्थित जन ग्रंथालय के सभागार में किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री रामप्रसाद ने की जबकि संचालन का दायित्व निर्वाह किया सचिव डॉ. टी महादेव राव ने।

डॉ. टी. महादेव राव ने हिन्दी व्यंग्य साहित्य पर कार्यक्रम के विषय में चर्चा करते हुये कहा – व्यंग्य लिखने के तरीके, शैलियाँ बदली ज़रूर हैं, पर अब भी व्यंग्य साहित्य मानव जीवन की विद्रूपताओं को अपने ढँग से उजागर करते हुये बेहतर समाज का संदेश देते हैं। निंदक नियरे राखिए की तर्ज़ पर हमारे आसपास रहकर यह व्यंग्य हमारी कमजोरियों से हमें निजात दिलाते हैं। एक स्वस्थ व्यंग्य में बहुत शक्ति होती है सामाजिक परिवर्तन की। जीवन की विभिन्न घटनाओं, परिस्थितियों को रचनाकार की गहन दृष्टि और यथार्थपरक चिंतन के साथ मिलकर व्यंग्य रचना की सृष्टि करती हैं और इस तरह व्यंग्य चाहे वह किसी भी विधा में क्यों न हो मनुष्य के करीब धड़कती, अनंत काल से चली आ रही एक सतत प्रक्रिया है। सृजन का हिन्दी व्यंग्य साहित्य पर चर्चा इसी दिशामें किया जा रहा एक प्रयास है।

श्री रामप्रसाद ने कहा कि इस तरह के चर्चा कार्यक्रमों द्वारा विशाखापटनम में हिन्दी साहित्य सृजन को पुष्पित पल्लवित करना, नए रचनाकारों को रचनाकर्म के लिए प्रेरित करते हुये पुराने रचनाकारों को प्रोत्साहित करना सृजन का उद्देश्य है। व्यंग्य साहित्य पर कार्यक्रम का उद्देश्य रचनाकारों को व्यंग्य लेखन की ओर प्रेरित करते हुये उन्हें मार्ग-दर्शन देना है।

कार्यक्रम में सबसे पहले देवनाथ सिंह ने चुनावी वायदे, रथ से, तत्सम शब्दों पर कविता शीर्षक से तीन व्यंग्य रचनाएँ प्रस्तुत कीं, जिनमें आज के राजनीतिज्ञों का कच्चा चिट्ठा खोला गया थाऔर विविध प्रलोभनों से जनता को गुमराह करते नेताओं और आज के प्रेमियों पर व्यंग्य कसा गया था। व्यंग्य कथा “बदल लो अपनी कहानी का शीर्षक” सुनाई जी एस एन मूर्ति नेजिसमें दूसरों पर छींटें कसते खुद को पाक साफ बताते कालोनी के निवासियों पर अच्छा कटाक्ष था। डॉ एम सूर्यकुमारी ने आज के भवन बनाते अनपढ़ मजदूरों के द्वारा केवल भवन निर्माण ही नहीं चरित्र निर्माण किए जाने की बात पूँजीपतियों के संदर्भ में सरल किन्तु प्रभावी शब्दों में अपनी कविता “अँधेरा” में प्रस्तुत किया। डॉ टी महादेवराव ने अपने व्यंग्य लेख “हाय मैं कहाँ फँसा?” में आज के अवसरवादी स्वार्थी कवियों को बिम्ब बनाकार वर्तमान मानव की मानसिकता, परिस्थिति जन्य राजनीति और अवसरवादी मनुष्य पर व्यंग्य कसा।

कार्यक्रम में श्रीधर, सीएच ईश्वर राव, शंकर राव, एन टाटा राव, एम सिवाराम प्रसाद ने भी सक्रिय भागीदारी की। सभी रचनाओं पर श्रीरामप्रसाद ने विवरणात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया और कहा कि सार्थक और ईमानदार प्रयास सिद्ध करते हैं कि उपस्थि कवि‍यों और लेखकों की रचनाधर्मिता में एक स्तरीय सृजन है। सभी ने अपनी अपनी प्रति‍क्रि‍या दी। सभी को लगा कि‍इस तरह के सार्थक चर्चा कार्यक्रम लगातार करते हुए सृजन संस्था साहित्य के पुष्पन औरपल्लवन में अच्छाक काम कर रही है।

डॉ. टीमहादेव राव

सोमवार, 4 जून 2012

सृजन द्वारा “हिन्दी व्यंग्य साहित्य” पर चर्चा आयोजित

विशाखापटनम॰ ४ जून। हिन्दी साहित्य, संस्कृति और रंगमंच के प्रति प्रतिबद्ध संस्था “सृजन” ने आज “हिन्दी व्यंग्य साहित्य” पर चर्चा कार्यक्रम का आयोजन विशाखापटनम के द्वारकानगर स्थित जन ग्रंथालय के सभागार में किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सृजन के सचिव डॉ॰ टी महादेव राव नीरव कुमार वर्मा ने की जबकि संचालन का दायित्व निर्वाह किया संयुक्त सचिव डॉ संतोष अलेक्स ने।

डॉ॰ टी महादेव राव ने हिन्दी व्यंग्य साहित्य पर कार्यक्रम के विषय में चर्चा करते हुये कहा – व्यंग्य  लिखने के तरीके, शैलियाँ बदली ज़रूर हैं, पर अब भी व्यंग्य  साहित्य मानव जीवन की विद्रूपताओं को अपने ढंग से उजागर करते हुये बेहतर समाज का संदेश देते हैं।  निंदक नियरे राखिए  की तर्ज़ पर हमारे आसपास रहकर यह व्यंग्य हमारी कमजोरियों से हमें निजात दिलाते हैं। एक स्वस्थ व्यंग्य में बहुत शक्ति होती है सामाजिक परिवर्तन की। जीवन की विभिन्न घटनाओं, परिस्थितियों को रचनाकार की गहन दृष्टि और यथार्थपरक चिंतन के साथ मिलकर व्यंग्य रचना की सृष्टि करती हैं और इस तरह व्यंग्य चाहे वह किसी भी विधा में क्यों न हो  मनुष्य के करीब धड़कती है, अनंत काल से चली आ रही एक प्रक्रिया है। सृजन का हिन्दी व्यंग्य साहित्य पर चर्चा इसी दिशा में किया जा रहा एक प्रयास है।

डॉ संतोष अलेक्स ने कहा कि इस तरह के चर्चा कार्यक्रमों द्वारा विशाखापटनम में हिन्दी साहित्य सृजन को पुष्पित पल्लवित करना, नए रचनाकारों को रचनाकर्म के लिए प्रेरित करते हुये पुराने रचनाकारों को प्रोत्साहित करना सृजन का उद्देश्य है। कथा साहित्य पर कार्यक्रम का उद्देश्य रचनाकारों को कहानी लेखन की ओर प्रेरित करते हुये उन्हें मार्गदर्शन देना है।  कार्यक्रम में सबसे पहले कपिल कुमार शर्मा ने “ पेट्रोल की कीमतें” शीर्षक कविता में आज आम आदमी जिन समस्याओं से जूझ रहा है जैसे बढ़ती कीमतें, भ्रष्टाचार, राजनीति से पीड़ित आम आदमी की व्यथा गाथा, उसका खुलासा अपनी व्यंग्य शैली में किया।  “सेवक और मालिक” कविता में बी एस मूर्ति ने स्तरों के अंतर, सोच और काम के मूल्यांकन के अंतर को वक्रोक्ति शैली में किया। व्यंग्य साहित्य शीर्षक से व्यंग्य की स्थिति पर एन डी नरसिंहा राव ने अपना लेख पढ़ा! समकालीन समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान व्यंग्य कविता “ व्यंग्य गीत” में श्रीमती सीमा शेखर ने प्रस्तुत किया। जी एस एन मूर्ति ने राजनीति और भ्रष्टाचार से लिप्त गुंडे राजनीतिज्ञों पर करारे व्यंग्य से भरी  लघुकथा “ धरती अब भी घूम रही है” पढ़ी।

लक्ष्मी नारायण दोदका ने वर्तमान परिस्थितियों का लेखा जोखा अपनी व्यंग्य रचना “ वेश्या और समाज” में चित्रित की। एक कंजूस व्यक्ति की व्यथा गाथा पर व्यंग्य “ मुनाफा” शीर्षक लघु कथा में तोलेटी चंद्रशेखर ने सुनाई। श्रीमती बी शोभावती ने हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध रचनाकार रेणु (पंचलाईट), प्रेमचंद (पूस की रात), विष्णु प्रभाकर (धरती अब भी घूम रही है) की कहानियों में निहित व्यंग्य का समग्र विश्लेषण अपने लेख “व्यंग्य और साहित्य” में प्रस्तुत किया। पति पत्नी के बीच के सम्बन्धों में उपस्थित व्यंग्य का खाका अपनी शैली में डॉ एम सूर्य कुमारी ने अपनी कविता “जोरू का गुलाम” में खींचा।  अपने व्यंग्य लेख “ राष्ट्रीय पशु” में डॉ टी महादेव राव ने पशु प्रवृत्तियों की बिम्ब बनाकार वर्तमान मानव की मानसिकता, परिस्थितिजन्य राजनीति और अवसरवादी मनुष्य पर करारा कटाक्ष किया।  डॉ संतोष एलेक्स ने “परसाई – व्यक्तित्व और कृतित्व” लेख में व्यंग्य साहित्य के प्रख्यात रचनाकार हरीशंकर परसाई और उनकी रचनाओं पर विवरण विश्लेषणात्मक शैली में प्रस्तुत किया। 
           
कार्यक्रम में डॉ पद्मा रानी, श्रीधर, ताता राव ने भी सक्रिय भागीदारी की। सभी रचनाओं पर उपस्थि ‍त कवि‍यों और लेखकों ने अपनी अपनी प्रति‍क्रि‍या दी। सभी को लगा कि‍ इस तरह के सार्थक  चर्चा कार्यक्रम लगातार करते हुए सृजन संस्थार साहित्य के पुष्पन और पल्लवन में अच्छार  काम कर रही है। डॉ संतोष अलेक्स‍ के  धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।
              
- डॉ॰ टी महादेव राव

सोमवार, 28 नवंबर 2011

सृजन ने आयोजि‍त की वि‍वि‍ध वि‍धाओं की हि‍न्दी साहि‍त्य चर्चा

विशाखापटनम की हि‍न्दी साहि‍त्य, संस्कृति‍ एवं रंगमंच को समर्पि‍त संस्था “सृजन” ने दि‍नांक ३० अक्टूबर २०११ को डाबा गार्डन्स स्थित पवन एनक्लेसव के प्रथम तल पर वि‍वि‍ध वि‍धाओं की हि‍न्दीस साहि‍त्य चर्चा का आयोजन कि‍या। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. टी महादेव राव, सचि‍व, सृजन ने की जबकि‍ संचालन कि‍या सृजन के अध्ययक्ष नीरव कुमार वर्मा ने। स्वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम एवं सृजन संबंधी वि‍वरण प्रस्तुजत कि‍या सृजन के संयुक्त सचि‍व डॉ. संतोष अलेक्स ने। सृजन ने हाल ही में दि‍वंगत हि‍न्दी‍ के मूर्धन्य साहि‍त्यसकार श्रीलाल शुक्ल तथा सृजन के वरि‍ष्ठ सदस्य, राजभाषा अधि‍कारी ओम प्रकाश एवं सृजन के समर्थक, हि‍न्दी कार्यक्रम अधि‍शासी आकाशवाणी रमणन स्वामी को दो मि‍नट का मौन रखकर श्रद्धांजलि‍ अर्पि‍त की।

कार्यक्रम में सबसे पहले श्रीमती मीना गुप्ता ने दीपावली पर्व को अंधेरे पर उजाले की जीत बताते हुए कवि‍ता “दीप पर्व” सुनाया। साथ ही टीवी धारावाहि‍कों से प्रभावि‍त वर्तमान जीवन शैली पर अपनी कवि‍ता “मेरे घर आई सुनामी” प्रस्तुत की। श्रीमति‍ श्वेता कुमारी ने स्त्री शक्ति‍ की बढती उपलब्धि‍यों का लेखा जोखा अपनी कवि‍ता “नारी” में प्रस्तुत किया। वि‍श्वनाथाचारी ने अपनी “धरती और आकाश” कवि‍ताओं के माध्यम से प्रकृति‍ की महत्ता दर्शाई। अपनी व्यंग्य क्षणि‍काओं, गीत “हि‍न्दी से हि‍न्दुस्तान” लेकर प्रस्तुात हुए जी.अप्पांराव ‘राज’ जि‍समें भारत की महानता का बखान था। श्री जी. ईश्वदर वर्मा द्वारा “तमसोमा ज्योदर्ति‍गमय” में दुर्जनों पर सज्जनों के द्वारा द्वि‍गुणि‍त दीप जलाकर उजाला करने का आह्वान कि‍या गया। पवन कुमार गुप्ता ने “मां का दूध” कवि‍ता पढी जबकि‍ श्रीनि‍वास ने “शि‍क्षक” एवं “महान भारत” कवि‍ताएँ प्रस्तुतत कीं। इसी क्रम में रामप्रसाद यादव ने “मन क्यों नहीं लगता?” और “लफ्ज” कवि‍ताएँ पढीं जि‍समें मानवीय सम्बंधों में घटती आत्मीयता एवं बढते भौति‍कवाद की बिंबात्मक प्रस्तुति‍ थी। अपनी हास्य कहानी “सेफ्टी डि‍वाइज” में मशीनों पर आश्रि‍त मानव की कठि‍नाइयों का खुलासा प्रस्तु‍त कि‍या तोलेटि‍ चंद्रशेखर ने। “मोटापा” शीर्षक हास्य कवि‍ता में बी.एस. मूर्ति‍ ने वर्तमान में मानव जीवन की वि‍डंबना पर हँसाया। जे. एस. यादव ने द्रौपदी को बिंब बनाकर वर्तमान समाज में नारी की वि‍डंबना एवं ग्रामीण जीवन से टूटकर एकाकी होते मानव की त्रासदी अपनी कवि‍ताओं “कलयुग की द्रोपदी” तथा “जब से छुटा मेरा गाँव” में पेश कि‍या। “मैं अबला कि‍ तू अबला” कवि‍ता में वर्तमान समाज में पति‍ पत्नीक के संबंधों, स्त्री शक्ति का अच्छा खुलासा कि‍या श्रीमती दीपा गुप्ता ने। बीरेंद्र राय ने “चंदीले सपने” में सपने और उनसे जुडी शृंखला और यथार्थ प्रस्तुत कि‍या। पर्यावरण प्रदूषण, प्रकृति के प्रकोप एवं ओजोन परत पर भावपूर्ण कवि‍ता “बुद्धि‍शाली पेश” कि‍या डॉ. एम. सूर्यकुमारी ने। वि‍भि‍न्न स्थि‍ति‍यों को बि‍म्ब बनाकर डॉ सन्तोक अलेक्स ने अपनी कवि‍ता “आँखें” पढी। एकाकी होते मानवीय संबंधों, वि‍षम परि‍स्थि‍‍ति‍यों एवं क्षीण होते मानवीय मूल्यों पर आक्रोश व्यंक्त कि‍या डॉ. टी. महादेव राव ने अपनी दो गजलों- “आओ जीने का” तथा “अजीब बशर हैं” में। नीरव कुमार वर्मा ने अपनी कहानी “यादों के दायरे” में दो सहेलि‍यों की मर्मस्पर्शी कथा प्रस्तुत की।

इस कार्यक्रम में कृष्ण कुमार गुप्ता, वि‍जय कुमार राजगोपाल, अशोक गुप्ता, सी एच ईश्वर राव आदि‍ ने सक्रि‍य हि‍स्सा लि‍या। पढी गई प्रत्येक रचना पर चर्चा हुई जि‍से सभी ने सराहा। सभी का मत था कि‍ इस तरह के कार्यक्रमों से लि‍खने के लि‍ए प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मि‍लती है। डॉ. सन्तोष अलेक्स के धन्यावाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

-डॉ. टी. महादेव राव
सचि‍व – सृजन

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार [2011] समारोह संपन्न

चित्र में-पुरस्कृत हिंदी साहित्यकार मटमरि, तेलुगु कथाकार डी. कामेश्वरी एवं रंगमंच कलाकार रेकेंदर नागेश्वर राव ‘बाब्जी’. साथ में डॉ. पी.वी. रंगाराव, सी. वी. चारी तथा स्मारक ट्रस्ट के पदाधिकरीगण।

हैदराबाद, ५ अक्तूबर, २०११, श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्वर्गीय वेमूरि आंजनेय शर्मा के ९५ वें जयंती समारोह के संदर्भ में वर्ष २०११ के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। यह समारोह स्थानीय रवींद्र भारती सभागार में संपन्न हुआ।

समारोह की अध्यक्षता आंध्र प्रदेश भूदान यज्ञ बोर्ड के अध्यक्ष श्री सी.वी.चारी ने की तथा आंध्र प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. पी.वी. रंगाराव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वर्ष २०११ का वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार हिंदी साहित्य के लिए वरिष्ठ व्यंग्यकार मटमरि उपेंद्र को प्रदान किया गया जबकि तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार विख्यात तेलुगु कथाकार डी. कामेश्वरी ने एवं तेलुगु रंगमंच के लिए सुप्रसिद्ध कलाकार रेकेंदर नागेश्वर राव ‘बाब्जी’ ने प्राप्त किया। तीनों सम्मानित विभूतियों को शाल, स्मृतिचिह्न तथा १० हज़ार की नक़द राशि भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ट्रस्ट की ओर से छात्र-छात्राओं को ‘प्रतिभा पुरस्कार’ तथा ‘सरस्वती पुरस्कार’ भी प्रदान किए गए। मुख्य अतिथि डॉ. पी.वी. रंगाराव ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा बहुमुखी प्रज्ञाशाली थे जो हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए अपना सारा जीवन उत्कृष्ट सेवाएँ प्रदान करते रहे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारतीय भाषाओं को सर्वप्रथम कंप्यूटर पर लाने का श्रेय वे. आंजनेय शर्मा को ही जाता है। अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री सी.वी. चारी ने आंजनेय शर्मा के साथ अपने 60 साल के निकट संबंधों को स्मृतिपटल पर लाते हुए बताया कि आंजनेय शर्मा का जीवन भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय तथा आदर्श है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि श्री पी.वी. नरसिंहा राव तथा आंजनेय शर्मा के अथक प्रयास से ही दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च षिक्षा विभाग में विभिन्न चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम आरंभ किए गए जो आज़ भी अबाध चल रहे हैं।

समारोह का संचालन सी.सी.एम.बी. के हिंदी अधिकारी चंद्रशेखर ने किया तथा श्रीमती शारदा और बालाजी ने कार्यक्रम के आरंभ में सुगम संगीत प्रस्तुत किया। समारोह में ट्रस्ट के प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा तथा अन्य न्यासियों ने भी भाग लिया। इस कार्यक्रम में नगरद्वय के अनेक विशिष्ट हिंदी सेवी और गणमान्य विद्वान उपस्थित थे।

– वेमूरि ज्योत्स्ना कुमारी.

सोमवार, 26 सितंबर 2011

डॉ. राधेश्याम शुक्ल को ''रामनाथ गोइन्का पत्रकार शिरोमणि पुरस्कार''

समग्र लेखन के लिए डॉ. बालशौरि रेड्डी और अनुवाद के लिए डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद सम्मानित
हैदराबाद, २८ अगस्त २०११, कमला गोइन्का फाउंडेशन ने गत रविवार की शाम यहाँ पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित एक भव्य पुरस्कार एवं सम्मान समारोह में हिंदी दैनिक 'स्वतंत्र वार्त्ता' के सम्पादक डॉ. राधे श्याम शुक्ल को प्रतिष्ठित ''रामनाथ गोइन्का पत्रकार शिरोमणि पुरस्कार'' प्रदान किया। इस अवसर पर डॉ. शुक्ल को हिंदीतर क्षेत्र के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार के रूप में सम्मानित करते हुए फाउंडेशन की ओर से प्रशस्ति पत्र, उत्तरीय, श्रीफल, स्मृतिचिह्न और सरस्वती की प्रतिमा के साथ ५१ हज़ार रुपए की राशि भी प्रदान की गई। ६२ वर्षीय डॉ. राधेश्याम शुक्ल अपने विद्यार्थीकाल से ही सोद्देश्य पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं तथा विगत १३ वर्षों से हैदराबाद में रहकर समाचार पत्र सम्पादक के अतिरिक्त अपने व्याख्यानों ओर लेखों के माध्यम से हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं।

साथ ही, इस समारोह में वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. बाल शौरि रेड्डी को उनके समग्र लेखन के लिए ''भाभीश्री रमादेवी गोइन्का सारस्वत सम्मान''तथा आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद को डॉ. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के हिंदी से तेलुगु में अनुवाद के लिए ''गीतादेवी गोइन्का हिंदी-तेलुगु अनुवाद पुरस्कार'' से सम्मानित किया गया। ये सभी सम्मान मुख्य अतिथि ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता साहित्यकार डॉ.सी. नारायण रेड्डी के हाथों भेंट किए गए। डॉ. सी. नारायण रेड्डी ने तीनों हिंदी साहित्यकारों की हिंदी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा अपनी हिंदी-ग़ज़ल सुना कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। इस अवसर पर समारोह के अध्यक्ष प्रसिद्ध कला-संग्राहक एवं समीक्षक जगदीश मित्तल और विशेष अतिथि एम. उपेंद्र के अतिरिक्त पुरस्कारदाता संस्था के श्यामसुंदर गोइन्का, ललिता गोइन्का,ॐ प्रकाश गोइन्का, सुशील गोइन्का, संजय गोइन्का भी बालकृष्ण गोइन्का मंच पर उपस्थित थे।

पुरस्कार के स्वीकृति भाषण में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कमला गोइन्का फाउंडेशन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए हिंदी के अखिल भारतीय स्तर पर ज़ोरदार प्रचार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि भाषा और साहित्य वस्तुतः सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय संस्कृति के संवाहक ही नहीं संरक्षक और संप्रेषक भी होते हैं, अतः उत्तर और दक्षिण के सतही भेदों को भुलाकर हिंदी को समस्त भारतीय भाषाओँ के प्रतीक के रूप में आधुनिक विश्व के समक्ष समग्र भारत की पहचान बनकर उभरना होगा। डॉ. शुक्ल ने इस कार्य के लिए बुद्धिजीवियों के स्तर पर एक बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता बताते हुए आंदोलन सभी भाषाओँ के साहित्यकारों का आह्वान किया कि वे इस विचार को मूर्त रूप दें। डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने इस उद्देश्य से एक नवचेतना मंच के गठन की घोषणा करते हुए उसके संयोजक राम गोपाल गोइन्का को अपनी पुरस्कार राशि मंच के लिए प्रदान करने की घोषणा की। इससे प्रेरित होकर कमला गोइन्का फाउंडेशन के संस्थापक न्यासी श्याम सुन्दर गोइन्का ने भी इस नवगठित मंच को पुरस्कार के बराबर अर्थात ५१ हज़ार रुपए की राशि प्रदान करने की घोषणा की।

अध्यक्षीय संबोधन में पद्मश्री जगदीश मित्तल ने हिंदी की समृद्धि पर प्रकाश डालते हुए साहित्येतर विषयों और कलाओं के विविध पक्षों पर व्यापक लेखन की आवश्यकता जताई तथा भारतीय भाषाओं, भारतीय कलाओं एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए आंदोलन के स्तर पर काम किए जाने के विचार का समर्थन करते हुए पुरस्कृत साहित्यकारों और आयोजक संस्था को शुभकामनाएँ दीं। धन्यवाद प्रस्ताव के बाद जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

-ऋषभदेव शर्मा
आचार्य एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद -500004

रविवार, 24 अप्रैल 2011

शमशेर शताब्दी समारोह संपन्न


हैदराबाद, 2 अप्रैल, 2011। ‘‘शमशेर बहादुर सिंह हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के बड़े कवि थे। गद्यकार भी वे उतने ही बड़े थे। वे इकलौते ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने हाली की उर्दू रचना ‘मुसद्दस’ और मैथिलीशरण गुप्त की हिंदी रचना ‘भारत भारती’ की गहराई से तुलना करते हुए दोनों के रिश्ते की पहचान की। इक़बाल पर भी हिंदी में उन्होंने ही सबसे पहले लिखा। वे हिंदी और उर्दू के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव और टकराव के विरोधी थे।

ये विचार प्रो. नामवर सिंह ने 30-31मार्च, 2011 को हैदराबाद में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘शमशेर शताब्दी समारोह’ के उद्घाटन सत्र में बुधवार को बीज व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। यह समारोह उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। समारोह का उद्घाटन डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने किया। इस सत्र के संयोजक प्रो. दिलीप सिंह थे। विशिष्ट अतिथि प्रो. आमिना किशोर रहीं और अध्यक्षता मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहम्मद मियाँ ने की।

उद्घाटन के बाद ‘शमशेर की स्मृति’ पर केंद्रित सत्र में प्रो. दिलीप सिंह ने 'शमशेर : व्यक्ति और रचनाकार’ शीर्षक आलेख प्रस्तुत किया, प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी ने ‘लोगों की स्मृतियों में बसे हुए शमशेर' पर प्रकाश डाला और डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने शमशेर बहादुर सिंह से जुड़े कई रोचक प्रसंग सुनाए। मुंबई से पधारे भाषावैज्ञानिक डॉ. अब्दुस्सत्तार दलवी ने स्मृति सत्र की अध्यक्षता की, संयोजन प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने किया तथा डॉ. मृत्युंजय सिंह ने वक्ताओं के प्रति आभार प्रकट किया।

‘शमशेर की कविता’ पर केंद्रित विचार सत्र की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से पधारे प्रो.सत्यकाम ने की। अलीगढ़ विश्वविद्यालय से आए डॉ. अब्दुल अलीम ने 'शमशेर : काव्यानुभूति के आयाम’ विषय पर अपना आलेख पढ़ा।
‘शमशेर की काव्यभाषा’ पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने आलेख प्रस्तुत किया। काव्यभाषा विषयक चर्चा को आगे बढ़ाया उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने।


जोधपुर से पधारे डॉ. श्रवण कुमार मीणा ने शमशेर की गज़लों का विश्लेषण किया। दिल्ली से पधारे कविवर डॉ. हीरालाल बाछोतिया के आलेख का विषय था ‘शमशेर : शोक गीतों के आईने में’। अध्यक्ष मंडल के सदस्य प्रो. टी. मोहन सिंह ने शमशेर की जनपक्षधरता और प्रयोगधर्मिता को तेलुगु साहित्यकार श्रीश्री से तुलनीय बताया जो शमशेर के समकालीन थे। इस सत्र का संयोजन डॉ. जी.वी. रत्नाकर ने किया तथा डॉ. जी. नीरजा ने वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद प्रकट किया।

३१ मार्च, 2011 (गुरुवार) को आयोजित विशेष सत्र में प्रो. नामवर सिंह ने शमशेर से संबंधित संस्मरण सुनाकर श्रोताओं को भावविगलित तो किया ही, वैचारिक रूप से समृद्ध भी बनाया। दूसरे दिन के दो विचार सत्र शमशेर के गद्य को समर्पित रहे। इन सत्रों की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रो. हेमराज मीणा और ‘स्वतंत्र वार्ता’ के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने की तथा संयोजन डॉ. करनसिंह ऊटवाल और डॉ. शेषुबाबु ने किया। डॉ. हेमराज मीणा ने अपने पीएच.डी. शोध कार्य के दौरान तीन वर्ष शमशेर के साथ रहने के मार्मिक संस्मरण सुनाए। डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने शमशेर बहादुर सिंह को हिंदी और उर्दू की गंगा जमुनी तहज़ीब का कवि बताया। एरणाकुलम (केरल) से आई प्रो. सुनीता मंजनबैल ने शमषेर के डायरी लेखन पर केंद्रित आलेख पढ़ा, डॉ. मृत्युंजय सिंह ने ‘घनत्व और प्रसार का गद्य’ शीर्षक लेख और डॉ.जी. नीरजा ने ‘शमशेर की कहानियाँ’ विषयक आलेख का वाचन किया। गद्य संबंधी इस सत्र के अंत में डॉ. बलविंदर कौर ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

संगोष्ठी के अंतिम विचार सत्र में प्रो. अमर ज्योति (धारवाड) ने ‘शमशेर की आलोचना दृष्टि’ पर आलेख पढ़ा और अलीगढ़ विश्वविद्यालय से आए डॉ. राजीव लोचन नाथ शुक्ल ने ‘शमशेर की भाषादृष्टि’ पर। कृतज्ञताज्ञापन डॉ. गोरख नाथ तिवारी ने किया। मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. टी.वी. कट्टीमनी ने समाकलन भाषण दिया। श्रीवेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति के डॉ. आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी तथा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की डॉ. साहिरा बानू ने अपनी टिप्पणियों में कार्यक्रम की भूरि भूरि प्रशंसा की और कहा कि शमशेर को समझने में इस संगोष्ठी से बड़ी सहायता मिली। कार्यक्रम के परिकल्पक प्रो. दिलीप सिंह ने संतोष जताया कि पूरा आयोजन योजना के अनुरूप चला और शमशेर के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित कई गुत्थियाँ खुलीं। उन्होंने हर्ष व्यक्त किया कि सभी शोध पत्रों में वादनिरपेक्ष और पाठकेंद्रित आलोचनादृष्टि देखने को मिली।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए डॉ. नामवर सिंह ने बताया, ‘‘पिछले दिनों दिल्ली तथा अन्य स्थानों पर शमशेर पर कई गोष्ठियाँ हुईं परंतु उनमें पुनरावृत्ति ही अधिक दिखाई दी तथा कविता पर ही अधिक ज़ोर रहा। इसके विपरीत हैदराबाद के इस समारोह की यह उपलब्धि रही कि यहाँ नई बातें हुईं, अलग अलग दृष्टि से बातें हुईं, सब विधाओं की बातें हुईं और नई रचनाएँ उद्धृत की गईं। डॉ. नामवर सिंह ने इस तुलना को आगे बढ़ाते हुए कहा कि लोग आधा चाँद लिए नाच रहे थे, यहाँ पूरा चाँद देखने को मिला - शमशेर की शमशेरियत का पूरा चाँद। समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने की। समापन समारोह का संयोजन शमशेर की उक्तियों के माध्यम से प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने इतनी रोचक शैली में किया कि स्वयं प्रो. नामवर सिंह ने उनकी संयोजन शैली की मंच से मुक्तकंठ से प्रशंसा की।

इस समारोह में राष्ट्रीय संगोष्ठी के अतिरिक्त तीन अन्य कार्यक्रम भी संपन्न हुए।
1- डॉ. नामवर सिंह के हाथों डॉ. टी.वी. कट्टीमनी द्वारा संपादित समीक्षाकृति ‘दक्खिनी भाषा और साहित्य’ तथा हैदराबाद के प्रतिष्ठित क्रांतिकारी कवि शशि नारायण ‘स्वाधीन’ की काव्यकृति ‘भूख, धान और चिड़िया’ का लोकार्पण किया। पहले दिन की साँझ अभिनेता विनय वर्मा द्वारा एकपात्री नाटक ‘मैं राही मासूम’ का मंचन किया गया और समापन सत्र के उपरांत ‘अलिफ’ के तत्वावधान में प्रो. खालिद सईद ने ‘बहुभाषा कवि सम्मेलन’ आयोजित किया जिसमें हिंदी, उर्दू और तेलुगु के कवियों ने डॉ. नामवर सिंह, डॉ. गंगा प्रसाद विमल, डॉ. अब्दुस्सत्तार दलवी और डॉ. हीरालाल बाछोतिया के सान्निध्य में काव्यपाठ किया।

(रिपोर्टर :संगोष्ठी स्थल से डॉ.मृत्युंजय सिंह,डॉ जी.नीरजा,डॉ.बलविंदर कौर एवं डॉ.गोरखनाथ तिवारी)
[चित्र : डॉ. जी. नीरजा, डॉ. बी. बालाजी एवं राधाकृष्ण मिरियाला]

रविवार, 27 फ़रवरी 2011

सृजन द्वारा समकालीन कवि‍ता पर साहि‍त्य गोष्ठी आयोजित

वि‍शाखपट़नम की हि‍न्दीत साहि‍त्यि‍क संस्था सृजन के तत्वावधान में 13 फरवरी 2011 को समकालीन हि‍न्दी कवि‍ता वि‍षयक साहि‍त्य गोष्ठी‍ का आयोजन कि‍या गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सृजन के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव ने की जबकि संचालन सृजन के संयुक्त सचि‍व डॉ. संतोष अलेक्स‍ ने कि‍या।

कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. टी. महादेव राव ने इस साहि‍त्य चर्चा के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि‍ समकालीन कविता के विषय पर चर्चा और समकालीन कवि‍ताओं के पठन के इस आयोजन का उद्देश्य है वर्तमान में कवि‍ताएं कैसी लि‍खी जा रही हैं इसके बारे में साहि‍त्य प्रेमि‍यों को वि‍स्तार में बताना और नये कवि‍यों को समकालीन कवि‍ताएँ लि‍खने के लि‍ए प्रोत्साहि‍त करना। इस अवसर पर डॉ. संतोष अलेक्सा ने ए. अरवि‍न्दाकक्षन का आलेख कवि‍ता की मि‍ट्टी, जो कि‍ समकालीन कवि‍ नागार्जुन की रचनाधर्मि‍ता पर थी, पढा जि‍समें ‘काव्यन प्रवृत्तियाँ नवयुग में कि‍स तरह हों’ इसका वि‍वरण था। भूख, नग्नता जो कि‍ सामयि‍क बि‍म्बक हैं, का नागार्जुन की कवि‍ता में वि‍श्ले‍षण था। श्रीमती सीमाशेखर ने अपनी तीन नई कवि‍ताएँ ‘संरक्षण’, ‘तारे’ और ‘ताल’ का पठन कि‍या जि‍समें जंगलों की कटाई, प्रकृति‍ से बि‍छोह तथा संबंधों में आता अपरि‍चय का वर्णन था। बी.एस. मूर्ति‍ ने कर्मयोगी शीर्षक कवि‍ता में सीमा पर तैनात सैनि‍क और आम आदमी के बीच के अंतर को प्रभावशाली ढ़ंग से प्रस्तुबत कि‍या। अपनी कवि‍ताओं हँसी, जाड़ा के साथ हास्य कवि‍ता आज अगर हमारी शादी होती सुनायी लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने, जि‍समें कवि‍ का फक्कड़पन और समाज पर व्यंग्य नि‍हि‍त था। श्रीमती कि‍रण सिंह ने महादेवी वर्मा की एक रचना सुनाई। अपने सारगर्भि‍त लेख में बीरेन्द्र राय ने समकालीन कवि‍ता के गुणों और लक्षणों की चर्चा करते हुए कहा कि‍ कथ्य‍, रूप, शैली और छंद मुक्तता के कारण नर्इ कवि‍ता अपना अलग स्थान रखती है। श्री राय ने समकालीन कवि‍ताएँ जो‍ प्रेम की कवि‍ताएँ थीं, बेताब सूरज और कहाँ हो तुम सुनायी। आरुणि‍ त्रि‍वेदी ने समकालीन कवि‍ता पर अपने वि‍चार व्यक्त कि‍ए। रामप्रसाद यादव ने तड़प शीर्षक से कवि‍ता सुनाई जि‍समें मानवीय संवेदनाओं के बिम्ब थे।

डॉ. एम. वि‍जयगोपाल ने अपनी कविता छुवन में मानव जीवन के वि‍भि‍न्न पहलुओं को छुआ। जी. अप्पापराव राज और एनसीपी नायुडू ने अपने व्यंग्य रचनाएँ प्रस्तुनत की। डॉ. टी. महादेव राव ने समकालीन कवि‍ता की चर्चा करते हुए अपनी रचना तीन आयाम समय के जो कि‍ कवि‍ता की भूत, वर्तमान और भवि‍ष्यव की स्थिति‍यों का खुलासा था, पढ़ा और अपनी कवि‍ता वि‍नि‍मय का अर्थशास्त्र प्रस्तुत कि‍या जो‍ एकाकी होते मानवीय संबंधों और खोखले समाजवाद को प्रतीक बनाकर लि‍खी गई थीं। डॉ. संतोष अलेक्स ने सीधा और शब्देकोष कवि‍ताएँ पढीं, जो कि‍ आज के परि‍वेश में बदलते जीवन संदर्भों से जुड़ी थीं। कार्यक्रम में कृष्णक कुमार गुप्ताब, वि‍जय कुमार आर. और सीएच ईश्विर राव ने भी सक्रि‍य प्रति‍भागि‍ता की।

आकाशवाणी द्वारा गणतंत्र दि‍वस पर वि‍शेष हि‍न्दी कवि‍गोष्ठी


आकाशवाणी, वि‍शाखपटनम केंद्र द्वारा 25 जनवरी 2011 को रात 8 बजे इकसठवें गणतंत्र दि‍वस के अवसर पर वि‍शेष हिंदी कवि‍गोष्ठीष का प्रसारण कि‍या जा रहा है। इस कवि‍गोष्ठी में गणतंत्र भारत, हमारे देश की प्रगति‍ और हमारी एकता और अखंडता के साथ साथ वि‍वि‍ध सामयि‍क वि‍षयों पर प्रसि‍द्ध स्था नीय कवि‍ डॉ टी महादेव राव (उप प्रबंधक-राजभाषा, एचपीसीएल और सृजन संस्थार के सचि‍व), डॉ संतोष अलेक्सह (तकनीकी अधि‍कारी – हि‍न्दी , सीआईएफटी और सृजन संस्थास के संयुक्ता सचि‍व), श्री बीरेन्द्रे राय ( वरि‍ष्ठं प्रबंधक-हि‍न्दी‍, इंडि‍यन बैंक), श्रीमती पी उमारानी (प्रबंधक – हि‍न्दीर, भारतीय स्टे्ट बैंक), श्री तोलेटि‍ चंद्रशेखर (आकाशवाणी) और श्री हनुमंत सिंह‍ (भारतीय नौसेना) अपनी रचनायें प्रस्तु,त करेंगे। कार्यक्रम का संचालन डॉ टी महादेव राव कर रहे हैं। इस पूरे कार्यक्रम का समन्वायन और संयोजन कि‍या आकाशवाणी के प्रसारण नि‍ष्पाादक श्रीमती के इंदि‍रा और कार्यक्रम अधि‍शासी श्री के रमणन स्वा मी ने। आकाशवाणी वि‍शाखपटनम केंद्र राजभाषा हि‍न्दी् के प्रचार प्रसार के लि‍ये इस तरह के वि‍शेष कार्यक्रमों का आयोजन लगातार करता रहा है।

डॉ टी महादेव राव

सोमवार, 24 जनवरी 2011

कविता वाचक्नवी के सम्मान में स्नेह मिलन और कवि गोष्ठी संपन्न


हैदराबाद,१४ जनवरी २०११ 'साहित्य मंथन' और 'विश्वम्भरा' के तत्वावधान में आज सायं प्रसिद्ध कवयित्री और संस्कृतिकर्मी डॉ. कविता वाचक्नवी के हैदराबाद आगमन पर 'स्नेह मिलन और कविगोष्ठी' का आयोजन किया गया। आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अनुसंधान अधिकारी प्रो। बी। सत्यनारायण की अध्यक्षता में संपन्न इस समारोह में कवयित्री का सारस्वत सम्मान किया गया। सर्वप्रथम दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो। ऋषभ देव शर्मा ने अंगवस्त्र द्वारा मुख्य अतिथि डॉ।वाचक्नवी का स्वागत किया। तदुपरांत 'विश्वम्भरा' के संरक्षकद्वय चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद और द्वारका प्रसाद मायछ ने स्मृति-चिह्न के रूप में नामांकित रजत पट्टिका प्रदान की। मित्रों, शुभचिंतकों और प्रशंसकों की ओर से कार्यक्रम की संयोजिका संपत देवी मुरारका ने सम्मानचिह्न और मुक्तामाल भेंट कीं तथा रचनाकारों की ओर से पुस्तकें और लेखन सामग्री प्रदान की गईं। 'आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी', 'उच्च शिक्षा और शोध संस्थान' तथा 'अहल्या' पत्रिका की ओर से भी कवयित्री का सम्मान किया गया। आत्मीय जन के स्नेह और आशीष को अत्यंत संकोच और विनम्रता से स्वीकार करती हुईं कविता जी काफी प्रसन्न दिख रही थीं।

डॉ. कविता वाचक्नवी ने इस अवसर पर अपने संबोधन में विस्तार से इन्टरनेट के माध्यम से साहित्य, भाषा और संस्कृति की सेवा के कई गुर बताए और हमेशा की तरह उन लोगों को जी भर कर लताड़ा जो इस शक्तिशाली माध्यम का प्रयोग केवल अपनी छपास मिटाने के लिए करते हैं। खूब कविताएँ पढी-सुनी गईं। अध्यक्षता आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के प्रो। बी। सत्यनारायण ने की।डॉ।राधे श्याम शुक्ल , प्रो. ऋषभ देव शर्मा, डॉ. कविता वाचक्नवी, विशेष अतिथि आर. शांता सुंदरी, संचालक डॉ.बी बालाजी, द्वारका प्रसाद मायछ, चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद, प्रो.माणिक्याम्बा मणि, गोपाल कुमार, राजेश मुरारका, डॉ.बलविंदर कौर, डॉ.गोरखनाथ तिवारी, पवित्रा अग्रवाल , लक्ष्मीनारायण अग्रवाल, अशोक कुमार तिवारी, सीमा मिश्र, आर. एस. जी राव, डॉ.शशांक शुक्ल, ज्योति नारायण, गोविन्द मिश्र, विनीता शर्मा, डॉ।देवेन्द्र शर्मा, भगवान दास जोपट, तेजराज जैन, संपत देवी मुरारका , आशादेवी सोमाणी, डॉ.प्रभाकर त्रिपाठी, डॉ.श्रीनिवास राव, श्रीनिवास सोमाणी एवं प्रो.किशोरी लाल व्यास ने अपने काव्यपाठ और संबोधन द्वारा कार्यक्रम को सफल बनाया।

सोमवार, 27 दिसंबर 2010

‘सृजन’ ने किया डॉ टी महादेव राव की लघुकथा संकलन ’चुभते लम्हें’ का लोकार्पण


१२ दिसंबर २०१० को वि‍शाखपटनम की हि‍न्दी’ साहि‍त्या संस्थाल ‘सृजन’ ने बिल्ड्र्स एसोशयेशन सभागार में संथा के सचिव एवं प्रसिद्ध हिन्दीं सेवी साहित्य।कार डॉ टी महादेव राव रचित ‘चुभते लम्हे ’ लघुकथा संग्रह के लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ हिन्दी साहित्यकार और वरिष्ठ हिन्दी आचार्य प्रो पी आदेश्वरर राव और विशेष अतिथि वरिष्ठ हिन्दी आचार्य प्रो एस एम इकबाल थे। पुस्तक विमोचन करते हुए प्रो पी आदेश्वर राव ने कहा कि डॉ टी महादेव राव की रचनाओं में एक अलग तरह का प्रभाव है जिसे ‍‍‍फिर एक बार हम उनके इस लघुकथा संग्रह में पाते हैं। देखने में छोटे जरूर हैं पर इनमें गहन और गंभीर अभिव्यक्ति निहित है। उन्होंने इस लघुकथा संग्रह ‍को पठनीय और विचार मंथन करने के लिए विवश करता संग्रह कहा। उन्होंने पुस्तक परिचय करते हुए कहा कि आज का आदमी लंबी रचनायें पढने की स्थिति में नहीं है और ऐसे में ऐसी छोटी कहानियों का अपना अलग महत्व हो जाता है और महादेव राव की यह लघुकथा संग्रह पाठक को अच्छी तरह उद्वेलित करती हैं और छोटे होने के बावजूद गंभीर घाव करने का प्रभाव रखती हैं। उन्होंने डॉ टी महादेव राव को पुस्तक प्रकाशन और विमोचन पर और साथ ही ऐसे समर्पित लेखन पर बधाई दी। उन्हों ने सृजन संस्था को अच्छे साहित्त्यिक कार्यक्रमों के सफल आयोजन पर अपना साधुवाद दिया।

विशेष अतिथि प्रो एस एम इकबाल ने कहा कि चुभते लम्हेंत के द्वारा महादेव राव में निहित कवि, हिन्दी उर्दू पर समान अधिकार से लिखने वाले रचनाकार से हमारा परिचय होता है। उन्होंने लघुकथाओं को न केवल प्रभावी बताया बल्कि संवेदनशील लेखक की पैनी दृष्टि और सजीव चि‍त्रण बताया। उन्हों ने सृजन के सदस्योंं और कार्यक्रमों को हि‍न्दीे साहित्यर कों प्रेरित करने वाले कार्यक्रमों की संज्ञा दी। सबसे पहले स्वागत भाषण करते हुए संस्था् के संयुक्त सचिव डॉ संतोष अलेक्स ने आहुतों का स्वादगत किया और संस्था की गति‍वि‍धि‍यों का वि‍वरण प्रस्तु्त कि‍या। उन्होंने कहा कि सृजन सभी रचनाकारों के मार्गदर्शन और संबल के लिए लगातार तत्पर रहता है। उन्होंने पुस्तषक विमोचन के इस कार्यक्रम को एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम कहा क्योंकि‍ लेखक की कृति को सजग पाठकों के सम्मुख लाया जाता है। डॉ अलेक्स ने डॉ महादेव राव को एक सजग साहित्यकार बताते हुए कहा कि उनके नये रूपों से उनकी रचनायें अवगत कराती हैं।



सृजन के अध्य।क्ष नीरव कुमार वर्मा ने कहा कि‍ साहि‍त्य का अर्थ है समाज का हि‍त चाहने वाला और समाज के प्रति‍ अपने कर्त्तव्यों और दायि‍त्वों के बारे में जानने वाला। कवि और लेखक अधि‍क जागरूक होते हैं अतः समाज के हि‍त में रचनाधर्मि‍ता अपनाने की आज के युग में आवश्ययकता है।‍ सभी रचनाकार ऐसी संस्था में आयेंगे और गुणवत्ता पूर्ण कार्यक्रम हम जो आयोजि‍त कर रहे हैं, उन्हें और अधि‍क स्तरीय बनाने में सहयोग करेंगे ऐसा मेरा वि‍श्वास है। डॉ टी महादेव राव की पुस्तक चुभते लम्हे में, आज के युग में मानवीयता जिन विषम परिस्थीतियों से गुजर रही है उसका लघुकथाओं के रूप में प्रभावी प्रस्तुति है। उन्होंने लघुकथाओं को समाज का वर्तमान की वि‍संगति‍यों का प्रतीक बताया। अंत में पुस्तंक के लेखक और संस्थात सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव ने सभी उपस्थितों को धन्यतवाद दिया और विशेषकर इस कार्यक्रम को सफल बनाने में योगदान देने वाले वरिष्ठ साहित्यॉकारों और सभी साथियों का आभार माना। ज्ञातव्य है कि अब तक डॉ टी महादेव राव की गजल संग्रह ‘जज्बात के अक्षर’, कविता संकलन ‘ विकल्प की तलाश में’, शोध प्रबंध ‘ नई कविता के नाट्यकाव्यों में चरित्र सृष्टि’ और लेख संक्रलन ‘कश्मीर गाथा’ प्रकाशि‍त हो चुकी हैं और अभिव्यक्ति सहि‍त अनेक पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनायें प्रकाशित होती रहती हैं।
**** डॉ टी महादेव राव

रविवार, 28 नवंबर 2010

हिन्दू सोसाईटी द्वारा मौरिसविल (नार्थ कैरोलाईना) के हिन्दू भवन के खुले मैदान में दशहरा


अक्तूबर १७, २०१० को हिंदी विकास मंडल एवं हिन्दू सोसाईटी (नार्थ कैरोलाईना) ने मौरिसविल (नार्थ कैरोलाईना) के हिन्दू भवन के खुले मैदान में दशहरा उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया। ३८ फुट का रावण (जिसका शरीर ३० फुट का, सिर ६ फुट का, मुकुट १.८ फुट का और कलगी ०.२ फुट की थी) सबके आकर्षण का केंद्र था। अमेरिका में यह सबसे बड़ा रावण था। इसका डिजाइन और ढांचा स्वयं-सेवकों की टीम (अशोक एवं मधुर माथुर, रमणीक कामो, अजय कौल, डॉ. ध्रुव कुमार, सतपाल राठी, डॉ. ओम ढींगरा, मदन एवं मीरा गोयल, ममता एवं प्रदीप बिसारिया, तुषार घोष, उत्तम डिडवानिया, लुईस और रमेश माथुर) ने तीन महीने की मेहनत और लगन से तैयार किया।

रावण दहन से पहले राम और रावण के द्वन्द्व युद्ध का मंचन किया गया। ध्वनी और प्रकाश के प्रयोग ने इसे बहुत प्रभावित बना दिया। राम जी की भूमिका (अतीश कटारिया), सीता जी (स्मिता कटारिया), लक्ष्मण (रमेश कलाज्ञानम), हनुमान (डॉ. ध्रुवकुमार), ब्राह्मण (रमेश माथुर ) और रावण (डॉ. अफ़रोज़ ताज) ने किया। रामलीला के इस अंश को लिखा और प्रस्तुत किया डॉ. सुधा ओम ढींगरा ने और निर्देशन दिया रंगमंच के प्रसिद्ध कलाकार और निर्देशक हरीश आम्बले ने। बिंदु सिंह और डॉ. सुधा ओम ढींगरा ने पात्रों का मेकअप कर उन्हें सजीव कर दिया। प्रकाश का सञ्चालन किया शिवा रघुनानन ने और ध्वनी का संयोजन किया जॉन कालवेल ने। राम और रावण को आवाज़ें दीं रवि देवराजन और डॉ. अफ़रोज़ ताज ने। राम जी की शांत और ठहराव वाली आवाज़, रावण की विद्रूप हँसी के मिश्रण पर बच्चों और बड़ों ने बहुत तालियाँ बजाईं।

राम-लक्ष्मण तथा हनुमान जी के तिलक से उत्सव का आरंभ हुआ। स्टेशन वैगन को सजा कर "इन्द्र वाहन" बनाया गया और उसकी छत पर बैठ कर पूरा काफिला रामलीला मैदान में पहुँचा। पीछे छोटे बच्चों की बानर सेना, हनुमान जी की तरह सजे- धजे "जय सिया राम" का उच्चारण करते चले। अमेरिका की धरती पर समय बँध गया। हज़ारों लोग राम जी की सवारी, रामलीला और रावण दहन में शामिल हुए। इस सारे कार्यक्रम को हिंदी विकास मंडल की अध्यक्ष श्रीमती सरोज शर्मा के मार्ग दर्शन में तैयार किया गया।

सृजन ने आयोजि‍त की पुस्तक वि‍मोचन व साहि‍त्यक चर्चा


वि‍शाखपट्टणम की प्रसि‍द्ध साहि‍त्यक संस्था‍ सृजन के तत्वातवधान में डाबा गार्डेन्स स्थित पवन एनक्ले व में ३१ अक्टूबर २०१० को पुस्तक वि‍मोचन और साहि‍त्य चर्चा का आयोजन कि‍या गया। सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और कार्यक्रम का संचालन सृजन के संयुक्त सचि‍व डॉ. अलेक्स ने कि‍या। स्वागत भाषण करते हुए सृजन के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव ने संस्था की गति‍वि‍धि‍यों का वि‍वरण प्रस्तुत कि‍या और कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि‍ नये कवि‍यों और रचनाकारों को प्रोत्साहि‍त करने के उद्देश्य से ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन सृजन कर रही है। इससे न केवल नई रचनाओं का जन्म होता है बल्किद हमारा हि‍न्दी साहि‍त्य भी नए सौंदर्य से अलंकृत होता है। सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कहा कि‍ वि‍गत ८ वर्षों से साहि‍त्य सृजन करने वाले कवि‍यों और लेखकों को संबल प्रदान करने वाली संस्था सृजन सही मार्गदर्शन दे रही है। उन्होंने वि‍श्वास व्याक्त कि‍या कि‍ सभी रचनाकार ऐसी संस्था में आकर कार्यक्रमों को और अधि‍क स्तरीय बनाने में सहयोग करेंगे। इस अवसर पर श्रीमती पारनंदी नि‍र्मला रचि‍त दो अनूदि‍त पुस्तिकों तेलुगु की प्रति‍नि‍धि कहानि‍याँ भाग-१ और २ का वि‍मोचन कि‍या गया। वि‍मोचन कार्यक्रम में पुस्तकों और लेखि‍का का परि‍चय डॉ. टी. महादेव राव ने दि‍या जबकि‍ पुस्तकों का वि‍मोचन नीरव कुमार वर्मा ने कि‍या। अपने समीक्षा आलेख में श्री वर्मा ने पारनंदी नि‍र्मला की रचनाधर्मि‍ता और अनुवाद के प्रति‍ समर्पण की बात कहीं। उन्हों ने कहा कि‍ समसामयि‍क पुरानी तेलुगु कहानि‍यों का अनुवाद पढते समय नहीं लगता कि‍ ये आज के समय की नहीं हैं। उन्होंने राचकोंडा बहनों द्वारा अनूदि‍त कहानि‍यों में कई वि‍शेषताओं के होने की बात बतायी। पहली पुस्तहक केवल श्रीमती पारनंदी नि‍र्मला की अनूदि‍त कहानि‍यों की है जबकि‍ दूसरे भाग की सभी कहानि‍याँ राचकोंडा बहनों डॉ. राचकोंडा स्वतराज्य लक्ष्मीक, पारनंदी नि‍र्मला, मुनुकुटला पद्मा राव और गुंटूर रत्नलप्रभा द्वारा अनूदि‍त हैं। ये अनूदि‍त पुस्तकें मौलि‍क रचनाओं का आभास देती हैं। गौरतलब है कि‍ श्रीमती पारनंदी नि‍र्मला अब तक १२ लेखकों की २६ कहानि‍यों और ६५ पुस्त्कों का अनुवाद कर चुकी हैं। इसी तरह श्रीमती मुनुकुटला पद्मा राव १३ पुस्तकों, गुंटूर रजनी प्रभा ११ पुस्तकों और डॉ. राचकोंडा स्वलराज्यरलक्ष्मीप ने १० पुस्तुकों का अनुवाद कि‍या है।

साहि‍त्यर चर्चा में सबसे पहले श्रीमती सीमा वर्मा ने प्रदूषण के वि‍रोध में आवाज उठाते पीपल के वृक्ष को बिं‍ब बनाकर अपनी कवि‍ता पीपल का पेड़ सुनाई। श्रीमती सीमा शेखर ने पुरानी पीढी की स्मृतति‍यों और उनकी प्रगाढ संबंधों की कवि‍ता दादी माँ प्रस्तुजत कि‍या। साथ चलने की ओर वि‍श्व शांति‍ के वि‍चार लि‍ये डॉ. एम. वि‍जय गोपाल ने अपनी कवि‍ता आते हो क्या पढी। जी. अप्पाराव राज ने व्यं‍ग्य कवि‍ता सुनाई। ईश्वर वर्मा ने वेमना के तेलुगु पद्यों का और हाडकु कवि‍ताओं का अनुवाद पेश कि‍या। टी. चंद्रशेखर राव ने प्रदूषण पर क्षणि‍का आज के परि‍वेश में कवि‍ता सदाबहार बारि‍श और एक प्रयोगवादी गजल प्रस्तुत की। एसवीआर नायडु ने व्यं‍ग्यक सुनाये। डॉ. टी. महादेव राव ने पौराणि‍क प्रतीकों के माध्यम से दो लघुकथाएँ रहस्य और लेकतंत्र पढ़ीं, जि‍नमें आज की राजनीति‍ की सड़ी गली हालत बतायी गई। डॉ. सन्तोष अलेक्स ने प्रवासी कवि‍ता "आज के कांक्रीट जंगल में" पढ़ी और मानवता पर अपनी रचना पर चर्चा की। इस कार्यक्रम में ल. अशोक, प्रो. पारनंदी वेंकट रमणमूर्ति, कि‍रण जीवी सत्यनारायण, बी अनुराधा सि‍ह, कु. वी. वि‍जयकुमार राजगोपाल और ईश्च‍र राव ने भी सक्रि‍य रूप से भाग लि‍या। संस्था के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

रविवार, 24 अक्टूबर 2010

चेखव की १५० वीं वर्षगाँठ पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


(चित्र में: (बाएं से) प्रो.ऋषभ देव शर्मा, प्रो.वरयाम सिंह, प्रो.शंकर बसु एवं प्रो.आर.डी.अकेला)
हैदराबाद, २१ अक्टूबर २०१०, "वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अनुवाद का महत्व पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है। साहित्य के अनुवाद के माध्यम से हम केवल किसी अन्य भाषा के लेखन से ही परिचित नहीं होते बल्कि उस भाषा समाज की सामजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और विशेषताओं से भी परिचित होते हैं। अनुवादक एक भाषा में रचित साहित्य के अर्थ और रूप भर को नहीं बल्कि उसके मूल्यों और सरोकारों को भी दूसरी भाषा में प्रकट करने का दायित्व निभाता है। ऐसा करने के लिए उसका द्विभाषिक के साथ साथ द्विसांस्कृतिक होना भी अपरिहार्य शर्त है। इस स्तर पर साहित्य का अनुवादक मात्र अनुसरणकर्ता नहीं होता बल्कि मौलिक लेखक की भाँति ही सृजनकर्ता होता है।"

ये विचार अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी अध्ययन संकाय के तत्वावधान में संपन्न 'चेखव का अनुवाद' विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर बोलते हुए प्रमुख चेखवविद लेखक और अनुवादक प्रो. योगेश चन्द्र भटनागर ने व्यक्त किये।

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी ने बताया कि इस संगोष्ठी-कार्यशाला में स्वीकृत किए गए विभिन्न भाषाओं के अनुवादों को शीघ्र ही पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा। उन्होंने इसे समारोह की उपलब्धि और सफलता माना कि इसमें जहाँ एक ओर २० वरिष्ठ अनुवादक सम्मिलित हुए वहीं इसके माध्यम से नए चेहरे के रूप में ११ युवा अनुवादक भी सामने आए जो हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में रूसी भाषा से सीधे अनुवाद की संभावनाओं के विस्तार का सूचक है।

उल्लेखनीय है कि दो दिन के इस समारोह में ६ अलग-अलग समूहों में ३२ अनुवादकों द्वारा विभिन्न भारतीय भाषाओं में किये गएचेखव के १२ छोटे-बड़े नाटकों के अनुवादों का विश्लेषण करके उन्हें अंतिम रूप दिया गया। इस कार्य में द्विभाषिक विद्वानों के साथ साथ लक्ष्य भाषाओं हिंदी, मलयालम, तेलुगु, मराठी, ओडिया और बांग्ला के मातृभाषा-भाषी विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया।

चेखव के भारतीय विशेषज्ञ प्रो. शंकर बसु, प्रो. योगेश भटनागर, प्रो. वरयाम सिंह और प्रो. पंकज मालवीय की उपस्थिति सभी प्रतिभागियों के लिए अत्यंत प्रेरणा-दायक रही। कार्यशाला का निर्देशन प्रो. चारुमति रामदास तथा संयोजन डॉ. सत्यभान सिंह राजपूत ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. मोनिका ने किया।

अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित



हैदराबाद, २० अक्टूबर, विश्वप्रसिद्ध रूसी कथालेखक एवं नाटककार चेखव की १५० वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में आज यहाँ अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के परिसर में रूसी भाषा विभाग के तत्वावधान में आयोजित ''चेखव का अनुवाद '' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला का उद्घाटन प्रसिद्ध भारतीय चेखवविद तथा जेएनयू के अधिष्ठाता प्रो. शंकर बसु ने किया. उन्होंने चेखव की रचनागत विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें मानवीय संवेदना के अप्रतिम चितेरे की संज्ञा दी .

उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता रूसी अध्ययन संकाय के डीन प्रो.आर.डी.अकेला ने की और बताया कि इस आयोजन में चेखव के एक पूर्णाकार तथा ११ एकांकी नाटकों के रूसी से सीधे हिंदी ,मराठी ,तेलुगु, बंगला,ओडिया और मलयालम भाषाओं में संपन्न अनुवादों का विश्लेषण करके उन्हें अंतिम रूप दिया जाएगा जो अपने आप में एक कीर्तिमान होगा.

बीज भाषण सुप्रसिद्ध कवि एवं अनुवादक प्रो. वरयाम सिंह , जेएनयू , ने दिया. प्रो. सिंह ने कहा कि चेखव केवल रूसी लेखक ही नहीं थे, वे अपने समय में ही भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुके थे क्योंकि उनकी रचनाओं की विषयवस्तु और उनके पात्र चिरंतन हैं. इस अवसर पर संबोधित करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि हिंदीजगत के भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों की भाँति चेखव भी ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अकालमृत्यु के बावजूद कालजयी सिद्ध हुए हैं।

समारोह की संयोजक डॉ. चारुमति रामदास ने बताया कि इस कार्यक्रम में ३२ अनुवादक भाग ले रहे हैं जिनमें ११ नए चेहरे हैं. विविध भारतीय भाषाओं में इनके द्वारा किए गए अनुवादों का विश्लेषण करने के लिए द्विभाषाविदों के साथ साथ विशेष रूप लक्ष्य भाषा के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया है ताकि अनूदित पाठों को लक्ष्य भाषाओं के मुहावरे में ढाला जा सके.

उद्घाटन सत्र के बाद छः समानांतर समूहों में कार्यशाला आरम्भ हुई. दो दिन में कार्यशाला के चार सत्र होंगे.

समापन गुरुवार को प्रो. जे. पी. डिमरी की अध्यक्षता में संपन्न होगा. समाकलन व्याख्यान प्रसिद्ध चेखवविद , लेखक और अनुवादक प्रो. योगेश भटनागर , भूतपूर्व आचार्य - जेएनयू, देंगे. समारोह में हैदराबाद के अतिरिक्त गुवाहाटी, नागपुर, पुणे ,लखनऊ, कोल्हापुर, आगरा , अमृतसर, चंडीगढ़, भंडारा, कोलकाता बनारस, रीवां, दिल्ली, तिरुवनंत पुरम, इलाहाबाद और औरंगाबाद आदि स्थानों से आए हुए अनुवादक और विशेषज्ञ विद्वान् सम्मिलित हैं

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार समारोह संपन्न


हैदराबाद, १७ अक्तूबर, २०१०, प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा के 94वें जयंती समारोह के अवसर पर श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा वर्ष २०१० के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। जयंती एवं पुरस्कार समारोह यहाँ रवींद्र भारती में प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ तेलुगु पत्रकार पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

स्मरणीय है कि ट्रस्ट द्वारा प्रति वर्ष तेलुगु साहित्य, हिंदी साहित्य और अभिनय जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए दस-दस हजार रुपये के तीन नकद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं। इस वर्ष तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार 83 वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार महामहोपाध्याय डॉ. पुल्लेल श्रीरामचंद्रुडु को प्रदान किया गया, जिन्होंने तेलुगु तथा संस्कृत साहित्य को अपनी मौलिक तथा अनूदित रचनाओं से सुसंपन्न किया है।

हिंदी साहित्य के लिए इस वर्ष ‘राष्ट्र नायक’ पत्रिका के संपादक ७५ वर्षीय डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी को हैदराबाद में हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के उन्नयन के लिए दिया गया। इसी प्रकार प्रसिद्ध तेलुगु रंगकर्मी ७५ वर्षीय डॉ. मोदलि नागभूषण शर्मा को अभिनय जगत में योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया। इसके अतिरिक्त न्यास की ओर से विभिन्न छात्र-छात्राओं को 'प्रतिभा पुरस्कार' और ‘सरस्वती पुरस्कार’ भी वितरित किए गए।

आरंभ में मुख्य अतिथि पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने मट्टपर्ति वीरांजनेयुलु द्वारा चित्रित वेमूरि आंजनेय शर्मा के विशाल तैलचित्र को लोकार्पित किया। इस अवसर पर संबोधित करते हुए पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने कहा कि वेमूरि आंजनेय शर्मा ने अपना पूरा जीवन हिंदी की सेवा और भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय के कार्य के लिए समर्पित कर दिया, अतः वे सही अर्थों में दक्षिण और उत्तर के सामाजिक-सांस्कृतिक सेतु के निर्माता थे। डॉ. पोत्तूरि ने आंजनेय शर्मा जी द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता और सामासिक संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का स्मरण करते हुए उन्हें नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय और आदर्श बताया।

पुरस्कृत विद्वानों को समर्पित किए गए प्रशस्ति पत्रों का वाचन विद्यानाथ शास्त्री, कृष्णमूर्ति और ज्योत्स्ना कुमारी ने किया। समारोह का संचालन डॉ. पेरिशेट्टी श्रीनिवास राव ने किया।

रविवार, 26 सितंबर 2010

आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी , हैदराबाद द्वारा वर्ष २०१० के पुरस्कारों की घोषणा


आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद द्वारा वर्ष २०१० के हिंदी दिवस के संदर्भ में आंध्र प्रदेश के हिंदी सेवियों और हिंदी साहित्यकारों को विभिन्न पुरस्कार प्रदान किये जाने की घोषणा की गई है। अत्यंत हर्ष का विषय है कि इस वर्ष का हिंदीभाषी लेखक पुरस्कार विगत बीस वर्षों से दक्षिण भारत में हिंदी के उच्च स्तरीय अध्यापन और शोधकार्य के साथ निरंतर विविध विधाओं में श्रेष्ठ आलोचनात्मक तथा सृजनात्मक मौलिक लेखन के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा कर रहे डॉ। ऋषभ देव शर्मा को प्रदान किए जाने का निर्णय लिया गया है। १९५७ में उत्तर प्रदेश में जन्मे डॉ. ऋषभ देव शर्मा के तीन कविता संकलन 'तेवरी', 'तरकश' तथा 'ताकि सनद रहे ' प्रकाशित हैं। 'तेवरी चर्चा' और 'हिंदी कविता : आठवाँ नवाँ दशक' जैसी समीक्षात्मक कृतियों के अलावा उनकी अनेक रचनाएँ पत्रपत्रिकाओं और ब्लोगों के माध्यम से पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी हैं। उन्हें एक दर्ज़न से अधिक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों के संपादन और सहलेखन का भी श्रेय प्राप्त है।

उल्लेखनीय है कि अकादमी द्वारा प्रतिवर्ष एक तेलुगुभाषी हिंदीसेवी को दिए जाने वाले 'पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार' हेतु इस वर्ष डॉ. सी. शेषगिरि राव का चयन किया गया है। संस्था के निदेशक डॉ. के वी एल एन एस शर्मा द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि पद्मभूषण मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार के लिए नकद एक लाख रुपये तथा हिंदीभाषी लेखक पुरस्कार के लिए पच्चीस हज़ार रुपये की नकद राशि प्रदान की जाती है। विज्ञप्ति के अनुसार इस वर्ष दक्षिण भारतीय भाषेतर हिंदी लेखक पुरस्कार डॉ. किशोरी लाल व्यास को,उत्तम अनुवाद पुरस्कार वाई सी पी वेंकट रेड्डी को तथा तेलुगुभाषी युवा हिंदी लेखक पुरस्कार डॉ. सत्यलता को प्रदान किए जाएँगे। ये तीनों पुरस्कार भी पच्चीस-पच्चीस हज़ार के हैं।

इनके अतिरिक्त तेलुगु और हिंदी भाषियों द्वारा लिखित सोलह हिंदी रचनाओं के प्रकाशन हेतु अकादमी द्वारा दो लाख के आर्थिक अनुदान की भी घोषणा की गई है। ये सभी पुरस्कार १४ सितम्बर को हिंदी दिवस के अवसर पर प्रदान किए जाएँगे।

आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के पुरस्कारों के लिए चयित सभी हिंदी सेवियों और साहित्यकारों को बधाई !!!


चंद्र मौलेश्वर

रविवार, 4 जुलाई 2010

‘सृजन’ के तत्वावधान में ‘अभी भी समय है’ काव्य संकलन का लोकार्पण

चि‍त्र में - बायें से संतोष अलेक्स, नीरव कुमार वर्मा, डॉ चागंटि‍ तुलसी,डॉ शंकर लाल पुरोहि‍त, डॉ शकुंतला बेहुरा और डॉ टी महादेव राव।

वि‍शाखपटनम की हि‍न्दी‍ साहि‍त्य, संस्कृति‍ और रंगमंच के प्रति‍ प्रति‍बद्ध संस्था सृजन ने 24 मई 2010 को स्थानीय पाम बीच होटल में कवि‍यत्री डॉ शकुंतला बेहुरा का काव्यस संकलन ‘अभी भी समय है’ का लोकार्पण एवं कवि‍ सम्मेलन का आयोजन कि‍या। मुख्य अति‍थि‍ के रूप में उड़ीसा हि‍न्दी अकादमी के अध्यक्ष एवं प्रसि‍द्ध साहि‍त्यकार और अनुवादक डॉ शंकर लाल पुरोहि‍त उपस्थि‍त थे जबकि‍ कार्यक्रम की अध्यक्षता नीरव कुमार वर्मा, अध्यक्ष, सृजन ने की और वि‍शेष अति‍थि‍ थीं प्रसि‍द्ध अनुवादक एवं साहि‍त्यज्ञ डॉ चागंटि‍ तुलसी।

कार्यक्रम का प्रारंभ सृजन के सचि‍व डॉ टी महादेव राव के स्वागत भाषण एवं वि‍शेष आहूतों के परि‍चय के साथ हुआ। उन्होंने कहा कि‍ पि‍छले आठ वर्षों से सक्रि‍य स्वैच्छिक हि‍न्दी‍ सेवी संस्था सृजन ने न केवल नये लेखकों को प्रोत्साहि‍त कि‍या बल्कि‍‍ पुराने नामी लेखकों और वरि‍ष्ठ रचनाकारों कों भी मंच देकर वि‍शाखपटनम में हि‍न्दी साहि‍त्य को प्रचार प्रसार देने के साथ था हि‍न्दी के अच्छे लेखन को भी प्रेरि‍त कि‍या। अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने वर्तमान समाज में कवि‍, कवि‍ता और पुस्तकों की महत्ता को रेखांकि‍त करते हुए कहा कि‍ समाज को दि‍शा देने में कवि‍ अपनी भूमि‍का बखूबी अदा करता है। साहि‍त्य को समाज का दर्पण कहने के पीछे यही भूमि‍का है। मुख्य अति‍थि‍ डॉ शंकर लाल पुरोहि‍त ने अपनी शि‍ष्या डॉ शकंतला बेहुरा के कवि‍ता संग्रह को लोकार्पण करने के बाद अपने उदबोधन में कहा कि‍ कवि‍ता जो काफी पुरानी वि‍धा है अपने कालांतर में जीवन के बेहद करीब आ गई है और आज आम आदमी के साथ कांधे से कांधा मि‍लाकर चल रही है। कवि‍ता का जीवन में महत्त्व अधि‍क है और गंभीर अध्यियन, व्याकपक जीवन दृष्टित, स्वनि‍रपेक्ष आत्माभि‍व्यक्ति ‍ से परि‍पूर्ण कवि‍ताओं के लि‍ये मैं शकुंतला बेहुरा को ‍बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि‍ उनकी लेखनी असरी तरह प्रभावशाली साहि‍त्य का सृजन करती रहेगी।

पुस्तक समीक्षक संतोष अलेक्स ने इस काव्य संग्रह - अभी भी समय है - को स्मृ्ति‍यों और आत्मवि‍श्वास की कवि‍ताएँ कहते हुए अपने लेख में कहा कि‍ प्रकृति‍, स्मृ‍ति‍, आत्मवि‍श्वा‍स, पीडा पर आशावादी स्वतर को रेखांकि‍त करती सकारात्माक कवि‍ताएँ हैं। अपने भाषण में डॉ चागंटि‍ तुलसी ने कहा कि‍ जडों से जुडी, आत्मवि‍श्वा‍स से भरी और स्त्री की सहज प्राकृति‍ की आशावादी कवि‍ताएँ इस संग्रह में है। एक नारी समाज के बारे में कि‍स तरह सोचती है और उसे कि‍स तरह के समाज की अपेक्षा है इसे हम इन कवि‍ताओं में बेहतर रूप में पाते हैं। इसके बाद कवि‍ सम्मेलन का दौर चला जि‍सका सफल संचालन संतोष अलेक्स ने कि‍या। टी चंद्रशेखर ने चौपहि‍या और पडोसी कवि‍ताओं के साथ एक गजल पढी जो ‍मि‍त्रता और रि‍श्तों पर थी। राजेन्द्र साहू ने अपनी कवि‍ता में देवी देवताओं को बिंब बनाकर आधुनि‍क समस्याओं का जि‍क्र कि‍या। डॉ टी महादेव राव ने आशावादी स्वर को रेखांकि‍त करती दो रुबाइयाँ प्रस्तुरत की और उसके बाद गजल सुनाई -आओ जीने का कोई नया बहाना ढूँढें, जि‍समें आज के समय में एकाकी होते मनुष्यल की व्यथा थी। सुनीता पटनायक ने मानवीय संबंधों पर गजल कौन कहता है पढी जबकि‍ सीमा शेखर ने प्रकृति‍ और औरत शीर्षकों से दो कवि‍ताएँ पढीं जो कि‍ प्रकृति‍ में मौसम और परि‍सरों और स्त्री की मन:स्थिवति्‍ पर थीं। टी के मोहंती ने संस्कृंति‍, सभ्यता और आपसी मेल मि‍लाप की भाषा हि‍न्दी पर एक कवि‍ता हि‍न्दी‍ की व्यापकता पढी। अभी भी समय है शीर्षक कवि‍ता में डॉ रामलक्ष्मी ने आशावादी मानवीय मूल्यों की बात कही। अंत में संतोष अलेक्स ने जीवन और अनुभूति‍यों पर गजल सुनाई। कार्यक्रम का समापन रमेश कुमार स्वाईं के धन्यवांद ज्ञापन से हुआ। देर रात तक चले इस कार्यक्रम में वि‍शाखपटनम के हि‍न्दीव प्रेमी, हि‍न्दीस लेखक और कवि‍ बडी संख्याआ में उपस्थित थे।

– डॉ टी महादेव राव

रविवार, 31 जनवरी 2010

'सृजन' द्वारा 'साहि‍त्‍य चर्चा' का सफल आयोजन


स्‍थानीय साहि‍त्‍य संस्‍था 'सृजन' ने डाबा गार्डेन्‍स स्‍थि‍त पवन एनक्‍लेव में साहि‍त्‍य चर्चा कार्यक्रम का भव्‍य आयोजन कि‍या। मुख्‍य अति‍थि थे सेवा मुक्‍त वरि‍ष्‍ठ हि‍न्‍दी आचार्य प्रो. एस. एम. इकबाल। अध्‍यक्षता की सृजन के अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने और कार्यक्रम का संचालन सृजन के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव ने कि‍या। स्‍वागत भाषण करते हुए डॉ. टी. महादेव राव ने संस्‍था की गति‍वि‍धि‍यों का वि‍वरण प्रस्‍तुत कि‍या और साहि‍त्‍य चर्चा कार्यक्रम के उद्देश्‍यों पर प्रकाश डाला। उन्‍होंने कहा कि‍ इस तरह के कार्यक्रमों से नए लेखकों को प्रोत्‍साहन तो मि‍लता ही है साथ ही पुराने रचनाकारों को भी साहि‍त्‍य सृजन के लि‍ए प्रेरणा मि‍लेगी, जि‍ससे नए साहि‍त्‍य का सृजन होगा और हमारा हि‍न्‍दी साहि‍त्‍य नई ऊँचाइयाँ छू सकेगा।

मुख्‍य अति‍थि‍ प्रो एस एम इकबाल ने आयोजि‍त कार्यक्रमों के माध्‍यम से हि‍न्‍दी साहित्‍य की नि‍स्‍वार्थ सेवा करती सृजन संस्‍था की सराहना की। उन्‍होंने अपने उदबोधन में कहा कि‍ साहि‍त्‍य का अर्थ है समाज का हि‍त चाहने वाला और समाज के प्रति‍ अपने कर्तव्‍यों और दायि‍त्वों के बारे में अधि‍क जागरूक होते हैं कवि‍ और लेखक और समाज के हि‍त में रचनाधर्मि‍ता अपनाने की आज के युग में आवश्‍यकता है।‍ सृजन के अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कहा कि‍ वि‍गत सात वर्षों से साहि‍त्‍य सृजन करने वाले कवि‍यों और लेखकों को संबल प्रदान करने वाली संस्‍था सृजन सही मार्गदर्शन दे रहा है। सभी रचनाकार ऐसी संस्‍था में आएँगे और गुणवत्‍तापूर्ण कार्यक्रम हम जो आयोजि‍त कर रहे हैं, उन्‍हें और अधि‍क स्‍तरीय बनाने में सहयोग करेंगे ऐसा वि‍श्‍वास है।

साहि‍त्‍य चर्चा कार्यक्रम की शुरुआत सीमा वर्मा की कहानी 'छोटी' से हुआ, जि‍में उन्‍होंने मानवीय संबंधों में आते बदलाव की और अनुभूति‍यों की बात की। तोलेटि‍ चंद्रशेखर ने अपनी कवि‍ता मदारी में वर्तमान समय में आम बादमी की दुर्दशा और कठि‍न परि‍स्‍थि‍ति‍यों को रेखांकि‍त कि‍या। एन.डी. नरसि‍म्‍हा राव ने कहानी शांति‍ के माध्‍यम से वि‍धवा वि‍वाह की बात कही। रामप्रसाद यादव ने बिंबों से भरी अपनी प्रभावी कवि‍तायें द्रौपदी और सीता, गुलाब और धरती सुनाई। संगीता राज ने मर्मस्‍पर्शी दो कवि‍तायें सुनाई जो कि‍ कोमल अनुभूति‍यों के शब्‍द चि‍त्र प्रतीत हो रहे थे। भारती शर्मा (प्रभात भारती) ने ताजमहल पर कवि‍ता पढी जो कि‍ वि‍वि‍ध आयाम लि‍ए हुए था। वीरेंद्र राय की कवि‍ताओं में जीवन के लक्षणों के बारे में बिंबात्‍मक लेकि‍न मन को छूती अनुभूति‍यों और संवेदनाओं की उपस्‍थि‍ति‍ थी। बी.वी. राव और डॉ.जी. रामनारायण ने तेलुगु से अनूदि‍त कवि‍तायें मैं भी पढूँगा और मातृ सौंदर्य लहरी का पाठ कि‍या। जी अप्‍पाराव राज ने राजनीति‍क व्‍यंग्‍य कवि‍तायें सुनाई जो कि‍ वर्तमान व्‍यवस्‍था पर चोट थीं। सीमा शेखर ने प्रकृति‍, औरत और वि‍शाखपटनम शीर्षक से स्‍त्री की वि‍वशता, प्रकृति‍ का प्रकोप और शहरीकरण से दूषि‍त होते वातावरण की बात अपनी कवि‍ताओं में कही। डॉ वि‍जय गोपाल संक्रांति‍ और पतंग शीर्षक कवि‍ता में आजकल के परि‍वेश का बिंबात्‍मक प्रस्‍तुति‍ की। संतोष अलेक्‍स ने सामयि‍क स्‍थि‍ति‍यों पर गजल पढी। नीरव कुमार वर्मा ने अपने व्‍यंग्‍य आम ही आम में हारस्‍य व्‍यंग्‍य के साथ नौकरीपेशा व्‍यक्‍ति‍यों की परेशानि‍यों का खुलासा कि‍या। डॉ. टी. महादेव राव ने अपनी सामयि‍क गजलों में शहरीकरण के कारण दूर होते संबंध और अभि‍नय करते चेहरों की बात आशावादी स्‍वर के साथ प्रस्‍तुत कि‍या। इस कार्यक्रम में डॉ नरसा रेड्डी, वि‍जयकुमार राजगोपाल, मुनि‍चन शा आदि‍ अन्‍य लोगों ने भी सक्रि‍यमा के साथ हि‍स्‍सा लि‍या। सभी रचनाओं पर सार्थक चर्चा हुई और अच्‍छे सुझाव भी रचनाकारों को दी गई। प्रो. एस.एम. इकबाल ने प्रति‍भागि‍यों को स्‍मृति‍चि‍ह्न प्रदान कि‍ए। संतोष अलेक्‍स के धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्‍न हुआ।