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रविवार, 30 अक्टूबर 2011

कोपनहेगन में हिन्दी सांस्कृतिक संगोष्ठी

९ अक्तूबर २०११ को कोपनहेगन में चाँद शुक्ला हदियाबादी का सांस्कृतिक कैफे ट्रंकबार हिन्दी संगोष्ठी से एक बार फिर गूँज उठा। इस कार्यकम की नींव तब पड़ गई थी जब मई २०११ में अभिव्यक्ति अनुभूति की संपादक पूर्णिमा वर्मन कोपनहेगन आयी थी और उनकी प्रेरणा से डेनमार्क में ऐसा पहला साहित्यिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। पूर्णिमा वर्मन ने कोपनहेगन निवासी भारतीयों को प्रेरित किया था कि वे इसी तरह नियमित रूप से मिलते रहे और अपनी हिन्दी भाषा व भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देते रहें।
इस द्वितीय हिन्दी संगोष्ठी में डेनमार्क निवासी कई भारतीयों ने अपनी भागीदारी दी। सुखद संयोग से इस बार डा. विजया सती उपस्थित थीं। डा. सती दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफेसर हैं और आजकल एल्ते विश्वविद्यालय बुदापैश्त हंगरी में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से नियुक्त हिन्दी की विजिटिंग प्रोफेसर है। डा. सती की उपस्थिति से कार्यक्रम और अधिक प्रभावी हो गया।

हम सभी जानते हैं कि हिन्दी एक बृहत देश हिन्दुस्तान की राजभाषा और एक विशाल जनसंख्या की मातृभाषा है। दुनिया में हिन्दी बोलने वालों की संख्या पहले से तीसरे स्थान पर निश्चित की जाती रही है। विश्व में किसी देश की भाषा की माँग उसकी राष्ट्री्य शक्ति को चित्रित करती हैं। इसे देखते हुए पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी की स्थिति में तेजी से विकास हुआ है। विशेषकर विदेशों में रहने वाले भारतीय हिन्दी व भारतीय संस्कृति के विकास को लेकर काफी सक़िय होते जा रहे हैं। आज विदेशों से काफी अच्छा हिन्दी साहित्य लिखा जा रहा है। हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं। विश्व के अनेकों विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम शुरू हो गए हैं। हिन्दी एक भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति व पराम्पराओं की अभिव्यक्ति भी है। सो देश-विदेश में चलते सामाजिक  सांस्कृतिक व धार्मिक क्रियाकलाप एवम् गतिविधियाँ भी बढ़ी हैं।

कोपनहेगन में आयोजित संगोष्ठी का विषय था- कोपनहेगन निवासी भारतीय हिन्दी को कितना आवश्यक समझते हैं? अपने जीवन में कितना वे हिन्दी को अपनाते हैं? कितनी वे हिन्दी पत्रिकायें व पुस्तकें पढ़ते है? अपने बच्चों को हिन्दी सीखने के लिये वे कितना प्रेरित करते हैं। इस कार्यकम में कोपनहेगन में भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। उन्होंने प्रकाश डाला कि अपनी संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों द्वारा कैसे वे हिन्दी व भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं। इस विषय पर डा रश्मि सिंगला, सुखदेव सिंह सन्धू, डा. सुरेश बिहारी माथुर, सुनीता मंगा, डा सुभाष धर, गुरूचरण मिंगलानी, डा सुधीर शर्मा, स्वाति डंगवाल, सतीश सरीन एवं चाँद शुक्ला आदि कई बुद्विजीवियों ने अपने विचार प्रस्तुत किये। अन्त में विजयाजी ने एलते विश्वविद्यालय में विदेशियों को हिन्दी व भारतीय संस्कृति को पढ़ाने के अपने रोचक व जानकारीपूर्ण अनुभव सुनाए। कार्य का समापन गजल व कविता पाठ से हुआ।

-अर्चना पैन्यूली

सोमवार, 29 अगस्त 2011

कोपनहेगन में प्राइड ऑफ इंडिया सम्मान

शनिवार 20 अगस्तः इंडियन कलचरल सोसाइटी डेनमार्क ने 65वें स्वतंत्रा दिवस समारोह पर लेखिका अर्चना पैन्यूली को ‘प्राइड ऑफ इंडिया पुरस्कार’ से सम्मानित किया। इस समारोह में डेनमार्क निवासी अनेकों भारतीय व डेनिशों के अलावा भारतीय राजदूत भी उपस्थित थे।

संस्था के अध्यक्ष सुखदेव सिंह सन्धू बोले कि इंडियन कलचरल सासोइटी डेनमार्क ने गत वर्ष निर्णय लिया कि पन्द्रह अगस्त के समारोह में उनकी संस्था डेनमार्क में रहने वाले भारतीय को उनकी उपलब्धियों के लिये ‘प्राइड ऑफ इंडिया’सम्मान से सम्मानित करेगी। इस वर्ष उनकी संस्था ने यह पुरस्कार अर्चना पैन्यूली को उनके लेखन द्वारा हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान एवम् भारतीय समुदाय के प्रति उनके योगदान लिये दिया है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित डेनमार्क में बसे भारतीयों पर लिखा उनका उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ अब रूपा पब्लिकेशन द्वारा अंग्रेजी में छपने जा रहा है।

अर्चना पैन्यूली ने कहा कि किसी संस्था द्वारा किसी लेखक़ कवि या कलाकार को सम्मानित करना उसे एक नवीन ऊर्जा से भर देता है जिससे उसका साहित्य सर्जन थमता नहीं। उन्होंने देश व समाज पर रचित अपनी दो व्यंग्यात्मक कवितायें सुनाकर श्रौतागणों को भाव विभोर कर दिया। इस अवसर पर भारत से आये कुछ कलाकार्रों राजस्थान से आया गुलाबों सपेरा ग्रुप ने राजस्थानी लोक नृत्य पेश किया व गीतकार अनवर अहमद व उनकी टोली ने हिन्दी गीत गाये। कई स्थानीय कलाकारों ने भी अपनी कला व हुनर का प्रदर्शन किया। समारोह समापन पर संस्था की तरफ से भोजन का आयोजन हुआ।

सोमवार, 30 मई 2011

कोपेनहैगेन में साहित्य संध्या

२२ मई २०११, नन्हीं जलपरी के देश की राजधानी डेन्मार्क के प्रथम सांस्कृतिक कैफे ट्रांकेबार में वैश्विक समुदाय की संरक्षक श्रीमती पूर्णिमा वर्मन का भव्य स्वागत किया गया, जिसमें भारतीय मूल के धार्मिक, सामाजिक और साहित्यिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।  इस कैफे की स्थापना भारतीय मूल के रेडियो कलाकार, प्रोड्यूसर, उद्घोषक और गजलकार तथा रेडियो सबरंग से संस्थापक श्री चाँद शुक्ला हदियाबादी तथा मूलरूप से डेनमार्क की निवासी चित्रकार, कवि, लेखक, अनुवादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती रिगमोर कुबलाक रासमुसेन (रिग मोर) ने की है।

कार्यक्रम का प्रारंभ चाँद हदियबादी ने डेन्मार्क में साहित्यिक गतिविधियों के विषय में बताकर किया। उन्होंने रेडियो सबरंग से ट्रंकबार तक की यात्रा के कुछ रोचक संस्मरणों को अतिथियों के साथ बाँटा औॅर ट्रंकबार की लोकप्रिय परंपराओं के विषय में बताया जिसमें द्वार से सटी खिड़की में रखे झरने में संजोई गई शुभ मणियों को कैफ़े के अतिथियों द्वारा उठाने और कैफे में पहली बार पधारने वाली महिला के गले में एक स्कार्फ पहनाने की मनमोहक परंपराएँ शामिल थीं। उन्होंने रेडियो सबरंग की वेब साइट के नये परिवर्तनों को भी सबके साथ बाँटा।
कोपेनहैगे निवासी प्रवासी उपन्यासकार एवं कथाकार अर्चना पैन्यूली ने कार्यक्रम का संचालन किया। उपस्थित हिंदी कर्मियों का परिचय दिया और उनसे अपने कार्य में आने वाली समस्याओं उनके निराकरणों और अपने कार्य अनुभवों के विषय में बोलने के लिये उन्हें आमंत्रित किया। इस अवसर पर सुनीता मंगा, आशा अरोड़ा और कुमुद माथुर ने हिंदी शिक्षण से संबंधित अपने विचार प्रस्तुत किेये। प्रवासी भारतीयों के लिये हिंदी की उपयोगिता बताते हुए उपन्यासकार व कथाकार राजकुमार कोहली ने कहा कि भारतीय मन की संवेदनाओं का जैसा चित्रण हिंदी भाषा में हो सकता है वैसा अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में नहीं हो सकता। रेडियो प्रोड्यूसर एवं उद्घोषक गुरुदयाल सिंह रमता ने कहा कि दूसरी भाषा से हमें धन समृद्धि सबकुछ मिल जाती है लेकिन अपनी भाषा के छूटते ही हम अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं को खो बैठते हैं।

पहले सत्र के बाद अनेक प्रकार के गर्म व ठंडे पेय के साथ समोसे और पकौड़ों का अल्पाहार परोसा गया। दूसरे सत्र का प्रारंभ प्रीति सिंह की तीन छंदमुक्त रचनाओं से हुआ। उनके बाद अर्चना पैन्यूली ने अपनी दो कविताओं का पाठ किया। कुमुद माथुर की एक लंबी कविता के बाद सबके आग्रह पर चाँद हदियाबादी की गजलों ने खूब रंग जमाया। श्रीमती रिगमोर ने पूर्णिमा वर्मन की कुछ रचनाओं के डैनिश अनुवाद का पाठ किया, अंत में पूर्णिमा वर्मन की गजलों और सुरीले गीतों से संध्या संपन्न हुई।
धन्यवाद ज्ञापन चाँद हदियाबादी ने किया। कार्यक्रम में उपरोक्त वक्ताओं के अतिरिक्त रवि मंगा, रघुनाथ माथुर, कमल घोष, शारदा दुलानी, सत्यदेव चतुर्वेदी, ज्योति पैन्यूली, कमल कोहली, प्रवीण सक्सेना और दिनेश शर्मा भी उपस्थित थे।

--दिनेश शर्मा

"वेयर डू आई बिलांग" का विमोचन सम्पन्न

एशियन म्यूजिक संस्था डेनमार्क द्वारा आयोजित शास्त्रीय संगीत संध्या पर अर्चना पैन्यूली के उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ का लोकापर्ण डॉ कैनथ ज्यूस्क़, ऐशियन शिक्षा विभाग कोपनहेगन यूनीवर्सिटी के अध्यक्ष द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रबुद्ध श्रोताओं में डेनमार्क में बसे भारतीय समुदाय के कई साहित्य व संगीत प्रेमियों के अतिरिक्त स्थानीय डेन्स भी उपस्थित थे।

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास योरोपीय वातावरण में रह रहे एक ऐसे भारतीय परिवार की कहानी है, जिसके माध्यम से लेखिका ने भारतीय अप्रवासियों की जीवन शैली, संघर्ष, दुविधाएँ, कठिनाइयाँ, उनके सोच-विचार, दो संस्कृतियों के बीच उनकी जूझ व आप्रवासन समस्याओं को दर्शाया है। उपन्यास की प्रमुख पात्र नवयुवती रीना है। रीना के जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष 20 से 25 तक उपन्यास में वर्णित है। इन पाँच वर्षो के समय में आज के युग की किसी महत्वाकांक्षी नवयुवती को अपना कैरियर बनाने के अतिरिक्त एक विशेष आवश्यकता जीवन साथी की खोज भी होती है। आप्रवासी होने के कारण से कई द्विविधाएँ पैदा हो जाती हैं। उपन्यास आप्रवासन के सरोकारों एवं प्रवासित परिवार व समुदाय के विषय में बहुत कुछ बयाँ करता है।

लोकापर्ण समारोह में डा कैनथ ज्यूस्क के अतिरिक्त रितु कृष्णन, अखिला रमन, मैरी ओहारा, व गुरूचरण मिंगलानी ने उपन्यास पर अपने विचार प्रस्तुत किये। डा कैनथ ज्यूस्क ने कहा, “एक स्केन्डिनेवियन देश डेनमार्क में रह कर यहाँ के समाज पर हिन्दी में उपन्यास लिखना अपने आप में एक विशिष्टता है। डेनिश समाज को लेकर डेनमार्क में हिंदी में लिखा ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ पहला उपन्यास है। अक्सर यह चर्चा होती रहती है कि इस देश के मूल नागरिकों का प्रवासियों के प्रति क्या दृष्टिकोण है। वेयर डू आई बिलान्ग के द्वारा इमीग्रेन्टस का दृष्टिकोण पता लगता है कि वे जिस देश में रहते हैं उस देश के विषय में क्या सोचते हैं और उनकी क्या परेशानियाँ हैं।” इसके अतिरिक्त उन्होंने कोपनहेगन यूनीवर्सिटी में इंडोलोजी व आधुनिक भारत पर चल रहे शैक्षिक कार्यक्रमों पर भी प्रकाश डाला। ऋतु कृष्णन ने कहा- “हिन्दी पुस्तकें मैं कोई खास नहीं पढ़ती थी। ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ पढ़ते हुये मै इसमें इतनी रम गई कि इसके पात्रों व घटनाओं में खो गई। हिन्दी किताबों के प्रति मेरा रुझान बढ़ गया।” मूलतः तमिल प्रदेश की रहने वाली अखिला रमन ने कहा- ‘यह उपन्यास युवा पीढ़ी के लिये है। और इसकी सफलता तभी है जब यह अधिक से अधिक युवकों के पास पहुँचे।” अन्त में लेखिका ने ऐशियन म्यूजिक फोरनिंग संस्था, डॉ कैनथ ज्यूस्क़, अपने पाठकों व श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुये कहा- “किसी रचना विशेष पर पाठकों की टिप्पणी व किसी संस्था द्वारा उसकी पुस्तक का लोकापर्ण करवाना लेखक को नवीन ऊर्जा से भर देता है जिससे उसका साहित्य सर्जन थमता नहीं।”

लीडस, यूके से आयी भारतीय सांस्कृतिक संगीत मंडली ने सुर व ताल से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कुल मिला कर समारोह में संगीत व साहित्य का बेजोड़ समन्यव था। ऐशियन म्यूजिक संस्था के व्यवस्थापक डॉली शैनाय व मनबीर सिंह ने कहा- “पहली बार हमारी संस्था के समारोह में किसी पुस्तक का लोकापर्ण हुआ है, नया अनुभव है…।”

- चाँद शुक्ला