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गुरुवार, 10 जनवरी 2013

निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान, बस्ती का सम्मान समारोह सम्पन्न

बस्ती (उत्तर प्रदेश), २५ दिसंबर, देश के विभिन्न राज्यों के मनीषी साहित्यकारों को साहित्य के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिये प्रतिष्ठित संस्था निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान, बस्ती द्वारा राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान से अलंकृत किया गया। यह संस्था लंबे समय से विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित करती रही है। समारोह के मुख्य अतिथि बस्ती मंडल आयुक्त श्री सुशील कुमार थे जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता मूर्धन्य साहित्यकार एवं पंजाब कला साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. राजेन्द्र परदेसी ने की।लगभग पाँच घंटे तक चले इस कार्यक्रम में हिंदी की विकास यात्रा पर आधारित परिचर्चा और राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, जिसमें देश के १५ राज्यों से पधारे कवियों ने काव्य पाठ करके श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान, बस्ती के संयोजक एवं अध्यक्ष डॉ. रामकृष्ण लाल जगमग की पहल पर आयोजित इस भव्य समारोह में पंजाब केसरी के जम्मू-कश्मीर प्रभारी एवं कथाकार बलराम सैनी एवं हरियाणा लोक साहित्य के अध्येता तथा छायाकार ओम प्रकाश कादयान के अलावा मुख्यतः त्रिलोक सिंह ठकुरेला (राजस्थान), नन्देश निर्मल खगड़िया (बिहार), कुँवर प्रेमिल जबलपुर (म.प्र.), कैलाश झा किंकर (बिहार), मोहम्मद मोइउद्दीन अतहर (म.प्र. ), किशनलाल शर्मा आगरा (उ.प्र.), डॉ. सरयू प्रसाद मिश्र बस्ती (उ.प्र.), डॉ. ज्ञानेन्द्र द्विवेदी दीपक सिद्धार्थ नगर (उ.प्र.) और डॉ रामचंद्र यादव गोंडा (उ.प्र.) आदि को सम्मानित किया गया।

इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश के कुंवर प्रेमिल, महाराष्ट्र के यशवंतकर संतोष कुमार, सिक्किम के वीरभद्र, पश्चिम बंगाल के गोपाल नेवाल, उत्तराखंड के डा.केएल दीवान, बीएसए मनभरन राम राजभर, उप खंड शिक्षाधिकारी बृजेश त्रिपाठी, डा.सरयू प्रसाद मिश्र, डा.अयोध्या प्रसाद पांडेय, सत्येंद्र नाथ मतवाला, बृजराज शुक्ल, नवल किशोर, संतराम, अब्दुल कादिर, हरिश्चंद्र शुक्ल, राघवेंद्र शरण पांडेय, लालमणि प्रसाद, अफजल हुसैन, अनवार हुसैन पारसा, कैलाशनाथ दुबे, डा.रामचंद्र यादव, डा.ज्ञानेंद्र द्विवेदी, धर्मराज चौधरी को भी विविध क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। बाद में हुयी संगोष्ठी व कवि सम्मेलन में मुख्य रूप से डा.सत्यव्रत, डा.रामदुलारे पाठक, प्रेमशंकर द्विवेदी, कृष्ण कुमार उपाध्याय, सागर गोरखपुरी, अजय श्रीवास्तव, परमात्मा प्रसाद निर्दोष, डा.ओम प्रकाश पांडेय व रहमान अली रहमान ने भी प्रस्तुतियाँ दीं।

परिचर्चा के समय ओमप्रकाश कादयान, डॉ. सत्यव्रत, कैलाश झा किंकर और डॉ. ज्ञानेन्द्र द्विवेदी दीपक ने हिंदी की दशा और दिशा पर विस्तार से प्रकाश डाला। मंच का संचालन डॉ. रामकृष्ण लाल जगमग और डॉ. अफजल हुसैन अफजल ने संयुक्त रूप से किया।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

अक्षरा द्वारा सम्मान समारोह का आयोजन

साहित्यिक संस्था 'अक्षरा' के तत्वावधान में कम्पनी बाग, मुरादाबाद स्थित प्रेस क्लब सभागार में सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। का शुभारम्भ माँ सरस्वती के चित्र के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन से हुआ, तथा स्व. श्री देवराज वर्मा की पुण्य स्मृति में उन्हें भावभीनी पुष्पांजलि अर्पित की गयी। इसके पश्चात् आयोजित सम्मान समारोह में झज्जर (हरियाणा) के चर्चित युवा कवि श्री राकेश 'मधुर' को निर्णायक मंडल द्वारा चयनित उनकी काव्यकृति 'चाँद को सब पता है' के लिए "देवराज वर्मा उत्कृष्ट साहित्य सृजन सम्मान-२०१२" से सम्मानित किया गया। श्री मधुर को सम्मान स्वरूप प्रतीक चिन्ह, अंगवस्त्र, सम्मानपत्र, श्रीफल नारियल एवं रु. ११०० की सम्मान राशि भेंट की गयी।

इस अवसर पर सम्मान प्रक्रिया के सन्दर्भ में बताते हुए संस्था के संयोजक योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' ने कहा -"सम्मान प्रक्रिया के अंतर्गत लगभग ३५ साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित सम्मान हेतु प्रविष्टि आमंत्रण विषयक विज्ञप्ति के क्रम में देश के ८ राज्यों से कुल २८ काव्य -कृतियाँ प्राप्त हुयीं जिनमें से सर्वोत्कृष्ट काव्यकृति के चयन हेतु गठित निर्णायक मंडल द्वारा झज्जर (हरियाणा) के चर्चित युवा कवि श्री राकेश 'मधुर' की काव्यकृति 'चाँद को सब पता है' का सम्मान हेतु चयन किया गया।" कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुप्रसिद्ध साहित्यकार नवगीतकवि श्री माहेश्वर तिवारी ने कहा -"राकेश 'मधुर' की कवितायेँ भाषाई सहजता और बिम्बों की ताजगी की चाशनी में पगी हुयी होती हैं।" मुख्य अतिथि लखनऊ से पधरे वरिष्ठ साहित्यकार श्री मधुकर अष्ठाना ने कहा -"मधुर की रचनाधर्मिता में समाज के सांस्कृतिक संकट की फ़िक्र साफ झलकती है।" विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ गीतकार श्री अनुराग गौतम ने कहा -"मधुर की कवितायेँ संवेदनात्मक अनुभूति जगातीं हैं।" विशिष्ट अतिथि प्रख्यात शायर डॉ. स्वदेश भटनागर ने इस अवसर पर कहा -" काव्यकृति 'चाँद को सब पता है' की कविताएँ आज की युवा कविता की चर्चा को में ला खड़ा हैं।" कार्यक्रम में सम्मानित कवि श्री राकेश 'मधुर' ने काव्यपाठ करते हुए कविता पढ़ी -"धुआँ / चूल्हे से उठकर / आँखों में जाता है / चुभता है सुई-सा /बहुत गुस्सा आता है / फिर दब भी जाता है / गुस्सा भूख से डर जाता है "

सम्मान समारोह में राम दत्त द्विवेदी, राजेश भारद्वाज, मनोज 'मनु', अशोक विश्नोई, वीरेन्द्र सिंह ब्रजवासी, डॉ . मीना नकवी, अंजना वर्मा, रामेश्वरी देवी, डॉ . प्रेमकुमारी कटियार, अतुल कुमार जौहरी, शिशुपाल मधुकर, अवनीश सिंह चौहान, विकास मुरादाबादी, निज़ाम हतिफ,सुप्रीत गोपाल आदि गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। कार्यक्रम का सफल सञ्चालन मशहूर शायर डॉ . कृष्ण कुमार 'नाज़' ने किया। आभार अभिव्यक्ति संस्था के संयोजक योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' ने प्रस्तुत की।

- योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'
संयोजक - 'अक्षरा'
मुरादाबाद (उ.प्र.)
मो . 9412805981

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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

अखिल भारतीय साहित्य कला मंच का पुरस्कार समारोह सम्पन्न

मुरादाबाद: १४ अक्टूबर, २०१२; अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, उ.प्र.(भारत) द्वारा आयोजित साहित्य समारोह में मंच द्वारा हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में विविध उपलब्धियों के लिए तीस विभूतियों को सम्मानित एवं पुरस्कृत किया गया। कार्यक्रम का समारम्भ मुख्य अतिथि डॉ. दीनानाथ सिंह (मुंगेर), कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रख्यात हिन्दी सेवी डॉ. राम अवतार शर्मा, (आगरा), विशिष्ट अतिथि डॉ. तंकमणि अम्मा, (केरल); डॉ. निजामुद्दीन (जम्मू व कश्मीर) और डॉ. अंजना संधीर, (अहमदाबाद) द्वारा सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन करने के साथ हुआ। तत्पश्चात सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की।

इस अवसर पर वरिष्ठ गीतकवि एवं आलोचक वीरेंद्र आस्तिक (कानपुर) को अखिल भारतीय साहित्य कला मंच, मुरादाबाद (उ.प्र.) ने उन्हें 'स्व. मधुरताज स्मृति साहित्य-अलंकार-सम्मान- २०१२' से सम्मानित किया। वीरेंद्र आस्तिक जी पिछले ४० वर्षों से गीत एवं समीक्षा लेखन कर रहे हैं। आपका जन्म कानपुर (उ.प्र.) जनपद के एक गाँव रूरवाहार में १५ जुलाई १९४७ को हुआ। अब तक आपके पांच गीत-नवगीत संग्रह-परछाईं के पाँव, आनंद ! तेरी हार है, तारीख़ों के हस्ताक्षर, आकाश तो जीने नहीं देता, दिन क्या बुरे थे प्रकाशित हो चुके हैं। धार पर हम (एक और दो) आपके द्वारा संपादित कृतियाँ है। मंच का आभार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा- "आज हिन्दी भाषा एक जरूरत के रूप में पूरे विश्व में बोली तथा लिखी-पढी जा रही है। सिद्धांत को व्यवहार से ही परखा जा सकता है। हिन्दी ने अपने व्यवहार से सिद्धांत को बहुत पीछे छोड़ दिया है। सिद्धांत टूट चूका है किन्तु संवैधानिक स्तर पर हिन्दी भाषा को बार-बार घेरने का प्रयास किया जा रहा है ताकि वह राष्ट्रभाषा न बन सके। दरअसल हिन्दी भाषा के मामले में आज हम वहीं खड़े हैं जहां से चले थे। ऐसी स्थिति में हमारे पास अब एक ही विकल्प बचता है। राष्ट्रभाषा के समर्थन में जिस दिन हिन्दी जाति की करोड़ों-करोड़ों जनता आन्दोलन पर उतर आयेगी, संसद के सामने धरना देगी और आमरण अनशन पर बैठेगी, उसी दिन सच मानिए हिन्दी राष्ट्रभाषा घोषित हो जायेगी।"

समारोह में अनेक प्रान्तों के साहित्यकार मौजूद थे। प्रो. रामप्रकाश गोयल (बरेली); डॉ. परमेश्वर गोयल (पूर्णिया); डॉ. प्रभा कपूर, डॉ. पी. के.शुक्ल, डॉ. विनोद कुमार पाण्डेय (मुरादाबाद); डॉ शमा परवीन; डॉ. मनीषा मित्तल; डॉ. अरूण रानी (चाँदपुर); रवीन्द्र मोहन ‘अनगढ़’; रामप्रकाश ‘ओज’, डॉ. मीना कौल (मुरादाबाद); डॉ. दिनेश चमोला (देहरादून), डॉ. ऋजु पंवार (मेरठ); रमेश सोबती (फगवाड़ा);डॉ. विनोद कुमार ‘प्रसून’ (नोयडा); डॉ. सुनील अग्रवाल (चन्दौसी); डॉ. रघुवीरशरण शर्मा (रामपुर); अनिल शर्मा ‘अनिल’ (धामपुर); सत्यपाल सत्यम, समीर मण्डल, डॉ. सुधाकर ‘आशावादी’, सुमनेश ‘सुमन’, कौशल कुमार, श्री अनिल सिसौदिया, (मेरठ); डॉ. आर.सी.शुक्ला, डॉ. दीपक बुदकी, डॉ. गंगेश गुंजन, अशोक ज्योति (नई दिल्ली), डॉ. नीरू कपूर, डॉ. राजीव शर्मा, डॉ. चन्द्रभान सिंह यादव, डॉ.मुकेश कुमार गुप्ता, पुष्पेन्द्र वर्णवाल, माहेश्वर तिवारी, ब्रजभूषण सिंह गौतम ‘अनुराग’, डॉ. मयंक पंवार, डॉ. अभय कुमार, डॉ. स्वाति पंवार, डॉ. अनुराधा पंवार, महेश पाल सिंह राघव, योगेन्द्र पाल सिंह विश्नोई, रामलाल ‘अन्जाना’, वीरेन्द्र ‘बृजवासी’, अशोक विश्नोई, मीना नकवी, राजीव सक्सेना, ओंकार सिंह ओंकार, आनन्द गौरव, कृष्ण कुमार नाज़, चन्द्रशेखर ‘मयूर’, योगेन्द्र ‘व्योम’, जिया जमीर, ओमराज, श्री अतुल जौहरी, शिवशंकर यजुर्वेदी, फक्कड़ मुरादाबादी, विवेक ‘निर्मल’, जितेन्द्र जौली, अवनीश सिंह चैहान आदि साहित्यकार उपस्थित थे। कार्यक्रम के द्वितीय चरण में स्थानीय और बाहर से आये साहित्यकारों की कविगोष्ठी भी आयोजित की गयी। कार्यक्रम का संचालन डॉ अम्बरीष कुमार गर्ग एवं विवेक निर्मल ने संयुक्त रूप में किया।

'कुंडलिया छंद के सात हस्ताक्षर' का विमोचन

५ अक्टूबर, आगरा, के 'समानान्तर' संस्था के तत्वाधान मे 'यूथ हास्टल सभागार' मे त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा सम्पादित 'कुंडलिया छंद के सात हस्ताक्षर' का विमोचन यशस्वी कवि श्री सोम ठाकुर, 'बाबूजी का भारतमित्र' के सम्पादक श्री रघुविंद्र यादव, डा.राजेंद्र मिलन और 'समानान्तर' संस्था की अध्यक्षा डा. शशि गोयल द्वारा किया गया।
 
मुख्य अतिथि कवि सोम ठाकुर जी ने कहा कि कुंडलिया एक लोकप्रिय विधा रही है। आज इसके संरक्षण की आवश्यकता है। सुपरिचित रचनाकार श्री रघुविंद्र यादव ने पुस्तक की प्रशंशा करते हुए सम्पादक और इसके सभी रचनाकारों को बधाई दी। इस अवसर पर समानांतर संस्था की ओर से त्रिलोक सिंह ठकुरेला एवम रघुविंद्र यादव को श्री सोम ठाकुर द्वारा सम्मनित किया गया। कार्यक्रम मे डा.रामसनेही लालशर्मा 'यायावर' गाफिल स्वामी,राजेश प्रभाकर,शेशपाल सिंह शेष, ड्रा.एम.पी.विमल, अजीत फौजदार, सुरेंद्र सिंह वर्मा सहित अनेक साहित्यकार व गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। समारोह का अंत मे कवि सम्मेलन से हुआ। कार्यक्रम का संचालन अशोक अश्रु तथा संयोजन श्री शिव कुमार दीपक द्वारा किया गया।

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

सुप्रसिद्ध गीतकार एवं उपन्यासकार श्री आनन्द कुमार ‘गौरव’ को ‘हिन्दी साहित्य गौरव सम्मान’

मुरादाबाद की छह साहित्यिक संस्थाओं- ‘अक्षरा’, हिन्दी साहित्य संगम, सरस्वती परिवार, उत्कर्ष, मिलन एवं काव्य-संदेश के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी दिवस के अवसर पर दिनांक १४ सितम्बर, २०१२ को लाइनपार, मुरादाबाद स्थित दिव्य सरस्वती कन्या इंटर कॉलेज के सभागार में सुप्रसिद्ध गीतकार एवं उपन्यासकार श्री आनन्द कुमार ‘गौरव’ को हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में किए गए उनके उल्लेखनीय सृजनात्मक योगदान के लिए ‘हिन्दी साहित्य गौरव सम्मान’ से सम्मानित करते हुए उन्हें प्रतीक चिन्ह, मानपत्र, अंगवस्त्र, तथा श्रीफल नारियल भेंट किया गया।

कार्यक्रम का “शुभारम्भ डॉ.प्रेमवती उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत वाणी-वंदना से हुआ। सम्मानित व्यक्तित्व श्री आनन्द कुमार ‘गौरव’ के व्यक्तित्व और कृतित्व के संदर्भ में ‘अक्षरा’ संस्था के संयोजक योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने कहा कि ‘श्री गौरव जितने श्रेष्ठ सुकवि है उतने ही चर्चित कथाकार व उपन्यासकार भी हैं। श्री गौरव की रचनाओं का गाम्भीर्य सिद्ध करता है कि उन्होंने साहित्य के मर्म को केवल जाना ही नहीं बल्कि आत्मसात भी किया है।’ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी ने कहा कि ‘श्री गौरव का रचना संसार एक बाइस्कोप की तरह है जो न केवल अपने समय के परिदृश्य को पर्त-दर-पर्त खोलकर दिखाता है वरन वह अपने समय का पोस्टमार्टम करते हुए सत्य, नैतिकता व मानवीयता की हत्या के यथार्थ के कारको और कारणों को भी उजागर करता है।’

कार्यक्रम की मुख्यअतिथि वरि’ठ “शायरा डॉ. मीना नकवी ने कहा कि ‘श्री आनंद गौरव ने गीतों, कहानियों और उपन्यासों के अतिरिक्त गजलें भी काफी मात्रा में कही हैं। उनकी गजलें मखमली रूमानियत और विद्रूपताओं पर तल्ख टिप्पणी का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती हैं।’ सम्मान समारोह के कार्यक्रम में सर्वश्री राजेन्द्रमोहन शर्मा ‘शृंग’, विवेक ‘निर्मल’, शचीन्द्र भटनागर, अशोक विश्नोई, डॉ. अजय ‘अनुपम’, डॉ. ओम आचार्य, रामदत्त द्विवेदी, विकास मुरादाबादी, डॉ. प्रेमवती उपाध्याय, प्रतिष्ठा वर्मा, डॉ. मीना नकवी, डॉ. प्रेमकुमारी कटियार, ओमकार सिंह ‘ओंकार’, शिशुपाल ‘मधुकर’, डॉ. जगदीप कुमार, जितेन्द्र जौली, रघुराज सिंह ‘निश्चल’, वीरेन्द्र सिंह बृजवासी आदि साहित्यकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ नवगीतकार श्री माहेश्वर तिवारी ने की तथा मुख्य अतिथि प्रसिद्ध शायरा डॉ. मीना नकवी एवं विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रदीप शर्मा एवं डॉ. ओम आचार्य रहे। कार्यक्रम का संचालन श्री योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’ ने किया तथा आभार अभिव्यक्ति श्री रामदत्त द्विवेदी ने प्रस्तुत की।

-योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’
संयोजक, साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’
मुरादाबाद

शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

नवगीत के अद्भुत हस्ताक्षर डॉ. माहेश्वर तिवारी जी को 'साहित्यादित्य सम्मान'

मुरादाबाद की सात साहित्यिक संस्थाओं - अक्षरा, विप्रा कला साहित्य मंच, परमार्थ, हिंदी साहित्य संगम, अंतरा, राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार समिति एवं हिंदी साहित्य सदन के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक २६ अगस्त २०१२ को कंपनी बाग़ मुरादाबाद स्थित प्रेस क्लब सभागार में एक भव्य सम्मान समारोह आयोजित किया गया जिसमें नवगीत के अद्भुत हस्ताक्षर डॉ. माहेश्वर तिवारी जी को उनकी अमूल्य नवगीत साधना एवं आकाशवाणी के केन्द्रीय संग्रहालय हेतु 'आर्काइव' के रूप में विशेष उपलब्धि हेतु 'साहित्यादित्य सम्मान' से सम्मानित किया गया। श्री तिवारी को सम्मान स्वरूप प्रतीक चिन्ह, मानपत्र, श्रीफल एवं सातों संस्थाओं द्वारा अंगवस्त्र पहनाकर भेंट किया गया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देहरादून से पधारे सुप्रसिद्ध गीत्कवि डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र ने इस अवसर पर कहा- "माहेश्वर जी के नवगीतों में जहाँ एक और ताजगी है वहीँ दूसरी और आंचलिक मिठास भी उनकी रचनाधर्मिता को महत्वपूर्ण बनाती है।" वरिष्ठ कवि श्री शचीन्द्र भटनागर एवं विशिष्ट अतिथि लेखिका डॉ. बीना रुस्तगी सहित अनेक वक्ताओं - डॉ. अजय 'अनुपम', आनंद कुमार 'गौरव', डॉ.कृष्ण कुमार 'नाज़', प्रो. ओमराज, मनीष मिश्र, डॉ. मक्खन मुरादाबादी, अनुराग गौतम, विवेक 'निर्मल', सुरेन्द्र राजेश्वरी आदि ने श्री तिवारी जी के व्यक्तित्व तथा कृतित्व के सन्दर्भ में अपने-अपने विचार रखते हुए उनके सृजन को स्तुत्य बताया। कार्यक्रम में श्री तिवारी जी का एकल काव्यपाठ भी हुआ जिसमें उन्होंने अपने कई गीतों का सस्वर पाठ भी किया- 'एक तुम्हारा होना क्या से क्या कर देता है/ बेजुबान छत, दीवारों को घर कर देता है.' तथा 'धूप में जब भी जले हैं पाँव/घर की याद आयी'।

कार्यक्रम का सफल संचालन श्री आनंद 'गौरव' ने किया एवं आभार अभिव्यक्ति योगेन्द्र वर्मा 'व्योम' ने प्रस्तुत की। इस अवसर पर मुख्यरूप से राजेंद्र मोहन शर्मा 'शृंग', रामदत्त दूवेदी, ब्रजगोपाल 'व्यास', अशोक विश्नोई, अंजना वर्मा, मनोज 'मनु', बलवीर पाठक, शिशुपाल 'मधुकर', डॉ. जगदीप कुमार, डॉ.पूनम बंसल, डॉ. मीना नकवी, डॉ. प्रेमवती उपाध्याय, विशाखा तिवारी, सुप्रीत गोपाल, योगेन्द्रपाल सिंह, आदि अनेक स्थानीय साहित्यकार एवं गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

- योगेन्द्र वर्मा 'व्योम'
संयोजक - 'अक्षरा' साहित्यिक संस्था
ए.एल.- ४९ ,सचिन स्वीट्स के पीछे, दीनदयाल नगर-प्रथम,
कांठ रोड, मुरादाबाद (उ.प.)
मो. - ९४१२८०५९८१

सोमवार, 4 जून 2012

भोजपुरी कवि सम्मेलन का सफल आयोजन

पूर्वाचल भोजपुरी महासभा द्वारा संस्था के मुख्य संरक्षक अशोक श्रीवास्तव के संयोजन में गाज़ियाबाद में पहली बार भोजपुरी कवि सम्मलेन का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि राजकुमार सचान ''होरी'' तथा संचालन भोजपुरी के लोकप्रिय कवि मनोज भावुक ने किया। इस सम्मेलन के मुख्य अतिथि हिन्दी - भोजपुरी के सुप्रसिद्ध अभिनेता महाभारत के द्रोणाचार्य सुरेन्द्र पाल सिंह एवं विशिष्ठ अतिथि नवल कान्त तिवारी, निदेशक उत्तर प्रदेश राज्य सूचना केंद्र थे।

कवि सम्मेलन का शुभारम्भ सिवान से पधारे गीतकार सुभाष चन्द्र यादव ने सरस्वती वन्दना से की, फिर चिरई - चुरुमन सब जल बिनु तरसे ..काहे नाहीं पनिया बदरा से बरसे .. गीत गाकर तो शुरू में हीं उन्होंने मंच को ऊंचाई दे दी। गीतकार- व्यंग्यकार मोहन दिवेदी ने अपनी रचना ''जेब'' सुनाकर आज की सामाजिक - राजनीतिक विसंगतियों पर करारा प्रहार किया ... देश क पैसा हव देश क जेब में, चाहे आप क जेब में चाहे हमरे जेब में... वयोवृद्ध कवि गिरधारी करून ने चैता सुनाया तो तारकेश्वर मिश्र राही ने भ्रूण ह्त्या पर गीत सुनाकर सबको सोचने समझने पर मजबूर कर दिया। हास्य कवि बादशाह तिवारी प्रेमी ने भोजपुरी को कुछ यों परिभाषित किया -- जे बोली समझी एकरा के सट जाई उ लासा नीयर / एतना मीठ कहाँ कवनो हमरी भोजपुरी भाषा नीयर। युवा कवि अनूप पाण्डेय एकांत ने किसानो के दर्द को उकेरा -- किसान के कफनो भर के ताकत नइखे...रूई में , कपास में। भोजपुरी हास्य के महाकवि कुबेर नाथ मिश्र विचित्र ने सत्ता की स्थिति पर व्यंग्य किया - ऊपर महिला, नीचे महिला, बीचे मरद चंपाइल बा, हे भगवान बुझाते नइखे कवन ज़माना आइल बा। मुकेश श्रीवास्तव मुकेश ने आदमी की विवशता को कुछ यूं चित्रित किया - कुकुरा के डाँट सहे, सियरा के रोब/ हई शेरवा त साचहूँ लाचार हो गइल। युवा ग़ज़लकार मनोज भावुक ने शेर पढ़े - मन के धृतराष्ट्र के आँखिन से सभे देखत बा/ भीम असली ह कि लोहा के, चिन्हाते नइखे... बर्फ हs, भाप हs, पानी हs कि कुछुओ ना ह s / जिन्दगी का हवे, ई राज बुझाते नइखे। गोरखपुर से आई कवयित्री शैलजा सिंह को गाँव की याद आई - अकेलापन भइल जब भी हमें उ गाँव याद आइल। डा० रचना, पी के सिंह एवं तरल जी समेत कई कवियों ने समसामयिक रचनाएँ व गीत - ग़ज़ल सुनाकर श्रोताओं को मन्त्रमुग्ध कर दिया।

वरिष्ठ कवि राजकुमार सचान ''होरी'' के अध्यक्षीय भाषण व काव्य पाठ के बाद पूर्वाचल भोजपुरी महासभा के मुख्य संरक्षक व संयोजक अशोक श्रीवास्तव ने सबका धन्यवाद ज्ञापित करते हुए घोषणा कि की इस भोजपुरी कवि सम्मेलन की परम्परा हमारे जीते जी जारी रहेगी और हर वर्ष दीपावली के आस- पास गाज़ियाबाद में इसका बड़े स्तर पर आयोजन होता रहेगा। प्रस्तुति - मोहन द्विवेदी

प्रभा स्मृति बाल साहित्य सम्मान बिजनौर के डा. बलजीत सिंह को

शाहजहांपुर, गाँधी पुस्तकालय द्वारा प्रतिवर्ष  दिया जाने वाला प्रभा स्मृति बाल साहित्य सम्मान इस बार बिजनौर के डा. बलजीत सिंह जी को प्रदान किया गया। सम्मान स्वरुप पुस्तकालय सचिव अजय गुप्त और प्रभा के पति अनूप गुप्त ने उन्हें प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह, अंग वस्त्र, नारियल और इक्कीस सौ रूपये की राशि भेंट की । डा. बलजीत वर्धमान कालेज,बिजनौर के पूर्व अंग्रेजी विभागाध्यक्ष हैं और साहित्य के क्षेत्र में उनकी १२ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

सम्मान प्राप्त करने के बाद डा. बलजीत सिंह ने कहा निष्पक्ष भाव से मिले इस पुरस्कार को पाकर वह स्वयं को धन्य अनुभव कर रहे हैं। आज बच्चो को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए विशेष प्रयासों की आवश्यकता है। इस अवसर पर गाँधी पुस्तकालय द्वारा प्रकाशित बच्चों के लिए पत्रिका बाल प्रभा का विमोचन किया गया। इसका संपादन नागेश पांडेय ‘संजय’ने किया है।‘बाल साहित्य के समक्ष पठनीयता का संकट‘ विषय पर संगोष्ठी भी आयोजित की गई। जिसकी अध्यक्षता भीलवाड़ा, राजस्थान से प्रकाशित मासिक ‘बाल वाटिका‘ के संपादक डा. भैरूंलाल गर्ग जी ने की। उन्होंने कहा कि बदलती रूचि को ध्यान में रखकर युगानुकूल बाल साहित्य लिखा जाना चाहिए। मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय से पधारी बाल साहित्य की चर्चित लेखिका- समीक्षिका डा. शकुन्तला कालरा जी उपस्थित रहीं। अपने संबोधन में उन्होंने बच्चों तक बाल साहित्य पहुँचाने के लिए उचित नेटवर्क न होने पर चिंता व्यक्त की। डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर ने अखबारों को बाल साहित्य उपलब्ध कराने का सस्ता और सुलभ माध्यम बताते हुए हर अखबारों में बाल साहित्य की जरूरत की बात कही।

समारोह में निर्मला सिंह बरेली की तीन पुस्तकों मैं जंगल का राजा हूँ, एकता में बल है, मेरा गाँव तथा फतेहगढ़ के राकेश चक्र की पुस्तक मातृभूमि है वीरों की का लोकार्पण भी किया गया। प्रारंभ में मंचस्थ जनों द्वारा सरस्वती माल्यार्पण के पश्चात एक बच्ची साक्षी द्वारा वंदना प्रस्तुत की गई। स्वागत भाषण डा. हरिओम त्रिपाठी ने दिया। डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, डा. विनोद रस्तोगी, बरेली, अरूण अदीब , राजस्थान, डा. अमित, पीलीभीत, रावेन्द्र कुमार रवि, कुमार गुलशन, ज्ञानेंद्र मोहन ज्ञान, मधु सिंह, देशबंधु, सहित अनेक बच्चों ने बाल कविता पाठ किया। समारोह में बसंत लाल खन्ना, ओम प्रकाश अडिग, विजय कुमार, ओंकार मनीषी, पंकज मिश्र अटल, अरविंद राज, डा. राजकुमार षर्मा, डा. योगेंद्र, अख्तर शाहजहाँपुरी, डा. सत्यप्रकाश मिश्र, ब्रजेश मिश्र, अरविंद मिश्र, डा. पंकज भार्गव, कमल शुक्ल, सुनैना अवस्थी, ब्रजेश पांडे, डा. प्रभात शुक्ल, डा. जे.एस. मिश्र, सुधीर सिंह, डा. बलवीर शर्मा, महेश प्रजापति , डा. प्रशांत अग्निहोत्री, दीपक कंदर्प, आशा गुप्ता, प्रवीण, सुनील, आदि अनेक, वुद्धिजीवी साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। संचालन डा. नागेश पांडेय ‘संजय’ और आभार शिवाजी गुप्त ने व्यक्त किया।

-अजय गुप्त

मंगलवार, 15 मई 2012

यूनिवर्सिटी पॉलीटेक्निक में स्वरचित कविता प्रतियोगिता का सफल आयोजन

मुरादाबाद, बुधवार ९ मई , तीर्थंकर महावीर यूनीवर्सिटी के पॉलीटेक्निक कालेज के प्रथम एवं द्वितीय वर्ष के छात्र-छात्राओं के लिए स्वरचित कविता प्रतियोगिता का आयोजन लेक्चर थिएटर में किया गया। इस आयोजन में माननीय कुलाधिपति श्री सुरेश जैन जी, ग्रुप वाइस चेयरमेन श्री मनीष जैन जी, कुलपति प्रो. आर.के. मित्तल जी तथा कुलसचिव प्रो. आर.के. मुदगल जी की प्रेरणा एवं पॉलीटेक्निक कालेज के प्राचार्य प्रो. टी.पी. अग्रवाल, डीन एम. आर. खुराना और सहायक कुलसचिव नितिन अग्रवाल के विशेष सहयोग से कार्यक्रम का शुभारम्भ सर्वश्री माहेश्वर तिवारी, शचीन्द्र भटनागर, महेश दिवाकर, प्राचार्य प्रो. टी.पी. अग्रवाल, एम. आर. खुराना, एस. सी. सिंघल, नितिन अग्रवाल द्वारा माँ सरस्वती की अर्चना एव वंदना से हुआ।

कार्यक्रम में १४ प्रतिभागियों- अभिषेक कुमार, अभिषेक मिश्रा, सिफात हैदर, जोनी कुमार, जुल्फेकार अली, धर्मेन्द्र कुमार, दिनेश कुमार, प्रदीप कुमार, मोहम्मद यूसुफ़, शमशाद अहमद, सुमित पाण्डेय, कृतिका राकेश, वैभव शुक्ला ने भाग लिया। इस प्रतियोगिता में छात्रों को अपनी स्वयं की लिखी हुई कविता 'स्वरचित कविता प्रतियोगिता' के संयोजकों (अवनीश सिंह चौहान एवं अनुराधा पंवार) को प्रस्तुत करनी थी। तदुपरांत निर्णायक मंडल के सम्मानित सदस्यों द्वारा चयनित रचनाओं के रचनाकारों को प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति प्रदान की गयी। प्रतियोगिता में भाग लेने पर रचनाओं के कथ्य एवं प्रस्तुतीकरण के आधार पर निर्णायक मंडल के सम्मानित सदस्यों- सर्वश्री शचीन्द्र भटनागर, माहेश्वर तिवारी एवं महेश दिवाकर ने अपना निर्णय सुनाया जिसमें कृतिका राकेश, धर्मेन्द्र कुमार तथा जुल्फेकार अली एवं वैभव शुक्ला (संयुक्त रूप से) को क्रमशः प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। इस कार्यक्रम के संयोजक अवनीश सिंह चौहान और अनुराधा पंवार रहे।

इस अवसर पर वरिष्ठ गीतकार माहेश्वर तिवारी जी ने कहा कि यह प्रतियोगिता अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से युवा पीढी को अपनी सोच एवं रचनात्मकता को प्रकट करने का सुनहरा अवसर मिला है। वरिष्ठ कवि शचीन्द्र भटनागर जी ने कहा कि तकनीकी छात्रों को कविता से जोड़ना एक अच्छी पहल कही जा सकती है जिससे छात्रों में सामाजिक चेतना आयेगी। वरिष्ठ साहित्यकार महेश दिवाकर जी ने कहा कि यांत्रिकी को संवेदना से जोड़कर यदि आज के युवा कार्य करेंगे तो उनके कार्य मानव की भलाई के लिए ही होंगे, विनाश के लिए कदापि नहीं। प्रो. टी. पी अग्रवाल ने कहा कि हमारे छात्र कविता के माध्यम से न केवल संस्कार सीखेंगे बल्कि समाज को भी संस्कारित करेंगे। डीन एम. आर. खुराना ने अपने वक्तव्य में कहा कि इससे छात्रों में क्रियेटिविटी आयेगी। नितिन अग्रवाल ने कहा कि कि साहित्य सृजन और पाठन से छात्रों में चेतना आयेगी। अवनीश सिंह चौहान ने कहा कि आज की युवा पीढी साहित्य से कटती चली जा रही है; इस तरह के आयोजन उनमें साहित्य के प्रति अभिरुचि पैदा करेंगे। जबकि अनुराधा पंवार ने कहा कि इस प्रतियोगिता के माध्यम से छात्रों को जहाँ साहित्य की महत्ता को समझाने का अवसर मिला है वहीं वे अच्छे मूल्यों को अपनाकर अपना जीवन सुन्दर बनायेंगे ।

कार्यक्रम को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए छात्र-छात्राओं को समय-समय पर कविता की बारीकियों से अवगत कराया गया और उनका मार्गदर्शन किया गया था, जिसमें अवनीश सिंह चौहान, अनुराधा पंवार, वरुण झा, कार्तिकेय, वर्षा वत्स, जरीन फारुक का विशेष सहयोग रहा। इस आयोजन से एक दिन पूर्व इन छात्रों की रचनाओं को पूर्वाभास पर भी प्रकाशित किया गया ताकि इंटरनेट के पाठक इन युवाओं के रचनाकर्म से परिचित हो सकें।

इस अवसर पर सर्वश्री मयंक पंवार, अवनीश चौहान (हरिद्वार), संजीव चौहान, अभिनव सक्सेना, अरविन्द गौड़, ए. एम. खान, सचिन चौधरी, अंशु, निधि वर्मा, कार्तिकेय, पायल, वर्षा वत्स, एस.बी रस्तोगी, जितेश सिंह, हिमांशु शर्मा, ए. के. सिंह, अंकित बाजपेयी, विवेक, नीलोफर, संतोष गंगवार, हैदर अली, वरुण गुप्ता, मो. मुकीम, नवनीत सैनी, प्रदीप अम्बेडकर, रूचि अग्रवाल, पुनीत कुमार, डी.एम गर्ग, अमित शर्मा , मुस्तफा अहमद, टी.डी. सक्सेना, सोनू चौहान, सौरभ भटनागर, गौरव सिंह, कृति वर्मा, अंजना चौधरी, मो. उमर, कुमुद राणा एवं यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। मंच का संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया।

मंगलवार, 8 मई 2012

प्रतिष्ठित लमही सम्‍मान सुप्रसिद्ध कथाकार श्री शिवमूर्ती को

हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका लमही द्वारा दिया जाने वाला लमही सम्‍मान वर्ष २०११ हेतु सुप्रसिद्ध कहानीकार श्री शिवमूर्ती को दिया जायेगा। लमही के प्रधान संपादक विजय राय ने जानकारी देते हुए बताया कि यह सम्‍मान लखनऊ में अक्‍टूबर में होने वाले समारोह में प्रदान किया जायेगा।

वर्ष २०११ का लमही सम्‍मान कथाकार श्री शिवमूर्ती को दिये जाने का निर्णय चार सदस्‍यीय चयन समिति ने लिया। इस चयन समिति में वरिष्‍ठ साहित्‍यकार चित्रा मुदगल, रंगमंच से डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी, लमही के संपादक विजय राय तथा साहित्यकार सुशील सिद्धार्थ शामिल थे। श्री शिवमूर्ती को लमही सम्‍मान ८ अक्‍टूबर को लखनऊ में आयोजित होने वाले लमही के साहित्यिक समारोह में प्रदान किया जायेगा। इस समारोह में लमही के श्री शिवमूर्ती पर केन्द्रित विशेषांक का भी विमोचन किया जायेगा। यह विशेषांक श्री सुशील सिद्धार्थ के अतिथि संपादन में प्रकाशित होने जा रहा है।

सुल्तानपुर(उत्तर प्रदेश) के गांव कुरंग में जन्मे श्री शिवमूर्ती की कसाईबाड़ा, सिरी उपमा जोग, भरत नाट्यम्, तिरिया चरित्तर आदि प्रसिद्ध तथा चर्चित कहानियाँ हैं। उनका केशर कस्तूरी कथा संग्रह तथा त्रिशूल और तर्पण जैसे उपन्यास प्रकाशित तथा चर्चित हो चुके हैं। श्री शिवमूर्ती की कुछ कहानियाँ रंगमंच और सिनेमा का कथानक बनीं हैं तथा कसाईबाड़ा पर पाँच हजार से ज्यादा मंचन हो चुके हैं, इस पर फीचर फिल्म भी बनी है। तिरिया चरित्तर पर बासु चटर्जी की फिल्म बनी है। कई कहानियाँ देशी-विदेशी भाषाओं में अनूदित हो चुकी हैं। वर्ष २००२ में श्री शिवमूर्ती को कथाक्रम सम्मान प्रदान किया गया था।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

अवनीश सिंह चौहान को थिंक क्लब वार्षिक पुरस्कार

संयुक्त राज्य अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित द थिंक क्लब ने पूर्वाभास के संपादक अवनीश सिंह चौहान को हिंदी भाषा और साहित्य की उन्नति हेतु थिंक क्लब वार्षिक पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की है। थिंक क्लब हिंदी भाषा की उन्नति के लिए प्रतिबद्ध है। पुरस्कार की रकम १५,००० रुपये है। थिंक क्लब का मानना है कि पूर्वाभास के द्वारा किये गए प्रयास हिंदी जगत के संघर्षरत कवियों ओर लेखकों के लिये आवश्यक मंच प्रदान करते हैं।

थिंक क्लब की ओर से पुरस्कार चयन समिति ने उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए कामना की है कि उनका यह रचनात्मक कार्य अनवरत चलता रहे। इस पुरस्कार हेतु चयन समिति के अध्यक्ष अनिल श्रीवास्तव (प्रबंध सम्पादक, थिंक क्लब पब्लिकेशन्स,ब्लूमफील्ड हिल्स, मिशीगन, यूं एस ए) ने ८ फरवरी २०१२ को यह घोषणा की है।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

‘देवराज वर्मा उत्कृष्ट काव्य सृजन सम्मान- २०१२’ हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’ के तत्वावधान में गतवर्षों की भाँति इस वर्ष भी स्व. श्री देवराज वर्मा की सप्तम् पुण्यतिथि ७ दिसम्बर, २०१२ को उत्कृष्ट साहित्यिक कृति पर प्रदान किये जाने वाले ‘देवराज वर्मा उत्कृष्ट काव्य सृजन सम्मान- २०१२’ हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जाती हैं जिसके अंतर्गत रु0 ११००/= की नकद धनराशि, अंगवस्त्र, मानपत्र, श्रीफल नारियल तथा प्रतीक चिन्ह प्रदान किया जायेगा। उक्त सम्मान हेतु काव्य की किसी भी विधा में वर्ष २०१२ तथा२०१२ में प्रकाशित मौलिक साहित्यिक कृति प्रविष्टि हेतु पात्र होगी। सम्मान हेतु कृति का चयन एक निर्णायक मंडल द्वारा किया जायेगा। निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम तथा प्रत्येक स्थिति में मान्य होगा जिस पर किसी भी प्रकार की आपत्ति अथवा विवाद स्वीकार्य नहीं होगा। सम्मान हेतु पता लिखा एक पोस्ट कार्ड तथा एक पता लिखा टिकिट लगा लिफाफा सहित मौलिक साहित्यिक कृति की ४ प्रतियाँ दिनांकः ३१ अगस्त, २०१२ तक पंजीकृत/स्पीडपोस्ट/कोरियर द्वारा योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’, संयोजक- साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’, ए.एल.-४९, सचिन स्वीट्स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्, काँठ रोड, मुरादाबाद-२४४००१ (उ.प्र.) के पते पर पहुँच जानी चाहिए। अंतिम तिथि के पश्चात प्राप्त किसी भी प्रविष्टि का उक्त सम्मान हेतु संज्ञान लिया जाना संभव नहीं होगा।

सोमवार, 30 जनवरी 2012

पर्यटक जी को अंतिम प्रणामः

१९८० एवं ९० के दशक में लखनऊ में उभरते साहित्यकारों- विशेषकर कवियों को एकजुट कर नवोदित साहित्यकार परिषद नामक एक मंच प्रदान करनेवाले रामनारायण त्रिपाठी पर्यटक आज ३० जनवरी २०१२ को पंचतत्त्व में विलीन हो गए। कैंसर की कष्टकारक लंबी बीमारी से विगत रविवार को दोपहर बाद उन्होंने पार्थिव शरीर त्याग दिया।

१९८९ में भाई पर्यटक जी के नेतृत्व में नवोदित साहित्यकार परिषद द्वारा लखनऊ के मिनी रवींद्रालय में मनाया गया पं. माखनलाल चतुर्वेदी जन्म शताब्दी समारोह इतना भव्य एवं चर्चित रहा कि उसके सामने राज्य सरकार द्वारा कानपुर में लाखों रुपए खर्च करके मनाया गया सरकारी समारोह भी फीका पड़ गया था। उसी वर्ष नवोदित साहित्यकार परिषद ने लोकगीतों के संकलन पर अद्वितीय काम करनेवाले पं. रामनरेश त्रिपाठी का जन्मशताब्दी समारोह भी पूरी गरिमा के साथ मनाया गया। इस समारोह में परिषद को आशीर्वचन देने के लिए लखनऊ की शान समझे जानेवाले वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय अमृतलाल नागर जी भी उपस्थित थे ।  संगठनकुशल भाई पर्यटक जी एवं परिषद के राष्ट्रीय महासचिव राजेश राय के नेतृत्व में जो महत्वपूर्ण काम किये गए उसके लिये वे सदा याद किये जाएँगे।
-मुंबई से ओमप्रकाश तिवारी की रपट

रविवार, 29 जनवरी 2012

हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा शमशेर की कविता पर संगोष्ठी आयोजित

दिनांक ३ जनवरी २०१२, हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विष्वविद्यालय, मेरठ में राष्ट्रीय संगोष्ठी 'शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता' का आयोजन सफलता पूर्वक किया गया। उदघाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जानी-मानी आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि यह गौरव की बात है कि इतना बड़ा कवि स्थानीय स्तर पर हुआ। शमशेर की स्थिति दो मेडों पर खड़े हुए कवि की स्थिति है। उन्होंने वामपन्थी और प्रेम दोनों ही तरह की कविताएँ लिखी। उन्हें रूप का कवि, एन्द्रियता का कवि तथा बिम्बों का कवि कहा गया। शमशेर उनमें से एक हैं जिन्होंने ऊँचाई ग्रहण की।

इस अवसर पर माननीय कुलपति डॉ. विपिन गर्ग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विभाग में लगातार आयोजित हो ऐसी मेरी अपेक्षा है। दिल्ली से आए डॉ. रामेश्वर राय ने व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता विशेष तैयारी की माँग करती है। विजय देव नारायण साही ने कहा है कि शमशेर बुनियादी रूप से दुरूहता के कवि हैं। प्रो. राय ने मलयज की पंक्तियां व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता की कुछ निजी माँगें हैं। डीन कलासंकाय प्रो. आर.एस. अग्रवाल ने कहा कि शमशेर हमारे विश्वविद्यालय परिक्षेत्र के अंग रहे है, हमारे विश्वविद्यालय क्षेत्र के ऐसे व्यक्ति के विविध आयामों की चर्चा हिंदी विभाग ने की, ये गौरव का विषय है। उद्घाटन सत्र का संचालन ललित कुमार सारस्वत, परियोजना अध्येता, उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र, हिन्दी विभाग ने किया।

संगोष्ठी के दूसरे सत्र ’’शमशेर की कविता के विविध आयाम’’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि पद्मश्री लीलाधर जगूडी ने कहा कि शमशेर को समझने के लिए खास तैयारी की जरूरत है। शमशेर से टक्कर लेनी चाहिए वे शब्दों को गायब कर देते है, जैसे - ’एक नीला आइना बेठोस।’ - इससे वह केवल आकाश कहना चाहते है और आकाश जिस दिन ठोस हो जाएगा तो मैं हाथ पैर भी नहीं हिला पाऊँगा। ऐसा बिम्ब पूरे साहित्य में नहीं मिलता। उन्हें समझने के लिए उनकी भाषा को, बिम्बों को जानना होगा। इस सत्र में डॉ. जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि एक नये कवि के रूप में जब मैं उन्हें देखता हूँ, कविता की कला सीखने के लिए मैं जिन लोगों के पास जाता हूँ उनमें पहला नाम शमशेर का है। उनकी कविता अपने आप को पहचाने का सलीका सीखाती है, आप सीखते जायेंगे कि एक अच्छी कविता के क्या-क्या गुण हों ? प्रो. दुर्गाप्रसाद गुप्त ने कहा कि शमशेर की पूरी कविता पर पश्चिमी आंदोलनों का प्रभाव है। उस पर प्रतीकवाद, प्रभाववाद, रूपवाद, दादावाद, व्यंजनावाद का प्रभाव है। इसलिए पश्चिमी आंदोलनों के संदर्भ में शमशेर की कविताओं को देखा जाए। द्वितीय सत्र का संचालन एस. डी. कालिज, मुजफरनगर के प्रवक्त डॉ. विश्वम्भर पाण्डेय ने किया।

तृतीय सत्र ‘शमशेर का गद्य और अन्य पक्ष’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. प्रेमचन्द पातंजलि, दिल्ली ने कहा कि जब व्यक्ति जीवित रहता है तो उसे कोई याद नहीं करता, यही विडम्बना शमशेर के साथ भी रही। ईर्ष्या जन्य पीढ़ी ने शमशेर को पनपने नहीं दिया। साहित्य के मठाधीशों ने उन्हें दूर रखा। वे किसी मठ से बंधने वाले कवि नहीं थे शमशेर निराला का कौरवी एडीसन है। मेरी इच्छा है कि उनके नाम पर पुस्तकालय अथवा स्मारक बनना चाहिए। डॉ. गजेन्द्र सिंह ने कहा कि शमशेर आधुनिक संदर्भों में ऐसे साहित्यकार है जिन्हें पढ़ा जाना जरूरी है। शमशेर को साहित्यिक गुटबदियों के कारण उस तरह से नहीं पढ़ा गया जैसे पढ़ा जाना चाहिए। परिवेश से व्यक्ति अपने गद्य का निर्माण करता है। हर व्यक्ति संघर्ष से आगे बढ़ता है। तृतीय सत्र का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया। संगोष्ठी में हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने आभार व्यक्त किया।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

अभिव्यक्ति-२०११ नवगीत परिसंवाद एवं विमर्श का सफल आयोजन

चित्र में- जमीन पर बैठे बाएँ से प्रवीण सक्सेना, आनंद कुमार गौरव, पूर्णिमा वर्मन, डॉ. अमिता दुबे, संध्या सिंह और अवनीश कुमार चौहान। कुर्सी पर बाएँ से- वीरेन्द्र आस्तिक, कमलेश भट्ट कमल, मधुकर अष्ठाना, ओम प्रकाश चतुर्वेदी पराग, माहेश्वर तिवारी, ओम प्रकाश सिंह, निर्मल वर्मा, शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान, पीछे खड़े हुए बाएँ से- डॉ जगदीश व्योम, अनिल श्रीवास्तव, जय प्रकाश त्रिवेदी, श्याम श्रीवास्तव, विनय भदौरिया, सत्येन्द्र तिवारी, जय चक्रवर्ती, आदित्यकुमार वर्मन (पीछे), रमा कान्त, डॉ. विजयकर्ण (पीछे), शैलेन्द्र श्रीवास्तव, योगेन्द्र वर्मा व्योम, गीता सिंह, सुनील कुमार परिहार एवं सत्येन्द्र रघुवंशी।
लखनऊ २६ एवं २७ नवंबर २०११ को अभिव्यक्ति विश्वम् के सभाकक्ष में जाल पत्रिकाओं अभिव्यक्ति एवं अनुभूति (http://www.abhivyakti-hindi.org तथा http://www.anubhuti-hindi.org ) द्वारा नवगीत परिसंवाद एवं विमर्श का सफल आयोजन किया गया। इस अवसर पर १८ वरिष्ठ नवगीतकारों सहित नगर के जाने माने अतिथि, वेब तथा मीडिया से जुड़े लोग, संगीतकार व कलाकार उपस्थित थे। निरंतर दो दिवस चले छह सत्रों में नवगीत के विभिन्न पहलुओं, यथा- नवगीत की वर्तमान स्थिति, नवगीत का उद्गम इतिहास, वर्तमान चुनौतियों एवं नवगीत हेतु आवश्यक मानकों एवं प्रतिबद्धताओं पर विस्तृत सार्थक चर्चा हुई।

पहले दिन की सुबह कार्यक्रम का शुभारंभ लखनऊ की बीएसएनल के जनरल मैनेजर श्री सुनील कुमार परिहार ने दीप प्रज्वलित कर किया। सरस्वती वंदना रश्मि चौधरी ने पंकज चौधरी की तबला संगत के साथ प्रस्तुत की। दो दिनों के इस कार्यक्रम में प्रतिदिन तीन तीन सत्र हुए जिसमें अंतिम सत्र मनोरंजन संगीत और कविता पाठ के रहे।

नवगीतों पर आधारित पूर्णिमा वर्मन के फोटो कोलाज की प्रदर्शनी इस कार्यक्रम में आकर्षण का केन्द्र रही। प्रदर्शनी के लिये उन्हीं नवगीतकारों के नवगीतों को चुना गया था जो वहाँ उपस्थित नहीं थे, यह आयोजकों की दूरदर्शिता का परिचायक तो था ही साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से उन नवगीतकारों को फोटो-कोलाज के माध्यम से इस समारोह में सम्मिलित तथा सम्मानित करना भी था।

२६ नवंबर का पहला सत्र समय से संवाद शीर्षक से था। इसमें विनय भदौरिया ने अपना शोधपत्र नवगीतों में राजनीति और व्यवस्था, शैलेन्द्र शर्मा ने नवगीतों में महानगर, रमा कान्त ने नवगीतों में जनवाद, तथा निर्मल वर्मा ने अपना शोधपत्र क्या नवगीत आज के समय से संवाद करने में सक्षम है पढ़ा। अंतिम वक्तव्य वरिष्ठ रचनाकार माहेश्वर तिवारी जी ने दिया।

दूसरे सत्र का विषय था- नवगीत की पृष्ठभूमि कथ्य-तथ्य, आयाम और शक्ति। इसमें अवनीश चौहान ने अपना शोध पत्र नवगीत कथ्य और तथ्य, वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत कितना सशक्त कितना अशक्त, योगेन्द्र वर्मा ने नवगीत और नई पीढ़ी तथा माहेश्वर तिवारी ने नवगीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पढ़ा। अंतिम वक्तव्य डॉ ओमप्रकाश सिंह का रहा।

सायं चाय के बात तीसरे सत्र में आनंद सम्राट के निर्देशन में शोमू, आनंद दीपक और रुचिका ने सुमग संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। संगीत सम्राट आनंद का था तथा गायक थे रुचिका श्रीवास्तव और दीपक। गिटार और माउथ आर्गन पर संगत शोमू सर ने की। कार्यक्रम में वरिष्ठ गीतकार माहेश्वर तिवारी एवं कुमार रवीन्द्र के नवगीतों को प्रस्तुत किया गया। इसके बाद पूर्णिमा वर्मन ने अपनी पावर पाइंट प्रस्तुति दी जिसका विषय था- हिंदी की इंटरनेट यात्रा अभिव्यक्ति और अनुभूति के साथ नवगीत की पाठशाला तक।

दूसरे दिन का पहला सत्र नवगीत वास्तु शिल्प और प्रतिमान विषय पर आधारित था। इसमें जय चक्रवर्ती ने नवगीत का शिल्प विधान, शीलेन्द्र सिंह चौहान ने नवगीत के प्रतिमान, आनंद कुमार गौरव ने गीत का प्रांजल रूप है नवगीत, डॉ ओम प्रकाश ने समकालीन नवगीत के विविध आयाम तथा मधुकर अष्ठाना ने नवगीत और उसकी चुनौतियाँ विषय पर अपना वक्तव्य पढ़ा। अंतिम वक्तव्य वीरेन्द्र आस्तिक ने दिया।

दूसरे सत्र में जिसका शीर्षक था- नवगीत और लोक संस्कृति में डॉ. जगदीश व्योम ने लोकगीत में लोक के छीजने की पीड़ा, श्याम नारायण श्रीवास्तव ने नवगीतों में लोक की भाषा के प्रयोग तथा सत्येन्द्र तिवारी ने नवगीत में भारतीय संस्कृति विषय पर अपना शोधपत्र पढ़ा। अंतिम वक्तव्य रमाकांत का रहा। दोनो दिनों के इन चारों सत्रों में प्रश्नोत्तर एवं परिसंवाद के सत्र वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे।

दूसरे दिन के अंतिम सत्र में कविता पाठ का कार्यक्रम था जिसमें उपस्थित रचनाकारों ने भाग लिया। कविता पाठ करने वाले रचनाकारों में थे- अनिल श्रीवास्तव, संध्या सिंह, विनय भदौरिया, अवनीश सिंह चौहान, डॉ. जगदीश व्योम, वीरेन्द्र आस्तिक, शैलेन्द्र शर्मा, सत्येन्द्र तिवारी, रमा कान्त, जय चक्रवर्ती, डॉ. ओम प्रकाश सिंह, योगेन्द्र वर्मा व्योम, माहेश्वर तिवारी, आनंद गौरव, कमलेश भट्ट कमल, श्याम श्रीवास्तव, शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान, मधुकर अष्ठाना, निर्मल शुक्ल, पूर्णिमा वर्मन, सत्येन्द्र रघुवंशी विजय कर्ण, डॉ. अमिता दुबे, और राजेश शुक्ल। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओम प्रकाश चतुर्वेदी पराग रहे। धन्यवाद ज्ञापन के बाद सबको स्मृतिचिह्न प्रदान किये गए।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

स्वयं प्रकाश को कथाक्रम सम्मान

लखनऊ, सुप्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार स्वयं प्रकाश को १९वें आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें यह सम्मान आलोचक मुद्राराक्षस और उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने दिया। सम्मान के तहत १५ हजार रुपये का चेक, स्मृति चिह्न, अंग वस्त्र और सम्मान पत्र दिया गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के यशपाल सभागार में हुए सम्मान समारोह के अध्यक्ष मुद्राराक्षस थे। आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर ने स्व. श्रीलाल शुक्ल को याद करते हुए कहा कि वो हम सब के लिए कितना मायने रखते थे इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजकुमार ने सम्मानित कथाकार स्वयं प्रकाश के लेखन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सांप्रदायिकता के विषय पर लिखी गई उनकी कहानियाँ काफी चर्चित रही हैं। उनकी अधिकतर कहानियों का जन्म वास्तविक परिवेश में हुआ है। स्वयं प्रकाश की कहानियों की विशेषता है कि उनकी शुरुआत चरित्रों से नहीं, उनकी आंतरिक भावनाओं से होती है। वह प्रेमचंद की परम्परा के असल वाहक हैं, जो यथार्थ को दिशा देता है।
पुरस्कार ग्रहण करने के बाद कथाकार स्वयं प्रकाश ने हाल ही में ज्ञानपीठ से सम्मानित वरिष्ठ उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल को नमन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अमरकांत को भी ज्ञानपीठ सम्मान से समादृत करने के लिए ज्ञानपीठ परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पहली बार कहानीकारों का दिल ज्ञानपीठ वालों ने जीता। वैश्वीकरण और बाजारवाद पर प्रहार करते हुए स्वयं प्रकाश ने कहा कि बाजार हमारे छोटे भाइयों यानी नयी पीढ़ी में घुस चुका है। वह हमारे मूल्यों को नष्ट कर रहा है। इस कारण हमें सोचना होगा कि हमें किस प्रकार का समाज बनाना होगा।
सम्मान सत्र के तत्काल बाद 'वर्तमान समय के प्रश्न और रचनाकारों की भूमिका' विषय पर संगोष्ठी प्रारम्भ हुई जो अगले दिन भी जारी रही। इस चर्चा का प्रारंभ कथाकार  राकेश कुमार सिंह के पत्र वाचन से हुआ जिन्होंने कहा कि भूमण्डलीकरण का नकाब मौजूदा समय में भी पूरी तरह से उतरना बाकी है। संगोष्ठी में समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे,  साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय, उद्भावना के सम्पादक अजेय कुमार, उपन्यासकार रवीन्द्र वर्मा, कहानीकार शशांक, उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा, उपन्यासकार शिवमूर्ति, आलोचक वीरेन्द्र यादव, वसुधा के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा, वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश, युवा कथाकार राकेश बिहारी, प्रो. रमेश दीक्षित, प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी, पुनर्नवा के सम्पादक राजेन्द्र राव, कथाकार  कविता, सारा राय, डा. रंजना जायसवाल, अमरीक सिंह दीप, हरीचरन प्रकाश , मूलचंद गौतम  व प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी आदि की सक्रिय भागीदारी रही।
गोष्ठी में जब तब विवाद-संवाद की स्थितियां बनीं। पहले दिन गिरिराज किशोर ने प्रलेस पर आरोप लगाया कि अपने समारोह में प्रकाशित स्मारिका में यशपाल जैसे लेखक का चित्र न छापकर बड़ी गलती की है। वहीं अंतिम क्षणों में स्थानीय पत्रकार के। विक्रम राव के अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद भी बोलने पर आपत्ति की जाने से थोड़ी अप्रिय स्थिति हो गई,जिसे बाद में ठीक कर लिया गया। दो दिन चले इस आयोजन में बड़ी संख्या में लेखकों-पाठकों का जुटना सचमुच साहित्य के प्रति आकर्षण का ही प्रमाण है।

प्रस्तुति- विशेष संवाददाता

भारतीय हिन्दी परिषद का 39वाँ अधिवेशन और अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी

लखनऊ, १५-१६ अक्तूबर २०११ आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के द्वारा आयोजित द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी सफलता पूर्वक संपन्न हुई।

पहले सत्र ’’नई सदी में हिन्दी का वैश्विक परिदृश्य’’ विषय पर संगोष्ठी को पूर्व राज्यपाल श्री माता प्रसाद जी ने उद्बोधित किया। अध्यक्षीय वक्तव्य देते लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज कुमार मिश्र ने दिया। इसके पूर्व भारतीय हिन्दी परिषद के अध्यक्ष प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल का वक्तव्य हुआ। परिषद के प्रधानमंत्री प्रो० लक्ष्मीनारायण भारद्वज ने परिषद का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

हिन्दी विभाग एवं भारतीय हिन्दी परिषद के पूर्व अध्यक्ष व प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रो० सूर्य प्रसाद दीक्षित ने परिषद के गौरवपूर्ण इतिहास एवं उसके क्रिया कलापों पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डाला। इस अवसर पर हिन्दी की सेवा के लिए समर्पित २४ साहित्य प्रेमियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। उद्धाटन सत्र के केन्द्र बिन्दु रहे कोह जोहं किम् ने दक्षिण कोरिया में हिन्दी की दशा एवं दिशा का उल्लेख करते हुए हिन्दी की सर्जन्नात्मक गतिविधियों एवं अनुवाद के माध्यम से हिन्दी की सामर्थ्य और शक्ति का उल्लेख किया। इस अवसर पर डॉ० रमेश चन्द्र त्रिपाठी द्वारा संपादित स्मृति-उपायन, डॉ० बलजीत श्रीवास्तव द्वारा संपादित-शोध सृजन पत्रिका और डॉ० उषा गुप्त द्वारा लिखित- अमेरिका में हिन्दी’ पुस्तक का लोकर्पण किया गया। उद्घाटन समारोह का संचालन-भारतीय हिन्दी परिषद के साहित्य मंत्री- डॉ० वीरेन्द्र नारायण यादव और आभार प्रदर्शन संगोष्ठी के आयोजन सचिव एवं हिन्दी विभाग के प्रोफेसर पवन अग्रवाल ने किया।

संगोष्ठी के दूसरे दिन समानान्तर नौ संगोष्ठियाँ सम्पन्न हुई। प्रथम संगोष्ठी ’समकालीन हिन्दी गद्य’ विषय पर शोद्य-पत्रों का वाचन किया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ. लक्ष्मी नारायण भारद्वाज ने की। विषय प्रवर्तन डॉ. खुशीराम शर्मा ने किया और वक्ता के रूप में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित मेहरून्निसा परवेज, डॉ. लक्ष्मण सहाय (ग्वालियर), प्रो. म.मा. कडू (नागपुर) तथा डॉ. यतीन्द्र तिवारी (कानपुर) ने अपने विचार व्यक्त किये। संचालन डॉ. अलका पाण्डेय ने किया।

दूसरी संगोष्ठी ’समकालीन विमर्श (दलित, स्त्री, आदिवासी) विषय पर शोध-पत्रों का वाचन किया गया, जिसकी अध्यक्षता, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, प्रो. सरला शुक्ल ने की। वक्ता के रूप में राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के प्रो. नंद किशोर पाण्डेय, प्रो. कालीचरण स्नेही, डॉ. क्षमाशंकर पाण्डेय, डॉ. निर्मला, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. केदार सिंह, प्रो. कात्यायनी सिंह, डॉ. अर्चना शर्मा, डॉ. मुनीत शर्मा, डॉ. पंकज सिंह, डॉ. कमलेश कुमारी रानी, डॉ. आदित्य प्रियदर्शी, डॉ. किरन शर्मा और अमेरिका से पधारे डॉ. राम बाबू गौतम ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रविकान्त ने किया।

’हिन्दी लोक वाङमय’ विषय पर तीसरी संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. आद्याप्रसाद द्विवेदी, (गोरखपुर) ने की। विषय प्रवर्तन डॉ. भरत सिंह ने किया तथा प्रो. राम दरश राय, डॉ. चन्द्रमणि शर्मा, डॉ. कुसुम सिंह डॉ. समीर कुमार झा, डॉ. नलिन रंजन तथा अस्मि पाण्डेय ने अपने पत्रों का वाचन किया। संचालन डॉ. परशुराम पाल ने किया।

‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ विषय से सम्बन्धित चौथी संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. पूरनचन्द टण्डन (दिल्ली) ने की। प्रमुख वक्ता जोधपुर से पधारे डॉ. श्रवण कुमार मीणा के वक्तव्य के बाद ३२ शोध-पत्र प्रस्तुत हुए जिसमें डॉ. मुक्ता खन्ना, डॉ. रेखा गुप्ता, डॉ. विद्या रानी, डॉ. किरन शर्मा, डॉ. तारकेश्वर नाथ सिन्हा, डॉ. अनिल सिंह, डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र, डॉ. अनीता, डॉ. सुरेश माहेश्वरी आदि ने की अपने शोध-पत्रों का वाचन किया। संचालन डॉ. हेमांशुसेन ने किया।

’जन संचार और हिन्दी’ विषय संबंधित पाँचवी संगोष्ठी अध्यक्षता प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल ने की। विषय प्रवर्तन श्री कैलाशचंद पंत ने किया तथा डॉ. दीपक प्रकाश त्यागी ने हिन्दी के तीन स्वरूपों की विवेचना की। इस संगोष्ठी में डॉ. संजीव कुमार दुबे (मुम्बई), डॉ. अवधेश कुमार (भोपाल), डॉ. हरीश अरोड़ा (दिल्ली), डॉ. सुबोध अग्निहोत्री (उत्तराखण्ड), डॉ. सोनू अन्नपूर्णा और हनुमान प्रसाद शुक्ल (जयपुर) ने अपने पत्रों का वाचन किया। इस संगोष्ठी का संचालन डॉ. रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने किया।

छठी संगोष्ठी ’भाषा प्रौद्योगिकी’ विषय की अध्ययक्षता प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने की। विषय-प्रवर्तन पुणे से पधारे श्री अमित श्रीवास्तव ने किया और डॉ. पुनीत मिश्र, डॉ. प्रवण शास्त्री, डॉ. शोभा रानी श्रीवास्तव, डॉ. उषा मिश्र आदि शोध-पत्र वाचन किया।

’अवध संस्कृति और राम साहित्य’ विषय पर आधारित सातवीं संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह (इलाहाबाद) ने की। इस संगोष्ठी में डॉ. एन.जी. देवकी (केरल), डॉ. मनोरमा अवस्थी, डॉ. आभा त्रिपाठी, प्रो. मीरा दीक्षित (इलाहाबाद), डॉ. सभापति मिश्र, डॉ. सुरेशपति त्रिपाठी, डॉ. पवन कुमार आदि ने अपने विचार व्यक्त किये। संचालन प्रो. प्रेमशंकर तिवारी ने किया।

’हिन्दी की भाषिक समस्याएँ’ विषय पर आठवीं संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. धर्मदेव तिवारी (गुवाहाटी) ने की। विषय प्रवर्तन प्रो. राम किशोर शर्मा (इलाहाबाद) ने किया। प्रो. नरेश मिश्र (रोहतक), प्रो. भगवान देव पाण्डेय (हरिद्वार), डॉ. एम. शेषन (चेन्नई) ने अपने शोध-पत्रों का वाचन किया। संचालन प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने किया।

नौवीं संगोष्ठी ’देशान्तरी हिन्दी’ विषय की अध्यक्षता डॉ. यज्ञप्रसाद तिवारी (शहडोल) ने तथा विषय प्रवर्तन डॉ. रामलखन गुप्त (जबलपुर) तथा श्रीयुत श्रीधर पराड़कर (ग्वालियर) ने किया। मुख्य अतिथि डॉ. उषा गुप्ता (प्रवासी अमेरिका) थीं। डॉ. कामता कमलेश (अमरोहा), डॉ. विमला सिंहल (मीलवाड़ा), डॉ. करूणा शंकर उपाध्यक्ष (मुम्बई), डॉ. टी.एन. सिंह ने पत्र वाचन किया। संचालन डॉ. राहुल पाण्डेय ने किया।

भारतीय हिन्दी परिषद एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में मुख्य अतिथि माननीय श्री सुभाष पाण्डेय, संस्कृति मंत्री उ.प्र. सरकार थे। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. यू.एन. द्विवेदी प्रतिकुलपति लखनऊ विश्वविद्यालय की। कार्यक्रम तीन पुस्तकों का लोकार्पण माननीय मंत्री जी ने किया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का प्रतिवेदन डॉ. रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने किया तथा संचालन डॉ. वीरेन्द्रनारायण यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. कैलाश देवी सिंह ने किया।

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

केंद्रीय हिंदी संस्थान : पुरस्कारों की घोषणा

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा १९६१ ई. में संस्थापित स्वायत्त संगठन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल द्वारा संचालित एक स्वायत्तशासी शैक्षिक संस्था है| संस्थान का मुख्यालय आगरा में स्थित है| इसके आठ केंद्र इन नगरों में सक्रिय हैं - दिल्ली (१९७०), हैदराबाद (१९७६), गुवाहाटी (१९७८), शिलांग (१९८७), मैसूर (१९८८), दीमापुर (२००३), भुवनेश्वर (२००३) तथा अहमदाबाद (२००६)|

दिनांक १० अक्तूबर को एक पत्रकार सम्मेलन के दौरान संस्थान के निदेशक प्रो़. मोहन ने बताया कि भारत की एकता की एक महत्वपूर्ण कड़ी हिंदी है| आधुनिक भारत के लिए राष्ट्रीय एकता सबसे बड़ा मूल्य है, जो केंद्रीय हिंदी संस्थान के हर कार्यक्रम के मूल में विद्यमान रहा है| प्रत्येक वर्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान हिंदी में प्रचार-प्रसार के लिए कुल १४ पुरस्कार हिंदी विद्वानों को देता है|

इस अवसर पर केंद्रीय हिंदी संस्थान के माननीय उपाध्यक्ष प्रो. अशोक चक्रधर ने वर्ष २००८ एवं २००९ के लिए निम्न पुरस्कारों की घोषणा की है--
१. गंगाशरण सिंह पुरस्कार
(हिंदी प्रचार-प्रसार एवं हिंदी प्रशिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष २००८ के लिये- १. श्री गिरीश कर्नाड, २. श्री माधुरी छेड़ा, ३. श्री बल्ली सिंह चीमा तथा वर्ष २००९ के लिये- १. श्री वाई. लक्ष्मी प्रसाद, २. श्री मधुर भंडारकर, ३.श्री दामोदर खडसे, ४.श्री चमनलाल सप्रू।

२. गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार
(हिंदी पत्रकारिता तथा रचनात्मक साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष २००८ के लिये- 1. श्री पंकज पचौरी, 2. श्री विनोद अग्निहोत्री तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री ब्रजमोहन बख्शी, 2. श्री बलराम

३.आत्माराम पुरस्कार
(वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य और उपकरण विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. प्रो. यशपाल एवं 2. श्री मुहम्मद ख़लील तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री सुभाष लखेड़ा, 2. श्री नरेंद्र सहगल

४.सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार
(हिंदी के विकास से संबंधित सर्जनात्मक/आलोचनात्मक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सेवाओं के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्री नंदकिशोर आचार्य एवं 2. श्री विजय बहादुर सिंह तथा वर्ष 2009 के लिये- १. श्री अजित कुमार एवं 2. श्री गोपाल चतुर्वेदी

५. महापण्डित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार
(हिंदी में खोज एवं संधान करने तथा यात्रा विवरण आदि के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्री गोपाल राय एवं 2. डॉ. विमलेश कांति वर्मा तथा वर्ष 2009 के लिये 1. डॉ. हरिमोहन एवं 2. डॉ. विक्रम सिंह

६. डॉ. जार्ज ग्रियर्सन पुरस्कार
(एक विदेशी हिंदी विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्री हरमन वैन ऑलफन (यू.एस.ए.) तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री ली जंग हो (कोरिया)

७. पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार
(किसी भारतीय मूल के विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्रीमती पूर्णिमा वर्मन तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री सुरेंद्र गंभीर

स्मृति मंजूषा और भीगे पंख का विमोचन

’ज्ञान प्रसार संस्थान’ के तत्वावधान में नीरजा द्विवेदी के संस्मरण ’स्मृति मंजूषा’ एवं महेश चन्द्र द्विवेदी के उपन्यास ’भीगे पंख’ का लोकार्पण २५ सितम्बर, २०११ को सिटी मांटेसरी स्कूल, गोमतीनगर, लखनऊ के भव्य सभागार में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर लेखिका नीरजा द्विवेदी ने सस्वर भावभीनी सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।

’स्मृति मंजूषा’ के विषय में लेखिका ने कहा कि इसके लेख उनके अमेरिका एवं इंग्लैंड के प्रवास के दौरान घटित ऐसी घटनाओं के संस्मरण हैं, जो एक सामान्य भारतीय के लिये अनोखी अथवा शिक्षाप्रद हैं। समीक्षक डा. मधु चतुर्वेदी ने बताया कि इसमें वर्णित घटनायें पाश्चात्य जीवन-प्रणाली, सभ्यता एवं संस्कृति के अतिरिक्त वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य एवं भौतिक प्रगति को बडे रुचिकर ढंग से चित्रित करतीं हैं। इनमें अनेक बातें यथा समता का भाव, कार्य के प्रति निष्ठा, नियमों का पालन, किसी कार्य को छोटा न समझने की मान्यता, दिन-प्रतिदिन के कार्यों में बरती जाने वाली ईमानदारी एवं जीवन के प्रति उत्साहपूर्ण दृष्टिकोण हमारे लिये अनुकरणीय है।

'भीगे पंख’ उपन्यास का परिचय देते हुए महेश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि इस उपन्यास का विचार थामस ए. हैरिस की प्रसिद्ध पुस्तक ’आई. एम. ओ. के. : यू. आर. ओ. के.’ पढकर आया था। तीनों मुख्य पात्र मोहित, सतिया और रज़िया क्रमशः ’आई. एम. नौट ओ. के.: यू आर ओ. के.’, ’आई एम. ओ. के.: यू आर नौट ओ. के.’ एवं ’आई एम. नौट ओ. के.: यू आर नौट ओ. के.’ की असामान्य मनःस्थिति के हैं। इस कारण उनके पंख भीगे हुए हैं और वे पूरी उडान भरने में असमर्थ हैं। समीक्षक श्री संजीव जायसवाल ने उपन्यास में ग्रामीण परिवेश के एवं विशेषतः निम्न वर्ग की सामाजिक स्थिति के वर्णन को अद्भुत बताया और कहा कि इसे पढकर अमृत लाल नागर की ’नाच्यो बहुत गोपाल’ की याद ताज़ा हो जाती है।

श्री के. विक्रम राव ने अध्यक्षीय भाषण में दोनो पुस्तकों को अपने अपने क्षेत्र की विशेष उपलब्धि बताते हुए उन्हें पठनीय एवं संग्रहणीय बताया।

सोमवार, 26 सितंबर 2011

’समकालीन भारतीय सन्दर्भ और हिन्दी’विषय पर संगोष्ठी आयोजित

मेरठ, दिनांक 13 सितंबर 2011, हिन्दी विभाग, चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में ’हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में ’समकालीन भारतीय सन्दर्भ और हिन्दी’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ कवि एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में पूर्व प्राध्यापक रहे प्रो. केदारनाथ सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज समय आ गया है कि हिन्दी के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं तथा उसके साहित्य की बात हो। आज इस बात की बेहद जरूरत है कि औपचारिक क्षेत्रों से हिन्दी का विकास हो तथा यह अनौपचारिक क्षेत्रों में भी आए। आज की हिन्दी एक बड़ा काम कर रही है कि इससे भारतीय साहित्य के इतिहास का निर्माण हो रहा है। आज हिन्दी भारत की सेतुभाषा बन चुकी है क्योंकि अगर आप एक भाषा से दूसरी भाषा में जाना चाहे तो अनुवाद इसका माध्यम है। हिन्दीभाषियों को भी दूसरी भाषाएं -दक्षिण की भाषाएं सीखनी चाहिए ताकि अनुवाद कर सकें। अनुवाद के क्षेत्र में हिन्दी में रोजगार है। इसलिए हिन्दी वालों को दूसरी भाषाओं के साथ प्रत्यक्ष संबंध जोड़ना होगा।

इस अवसर पर केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ कथाकार प्रो. गंगा प्रसाद ’विमल’ ने कहा कि बोल-चाल की भाषा का हिन्दी में भरपूर प्रयोग होता है। सरकारी काम-काज में हिन्दी का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। समाचार पत्रों की संख्या में भास्कर, उमर उजाला, दैनिक जागरण आदि पत्रों की संख्या दूसरी भाषा इकाइयों से ज्यादा है। हिन्दी की गति फिल्मों व संचार माध्यमों में भी बढ़ रही है। देश में जो प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में मातृ-भाषाओं का प्रयोग किया जाता है इसका अनुपात आज बढ़ा है। यह हिन्दी की बढ़ी हुई स्थिति को देखने का वैज्ञानिक तरीका है। आज हिन्दी को समकालीन सन्दर्भों में जानना जरूरी है। आज विश्व स्तर पर हिन्दी के प्रति जो रुझान कम था, वह बढ़ रहा है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. एच.सी. गुप्ता ने कहा कि हिन्दी बोलने में हमें गर्व करना चाहिए। हमें भी पाठ्यक्रम निर्माण हिन्दी में करना होगा, तभी हम अति विकसित देशों की श्रेणी में आ सकेंगे। हिन्दीभाषी लोग दुनियाँ में 3. से 4. वर्षो के भीतर बढ़े हैं अगर यह ठीक बात है तो हिन्दी का प्रसार भी तेजी से बढ़ना चाहिए। माननीय कुलपति ने कहा कि ’हिन्दी दिवस’ हमारे लिए औपचारिकता है। हर दिन हमारे लिए ’हिन्दी दिवस’ है। हर दिन हमें हिन्दी की बात करनी चाहिए। अन्त में हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि हम हिन्दी के क्षेत्रीय रूप पर भी काम कर रहे हैं तो दूसरी ओर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रवासी साहित्य पर पाठ्यक्रम निर्धारित किया है। कार्यक्रम का संचालन मोनू सिंह एवं प्रगति ने किया।

हिन्दी दिवस के इस अवसर पर प्रो. वाई विमला, प्रो.एस.के. दत्ता, डा. महेश गर्ग, मेरठ के साहित्यकार पं. ईश्वर चन्द्र गंभीर, ज्वाला प्रसाद कौशिक ’साधक’, सुमनेश ’सुमन’, तुषा शर्मा, आदि तथा डॉ. अशोक मिश्र, डॉ. सीमा शर्मा, डॉ. रवीन्द्र कुमार, डा. गजेन्द्र सिंह, विवेक, अंजू, आरती राणा, अमित कुमार, ललित सारस्वत, नेत्र पाल, तथा छात्र-छात्राओं में कौशल, दलीप, पिण्टू, शिवानी, चंचल, संध्या, मिलिन्द, ब्रह्मसिंह, ज्योति, मनीषा, मोहनी, कपिल, आयुषी, पूजा, चरण सिंह, अनुराधा, राहुल आदि उपस्थित रहे।

--हिन्दी परिषद् , हिन्दी विभाग, चै. चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ