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मंगलवार, 11 सितंबर 2012

‘बेजुबान दोस्त‘ का सफल मंचन और हरनोट को सम्मान

प्रख्यात अभिनेता अनुपम खेर की मुम्बई स्थित संस्था ‘एक्टर्ज प्रिपेयर्स‘ एवं ‘गेयटी ड्रामाटिक सोसाईटी‘ शिमला द्वारा प्रथम अभिनय कार्यशाला के समापन समारोह के अवसर पर कथाकार एस.आर.हरनोट की बहुचर्चित कहानी ‘बेज़ुबान दोस्त‘ का सफल मंचन किया गया और उन्हें इस कहानी के लिए सम्मानित भी किया गया। संस्था के निर्देशक अभिनेता यशराज जाधव और कलाकार मुनीष प्रेम शर्मा की देखरेख में, एक माह से चल रही प्रशिक्षण कार्यशाला के ४९ कलाकारों से ‘बेजुबान‘ शीर्षक से इस नाटक को तैयार करवाया गया था। दो घण्टों की इस आकर्षक और मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति में छह वर्ष की बालिका से लेकर साठ वर्ष तक के वरिष्ठ कलाकार शामिल थे जिन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्रीमति मनीषा नंदा, प्रधान सचिव, भाषा एवं संस्कृति, हिमाचल प्रदेश सरकार और निदेशक भाषा और संस्कृति श्री दिनेश कंवर ने एस.आर.हरनोट को कहानी के लिए और यशपाल जाधव और उनके सहयोगी मुनीश शर्मा को निर्देशन के लिए सम्मानित भी किया। अनुपम खेर ने इस सशक्त कहानी के लिए हरनोट को मुम्बई से फोन पर बधाई भी दी।

‘बेजुबान दोस्त‘ कहानी पहली बार दिल्ली से निकलने वाली हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘पक्षधर‘ में प्रख्यात साहित्यकार प्रो. दूधनाथ सिंह की इस टिप्पणी के साथ वर्ष २००७ मई के अंक में छपी थी कि ‘‘यह कहानी एक आधुनिक लोक-कथा है जो अपने शिल्प और अपने अन्तर्कथ्य में बेजोड़ है। कहानी हिमालय के पर्यावरण को छिन्न-भिन्न करने के प्रयत्न के विरोध की एक अद्भुत कल्पना के साथ-साथ मनुष्य और प्रकृति के सम्मिलन का एक निर्वेद भी है। एक स्वप्न है कथाकार का। एक चाहना है कि ऐसा ही हो। लोगों के फटे-पुराने कोटों की जेबों में चिड़ियों के घोंसले हों और प्रकृति सहचर हो, चरवाहे और पशुओं में मौन वार्तालाप हो।‘‘

कहानी ’बेजुबान दोस्त‘ एस.आर.हरनोट के गत वर्ष प्रकाशति कहानी संग्रह ‘मिट्टी के लोग‘ में संग्रहीत है और पाठकों और आलोचकों ने इसे खूब सराहा है। कहानी में पर्यावरण को बचाने की बात एक विक्षिप्त ग्रामीण किशोर किशन के माध्यम से कही और बुनी गयी है। यह पात्र प्रकृति का अन्तरंग भक्त है और कोई ऐसी बात बर्दाश्त नहीं करता जो यथास्थित भूगोल, प्राणिसंसार और परिवेश से छेड़छाड़ करती हो। सिमैंट की फैक्ट्री के लिए जब उसके गाँव के जंगल के सात सौ पेड़ कटने की बात पता चली तो वह यह सोच कर परेशान होने लगा कि अब उसके पशु कहाँ चरेंगे, चिड़ियाँ अपने घोसले कहाँ बनाएँगी, जंगल के दूसरे जानवर कहाँ रहेंगे। वह इसका विरोध अपने बेजुबान दोस्त पशुओं और पक्षियों के साथ बतियाते हुए करता चला जाता है और अंत में उसकी मुहिम में पूरा गाँव जुड जाता है। फैक्ट्री के लोगों और पुलिस की फौज के साथ जब किशन भिड़ता है तो उसके साथ हजारों पशु, कुत्ते, बच्चे और गाँव के हर उम्र के लोग तो होते हैं पर लाठियों और गोलियों से उस विद्रोह को कुचलने की हर संभव कोशिश की जाती है। किशन के साथ बहुत से लोग गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं और गाँव के पशु डर कर घाटियों में भाग जाते हैं। कुछ दिनों बाद जब गाँव के लोग उन्हें तलाशने पहाडियों पर जाते हैं तो वहाँ झाड़ियों में जगह जगह अपने पुराने कोटों को देखकर हैरान रह जाते हैं जिन्हें कभी किशन ने चुरा दिया था। वे जैसे ही नजदीक जाते हैं तो कोटों की जेबों से चिड़ियों के बच्चों के चहचाने की आवाजें आने लगती है क्योंकि पेड़ कटने के बाद इन्हीं जेबों में उन्होंने घोसले बना दिए हैं। जानेमाने वरिष्ठ आलोचक और कवि श्रीनिवास श्रीकान्त का कहना है कि ‘‘ इस कहानी में पर्यावरण जैसे अति संवेदनशील और जरूरी मुद्दे को हरनोट ने बड़ी शिद्दत के साथ उठाया है जो मन को दहला देता है।‘‘

इस कहानी का सफल मंचन और वह भी ४९ प्रशिक्षणार्थियों से गेयटी जैसे ऐतिहासिक सभागार में करवाना ‘अनुपम खेर की राइटरस प्रिपेयरस संथा और उसके निर्देशक यशपाल जाधव की सूझबूझ और आधुनिक तकनीक का ही कमाल था। एस. आर. हरनोट सहत्तरोत्तर दशक में उभरे एक ऐसे गल्पकार है जिन्होंने हिमाचल के पर्वतीय देहात की अपनी कहानियों में सांस्कृतिक व सामाजिक पड़ताल करने के साथ-साथ कुछेक कहानियाँ ऐसी भी कही हैं जिनमें पर्यावरण के मुद्दे को तीव्रता के साथ लिया गया है जिनमें उनकी बेहद लोकप्रिय और चर्चित कहानी ‘बेजुबां दोस्त‘ भी शामिल है।
 
दिनेश अग्रवाल, स्वतन्त्र पत्रकार
 

सोमवार, 28 नवंबर 2011

गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह 'खबरदार जो व्यंग्य लिखा' का विमोचन

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने ऊना जिला मुख्यालय में आयोजित एक समारोह में हिमाचल साहित्य अकादमी से सम्मानित साहित्यकार गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह 'खबरदार जो व्यंग्य लिखा' का विमोचन किया। इस संग्रह की भूमिका देश के तीन शीर्षस्थ व्यंग्यकारों- गोपाल चतुर्वेदी, प्रेम जनमेजय और सुभाष चन्द्र ने लिखी है और दिल्ली के एक प्रमुख प्रकाशन संस्थान ने इसका प्रकाशन किया है। इस व्यंग्य संग्रह में गुरमीत बेदी के ७८ व्यंग्य लेख संग्रहित हैं जो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व चर्चित हो चुके हैं। 'इसलिए हम हंसते हैं' और 'नाक का सवाल' व्यंग्य संग्रहों के बाद गुरमीत बेदी की व्यंग्य की यह तीसरी पुस्तक है। उनकी कविता, कहानी व शोध की एक-एक पुस्तक के अलावा तीन उपन्यास धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो चुके हैं। उनके दूसरे व्यंग्य संग्रह नाक को सवाल को कनाडा की विरसा संस्था पुरस्कृत कर चुकी है। बेदी को कविता संग्रह- मौसम का तकाजा के लिए १९९४ में हिमाचल साहित्य अकादमी का अवार्ड भी मिल चुका है। उनके व्यंग्य लेखों का अनुवाद पंजाबी, तेलगू, मराठी व गुजराती भाषा सहित कई भाषाओं में हुआ है एवं कविता व कहानी संग्रहों पर दो विद्यार्थी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से एम.फिल भी कर चुके हैं। गुरमीत बेदी हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला में जिला लोक संपर्क अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।

पुस्तक की भूमिका में देश के शीर्षस्थ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी ने लिखा है- 'गुरमीत के लेखन में मुझे जो सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह है इनका व्यंग्य का अनूठा अंदाज। प्रतिष्ठित व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने इस व्यंग्य संग्रह पर अपनी टिप्पणी दर्ज करते हुए लिखा है- 'गुरमीत बेदी दांतों के बीच जिह्ना समान व्यवस्था के बीच रहते हुए भी अपनी जिह्ना को लोकतांत्रिक प्रहार से युक्त किए हुए हैं... व्यवस्थागत विसंगतियों के विरुद्ध खतरनाक व्यंग्य लिखने का उनका साहस मंद नहीं पड़ा है।' विमोचन समारोह में मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि गुरमीत बेदी ने अपने साहित्यिक लेखन से समूचे उत्तरी भारत में अपनी पहचान बनाई है और प्रदेश का नाम रोशन किया है। इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य संसदीय सचिव सतपाल सिंह सत्ती ने कहा कि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और विचारात्मक व्यंग्यों से भरपूर गुरमीत बेदी का यह व्यंग्य संकलन उनकी शुद्ध सात्विक व्यंग्य चेतना का परिचायक है।

विमोचन समारोह में, मुख्य संसदीय सचिव वीरेन्द्र कंवर, गगरेट के विधायक प्रवीण शर्मा, प्रदेश जल प्रबंधन बोर्ड के उपाध्यक्ष प्रवीण शर्मा, डीसी के.आर. भारती सहित अनेक साहित्यकार, लेखक , रंगकर्मी व बुद्धिजीवी उपस्थित थे। पुस्तक का प्रकाशन 'भावना प्रकाशन , १०९-ए, पटपड़गंज, दिल्ली- ११००९१' ने किया है। आकर्षक छपाईयुक्त पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य ३०० रूपए है।

हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच द्वारा राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन का आयोजन

हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच के तत्वावधान में २० अक्तूबर, २०११  दोपहर २.३० बजे शिमला माल रोड़ पर स्थित रोटरी टाउन हाल में ‘पहाड़ की रचनाशलता पर‘ एक ’राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रतिष्ठित कथाकार और आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह ने की।

डॉ. सिंह ने कहा कि ’कथा में पहाड़’ पहाड़ की रचनाशीलता को सामने लाने वाला एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें इसके संयोजक और कथाकार एस आर हरनोट एवं सम्पादक वरिष्ठ कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकान्त ने सभी प्रकार के रागद्वेष से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ रूप से पर्वतीय जन-जीवन को गहनता से रेखांकित करने वाली कहानियों को प्रस्तुत किया है। डॉ0 विजय मोहन सिंह ने १९७५ से १९८२ के दौरान शिमला में व्यतीत किए अपने समय को याद करते हुए हुए अत्यन्त भावुन अंदाज में कहा कि शिमला की मेरी यह यात्रा अतीत और स्मृतियों के बीच एक अन्तर यात्रा है और आज मेरी उम्र काफी हो चुकी है और अब लगने लगा है कि कहीं यह आखरी आखरी यात्रा न हो। उन्होंने अज्ञेय की एक कविता से अपना वक्तव्य समाप्त किया।

प्रमुख वक्ता प्रो0 कुमार कृष्ण ने कहा कि ‘कथा में पहाड़‘ वास्तव में पहाड़ के मनुष्यों की एक ऐसी महागाथा है जहां उनके दुःख, अवसाद, पीड़ा, वेदना, आक्रोश, चुनौतियों, दुर्भिसन्धियों, संघर्ष एवं जीविविषा को एक स्थान पर महसूस किया जा सकता है। पांच सौ पचपन पृष्ठों के इस वुहद कथा ग्रन्थ की सबसे बड़ी खसुसियत यह है कि इसमें जहां एक ओर रमा प्रसाद पहाड़ी जैसे कहानीकार की कहानी को शामिल किया गया है वहां दूसरी ओर ४१ वर्षीय आत्मा रंजन की कहानी को भी स्थान दिया गया है। पहाड़ की रचनाशीलता को प्रस्तुत करने वाला यह ऐतिहासिक दस्तावेज आने वाली पीढ़ी के लिए एक लाइटहाउस का काम करता रहेगा। पुस्तक का मूल्यांकन प्रस्तुत करते हुए आलोचक डॉ. हेमराज कौशिक ने इस कथा संकलन को अत्यन्त श्रमसाध्य बताया जिसे श्रीजिसे श्रीनिवास श्रीकातं जैसे रचनाकार ने अपनी बेबाक समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ लम्बी भूमिका के द्वारा हिन्दी कहानी के पाठकों को अमूल्य धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया है।

आयोजन के प्रारम्भ होने से पूर्व हिमाचल के तीन रचनाकार साथियों सर्वश्री रत्न सिंह हिमेश, डॉ0 शम्मी शर्मा और डॉ0 ठाकुर दत शर्मा आलोक को दो मिनट का मौन रखकर भावभीनी श्रद्धांजति अर्पित की गई। मंच के अध्यक्ष और लेखक तथा इस कथा-ग्रन्थ के संयोजक श्री एस आर हरनोट ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इस योजना के कई पहलुओं पर प्रकाश डाला और सभागार में उपस्थित सभी का स्वागत किया। मंच का संचालन कला, भाषा एवं संस्कृति अकादेमी के सचिव एवं साहित्यकार डॉ0 तुलसी रमण ने किया। इस आयोजन में नेपाली लेखक जगदीश राणा, राम दयाल नीरज, सत्यन शर्मा, सरोज वशिष्ठ, रेखा, तेज राम शर्मा, बद्रीसिंह भाटिया, डॉ0 जगन सिंह, डॉ0 कृपा शंकर सिंह, आर सी शर्मा, आत्मा रंजन, जगत प्रसाद शास्त्री, इस्मिता सिंह सहित कई गणमान्य लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी उपस्थित थे।
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सोमवार, 26 सितंबर 2011

श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक गल्प के रंग का लोकार्पण

शिमला, 6 अगस्त 2011, बचत भवन में जानेमाने कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक गल्प के रंग का लोकार्पण प्रख्यात आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के हाथों संपन्न हुआ। इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिस भाषा के पास अच्छे आलोचक नहीं होते उस भाषा का विकास संभव नहीं हो पाता। हिन्दी के पास आलोचना की लम्बी परम्परा रही है। हमारे पास पुरानी पीढ़ी से लेकर युवा पीढ़ी तक के आलोचक शामिल हैं। अच्छी रचना आलोचक को खुद अपने पास बुलाती है। डॉ0 श्रोत्रिय ने श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि श्री निवास मूलतः कवि हैं लेकिन इस पुस्तक के माध्यम से उनका श्रेष्ठ मर्मज्ञ आलोचक सामने आया है जिससे उनकी आलोचना दृष्टि की ऊंचाई का पता चलता है। श्रीनिवास श्रीकांत ने पुस्तक में 15 आलोचना निबन्ध लिखें हैं जिसमें हिन्दी के ग्यारह लेखक, मराठी के दो और जर्मन के हैं। उन्होंने पुस्तक में संग्रहीत निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, मृदुला गर्ग, केशव और हरनोट की पुस्तकों पर लिखे आलोचना लेखों के साथ गुण्टर ग्रास पर लिखे आलेख को सबसे श्रेष्ठ आलोचना लेख बताया। उन्होंने कहा कि पुस्तक में संग्रहीत अन्य लेख भी आलोचना की दृष्टि से अच्छे बन पडे हैं।

कार्यक्रम की शुभारम्भ एस आर हरनोट ने श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं से किया और कहा कि श्रीनिवास श्रीकांत के रचनाकर्मी जीवन में दो लम्बे अन्तराल है। एक 1954 और 1970 के बीच और दूसरा सहत्तर के मध्य से नई सदी के लगभग मध्य तक, जब वे न अपना कुछ प्रकाशित करवा पाए और न इतनी चर्चा में ही रहे। 2007 में एकाएक बात करती है हवाएँ, 2008 में घर एक यात्रा है और 2010 में हर तरफ समंदर है और कथा में पहाड़ से ये पुनः अपनी शीत निद्रा से अकस्मात जागे हैं और श्रीश्री जी ने समकालीन कविता में ही नहीं, समकालीन रचनात्मक आलोचना में भी अपनी एक विशिष्ठ पहचान बना कर हिन्दी के समकालीन लेखक वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया है। कथा में पहाड़ लगभग 40 महत्वपूर्ण कथाकारों की कहानियों को टिप्पणियों के साथ पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करना आसान काम नहीं था। वरिष्ठ आलोचक डॉ0 हेमराज कौशिक ने श्रीनिवास श्रीकांत के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला और उनकी आलोचना दृष्टि पर "गल्प के रंग" के संदर्भ में विस्तार से बात की। इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार केशव नारायण, आलोचक आत्मा रंजन, चर्चित युवा कवि सुरेश सेन निशांत एवं  नेपाली लेखक जगदीश राणा ने भी अपने विचार प्रकट किये। वयोवृद्ध कवि और लेखक श्रीनिवास श्रीकांत ने इस अवसर पर एकल कविता पाठ भी किया और उन्होंने तरन्नुम में गीत और गजलें भी सुनाई। मंच का सफल संचालन आत्म रंजन ने किया। इस आयोजन में शिमला व प्रदेश के विभिन्न भागों से लगभग 130 लेखक उपस्थित थे जिनमें सत्येन शर्मा, राम दयाल नीरज, सुदर्शन वशिष्ठ, सुशील कुमार फुल्ल, बद्री सिंह भाटिया, राजकुमार राकेश, रमेश चन्द्र शर्मा, जयवंती डिमरी, श्रीनिवास जोशी, कुल राजीव पंत आर0डी0 शर्मा, मस्त राम शर्मा, एस.शशि, मीनाक्षी पाल, राजेन्द्र राजन, ओम प्रकाश भारद्वाज, रत्न चंद निर्झन, रमेश शर्मा, खेम राज शर्मा, जगम प्रसाद शास्त्री, विशम्भर सूद, प्रमुख थे। समारोह का आयोजन हिमालय साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण मंच द्वारा किया गया।

एस आर हरनोट,
द्वारा-हि0प्र0 पर्यटन विकास निगम, रिट्ज एनैक्सी, शिमला-171001