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रविवार, 28 नवंबर 2010

दक्षिण में हिंदी की स्थिति, गति एवं प्रगति पर परिसंवाद

नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, कोयंबत्तूर एवं डॉ. जी.आर.दामोदरन विज्ञान महाविद्यलय, कोयंबत्तूर के संयुक्त तत्वावधान में कोयंबत्तूर में ४ अक्तूबर, २०१० को राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन नराकास, कोयंबत्तूर के अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त श्री एम.पी. वर्गीस ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। उद्घाटन सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में वर्गीस जी ने कहा कि राष्ट्रीय एकता की संकल्पना को साकार बनाने के लिए जहाँ एक संपर्क भाषा की जरूरत है, वहीं भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए भारतीय भाषाओं का विकास जरूरी है। भारतीय संविधान इस संकल्पना के लिए प्रतिबद्ध है।

समिति के सदस्य-सचिव एवं संगोष्ठी के संयोजक डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि दक्षिण के आंध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल एवं पांडिच्चेरी प्रदेशों में शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक, आर्थिक, व्यावसायिक, वाणिज्यिक, औद्योगिक, प्रशासनिक क्षेत्रों के अलावा मीडिया एवं फिल्मी क्षेत्रों में भी आज हिंदी का विस्तृत प्रचार-प्रसार के आलोक में समग्र स्थिति का जायज़ा लेने के लिए आज इस एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी की महासचिव डॉ. मधुधवन ने नई पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें आगे बढ़कर हिंदी प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालना चाहिए। वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. पी.के. बालसुब्रमणियन जी ने तमिल साहित्य को हिंदी में अनुवादित करने के लिए नई पीढ़ी को प्रेरित किया और जानकारी दी कि इसके लिए तमिलनाडु सरकार आर्थिक मदद देती है। उद्घाटन सत्र में श्रीमती उषा वर्गीस, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए. पोन्नुसामी ने भी अपने विचार प्रकट किए और बच्चों को हिंदी अवश्य पढ़ाने का आग्रह किया। दक्षिण भारत में शिक्षा, साहित्य, संस्कृति एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी पर केंद्रित प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. पी.के. बालसुब्रमण्यन ने किया। विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. ना. गोपालकृष्णन, निदेशक, केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, श्री ईश्वर चंद्र झा, मंडल प्रबंधक, दि न्यू इंडिया एश्योरेंस कं.लि., उपस्थित थे। इस सत्र में बीज वक्तव्य देते हुए श्री सुदर्शन मलिक विश्व के एक बड़े जनतंत्रात्मक राष्ट्र की प्रचलित हिंदी को आज विश्व की भाषा का स्तर दिलाना आवश्यक है, इसके लिए हर ढंग से हमें पहल की जानी चाहिए। इस सत्र का संचालन डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने किया।

दूसरे सत्र का दक्षिण भारत में प्रशासनिक, व्यावसायिक एवं औद्योगिक क्षेत्रों में हिंदी की प्रगति पर केंद्रत रहा। इस सत्र में डॉ. एस. बशीर, डॉ. वासुदेवन शेष विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि दक्षिण भारत में हिंदी की प्रगति का कोई ऐसा आयाम नहीं है, जिस ओर हिंदीतर भाषियों का ध्यान नहीं गया हो। दक्षिण में हिंदी में पत्रकारिता आज विकसित स्थिति में है और आज दक्षिण में कई हिंदी ब्लागर हैं जो हिंदी को दुनिया की भाषा बनाने की पहल कर रहे हैं। इस सत्र का संचालन श्री डी. राम मोहन रेड्डी, शाखा प्रबंधक, न्यू इंडिया एश्योरेंस ने किया।
दोनों सत्रों में लगभग चालीस विद्वानों ने अपने शोध-पूर्ण आलेख प्रस्तुत किए। अंत में काव्य गोष्ठी में वरिष्ठ कवियों ने अपनी कविताओं तथा गीतों से श्रोताओं का मन बहलाया। अंत में सभी विद्वानों का सम्मान, श्रीमती सी.आर. राजश्री, भाषा विभागाध्यक्ष, डॉ. जी. आर. डी. विज्ञान महाविद्यालय के धन्यवाद ज्ञापन तथा राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी सुसंपन्न हुई।