बुधवार, 27 मई 2009

सियैटल में प्रतिध्वनि द्वारा 'एक था गधा' का मंचन


शरद जोशी के सुप्रसिद्ध व्यंग नाटक 'एक था गधा उर्फ़ अलादाद खां' का सुरुचिपूर्ण मंचन सिएटल की सांस्कृतिक संस्था प्रतिध्वनि द्वारा वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय स्थित, जातीय सांस्कृतिक केंद्र के सभागार में किया गया। इस नाटक में समाज एवं शासक के संबंधों का ताना बाना एक नवाब तथा एक धोबी के गधे से होता हुआ एक आम आदमी की जीवन की विडम्बना तक पहुँचता है। नाटक में यह दर्शाया गया है की किस प्रकार एक निरंकुश शासक की मनमानी का प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। ये नाटक उन सभी शासकों पर क़रारा व्यंग है जो अपनी सत्ता के मद में डूबे रहते हैं तथा आज भी सामंतवाद के युग को प्रश्रय दे रहे हैं।

सीमित साधनों में होने वाले नाटकों में मंच सज्जा एवं पात्रों की वेशभूषा पर बहुत अधिक खर्च करना संभव नहीं होता है। इसके बावजूद सभी पात्रों की सज्जा विषयानुकूल थी। चाहे कोतवाल की वर्दी हो, चाहे नवाब की अचकन या पगड़ी या धोबी का पाजामा और छोटी बाजुओं का कुर्ता, सब नाटक के अनुरूप रहे। मंच सज्जा भी सरलता से परिपूर्ण रही। मंच के संयोजन में एक महत्वपूर्ण बात ये रहती है कि कितनी स्वाभाविकता से एक दृश्य से दुसरे दृश्य में पदार्पण होता है। नाटक में इस बात का ध्यान रखा गया था कि दृश्य कि समाप्ति पर दर्शकों को इसको सूचना दे दी जाए। नाटक में प्रयोग किये गए गीत बड़े प्रभावशाली बन पड़े थे। इनका संगीत कर्णप्रिय था, शब्द अर्थों को समेटे हुए थे एवं भाव पूरी तरह मन को स्पर्श करने वाले थे। कलाकारों नें इन गीतों को भली प्रकार से गाया तथा संगीतकारों नें इस हेतु जो परिश्रम किया, वह सफल हुआ।

अभिनय कि दृष्टि से अनेक कलाकारों नें प्रभावित किया। नवाब बने मुकेश नें अपनी बुलंद आवाज़, शुद्ध उच्चारण एवं सटीक प्रस्तुतीकरण से खूब तालियाँ बटोरीं। कोतवाल बने गुरविंदर नें कहानी में हास्य के पुट को बनाये रखा तथा अपनी ज़ोरदार उपस्तिथि मंच पर दर्ज करवाई। बुद्धिजीवी बने जयंत, शाहाना और बिकास नें अपने चेहरे के भावों एवं संवादों कि अदायगी द्वारा नवाब की चाटुकारिता को जीवंत कर दिया। धोबी बने अनु गर्ग नें भी भावपूर्ण अभिनय किया। पानवाले का पात्र निभाते हुए अंकुर मानो उस चरित्र में ही प्रवेश कर गए हों। अलादाद खां (इंसान) बने कृष्णन नें अपने पात्र में सादगी को उतारा, जिससे उनके पात्र से दर्शकों की हमदर्दी जुड़ गयी। रंगकर्मी बने रोशित का अभिनय भी प्रभावी रहा। नत्थू दर्जी बने विशाल, रामकली बनी मुक्ता, दरबारी बनी श्रृंगार, अदिति, राधिका तथा नागरिक बने रानुल, पंकज, मनीषा और भूषण नें भी बढ़िया अभिनय किया। 'एक था गधा उर्फ़ अलादाद खां' के इतने जीवंत प्रस्तुतीकरण का सबसे अधिक श्रेय सिएटल क्षेत्र में हिंदी नाटक रुपी गंगा के भगीरथ तथा इस नाटक के निर्देशक अगस्त्य कोहली को जाता है। नाटक का निर्देशन सटीक एवं संतुलित रहा, कुछ पात्रों को जो स्वतंत्रता प्रदान की गयी थी उससे निर्देशक का अनुभव ही प्रर्दशित होता दिख रहा था। लम्बे लम्बे संवादों के बावाजूद नाटक कहीं बिखरता हुआ नहीं प्रतीत हुआ। दर्शक एक बार कुर्सी पर बैठे तो अंत तक मानो नाटक की दुनिया में ही खोये रहे।

कुल हिसाब ये कि नाटक बहुत बढ़िया रहा, सभी कलाकारों नें पात्रानुकूल अभिनय किया, निर्देशन अच्छा रहा तथा इस नाटक को देख कर कोई ये नहीं कह सकता था कि इसके सभी कलाकार मात्र शौकिया तौर पर अभिनय कर रहे थे। इस आशा के साथ कि आने वाले समय में सिएटलवासियों को श्रेष्ठ हिंदी नाटक नियमित रूप से देखने को मिलते रहेंगे मैं इस समीक्षात्मक लेख को विराम देता हूँ।

: अभिनव शुक्ल

रविवार, 24 मई 2009

१५वें कथा यू.के. सम्मान की घोषणा

कथा (यू.के.) के मुख्य सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष २००९ के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान के लिए राजकमल प्रकाशन से २००८ में प्रकाशित उपन्‍यासकार श्री भगवान दास मोरवाल के उपन्यास "रेत" का चयन किया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास-खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री मोरवाल को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में ०९ जुलाई २००९ की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जाएगा। इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गई थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान सुश्री चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस.आर. हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असगर वजाहत, महुआ माजी एवं नासिरा शर्मा को प्रदान किया जा चुका है।

२३ जनवरी १९६० को नगीना, मेवात में जन्मे भगवान दास मोरवाल ने राजस्थान विश्वविद्यालय से एम.ए. की डिग्री हासिल की। उन्हें पत्रकारिता में डिप्लोमा भी हासिल है। मोरवाल के अन्य प्रकाशित उपन्यास हैं काला पहाड़ (१९९९) एवं बाबल तेरा देस में (२००४)। इसके अलावा उनके चार कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह और कई संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। दिल्ली हिन्दी अकादमी के सम्मानों के अतिरिक्त मोरवाल को बहुत से अन्य सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनके लेखन में मेवात क्षेत्र की ग्रामीण समस्याएँ उभर कर सामने आती हैं। उनके पात्र हिन्दू-मुस्लिम सभ्यता के गंगा जमुनी किरदार होते हैं। कंजरों की जीवन शैली पर आधारित उपन्यास रेत को लेकर उन्हें मेवात में कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
वर्ष २००९ के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान श्री मोहन राणा को उनके कविता संग्रह "धूप के अन्धेरे में" (२००८ – सूर्यास्त्र प्रकाशन, नई दिल्ली) के लिए दिया जा रहा है। मोहन राणा का जन्म १९६४ में दिल्ली में हुआ। वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मानविकी में स्नातक हैं, आजकल ब्रिटेन के बाथ शहर के निवासी हैं। उनके ६ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। भारत में साहित्य की मुख्यधारा के आलोचक उन्हें हिन्दी का महत्वपूर्ण लेखक मानते हैं। कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार - हिंदी कविता की नई पीढ़ी में मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है, क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता।

इससे पूर्व इंग्लैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द्र श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डॉ.अचला शर्मा, उषा राजे सक्‍सेना, गोविंद शर्मा, डॉ. गौतम सचदेव और उषा वर्मा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियाँ भेजीं।

वर्ष २००८ का 'केदार सम्मान' दिनेश कुमार शुक्ल को

समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवि, दिनेश कुमार शुक्ल को उनके कविता संकलन 'ललमुनिया की दुनिया' के लिए वर्ष २००८ का केदार सम्मान देने का निर्णय लिया गया है। निर्णय की प्रशस्ति में लिखा गया है कि दिनेश कुमार शुक्ल हमारे समय के उन थोड़े से कवियों में हैं जो आज वैश्वीकरण से उत्पन्न बाज़ारवाद से आक्रांत दुनिया के सुख-दुःख को हार्दिकता के साथ एक बड़े फलक पर उठाते हैं। उनके नए संग्रह 'ललमुनिया की दुनिया' में हमारे जीवनानुभव ही नहीं, जीवनमूल्य और मानवीय सौन्दर्यबोध भी है। कविता की डूबती दुनिया में वे जिस तरह मनुष्यता को अपनी संवेदना से रेखांकित करते हैं, वह पाठकों को चमत्कृत करता है। बिल्कुल कवि कुँवर नारायण की तरह उनकी कविता में भी मनुष्यता को बचाने की चिंता है, संवेदनशीलता के साथ। निराला और मुक्तिबोध की तरह इस कवि ने भी कविता को शब्द- लय और भाषा के सौन्दर्यबोध के साथ इसे अपनी कविता में साधा है।

ज्ञातव्य हो कि दिनेशकुमार शुक्ल का 'ललमुनिया की दुनिया' वर्ष २००८ में अनामिका प्रकाशन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित किया गया है। यह इनका पाँचवाँ संकलन है। इसके पूर्व केदार सम्मान से निम्नांकित समकालीन हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण कवियों को सम्मानित किया जा चुका है - नासिरा अहमद सिकंदर (१९९६), एकांत श्रीवास्तव (१९९७), कुमार अम्बुज (१९९८), विनोद दास (१९९९), गगन गिल (२०००), हरिश्चंद्र पाण्डेय (२००१), अनिल कुमार सिंह (२००२), हेमंत कुकरेती (२००३), नीलेश रघुवंशी (२००४), आशुतोष दुबे (२००५), बद्री नारायण (२००६), अनामिका (२००७)।

सईद मलीहाबादी, अभिज्ञात और स्वर्ण ओबराय को कौमी एकता पुरस्कार


कोलकाताः ऑल इंडिया कौमी एकता मंच की ओर से ९ मई शनिवार की देर शाम स्थानीय कला मंदिर सभागार में पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उर्दू दैनिक आज़ाद हिंद के संपादक सईद मलीहाबादी, साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए अभिज्ञात और कैंसर चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में योगदान केलिए इंडियन कैंसर सोसायटी की चेयरपर्सन स्वर्ण ओबराय को कौमी एकता अवार्ड प्रदान किया गया। हालाँकि सईद कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो पाए। अभिज्ञात को प्रख्यात उर्दू साहित्यकार डॉ. लुत्फुर रहमान और ओबराय को ओएनजीसा-राजामुंदरी के कार्यकारी निदेशक आफताब अहमद खान के स्मृति फलक, मानपत्र, शाल व गुलदस्ता प्रदान कर सम्मानित किया। स्वतंत्रता सेनानी सुरेश चंद्र मैत्र और गुरुदास गाइन को भी इस समारोह में संवर्द्धना दी गई। इस अवसर पर आयोजित अखिल भारतीय मुशायरा और कवि सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए नामचीन रचनाकारों ने अपनी रचनाओं से लोगों का मन लोह लिया जिसमें डॉ. कलीम कैसर(बलरामपुर), डॉ. सुरेश(लखनऊ), दिनेश दर्पण (इंदौर), तश्ना आज़मी (आज़मगढ़), सुनील कुमार तंग (सिवान), श्यामा सिंह सबा(रायबरेली), ताकीर ग़ज़ल, शिखा गाजीपुरी, नईम अख़्तर खादिमी(बुरहानपुर), कुसुम जैन और जयकुमार रुसवा(कोलकाता) प्रमुख थे। ऑल इंडिया कौमी एकता मंच के महासचिव आफताब अहमद खान के आरंभ में संस्था के कार्यों का परिचय देते हुए बताया कि उसने सांप्रदायिक सद्भावना और राष्ट्रीय एकता से जुड़े सेमिनारों, ज़रूरतमंद लोगों की चिकित्सा सुविधा एवं गरीब छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान किया है।

अभियंता-आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' ''वागविदांवर सम्मान'' से विभूषित

अंतर्जाल पर हिन्दी की अव्यावसायिक साहित्यिक पत्रिका दिव्य नर्मदा का संपादन कर रहे विख्यात कवि-समीक्षक अभियंता श्री संजीव वर्मा 'सलिल' को संस्कृत - हिंदी भाषा सेतु को काव्यानुवाद द्वारा सुदृढ़ करने तथा पिंगल व साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट अवदान के लिए 'वाग्विदान्वर सम्मान' से सम्मलेन द्वारा अलंकृत किया जाना अंतर्जाल जगत के लिया विशेष हर्ष का विषय है चूँकि उक्त विद्वानों में केवल सलिल जी ही अंतर्जाल जगत से न केवल जुड़े हैं अपितु व्याकरण, पिंगल, काव्य शास्त्र, अनुवाद, तकनीकी विषयों को हिंदी में प्रस्तुत करने की दिशा में मन-प्राण से समर्पित हैं। अंतर्जाल की अनेक पत्रिकाओं में विविध विषयों में लगातार लेखन कर रहे सलिल जी गद्य-पद्य की प्रायः सभी विधाओं में सृजन के लिए देश-विदेश में पहचाने जाते हैं। हिंदी साहित्य सम्मलेन के इस महत्वपूर्ण सारस्वत अनुष्ठान की पूर्णाहुति परमपूज्य ज्योतिश्पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती महाराज के प्रेरक संबोधन से हुई। स्वामी जी ने संस्कृत तथा हिंदी को भविष्य की भाषाएँ बताया तथा इनमें संभाषण व लेखन को जन्मों के संचित पुण्य का फल निरुपित किया। सम्मलेन के अध्यक्ष वयोवृद्ध श्री भगवती प्रसाद देवपुरा ने बदलते परिवेश में अंतर्जाल पर हिंदी के अध्ययन व शिक्षण को अपरिहार्य बताया।

हिन्दी साहित्य सम्मलेन प्रयाग : शताब्दी वर्ष समारोह संपन्न


अयोध्या, १०-११ मई '०९; समस्त हिन्दी जगत की आशा का केन्द्र हिन्दी साहित्य सम्मलेन प्रयाग अपने शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में देव भाषा संस्कृत तथा विश्व-वाणी हिन्दी को एक सूत्र में पिरोने के प्रति कृत संकल्पित है। सम्मलेन द्वारा राष्ट्रीय अस्मिता, संस्कृति, हिंदी भाषा तथा साहित्य के सर्वतोमुखी उन्नयन हेतु नए प्रयास किए जा रहे हैं। १० मई १९१० को स्थापित सम्मलेन एकमात्र ऐसा राष्ट्रीय संस्थान है जिसे राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन तथा अन्य महान साहित्यकारों व समाजसेवियों का सहयोग प्राप्त हुआ। नव शताब्दी वर्ष में प्रवेश के अवसर पर सम्मलेन ने १०-११ मई '०९ को अयोध्या में अखिल भारतीय विद्वत परिषद का द्विदिवसीय सम्मलेन हनुमान बाग सभागार, अयोध्या में आयोजित किया गया। इस सम्मलेन में २१ राज्यों के ४६ विद्वानों को सम्मलेन की मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया।

१० मई को 'हिंदी, हिंदी साहित्य और हिंदी साहित्य सम्मलेन' विषयक संगोष्ठी में देश के विविध प्रान्तों से पधारे ११ वक्ताओं ने विद्वतापूर्ण व्याख्यान दिए। साहित्य वाचस्पति डॉ. बालशौरी रेड्डी, अध्यक्ष, तमिलनाडु हिंदी अकादमी ने इस सत्र के अध्यक्षता की। इस सत्र का संचालन डॉ. ओंकार नाथ द्विवेदी ने किया। स्वागत भाषण डॉ. बिपिन बिहारी ठाकुर ने दिया। प्रथम दिवस पूर्वान्ह सत्र में संस्कृत विश्व विद्यालय दरभंगा के पूर्व कुलपति डॉ. जयंत मिश्र की अध्यक्षता में ११ उद्गाताओं ने 'आज संस्कृत की स्थिति' विषय पर विचार व्यक्त किए। विद्वान वक्ताओं में डॉ. तारकेश्वरनाथ सिन्हा बोध गया, श्री सत्यदेव प्रसाद डिब्रूगढ़, डॉ. गार्गीशरण मिश्र जबलपुर, डॉ. शैलजा पाटिल कराड, डॉ.लीलाधर वियोगी अंबाला, डॉ. प्रभाशंकर हैदराबाद, डॉ. राजेन्द्र राठोड बीजापुर, डॉ. नलिनी पंड्या अहमदाबाद आदि ने विचार व्यक्त किए।

अपरान्ह सत्र में प्रो. राम शंकर मिश्र वाराणसी, डॉ. मोहनानंद मिश्र देवघर, पर. ग.र.मिश्र तिरुपति, डॉ. हरिराम आचार्य जयपुर, डॉ. गंगाराम शास्त्री भोपाल, डॉ. के. जी. एस. शर्मा बंगलुरु, पं. श्री राम दवे जोधपुर, डॉ. राम कृपालु द्विवेदी बंद, डॉ. अमिय चन्द्र शास्त्री मथुरा, डॉ. भीम सिंह कुरुक्षेत्र, डॉ. महेशकुमार द्विवेदी सागर आदि ने संस्कृत की प्रासंगिकता तथा हिंदी--संस्कृत की अभिन्नता पर प्रकाश डाला। यह सत्र पूरी तरह संस्कृत में ही संचालित किया गया। श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार में सभी वक्तव्य संस्कृत में हुए।

समापन दिवस पर ११ मई को डॉ. राजदेव मिश्र, पूर्व कुलपति सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी की अध्यक्षता में ५ विद्वजनों ने ज्योतिश्पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के प्रति प्रणतांजलि अर्पित की। सम्मलेन के अध्यक्ष साहित्य वाचस्पति श्री भगवती प्रसाद देवपुरा, अध्यक्ष हिंदी साहित्य सम्मलेन प्रयाग की अध्यक्षता में देश के चयनित ५ संस्कृत विद्वानों डॉ. जयंत मिश्र दरभंगा, श्री शेषाचल शर्मा बंगलुरु, श्री गंगाराम शास्त्री भोपाल, देवर्षि कलानाथ शास्त्री जयपुर, श्री बदरीनाथ कल्ला फरीदाबाद को महामहिमोपाध्याय की सम्मानोपाधि से सम्मानित किया गया।

११ संस्कृत विद्वानों डॉ. मोहनानंद मिश्र देवघर, श्री जी. आर. कृष्णमूर्ति तिरुपति, श्री हरिराम आचार्य जयपुर, श्री के.जी.एस. शर्मा बंगलुरु, डॉ. रामकृष्ण सर्राफ भोपाल, डॉ. शिवसागर त्रिपाठी जयपुर, डॉ.रामकिशोर मिश्र बागपत, डॉ. कैलाशनाथ द्विवेदी औरैया, डॉ. रमाकांत शुक्ल भदोही, डॉ. वीणापाणी पाटनी लखनऊ तथा पं. श्री रामदवे जोधपुर को महामहोपाध्याय की सम्मानोपाधि से सम्मानित किया गया।

२ हिन्दी विद्वानों डॉ. केशवराम शर्मा दिल्ली व डॉ वीरेंद्र कुमार दुबे को साहित्य महोपाध्याय तथा २८ साहित्य मनीषियों डॉ. वेदप्रकाश शास्त्री हैदराबाद, डॉ. भीम सिंह कुरुक्षेत्र, डॉ. कमलेश्वर प्रसाद शर्मा दुर्ग, आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जबलपुर, डॉ. महेश कुमार द्विवेदी सागर, श्री ब्रिजेश रिछारिया सागर, डॉ. मिजाजीलाल शर्मा इटावा, श्री हरिहर शर्मा कबीरनगर, डॉ, रामशंकर अवस्थी कानपुर, डॉ. रामकृपालु द्विवेदी बांदा, डॉ. हरिहर सिंह कबीरनगर, डॉ, अमियचन्द्र शास्त्री 'सुधेंदु' मथुरा, डॉ. रेखा शुक्ल लखनऊ, डॉ. प्रयागदत्त चतुर्वेदी लखनऊ, डॉ. उमारमण झा लखनऊ, डॉ. इन्दुमति मिश्र वाराणसी, प्रो. रमाशंकर मिश्र वाराणसी, डॉ. गिरिजा शंकर मिश्र सीतापुर, चंपावत से श्री गंगाप्रसाद पांडे, डॉ. पुष्करदत्त पाण्डेय, श्री दिनेशचन्द्र शास्त्री 'सुभाष', डॉ. विष्णुदत्त भट्ट, डॉ. उमापति जोशी, डॉ. कीर्तिवल्लभ शकटा, हरिद्वार से प्रो. मानसिंह, अहमदाबाद से डॉ. कन्हैया पाण्डेय, प्रतापगढ़ से डॉ, नागेशचन्द्र पाण्डेय तथा उदयपुर से प्रो. नरहरि पंड्या को ''वागविदांवर सम्मान'' ( ऐसे विद्वान जिनकी वाक् की कीर्ति अंबर को छू रही है) से अलंकृत किया गया। उक्त सभी सम्मान ज्योतिश्पीठाधीश्वर जगद्गुरु स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के कर कमलों से प्रदान किये जाते समय सभागार करतल ध्वनि से गूँजता रहा।

रेडियो सलाम नमस्ते द्वारा प्रविष्टियाँ आमंत्रित

रेडियो सलाम नमस्ते द्वारा हिन्दयुग्म के सहयोग से एक गीत प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। इसमें भाग लेने के लिए आपको जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रसिद्ध देशगान 'अरुण यह मधुमय देश हमारा' को अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके हमें भेजना होगा। गीत को केवल पढ़ना नहीं बल्कि गाकर भेजना होगा। हर प्रतिभागी इस गीत को अलग-अलग धुन में गाकर भेजे (कैसी धुन हो, यह आपको खुद सोचना है)।

1) गीत को रिकॉर्ड करके भेजने की आखिरी तिथि 31 मई 2009 है। अपनी प्रविष्टि podcast.hindyugm@gmail.com पर ईमेल करें।
2) इसे समूह में भी गाया जा सकता है। यह प्रविष्टि उस समूह के नाम से स्वीकार की जायेगी।
3) इसे संगीतबद्ध करके भी भेजा जा सकता है।
4) श्रेष्ठ तीन प्रविष्टियों को आदित्य प्रकाश की ओर से क्रमशः रु 1000, रु 500 और रु 500 के नग़द इनाम दिये जायेंगे।
5) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को डलास, अमेरिका के एफ॰एम॰ रेडियो स्टेशन रेडियो सलाम नमस्ते के कार्यक्रम 'कवितांजलि' में बजाया जायेगा। इस प्रविष्टि के गायक/गायिका से आदित्य प्रकाश (कार्यक्रम के संचालक) कार्यक्रम में सीधे बातचीत करेंगे, जिसे दुनिया में हर जगह सुना जा सकेगा।
6) अन्य 2 प्रविष्टियों को भी कवितांजलि में बजाया जायेगा।
7) सर्वश्रेष्ठ प्रविष्टि को 'हिन्दी-भाषा की यात्रा-कथा' नामक वीडियो/डाक्यूमेंट्री में भी बेहतर रिकॉर्डिंग के साथ इस्तेमाल किया जायेगा।
8) श्रेष्ठ प्रविष्टि के चयन का कार्य आवाज़-टीम द्वारा किया जायेगा। अंतिम निर्णयकर्ता में आदित्य प्रकाश का नाम भी शामिल है।
9) हिन्द-युग्म का निर्णय अंतिम होगा और इसमें विवाद की कोई भी संभावना नहीं होगी।

विस्तृत विवरण के लिए यह लिंक देखें- http://podcast.hindyugm.com/2009/05/sing-jai-shankar-prasad-poem-win-rs.html

प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़ द्वारा प्रविष्टियाँ आमंत्रित

संस्थान द्वारा अपने समय के वरिष्ठ आलोचक प्रमोद वर्मा की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए दो राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार प्रारंभ किये जा रहे हैं । इसका उद्देश्य हिंदी में उस स्वस्थ आलोचना कर्म का सम्मान है जिनसे अपने समय के साहित्य, साहित्यकार और पाठक को नयी संचेतना और नयी दिशा से जुड़ने का द्वार खुलता हो । इस पुरस्कार के अंतर्गत दो आलोचकों को उनकी आलोचनात्क कृति या कर्म के लिए सम्मानित किया जायेगा। पुरस्कार के अंतर्गत दो चयनित आलोचकों को 12-13 जुलाई, 2009 को रायपुर में आयोजित दो दिवसीय साहित्य समारोह में 11,000 एवं 7,000 हज़ार नगद सहित प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिन्ह एवं प्रमोद वर्मा समग्र की एक-एक प्रति प्रदान किया जायेगा । इसके अलावा अंतिम रूप से चयनित 2 आलोचकों को द्वितीय श्रेणी रेलवे-किराया भी संस्थान द्वारा देय होगा ।

नियमावलीः-
01. प्रथम वर्ग के अंतर्गत आलोचक को अपनी प्रकाशित कृति (साहित्य-आलोचना) की दो प्रतियाँ भेजना होगा जो किसी भी अवधि में प्रकाशित हों ।
02. द्वितीय वर्ग के अंतर्गत युवा आलोचक को अपनी प्रकाशित कृति (साहित्य-आलोचना) की दो प्रतियाँ भेजना होगा जो 2000 से 2009 की अवधि में प्रकाशित हों ।
03. ऐसी कृतियों के प्रकाशक, पाठक, संस्थायें भी उक्तानुसार प्रविष्टि भेज सकते हैं ।
04. प्रविष्टि के साथ आलोचक का बायोडेटा एवं छायाचित्र आवश्यक होगा ।
05. प्रविष्टि प्राप्ति की अंतिम तिथि – 30 मई, 2009 ।
06. ई-संपर्क – srijan2samman@gmail.com मोबा.- 94241-82664

निर्णायक मंडलः-
निर्णायक मंडल के सदस्य हैं – श्री केदार नाथ सिंह, दिल्ली, डॉ. विजय बहादुर सिंह, कोलकाता, डॉ. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, गोरखपुर, प्रो. धनंजय वर्मा, भोपाल एवं श्री विश्वरंजन, रायपुर । संयोजक - जयप्रकाश मानस ।


जयप्रकाश मानस
महासचिव
प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान, छत्तीसगढ़
रायपुर

शनिवार, 23 मई 2009

निकट का नया अंक प्रकाशित


संयुक्त अरब इमारात से प्रकाशित होने वाली हिंदी पत्रिका निकट का तीसरा अंक (मार्च 2009) प्रकाशित हो गया है। इस अंक के प्रमुख आकर्षण हैं- विष्णु प्रभाकर से गोरखनाथ तिवारी की एक लंबी बातचीत, लता शर्मा के अप्रकाशित उपन्यास गली रंगरेजन का एक अंश, पाकिस्तानी कथा परिवेश पर मुशर्रफ़ ज़ौकी की एक नज़र, अहमद सग़ीर सिद्दीकी, इंतिज़ार हुसैन, सज्जाद कबीर, महेश विक्रम शाह, सुदर्शन प्रिय दर्शिनी, संतोष दीक्षित गोविंद उपाध्याय, सूरजपाल चौहान, महेन्द्र भीष्म तथा ज्योति की कहानियाँ, दिनेश मंज़र और इंदु श्रीवास्तव की गज़लें, अनामिका, सुभाष सिंगाठिया अनिरुद्ध सिंह सेंगर और अशोक बाजपेयी की कविताएँ, प्रतीक मिश्र के गीत तथा पुस्तक समीक्षाएँ। इस अंक को यहाँ से डाउनलोड कर के पढ़ा जा सकता है।