रविवार, 28 जून 2009

एक शाम अंजना के नाम

७ जून, २००९ न्यू यार्क में पूर्णमासी के दिन, श्रीमती पूर्णिमा देसाई के शिक्षायतन के देवालय में डा. अंजना संधीर के सम्मान में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन सफलता पूर्वक संपन्न हुआ। स्वागत के शब्दों में शिक्षायतन की संस्थापिका एवं निर्देशिका पूर्णिमा देसाई ने कहा, " मैं एक ऐसी विभूति को बुला रही हूँ जिन्होने साहित्य के प्रचार में, संस्कृति के प्रचार में अपना योगदान दिया है और वह है डा. अंजना संधीर" जिन्होने मंच की शान बढाते हुए दीप प्रज्वलित किया। शिक्षायतन संस्था के संगीत विभाग से जुड़े सुर-सागर के श्री पंडित कमल मिश्रा जी ने माता के चरणों में गुलाब के फूलों को अर्पित करते हुए सरस्वती वंदना की। अपने भावों को व्यक्त करते हुए अंजना जी ने कहा " मै यहीं हूँ, यहीं थी और यहाँ से कहीं नहीं गयी।" अपने व्याख्यान में अधिक न कहते हुए उन्होने यू. के. से आए डा. कृष्ण कुमार जी को सादर आमंत्रित किया जिन्होंने अपने विचार प्रस्तुत करने से पहले पूर्णिमा जी को बधाई की पात्र मानते हुए अंजना के लिये कहा कि " अंजना जी का काम बोलता है"

भावों के आदान प्रदान के पश्चात् काव्य गोष्टी प्रारंभ हुई पहली रचना का पाठ किया डा. दाऊजी गुप्त ने, जो लखनऊ से पधारे थे। यू. के. से डा. कृष्ण कुमार जी ने अपनी रचना का पाठ के बाद अपने साथी साहित्यकार और कविगणों को आवाज़ दी जिनमें वहाँ उपस्थित थे डॉ.कृष्ण कन्हैया, श्रीमती जय वर्मा, श्री नरेन्द्र ग्रोवर और श्रीमती स्वर्ण तलवाड़। उनके पश्चात अनूप और रजनी भार्गव ने अपनी नन्हीं नन्हीं कविताओं की कोपलों से ज़िन्दगी के अंकुरित नए रंग माहौल में भर दिए। टोरंटो से श्री गोपाल बघेल जी ने सस्वर अपनी रचना का पाठ किया। फिर मंच को थामा न्यू यार्क तथा न्यू जर्सी के कवियों ने जिसमें जिनमें शामिल रहे श्री अशोक व्यास, श्री ललित अल्लुवालिया, मंजू राइ, बिन्देश्वरी अग्रवाल, अंजना संधीर, पूर्णिमा देसाई, गौतमजी, पुष्पा मल्होत्रा, नीना वाही, अनुराधा चंदर, डा. अनिल प्रभा, गिरीश वैद्य, देवी नागरानी, लखनऊ से आई श्रीमती शशि तिवारी और उनकी सुपुत्री शिवरंजनी। श्रोताओं में रहे श्री कथूरिया जी, परवीन शाहीन, रेनू नंदा और अनेकों साहित्यप्रेमी। यहाँ मैं डॉ. सरिता मेहता का ज़िक्र ज़रूर करना चाहूंगी, जो खुद विध्याधाम संस्था की निर्देशिका है और अच्छी कवयित्री भी। इस काव्य सुधा की शाम में उनका पूरी तरह से सहकार रहा। समाप्ति की ओर कदम बढाते हुए पूर्णिमा जी ने अंजना जी का सन्मान " साहित्य मणि' की उपाधि से श्री दाऊजी गुप्त के हाथों से करवाया, और सभी कविजनों का धन्यवाद किया। कार्यक्रम की समाप्ति भोजन के साथ हुई। -- देवी नागरानी

दिविक रमेश को द्विवागीश पुरस्कार

हिन्दी के सुविख्यात एवं वरिष्ठ कवि, बाल-साहित्यकार तथा अनुवादक दिविक रमेश के लिए प्रतिष्ठित संस्था ’भारतीय अनुवाद परिषद, नई दिल्ली की ओर से वर्ष २००७-२००८ के लिए राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार - द्विवागीश पुरस्कार की घोषणा की गई है। परिषद द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में इस पुरस्कार के अन्तर्गत ११०००/- रुपए की राशि का चेक, शाल, प्रशस्ति-पत्र, प्रशस्ति पत्र तथा स्मृति चिह्न प्रदान किया जाता है। समारोह का आयोजन सितंबर माह के प्रथम सप्ताह में संभावित है। श्री दिविक रमेश का वास्तविक नाम रमेश शर्मा है और वे इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु महाविद्यालय में प्राचार्य हैं।

प्रभाष जोशी द्वारा ''बिहार की पत्रकारिता तब और अब'' का लोकार्पण


पटना,१२ जून २००९ प्रख्यात पत्रकार प्रभाष जोशी ने आकाशवाणी के समाचार संपादक संजय कुमार की सद्य: प्रकाशित पुस्तक ''बिहार की पत्रकारिता तब और अब'' का लोकार्पण गांधी संग्रहालय पटना में आयोजित कार्यक्रम 'रामचरित्र सिंह स्मृति व्याख्यान- लोकतंत्र का ढहता हुआ चौथा स्तम्भ' के दौरान किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता में जो कुछ हो रहा है उससे उसके के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो गया है। श्री जोशी ने कहा कि अगर पत्रकारिता मर जायेगी तो लोकतंत्र मर जायेगा। श्री जोशी ने कहा कि पत्रकारिता साधारण नागरिक का हथियार है। इसके माध्यम से वह विधायिका पर नजर रखता है। हाल में हुए आम चुनाव के दौरान मीडिया द्वारा खबर छापने के के लिए उगाहे गये धन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आम जनता से इस हथियार को छीनने की साजिश हो रही हैं।

लोकार्पित पुस्तक ''बिहार की पत्रकारिता तब और अब में संजय कुमार ने बिहार की पत्रकारिता के नए और पुराने विविध पत्रकारीय गुणों का विस्तार से उल्लेख किया है। बिहार में पत्रकारिता के विभिन्न उतार-चढ़ावों को जानने के लिए यह पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में है। इस अवसर साहित्यकार खगेन्द्र ठाकुर, पत्रकार हरिवंश, हेमन्त, स्वयंप्रकाश, गांधी संग्रहालय के महामंत्री रजी अहमद सहित जाने माने पत्रकार-साहित्यकार उपस्थित थे। -- लीना

मुम्बई में हास्योत्सव २००९ का आयोजन


पिछले दिनों मुम्बई में हास्योत्सव २००९ का आयोजन एक सुखद ब्यार का झोका लेकर आया। रंग चकल्लस द्वारा पिछले ४० सालों से अनवरत आयोजित होते आ रहे हास्योत्सव जैसे शुद्ध और शिष्ट हास्य से लबरेज कार्यक्रमों का इंतजार न सिर्फ मुम्बई के रसिक श्रोताओं को होता है बल्कि देश भर के कवियों को भी रहता है। इस मंच से कभी काका हाथरसी शरद जोशी, शैल चतुर्वेदी जैसे ख्याति लब्ध कवियों ने श्रोताओं को गुदगुदाया तो कभी अशोक चक्रधर ने ये कहकर आयोजक को भाव विह्वल कर दिया कि जिन्दगी मे कभी उनकी तमन्ना हुआ करती थी कि वे रंगचकल्लस के इस आयोजन मे कविता पढें। शरद जोशी ने अपने जीवन का अंतिम रचना पाठ भी इसी मंच से किया था । बल्कि वे हर साल इस कारर्यक्रम के लिए एक नयी रचना जरूर लिख कर लाते थे।

मुम्बई के पाटकर सभागार मे आयोजित हास्योत्सव २००९ के मंच पर इस बार जिन हास्यकारों ने डॉ मुकेश गौतम के संचालन में हास्य और व्यंग्य के रंग बरसाये वे थे लम्बे समय से काव्य मंच पर मौजूद और विवाह फिल्म के सम्वाद लिखने से विशेष चर्चित हुए आशकरण अटल , शुजालपुर (म.प्र.) से आये गोविन्द राठी, यवतमाल से पधारे कपिल जैन, मुम्बई के देवमणि पान्डेय , बसंत आर्य तथा रजनी कांत। अंत मे संयोजक श्री असीम चेतन ने हँसते खिलखिलाते चेहरो को अगले साल फिर मिलने का वादा करते हुए विदा किया।

चित्र में - माइक पर आशकरण अटल ,बाय़ें से असीम चेतन, मुकेश गौतम , बसंत आर्य, देवमणि पांडेय, गोविन्द राठी, कपिल जैन और रजनीकांत
--बसंत आर्य

अधिवक्ताओं के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक मंच 'कवितायन' का वार्षिकोत्सव

नयी दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं के बौद्धिक एवं सांस्कृतिक मंच 'कवितायन' का वार्षिकोत्सव सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर सम्मान समारोह एवं काव्य संध्या का आयोजन किया गया। विख्यात ग़ज़लकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी,कवयित्री सरिता शर्मा, कवि विवेक गौतम तथा अधिवक्ता एवं कवि अनीस अहमद खान और सुरेश गुप्ता 'कातिब' को सम्मानित करते हुए कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि सर्वोच्च न्ययालय के माननीय न्यायाधीश श्री वी एस सिरप्रकर ने कहा-इस पूरी प्रकृति में कविता का तानाबाना और लय मौजूद है। अधिवक्ताओं में संवेदना का बचा रहना बहुत जरूरी है। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सर्वोच्च न्ययालय के माननीय न्यायाधीश डा. मुकुन्दकम शर्मा ने गैर हिन्दी भाषी होते हुए भी दिनकर की कविता का पाठ कर लोगों को चमत्कृत कर दिया। बाद में ममता किरण,रविन्द्र शर्मा 'रवि',सरिता शर्मा, लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, विवेक गौतम, अनीस अहमद खान, अभिषेक आत्रेय, विवेक मिश्र, नमिता राकेश आदि ने काव्यपाठ कर अधिवक्ताओं से श्रे खचाखच सभागार में खूब तालियाँ बटोरीं। कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता एवं 'कवितायन' के सचिव चन्द्रषेखर आश्री ने किया। अधिवक्ता एवं 'कवितायन' के अध्यक्ष वी शेखर ने संस्था की गतिविधियों के बारे में बताया। ऊपर चित्र में- कवितायन के अध्यक्ष लक्ष्मीशंकर वाजपेयी को सम्मानित करते हुए।


इंडिया इंटरनेशनल सेंटर एवं इंडियन सोसायटी आफ आथर्स के संयुक्त तत्वावधान में 'मेरी पसन्द की कविताएँ' शृंखला के अंर्तगत इस बार सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार लक्ष्मीशंकर वाजपेयी ने अपनी पसन्द की कविताएँ प्रस्तुत की। श्री वाजपेयी ने विभिन्न भारतीय भाषाओं एवं अनेक देषों के प्रतिष्ठित कवियों की इकतीस रचनाओं का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सुपरिचित कथाकार चित्रा मुद्गल ने कहा-श्री वाजपेयी की प्रस्तुति ने कविताओं को ऐसे जीवंत किया जैसे किसी पत्थर की मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर दी गयी हो। कार्यक्रम में विषिष्ट अतिथि के रूप में कवि एवं पूर्व सांसद श्री उदय प्रताप सिंह और अंग्रेजी कवि केकी एन दारूवाला उपस्थित थे। इस अवसर पर गंगा प्रसाद विमल, रंजीत साहा, वीरेन्द्र सक्सेना, डा. कमल कुमार सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे।
--नीरज तिवारी

'रजनी', 'गुड़िया का घर' और 'मुर्गाबी' का लोकार्पण


लखनऊ विश्वविद्यालय के डी पी सभागार में दि २२ अप्रैल २००९ को सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' द्वारा अनूदित विश्व प्रसिद्ध नार्वेजीय नाटककार हेनरिक इबसेन की कृतियों 'गुड़िया का घर' और 'मुर्गाबी' तथा १९८४ में रचित काव्यसंग्रह 'रजनी' का लोकार्पण उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के निदेशक डा स़ुधाकर अदीब ने किया।

काव्यसंग्रह 'रजनी' पर अपने विचार प्रगट किये डा प़्रेमशंकर तिवारी, आनन्द शर्मा, डा. सुधाकार अदीब और प्रो हरिशंकर मिश्र ने तथा 'गुड़िया का घर' और 'मुर्गाबी' पर अपने विचार प्रगट किये प्रो राकेश चन्द्रा, प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह और सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने। शरद आलोक ने हेनरिक इबसेन को विश्व के नाटककारों का पितामह बताते हुए कहा कि अभी तक हेनरिक इबसेन का नाम हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में गलत लिखा जाता रहा है। उन्होंने एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा कि नार्वे के नोबेल पुरस्कार प्राप्त लेखक क्नुत हामसुन को काफी समय तक गलत नट हामसुन लिखा जाता रहा।
कार्यक्रम का शुभारम्भ सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण से हुआ जिसमें स्वरस्वती वन्दना प्रस्तुत की शिवभजन कमलेश ने। कार्यक्रम का संचालन करते हुए नाटकों के अंश को नाटकीय अन्दाज मे प्रस्तुत किया डा कृष्णा जी श्रीवास्तव ने। 'गुड़िया का घर' के हिन्दी अनुवाद के अंशों को २००६ में ओस्लो मे सम्पन्न हुए अन्तराष्ट्रीय सांस्कृतिक महोत्सव में सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने प्रस्तुत किया था जिसमें डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव (लन्दन) मुख्य अतिथि थे।

चित्र में बायें से- डा क़ृष्णा जी श्रीवास्तव, योगेन्द्र प्रताप सिंह, प्रो. प़्रेमशंकर तिवारी, रामाश्रय सविता, सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', डा सुधाकर अदीब, आनन्द शर्मा और प्रो हरिशंकर मिश्र।

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' अभिनन्दन ग्रन्थ का लोकार्पण


४ अप्रैल २००९ को हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय में सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' अभिनन्दन ग्रन्थ का लोकार्पण संगीता सीमोनसेन, प्रो प़्रेमशंकर तिवारी और और डा व़िद्याविन्दु सिंह ने संयुक्त रूप से किया। प्रो के. डी. सिंह एवं अभिनन्दन ग्रन्थ के सम्पादकत्रय में अग्रणी डा रामाश्रय सविता ने सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' अभिनन्दन ग्रन्थ पर अपना वक्तव्य दिया। पूर्व उपनिदेशक हिन्दी संस्थान डा विद्याविन्दु सिंह, संयुक्त निदेशक आकाशवाणी निदेशालय कृष्ण नारायण पाण्डेय, विभागाध्यक्ष हिन्दी विभाग प्रो. प्रेमशंकर तिवारी, डा पाल, प्रो योगेन्द्र प्रताप सिंह, डा कृष्णा जी श्रीवास्तव, आनन्द शर्मा, भैयाजी, मधुकर अस्थाना, शिवभजन कमलेश, सरिता शुक्ला ने अपने विचार व्यक्त किये और संस्मरण सुनाए। लोकार्पण समारोह की मुख्य अतिथि थी नार्वे से पधारी संगीता सीमोनसेन और अध्यक्षता की प्रो. प़्रेमशंकर तिवारी ने। इस कार्यक्रम में सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' और नार्वे से आये उनके ज्येष्ठ पुत्र अनुराग भी उपस्थित थे।

चित्र में बायें से योगेन्द्र प्रताप सिंह, रामाश्रय सविता, सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', भैया जी, प्रो. प़्रेमशंकर तिवारी, संगीता सीमोनसेन, डा विद्याबिन्दु सिंह, प्रो के. डी. सिंह, आनन्द शर्मा और डा कृष्ण नारायण पाण्डेय।