22 सितम्बर 2009 - हिन्दी की ऑनलाइन पत्रिका - सामयिकी.कॉम की तरफ से व्यंग्य लेखन पुरस्कार के लिए व्यंग्य लेख आमंत्रित किए जाते हैं। विजेताओं को पुरस्कार के रूप में यह राशि प्रदान की जाएगी। प्रथम पुरस्कार (सामयिकी.कॉम से प्राप्त अतिरिक्त सहयोग राशि से अब यह बढ़ गया है -) – 3000 रुपए, द्वितीय पुरस्कार – 2000 रुपए तथा तृतीय पुरस्कार – 1500 रुपए.
इस प्रतियोगिता के लिए निर्णायक मंडल का गठन किया गया है, जिसमें निम्न सुधी निर्णायक गण हैं-
सर्वश्री -
वीरेन्द्र जैन – सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार
अनुज खरे – सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार
डॉ. महेश परिमल – सुप्रसिद्ध रचनाकार
प्रतियोगिता में भाग लेने के नियम तथा अन्य जानकारियों के लिए कृपया रचनाकार पत्रिका का यह पृष्ठ देखें-
सोमवार, 28 सितंबर 2009
रविवार, 27 सितंबर 2009
कंचना स्मृति व्याख्यानमाला तथा पुरस्कार समारोह का आयोजन
प्रख्यात विचारक और भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव श्री गोविंदाचार्य ने राष्ट्रीय राजनीति में आ रही गिरावट पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि सार्वजनिक जीवन में साख की बड़ी भूमिका होती है। राजनीति में बदलाव की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए नए ढाँचे, नए औज़ार और नए लड़ाके वक्त की ज़रूरत है। सत्ता पक्ष एवं विपक्ष दोनों को कटघरे में घेरते हुए श्री गोविंदाचार्य ने कहा कि देश के समक्ष राष्ट्रीय सग्प्रभुता एवं महंगाई सहित तमाम ज्वलंत चुनौतियाँ हैं। पर इन पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही मौन धारण किए हुए हैं। उन्होंने दोनों पक्षों पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए मीडिया को भी कटघरे में खड़ा किया। दिवंगत पत्रकार कंचना की याद में आयोजित छठी कंचना स्मृति व्याख्यानमाला तथा पुरस्कार समारोह में लोकतंत्र एवं पत्रकारिता को कैसे बचाया जाए? विषय पर बोलते हुए श्री गोविंदाचार्य ने कई अहं सवालों को उठाया। कार्यक्रम को अध्यक्षता कर रहे पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. सोमपाल शास्त्री ने कहा कि राजनीति का जन्म ही टकराव से होता है।
वरिष्ठ पत्रकार और सी.एन.ई.बी. चैनल के प्रमुख श्री राहुल देव ने इस अवसर पर कहा कि मीडिया को बाज़ारीकरण से नहीं बाज़ारू होने से बचाया जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने अब तक आयोजित कार्यक्रमों के बारे में विस्तार से जानकारी दी और कहा कि कंचना ऐसी पत्रकार थीं जिनको सामाजिक सरोकारों के लिए निजी इच्छा या हित का कभी कोई ध्यान भी नहीं आता था। वे काम के प्रति ईमानदार और समर्पित थीं। आज कंचना हमारे बीच नहीं हैं पर अवधेश जी में हम वे सारी खूबियाँ देखते हैं। वे भी सामाजिक सरोकारों के प्रति समर्पित हैं। यह कार्यक्रम बिना किसी आर्थिक मदद या प्रचार के तामझाम के हो रहा है। इस अवसर पर विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता श्री विजय कुमार सिंह को कंचना स्मारक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका जीवन परिचय वरिष्ठ पत्रकार श्री वीरेंद्र मिश्र ने पढ़ा।
श्री विजय कुमार विख्यात शांति कार्यकर्ता तथा अखिल भारतीय शांति सेना के संगठनकर्ता हैं। वे बीते कई वर्षों से बनारस, सारनाथ तथा आसपास के जिलों के ग्रामीण इलाकों में अखिल भारतीय शांति सेना तथा लोक चेतना मंच के तत्वावधान में अहिंसक ग्राम स्वावलंबन का व्यावहारिक प्रयोग कर रहे हैं। श्री विजय भाई देश के विभिन्न क्षेत्रों में अब तक करीब १० युवा शक्ति और शांति कैंप लगा चुके हैं और सांप्रदायिक सौहार्द्र तथा तमाम विवादों और तनावों को दूर करने का भी प्रयास किया है। वे भूदान तथा अन्य भूमि सुधार कार्यक्रमों से भी बहुत गहराई से जुड़े हैं और स्वास्थ्य तथा योग प्रशिक्षक भी हैं। महिला सशक्तिकरण के साथ विजय भाई ने प्राथमिक शिक्षा पर अनुसंधान और मूल्यांकन भी किया है। इस कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. रामकृपाल सिन्हा, जानेमाने गांधीवादी डॉ. राम जी प्रसाद सिंह, उत्तर प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री श्री. बालेश्वर त्यागी, राजघाट के सचिव श्री रजनीश कुमार, पूर्व विधान परिषद सदस्य श्री रामाशीष राय, बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महाचंद्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार देवदत्त, प्रबाल मैत्र, अरविंद मोहन, अजय कुमार, जवाहर लाल कौल, बनारसी सिंह, अरुण खरे, जयप्रकाश त्रिपाठी, अमिताभ, उमेश चतुर्वेदी, कैलाश जी सहित तमाम गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़ का दो दिवसीय आयोजन
रायपुर, १० एवं ११ जुलाई २००९ को आयोजित दो दिवसीय आलोचना संगोष्ठी एवं प्रथम प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान समारोह धूमधाम से किया गया। संस्थान की ओर से प्रत्येक वर्ष प्रमोद वर्मा की स्मृति में दिए जाने वाले राष्ट्रीय आलोचना सम्मान का शुभारंभ करते हुए वर्ष २००९ के लिए भागलपुर के आलोचक श्री भगवान सिंह तथा वाराणसी के श्री कृष्ण मोहन को सम्मानित किया गया। उक्त सम्मान में पुरस्कृत आलोचक द्वय को क्रमशः २१ हज़ार एवं ११ हज़ार रुपये देने के साथ ही प्रमोद वर्मा समग्र, प्रशस्ति पत्र एवं प्रतीक चिह्न, शॉल एवं श्रीफल भेंट कर अलंकृत किया गया। सम्मान के निर्णायकों में थे श्री केदारनाथ सिंह, डॉ. धनंजय वर्मा, डॉ. विजय बहादुर सिंह, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, श्री विश्वरंजन एवं संयोजक जयप्रकाश मानस।सम्मानित आलोचक श्री भगवान सिंह ने कहा कि उन्होंने कभी पुरस्कार प्राप्त करने के लिए नहीं लिखा था और न ही वे पुरस्कारों में विश्वास रखते हैं, लेकिन वे छत्तीसगढ़ के आभारी हैं कि यहाँ पर उनके द्वारा जिस विचार को लेकर लिखा जा रहा है उसे पुरस्कार दिया गया। पुरस्कार की विश्वसनीयता एक बार फिर स्थापित हुई। दो दिवसीय आलोचना संगोष्ठी का उद्घाटन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह ने किया। उन्होंने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि सुप्रसिद्ध कवि, नाट्य लेखक, शिक्षाविद और साहित्य समीक्षक स्वर्गीय डॉ. प्रमोद वर्मा की महत्वपूर्ण रचनाओं के संकलन प्रमोद वर्मा साहित्य समग्र जो राजकमल प्रकाशन से चार खण्डों में प्रकाशित हुआ है के विमोचन एवं तीन सत्रों में आलोचना पर विचार-विमर्श करने के साथ ही छत्तीसगढ़ का नाम एक बार पुन: साहित्य के आकाश पर छा गया है। उन्होंने इस अवसर पर प्रमोद वर्मा की महत्वपूर्ण रचनाओं के संकलन साहित्य समग्र तथा समारोह की स्मारिका का विमोचन करते हुए उनकी साहित्यिक जीवन यात्रा और रचनाओं पर केन्द्रित व संस्थान के कार्यकारी निदेशक श्री जयप्रकाश मानस द्वारा निर्मित (www.pramodverma.com) नामक पोर्टल का उद्घाटन भी किया। उन्होंने कहा कि प्रमोद वर्मा जैसे वरिष्ठ दिवंगत साहित्यकार को श्रद्धांजलि देने का इससे अच्छा माध्यम और कुछ नहीं हो सकता। कार्यक्रम में पर्यटन और संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल, आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास मंत्री श्री केदार कश्यप और पूर्व मंत्री श्री सत्यनारायण शर्मा के सहित छत्तीसगढ़ और देश के विभिन्न राज्यों के अनेक साहित्यकार और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित थे। समारोह तीन सत्रों में विभाजित था। प्रथम सत्र 'समकालीन आलोचना का हाव भाव' में अध्यक्षीय दीर्घा से बोलते हुए श्री नदंकिशोर आचार्य ने कहा कि रचना को समग्रता में देखना आलोचना है। दूसरा सत्र आलोचना का प्रजातंत्र विषय पर केन्द्रित था जिसमें अध्यक्षीय आसंदी से बोलते हुए श्री खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आलोचना को यथार्थ की धरती पर खड़ा किया। डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिशय ने कहा कि प्रजातंत्र का अर्थ वरण की स्वतंत्रता से है। आलोचक को विषय चुनने तथा उस पर दृष्टिकोण रखने की आशावादी होनी चाहिए। वरिष्ठ कवि श्री चंद्रकांत देवताले ने बहुत ही विचारोत्तेजक वक्तव्य देते हुए कहा कि रचनाकारों को ज़्यादा आलोचकों की चिंता नहीं करनी चाहिए। मुक्तिबोध को याद करते हुए उन्होंने कहा कि आज आलोचक और रचनाकार को अपनी राजनैतिक दृष्टि साफ़ करनी चाहिए। हमें अपनी जातीय, देशज संस्कृति की रक्षा करते हुए वैश्विक होना है। उक्त सत्र में संवाद में भाग लेते हुए श्री एकांत श्रीवास्तव, सुश्री रंजना अरगड़े, सुश्री मुक्ता सिंह, श्री कृष्ण मोहन, श्री अरुण शीतांश और श्री बसंत त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे।
तृतीय सत्र 'आलोचना के परिसर में प्रमोद वर्मा' पर केन्द्रित था। सत्र अध्यक्ष श्री अशोक वाजपेयी ने कहा कि एक आलोचक अपने दूसरे मित्र रचनाकारों के निर्माण में सहचर की भूमिका निबाह सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण प्रमोद वर्मा थे। वर्मा ने अपनी आलोचनाओं से गजानंद माधव मुक्तिबोध तथा हरिशंकर परसाई के लेखन को प्रोत्साहित किया है और उनके विकास में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। अध्यक्ष मंडल की आसंदी से श्री कमला प्रसाद ने बोलते हुए कहा कि आलोचना के क्षेत्र में श्री प्रमोद वर्मा का अपना स्थान है। संवाद सत्र में श्री प्रभात त्रिपाठी, डॉ.बलदेव, श्री रवि श्रीवास्तव, श्री विनोद साव, श्री नंद किशोर तिवारी, डॉ. बृजबाला सिंह, आदि ने भी अपने विचार रखे। अलंकरण समारोह में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री ई.एस.एल. नरसिम्हन ने कहा कि कलम की ताक़त असीमित होती है। कलाकारों, साहित्यकारों को अपनी इस ताक़त का इस्तेमाल सकारात्मक कार्यों में करना चाहिए। उन्होंने कहा कि साहित्य की ताक़त से समाज व उसका परिवेश बदला जा सकता है। उन्होंने आलोचक द्वय को प्रथम प्रमोद वर्मा स्मृति आलोचना सम्मान से अलंकृत भी किया। अशोक बाजपेयी ने कहा उन्हें छत्तीसगढ़ी होने का गर्व है और यह अच्छी बात है कि छत्तीसगढ़ ने हिन्दी साहित्य आलोचना के सम्मान का मान रखा है। वर्तमान पीढ़ी को साहित्य के प्राप्त अपने उत्तराधिकार के लिए सजग करने का दायित्व साहित्यकारों का है। संस्था के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन ने संस्थान की आगामी कार्य योजनाओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी देते हुए कहा कि संस्थान द्वारा भविष्य में महिला, आदिवासी, और दलित समाज के लेखकों के लिए विशेष तौर पर राष्ट्रीय लेखन शिविरों का आयोजन सहित राजधानी में हिन्दी भवन निर्माण का कार्य भी किया जाएगा। कार्यक्रम के पहले दिन श्री प्रमोद वर्मा की कविताओं पर आधारित कविताओं का नाट्य मंचन श्री कुंज बिहारी शर्मा के निर्देशन में प्रसिद्ध नाट्य संस्था 'रूपक' द्वारा किया गया। इस अवसर पर काव्य गोष्ठी का आयोजन भी किया गया, जिसमें देश के नामी-गिरामी कवियों यथा-श्री नंदकिशोर आचार्य,श्री चंद्रकांत देवताले, श्री विनोद कुमार शुक्ल, श्री प्रभात त्रिपाठी, श्री एकांत श्रीवास्तव, श्री विश्वरंजन, डॉ. वंदना केंगरानी, श्री अशोक सिंघई, श्री शरद कोकास, श्री कमलेश्वर साहू, श्री अरुण शीतांश, डॉ. बलदेव एवं श्रीमती पुष्पा तिवारी ने अपनी कविताओं का काव्य पाठ किया। काव्य पाठ का संचालन श्री रवि श्रीवास्तव ने किया। कार्यक्रम में राजकमल प्रकाशन दिल्ली के प्रमुख अशोक माहेश्वरी, डॉ. गंगा प्रसाद बरसैंया, डॉ. कल्याणी वर्मा, बसंत त्रिपाठी, राजेन्द्र मिश्र, कनक तिवारी, डॉ. बलदेव, राजुरकर राज, कैलाश आदमी, रमेश नैयर, डॉ. प्रेम दुबे, विनोद शंकर शुक्ल, सुभाष मिश्र, संतोष रंजन, श्री राम पटवा, अशोक सिंघई, मुमताज, एस. अहमद, बी.एल पॉल, तपेश जैन एवं राज्य भर के प्रबुद्ध साहित्य रसिक गण उपस्थित थे। - जयप्रकाश मानस, संपादक- सृजनगाथा, www.srijangatha.com
उमेश चौहान के काव्य संग्रह जिन्हें डर नहीं लगता है का लोकार्पण
लखनऊ 28 अगस्त 2009, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी व कवि उमेश चौहान के काव्य संग्रह जिन्हें डर नहीं लगता है का लोकार्पण प्रसिद्ध आलोचक और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के कुलाधिपति डॉ. नामवर सिंह ने किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज समाज से डर लगता है।...और तो और उन्हें अब ज़्यादा बोलने में भी डर लगने लगा है। माध्यम साहित्यिक संस्था द्वारा इस समारोह का आयोजन हिंदी संस्थान के यशपाल सभागार में किया गया। समारोह की अध्यक्षता भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष गोपाल चतुर्वेदी ने की। समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना, वरिष्ठ कथाकार अखिलेश व हिंदी संस्थान के निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब उपस्थित रहे। बतौर मुख्य अतिथि काव्य संग्रह का लोकार्पण के पश्चात नामवर सिंह ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और सामाजिक विषमताओं की ओर इंगित करते हुए कहा कि आज का समाज ऐसा बन चुका है कि डर लगता है। डर किसी दूसरे से नहीं अपने ही आदमी से है। स्त्री सुरक्षा के मुद्दों को भी उन्होंने इस मौके पर उठाया। लोकार्पित पुस्तक के विषय में उन्होंने कहा कि इसमें मानवीय संवेदनाओं की कविताओं को शामिल किया गया है। लोकार्पण के मौके पर खचाखच भरे यशपाल सभागार को देखकर उन्होंने कहा कि लखनऊ में अभी भी वह समाज है जो नाटक, कहानी, और कविता को ज़िंदा रख सकता है।समारोह की अध्यक्षता करते हुए भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष और व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि आज के परिवेश में हम विषमताओं और प्रशासन की कुटिलता कै आदी हो चुके हैं। इसके बाद भी हमें खुद पर रोना नहीं आता है। आज का समज काफ़ी भयावह है। उन्होंने कहा कि जिन्हें डर लगता है उन्हें रमेश चौहान का काव्य संग्रह पढ़ना चाहिए। इससे पूर्व हिंदी संस्थान के निदेशक डॉ. सुधाकर अदीब ने कहा कि कविता में कहानी कहना और कहानी कहना और कहानी में कविता कहने का अपना अलग रोमांच है। आज ऐसी कविताएँ प्रचलित हैं जो समझ से परे होती है। उन्हें श्री चौहान की कविताओं का उल्लेख भी किया। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि ढेर सारी पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन होने के बाद भी आज की कविताएँ प्रचलित हैं जो समझ से परे होती है। उन्हें श्री चौहान की कविताओं का उल्लेख भी किया। वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना ने कहा कि ढेर सारी पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन होने के बाद भी आज की कविताएँ पढ़ी नहीं जा रही है। दरअसल हम कविताओं का अंदाज़-ए-बयाँ भूल गए हैं। शिल्पायन, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित इस काव्य संग्रह में उमेश चौहान ने एसएमएस द्वारा अपनी भेजी जाने वाली कविताओं को संग्रहित किया है। श्री चौहान ने यहाँ कविता नई नस्ल के कबूतर, कूड़ेदान और करमजीते चक दे का पाठ भी किया। लखनऊ (डीएनएन)। प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह आज हिंदी संस्थान के यशपाल सभागार में जुटे साहित्यप्रेमियों की भारी संख्या को देखकर गदगद हो उठे। उन्होंने कहा कि इस सभागार को बनते हुए तो देखा है लेकिन भरते हुए पहली बार देख रहा हूँ। वहीं शहर के एक चर्चित हास्य व्यंग्य रचनाकार ने कहा कि ऐसी भीड़ किसी प्रशासनिक अधिकारी द्वारा सृजित पुस्तक के लोकार्पण समारोह में ही हो सकती है।
प्रगति मैदान में दिल्ली पुस्तक मेले का आयोजन
३१ अगस्त, २००९, प्रगति मैदान का प्रगति ऑडिटोरियम में दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया ने 'बच्चों के लिए पुस्तकों का लेखन ,चित्रांकन ,विपणन : वर्त्तमान चुनौतियाँ' शीर्षक से एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी की अध्यक्षता देवेन्द्र मेवाड़ी ने की। विचार गोष्ठी में अलका पाठक, मधु पन्त, और दिनेश मिश्र ने अपने विचार प्रकट किए। साथ ही 'सौर मण्डल की सैर' ( लेखक-देवेन्द्र मेवाड़ी, चित्रांकन-अरूप गुप्ता), हमारे जल-पक्षी (राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह), अंजाम (मौलवी कमर अब्बास, चित्रांकन: हाज़ी बिन सुहेल) पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। पुस्तक लोकार्पण विभिन्न विद्यालयों के बच्चों ने किया।नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया के सम्पादक श्री मानस रंजन महापात्र कई महीने से विचार गोष्ठी के माध्यम से वैचारिक जाग्रति का अभ्यान चलाए हुए हैं। आपने विषय का प्रवर्तन करते हुए कहा कि बच्चों के लिए कुछ करें। वक्ताओं का आह्वान करने से पूर्व आज की विचार गोष्ठी के संचालक श्री पंकज चतुर्वेदी ने कहा, 'बच्चों का वर्ग बहुत बड़ा है, जो किताबों का पाठक है। लेखक, चित्रकार, प्रकाशक सब इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हैं। बचपन को याद करना बहुत सुखद होता है। सुकून देने के लिए बच्चों की एक अहम भूमिका होती है। आज जो नीतियाँ समय के साथ नहीं चल पा रही हैं, उन्हें बदलना पड़ रहा है। श्रीमती अलका पाठक ने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि हमने माता-पिता से किताबें ख़रीदने की ज़िद की।
लेखक के दायित्वबोध पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बाल साहित्य-लेखन अपने बीते हुए कल का आने हुए कल संवाद करना है। हमारे बचपन में न दैत्य थे न राजा-रानी।
आज रंगरूप बदलकर वह सच, बड़ों के अधूरे सपने का बोझ बन कर आ गया है। अब वह पढ़ लेना है, जो पढ़ा नहीं गया। 'एक थाल मोती से भरा, सबके सिर पर औंधा धरा। चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।' का आसमान शहर में कहाँ है? बाल साहित्य में जानवर पात्र हैं, पर मानव की तरह चालाक हैं। बच्चों की दुनिया में चाचा चौधरी भी आ टपकते हैं। 'नदी की धारा में नानू की नाव' चल पड़ती है। बच्चों के पास समय की कमी है लेकिन सपनों की कमी नहीं है। बालगीत, खेलगीत कहीं पीछे रह गए हैं। बच्चों को पढ़ने के लिए दिया गया है, उसमें कहा क्या गया है; यह महत्त्वपूर्ण है। कोई भी बाल-पत्रिका बच्चों के माँ-बाप की तरह है। अन्य पत्रिकाओं में बाल साहित्य की चर्चा होती ही नहीं। 'बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई फ़ाके से' या 'अल्लाह मेघ दे' जैसे जनगीत कहाँ हैं।डॉ मधु पन्त ने कहा, 'मेरी नज़र में वह आम बच्चा रहा है जो पुस्तक पढ़ने से वंचित रह जाता है। आज का दुखद सच यह है कि बच्चे का बचपन छीनकर, उसके सपनों को तोड़कर, उसे बोंज़ाई बनाकर छोड़ देते हैं। उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास की बात कहीं दूर खो जाती है। अभिभावक या शिक्षक, आज सबके लिए चुनौतियाँ हैं। लेखक बनने के लिए बच्चों के मन में सेंध लगानी होगी, तभी वह बच्चों के लिए लिख सकेगा। लेखक को बच्चा बनना पड़ेगा जो बहुत कठिन है; क्योंकि हमने बच्चे को असमय बूढ़ा बना दिया है। चित्रकार को शब्दों का पूरक होना चाहिए। अच्छा चित्रकार वह है जो अपनी संकल्पना से बच्चों को किताबों की दुनिया की सैर करा दे। किताब इतनी आकर्षक हो कि बच्चे का हाथ खुद-बखुद किताब की तरफ़ बढ़े। चित्रों की चमक, अक्षरों का आकार, उपयुक्त दाम बच्चों को किताब ख़रीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। तालों मे बन्द किताबें कितनी बेचैन हैं, इसको महसूस करें। बच्चों की पहुँच किताबों तक बेरोकटोक होने दें।'
श्री दिनेश मिश्र ने कहा, 'बच्चों का साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं, वरन पूरे समाज और सृष्टि के निर्माण की शुरुआत है। समाज, परिवार देश में बच्चों की स्थिति क्या है, यही पैमाना है। देश के बजट में शिक्षा के लिए कितना बज़ट है और उसमें बच्चों के लिए कितना खर्च किया जाता है? आपका चरित्र इससे भी तय होता है कि आप उसे खर्च कैसे करते हैं? जो समाज बच्चों की अनदेखी करता है, वह अपने भविष्य को नष्ट कर रहा है। हमारे समाज में इस आत्मघाती प्रवृत्ति के सभी लक्षण मौज़ूद हैं। बाल-साहित्य लेखन के लिए समर्पण ज़रूरी है। बाल-साहित्य लेखन आपके लेखन के केन्द्र में है या 'बाल-साहित्य भी लिखते हैं' में अन्तर है। 'यह है तो मैं हूँ, यह नहीं है तो मैं नहीं हूँ।' की सोच ज़रूरी है। बाल साहित्य देश की आवश्यकता है; मेहरबानी नहीं है। बाल साहित्य में उपदेश नहीं होना चाहिए; लेकिन केवल मनोरंजन ही हो, उचित नहीं है। दिमाग के लिए भी खुराक होनी चाहिए। सही-गलत का विवेक भी होना चाहिए। यदि ऐसा हो गया तो समझो आधी लड़ाई जीत ली। फ़ायदे की सुनामी से बचकर नेशनल नेटवर्क बनाया जाना चाहिए। सरकार यह कर सकती है, क्योंकि सरकार बेबस भले ही नज़र आए, परन्तु होती नहीं। मॉल बने तो वहाँ किताबों की दूकान भी हो। जब उपहार देने का मौका हो, किताबें दी जाएँ। बाल साहित्य मानवता का भविष्य है।अध्यक्षीय भाषण में श्री देवेन्द्र मेवाड़ी ने कहा, 'हमने चिड़ियाँ, कलियाँ, बादल, नदियाँ झरने, हवाएँ, देखे हैं। चीड़ के बीज गिरते देखे हैं। लेखकीय दायित्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चे से पूरी आत्मीयता महसूस करके लेखक को एक प्रकार से परकाया -प्रवेश करना पड़ता है। लेखक अपने में बच्चे को जीवित करेगा, तभी वह सार्थक सर्जन कर पाएगा। इस लेखन में चित्रकार भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है। वह लेखक की कल्पना के बिम्बों को आकार ही नही देता वरन चित्र के रूप में अनुवाद करता है। माँ-बाप अपनी दमित इच्छाएँ बच्चे पर न लादें। बच्चे में सहजभाव से बढ़ने की अपार सम्भावनाएँ होती हैं। हमारी भाषाओं में हैरी पॉटर से भी अधिक उत्कृष्ट साहित्य है, उसे सामने लाया जाए।

दूसरे सत्र में पुस्तक-लोकार्पण का अभिनव प्रयोग किया गया। सभी पुस्तकों का लोकार्पण विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों द्वारा कराया गया। अन्तर्राष्ट्रीय खगोल वर्ष २००९ के अवसर पर 'सौर मण्डल की सैर' के लेखक और चित्रकार तथा 'अंजाम' के चित्रकार भी इस वसर पर मौजूद थे। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी इन पुस्तकों पर पढ़ी गई समीक्षा। 'अंजाम' (उर्दू पुस्तक) पर अमीना ने 'सौर मण्डल की सैर' पर -खुशबू, अनीता सपना चौधरी, पूर्णिमा यादव राक्या परवीन ने; 'हमारे जल-पक्षी' पर सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती विमला सचदेव की प्रेरणा से कमल, हसीना, नाज़,राधा, रेणु ने समीक्षाएँ प्रस्तुत की। श्री मानस रंजन महापात्र जी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया। इस प्रकार के सार्थक कार्यक्रम की प्रस्तुति के लिए 'नेशनल बुक ट्रस्ट' और इसकी कर्मठ टीम बधाई की पात्र है।
-प्रस्तुति- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
मालवा रंगमंच उज्जैन का हिन्दी दिवस समारोह

मालवा रंगमंच समिति, उज्जैन (म.प्र.) का हिन्दी दिवस समारोह रविवार 13 सितम्बर को सुबह 10 बजे कालिदास अकादमी उज्जैन में आयोजित किया गया। इस आयोजन में ‘‘साहित्य,समाज,सिनेमा और हिंदी’’ विषय पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेद प्रताप वैदिक तथा सुप्रसिद्ध फ़िल्म लेखिका एवं कथाकार डॉ. अचला नागर का व्याख्यान हुआ। संस्कृत वि.वि.उज्जैन के कुलपति श्री मोहन गुप्त की अध्यक्षता में आयोजित इस समारोह में मुम्बई के मशहूर शायर निदा फा़ज़ली और चर्चित कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय ने अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ किया| प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं उज्जैन संभाग के पुलिस महानिरीक्षक श्री पवन जैन भी इस अवसर पर बतौर अतिथि उपस्थित थे। इस अवसर पर डॉ. वेद प्रताप वैदिक को हिंदी सेवा सम्मान से भी अलंकृत किया गया। डॉ.हरि मोहन बुधौलिया और आचार्य शैलेन्द्र पाराशर जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति में उन्हें यह सम्मान मुम्बई से पधारे मशहूर शायर निदा फ़ाज़ली ने प्रदान किया। डॉ. वेद प्रताप वैदिक ने अपने भाषण में कहा कि ‘हिंदी हिंदुस्तान को जोड़ती है और संस्कृत पूरी दुनिया को । इस लिए भारत का भविष्य संस्कृत में है । अब संस्कृत के ज्ञान का ख़ज़ाना सबके लिए सुलभ होना चाहिए ।’ महर्षि पाणिनी संस्कृत वि.वि. उज्जैन के कुलपति श्री मोहन गुप्त की अध्यक्षता में आयोजित इस समारोह में सुप्रसिद्ध फ़िल्म लेखिका एवं कथाकार डॉ. अचला नागर ने ‘‘साहित्य,समाज,सिनेमा और हिंदी’’ विषय पर व्याख्यान देकर आयोजन की गरिमा बढ़ाई । शायर निदा फा़ज़ली और कवि-संचालक देवमणि पाण्डेय द्वारा अपनी चुनिंदा कविताओं का पाठ समारोह का ख़ास आकर्षण था । शायर निदा फा़ज़ली ने ग़ज़लें और नज़्में सुनाकर अदभुत समाँ बाँधा । श्रोताओं की माँग पर उन्होंने कुछ दोहे भी सुनाए-
बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान
अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान !
चित्र में बाएँ से- संयोजक राजेश राय, डॉ.हरिमोहन बुधौलिया, कवि देवमणि पाण्डेय , शायर निदा फ़ाज़ली, गीतकार सूरज उज्जैनी, संस्थाध्यक्ष केशव राय, डॉ. वेद प्रताप वैदिक, कुलपति श्री मोहन गुप्त, लोक गायक प्रहलाद टिपानिया, कथाकार डॉ. अचला नागर, पुलिस महानिरीक्षक श्री पवन जैन, आचार्य शैलेन्द्र पाराशर।
कृष्ण कुमार यादव की कृति 'बढ़ते चरण शिखर की ओर' का लोकार्पण

युवा प्रशासक एवं साहित्यकार कृष्ण कुमार यादव के व्यक्तित्व-कृतित्व को सहेजती पुस्तक ''बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव'' का लोकार्पण ब्रह्मानन्द डिग्री कॉलेज के प्रेक्षागार में आयोजित एक भव्य समारोह में किया गया। उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक का सम्पादन दुर्गा चरण मिश्र ने किया है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित सुविख्यात साहित्यकार पद्मश्री गिरिराज किशोर ने कहा कि अल्पायु में ही कृष्ण कुमार यादव ने प्रशासन के साथ-साथ जिस तरह साहित्य में भी ऊँचाइयों को छुआ है, वह समाज और विशेषकर युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है। वे एक साहित्य साधक एवं सशक्त रचनाधर्मी के रूप में भी अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। ऐसे युवा व्यक्तित्व पर इतनी कम उम्र में पुस्तक का प्रकाशन स्वागत योग्य है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आभार ज्ञापन करते हुए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति उ.प्र. के संयोजक पं. बद्री नारायण तिवारी ने कृष्ण कुमार यादव की रचनाधर्मिता को सराहा और कहा कि 'क्लब कल्चर' एवं अपसंस्कृति के इस दौर में उनकी हिन्दी-साहित्य के प्रति अटूट निष्ठा व समर्पण शुभ एवं स्वागत योग्य है।
इस अवसर पर कृष्ण कुमार यादव की साहित्यिक सेवाओं का सम्मान करते हुए विभिन्न संस्थाओं द्वारा उनका अभिनंदन एवं सम्मान किया गया। इन संस्थाओं में भारतीय बाल कल्याण संस्थान, मानस संगम, साहित्य संगम, उत्कर्ष अकादमी, मानस मण्डल, विकासिका, वीरांगना, मेधाश्रम, सेवा स्तम्भ, पं. प्रताप नारायण मिश्र स्मारक समिति एवं एकेडमिक रिसर्च सोसाइटी प्रमुख हैं। कार्यक्रम में कृष्ण कुमार यादव के कृतित्व के विभिन्न पहलुओं पर विद्वानजनों ने प्रकाश डाला। डॉ. सूर्य प्रसाद शुक्ल, डॉ. यतीन्द्र तिवारी, डॉ. राम कृष्ण शर्मा, भारतीय बाल कल्याण संस्थान के अध्यक्ष श्री रामनाथ महेन्द्र, प्रसिद्व बाल साहित्यकार डॉ. राष्ट्रबन्धु, समाजसेवी राजेन्द्र प्रसाद, अर्मापुर पी.जी. कॉलेज की हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. गायत्री सिंह, बी.एन.डी. कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विवेक द्विवेदी तथा शम्भू नाथ टण्डन सभी ने एक मत से इस कृति की प्रशंसा की। कार्यक्रम में अपने कृतित्व पर जारी पुस्तक से अभिभूत कृष्ण कुमार यादव ने आज के दिन को अपने जीवन का स्वर्णिम पल बताया। उन्होंने कहा कि साहित्य साधक की भूमिका इसलिए भी बढ़ जाती है कि संगीत, नृत्य, शिल्प, चित्रकला, स्थापत्य इत्यादि रचनात्मक व्यापारों का संयोजन भी साहित्य में उसे करना होता है। उन्होंने कहा कि पद तो जीवन में आते जाते हैं, मनुष्य का व्यक्तित्व ही उसकी विराटता का परिचायक है। स्वागत पुस्तक के सम्पादक श्री दुर्गा चरण मिश्र एवं संचालन उत्कर्ष अकादमी के निदेशक प्रदीप दीक्षित ने किया। कार्यक्रम के अन्त में दुर्गा चरण मिश्र द्वारा उमेश प्रकाशन, इलाहाबाद की ओर से सभी को स्मृति चिन्ह भेंट किया गया। कार्यक्रम में श्रीमती आकांक्षा यादव, डॉ. गीता चौहान, सत्यकाम पहारिया, कमलेश द्विवेदी, मनोज सेंगर, डॉ. प्रभा दीक्षित, डॉ. बी.एन. सिंह, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, पवन तिवारी सहित तमाम साहित्यकार, बुद्विजीवी, पत्रकारगण एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
आलोक चतुर्वेदी
उमेश प्रकाशन
दिविक रमेश पुरस्कृत

भारतीय अनुवाद परिषद द्वारा ७ सितम्बर, २००९ को सुविख्यात वरिष्ठ कवि, बाल साहित्यकार एवं विशेष रूप से कोरियाई ऒर अफ़्रीकी साहित्य के अनुवादक दिविक रमेश को राष्ट्रिय ’द्विवागीश' पुरस्कार प्रदान किया गया। (दाहिनी ओर के चित्र में) इसके साथ ही उन्हें श्रीमती रतन शर्मा स्मृति बाल-साहित्य पुरस्कार (२००९) के लिए भी चुना गया है। यह पुरस्कार उन्हें ’१०१ बाल कविताएं’ के लिए दिया जाएगा। इस राष्ट्रीय पुरस्कार में ३१०००/- रु., प्रशस्ति-पत्र एवं प्रतीक चिह्न प्रदान किया जाता है। समारोह के लिए ६ अक्टूबर, २००९ का दिन निश्चित किया गया है। सायं ५.०० बजे त्रिवेणी कला संगम, मंडी हाऊस, नई दिल्ली में यह समारोह आयोजित किया जाएगा। यह पुरस्कार हर वर्ष डा० रत्न लाल शर्मा स्मृति न्यास के द्वारा बाल साहित्य की किसी श्रेष्ठ पुस्तक के लिए दिया जाता है।
हाल ही में उनके कविता संग्रह गेहूँ घर आया का विमोचन भी हुआ है। किताबघर प्रकाशन से सद्य प्रकाशित इस कृति का लोकार्पण प्रोफेसर नामवर सिंह, प्रोफेसर केदारनाथ सिंह और प्रोफेसर निर्मला जैन ने समवेत रूप से किया। इस अवसर पर डॉ. केदारनाथ सिंह ने कहा कि दिविक रमेश ऐसा कवि है जिसका एक पृथक चेहरा है। यह चेहरा-विहीन कवि नहीं है बल्कि भीड़ में भी पहचाना जाने वाला कवि है। यह संकलन परिपक्व कवि का परिपक्व संकलन है और इसमें कम से कम १५-२० ऐसी कविताएँ हैं जिनसे हिंदी कविता समृद्ध होती है। इनकी कविताओं का हरियाणवी रंग एकदम अपना और विशिष्ट है। शमशेर और त्रिलोचन पर लिखी कविताएँ विलक्षण हैं। उन्होंने अपनी बहुत ही प्रिय कविताओं 'पंख' और 'पुण्य के काम आए' का पाठ भी किया। कविताओं की भाषा को महत्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने कहा कि दिविक ने कितने ही ऐसे शब्द हिंदी को दिए हैं जो हिंदी में पहली बार प्रयोग हुए हैं। प्रो. निर्मला जैन को यह संग्रह विविधता से भरपूर लगा और स्थानीयता के सहज पुट के कारण विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण भी। दिविक रमेश के पास एक सार्थक और सकारात्मक दृष्टि है साथ ही वे सहज मानुष से जुड़े हैं। सभी कविताएँ एक प्रौढ़ कवि की सक्षम कविताएँ हैं।

प्रोफेसर गोपेश्वर ने इन कविताओं को बहुत ही प्रभावशाली मानते हुए कहा कि ये कविताएँ खुलती हुई और संबोधित करती हुई हैं। अकेलेपन या एकान्त की नहीं हैं। विशेष रूप से उन्होंने 'गप ठोकना' जैसे शब्दों की ओर ध्यान दिलाते हुए दिविक रमेश की काव्य-भाषा को हिंदी काव्य-भाषा को समृद्ध करने वाली माना। उन्होंने अपनी अत्यंत प्रिय कविताओं में से एक 'पंख से लिखा खत' का पाठ भी किया। प्रताप सहगल के अनुसार दिविक रमेश कभी पिछलग्गू कवि नहीं रहा और उनके काव्य ने निरंतर विकास किया है। प्रणव कुमार बंद्योपाध्याय के अनुसार इन कविताओं में समय के संक्रमण का विस्तार मिलता है। संग्रह को उन्होंने हिन्दी कविता की उपलब्धि माना। प्रोफ़ेसर नामवर सिंह ने कहा कि वे किसी बात को दोहराना नहीं चाहते और उन्हें कवि केदरानाथ सिंह के विचार सर्वाधिक महत्वपूर्ण लगे। उन्होंने यह भी कहा कि वे केदरनाथ सिंह के मत पर हस्ताक्षर करते हैं। संग्रह की 'तीसरा हाथ' कविता का पाठ करने के बाद उन्होंने कहा कि दिविक की ऐसी कविताएँ उसकी और हिन्दी कविता की ताक़त है और यही दिविक रमेश है। मैं इन्हें बधाई देता हूँ। सभा के प्रारंभ में संग्रह पर दिनेश मिश्र ने अपना आलेख पढ़ा। उन्होंने कहा कि ये कविताएँ जगाती हैं। गोष्ठी का संचालन प्रेम जनमेजय ने किया और यह आयोजन भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद और व्यंग्यात्रा के संयुक्त तत्वावधान में आज़ाद भवन के हॉल में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर अनेक सुप्रसिद्ध साहित्यकार और गणमान्य पाठक उपस्थित थे। प्रारंभ में भारतीय सांस्कृति संबंध परिषद के श्री अजय गुप्ता ने सबका स्वागत किया।
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