शनिवार, 21 फ़रवरी 2009

स्वर्ण मंदिर में शरद आलोक का सम्मान


ओस्लो, १६ फरवरी। अमृतसर में सिक्खों के सबसे बड़े तीर्थस्थान स्वर्णमंदिर में 'स्वर्ण मंदिर' की तरफ़ से सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' को सरोपा और पुस्तकें भेंट करके सम्मानित किया गया। सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' को पंजाब में प्रवासी साहित्य गौरव सम्मान और उत्तर प्रदेश में प्रवासी साहित्यकार सम्मान से पुरस्कृत किया जा चुका है। आप नार्वे में २५ वर्षों से 'परिचय और 'स्पाइल-दर्पण' पत्रिकाओं का संपादन कर रहे हैं। प्रवासीय लेखकों में अग्रण्य सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने हिंदी में 'नंगे पाँवों का सुख', 'नीड़ में फँसे पंख' जैसे कविता संग्रहों और 'अर्धरात्रि का सूरज' तथा 'प्रतिनिधि प्रवासी कहानियाँ' जैसे कहानी संग्रहों के अलावा दो नार्वेजीय काव्यसंग्रहों की रचना करने के साथ-साथ हैनरिक इबसेन के नाटकों और स्कैंडेनेवियाई साहित्य का हिंदी में अनुवाद तथा अनेक संकलनों का संपादन भी किया है।

माया भारती

हेमंत स्मृति कविता सम्मान व विजय वर्मा कथा सम्मान


मुंबई, १७ जनवरी २००९, हेमंत स्मृति कविता सम्मान व विजय वर्मा कथा सम्मान महत्वपूर्ण पुरस्कारों की श्रेणी में आते हैं। उक्त विचार प्रख्यात साहित्य समीक्षक व आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने हेमंत फाउंडेशन एवं राजस्थान सेवा संघ के संयुक्त तत्वावधान में मुंबई के जे.बी.नगर स्थित श्री राजस्थानी सेवा संघ प्रांगण में आयोजित विजय वर्मा कथा सम्मान तथा हेमंत स्मृति कविता सम्मान समारोह में व्यक्त किया। वर्ष २००९ के लिए कथाकार श्री. योगेंद्र आहुजा(दिल्ली) को उनकी कथा संग्रह अंधेरे में हँसी के लिए विजय वर्मा कथा सम्मान और ग़ज़लकार श्री. आलोक श्रीवास्तव को उनकी ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' के लिए हेमंत स्मृति कविता सम्मान से सम्मानित किया गया। दोनों पुरस्कृत रचनाओं पर नामवर सिंह ने कहा कि इन पुस्तकों पर मौखिक टिप्पणी इनके उच्च साहित्यिक स्तर के साथ अन्याय होगा अतः मैं इन रचनाओं पर समीक्षा लिखूँगा। उन्होंने कहा कि दुष्यंत के बाद हिंदी जगत में जो एक निराशा और खालीपन की पूर्ति आमीन के आलोक ने बहुत हद तक दूर कर दिया है। यह पुस्तक अपना एक विशिष्ट स्थान बना चुका है। पुरस्कत रचनाकारों को स्मृति चिन्ह, शॉल, पुष्पगुच्छ व पाँच हज़ार रुपए की राशि देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ सभी उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों द्वारा द्वीप प्रज्ज्वलन व माँ सरस्वती की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। तत्पश्चात प्रारंभ हुए कार्यक्रमों में सर्वप्रथम स्वागताध्यक्ष विनोद टीबड़ेवाला ने सभी आगंतुकों का स्वागत कर पुरस्कार वितरण में श्री. झाबरमल डीबड़ेवाला विश्वविद्यालय, झंझनूँ द्वारा योगदान दिए जाने की प्रतिबद्धता की बात कही। हेमंत फाउंडेशन के महासचिव प्रख्यात कवि पत्रकार आलोक भट्टाचार्य ने पुरस्कारों के चयन की पूरी प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया कि किस तरह अंततः इन दो विजेताओं का निष्पक्ष चयन संभव हो पाया। ट्रस्ट की प्रबंध न्यासी, कथा लेखिका संतोष श्रीवास्तव ने अपने व्यक्तव्य में ट्रस्ट का परिचय देते हुए दोनों सम्मानित रचनाकारों के लिए कहा कि योगेंद्र आहूजा की कहानियाँ निराशा में अंधकार को चीरकर खुशियों की तलाश कराती हैं और आलोक श्रीवास्तव की ग़ज़लें इस छंदमुक्त माहौल में छंद के प्रति मोह जगाती हैं। उन्होंने अगले वर्ष से फाउंडेशन द्वारा पत्रकारिता पर एक नए पुरस्कार 'गुलाब मदनमोहन वर्मा पत्रकारिता पुरस्कार' की घोषणा भी की। इसके बाद पुरस्कृत रचनाओं से कुछ चुनिंदा अंशों के मंच पर प्रस्तुतीकरण के क्रम में सबसे पहले आकाशवाणी के जाने-माने उद्घोषक आनंद सिंह द्वारा 'अंधेरे में हँसी' कहानी संग्रह से 'कुश्ती' नाटक का पाठ किया गया। गायिका लता सिन्हा द्वारा ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' से 'मोहब्बत' ग़ज़ल का गायन किया गया। कार्यक्रम के दौरान देवी नागरानी द्वारा स्व. हेमंत की रचना 'मेरे रहते' का परिचय दिया गया। साथ ही उन्होंने 'मेरे रहते' संग्रह से एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर मंच व श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

ख्यात पत्रकार व लेखिका तथा ट्रस्ट की सचिव प्रमिला वर्मा ने आलोक श्रीवास्तव की 'आमीन' पर दिल्ली के जानकीप्रसाद शर्मा द्वारा लिखित परचियात्मक समीक्षा का पाठ किया। 'अंधेरे में हँसी' कहानी संग्रह का परिचय ओमा शर्मा ने दिया। पुरस्कृत लेखक योगेंद्र आहूजा ने अपने व्यक्तत्व में कहा कि कोई लेखक कोरे काग़ज़ का सामना करते हुए वाक्य बनाकर व विराम चिन्हों का प्रयोग कर आकांक्षाओं व भावनाओं को उकेरता है परंतु वर्तमान समय में शब्द की सत्ता पर बाहरी व भीतरी दोनों खतरे बढ़ रहे हैं। ऐसे में उत्सवधर्मिता व उत्तेजना से दूर रहकर अच्छे साहित्य का सृजन महती आवश्यकता है, जिसे हम सभी लेखकों को समझना होगा। ग़ज़ल संग्रह 'आमीन' के कवि आलोक श्रीवास्तव ने अपने व्यक्तव्य को काव्यात्मक रूप देते हुए वर्तमान लेखन के संदर्भ में टिप्पणी करते हुए कहा कि ''करोगे याद तो हर बात याद आएगी, पर अब तो बातों को भुलाने की भी कीमत मिलती है।''

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रसिद्ध नाटककार व फिल्मकार सागर सरहदी ने अपने भाषण में कहा कि असल मुद्दों की परख करके सच्चाई को सामने लाना किसी लेखक का मूल प्रयास होना चाहिए। साथ ही एक आंदोलन चलाकर पत्रकारों को मुंशी प्रेमचंद व निराला की तरह नई चेतना का संचार करना चाहिए। कार्यक्रम के समाप्ति की ओर बढ़ने से पहले स्वागताध्यक्ष विनोद टीबड़ेवाला ने घोषणा की कि अगले वर्ष से पुरस्कारों की श्रेणियाँ बढ़ा दी जाएँगी और साथ ही पुरस्कार राशि पाँच गुना बढ़ाकर पचीस हज़ार कर दी जाएँगी।

कार्यक्रम के दौरान कई गणमान्य लेखक और साहित्यकार उपस्थित रहे इनमें प्रमुख रूप से राजस्थानी सेवा संघ के जनसंचार संस्थान के निदेशक विनोद तिवारी, दादासाहेब फालके पुरस्कार विजेता सुरेंद्र श्रीवास्तव, टी.वी. कलाकार बृजभूषण साहनी, शंभुनाथ यादव, अनूप सेठी, ह्रदयेश मयंक, सुमंत मिश्र, दिव्या जैन, सुमन आहूजा, धीरेंद्र अस्थाना, शुलभा कोरे, मिलिंद जोशी, मनीषा जोशी, विजय कुमार जैन, दिलीप गुप्ता, विजयसिंह आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम में भड़गका कॉलेज की प्राचार्या श्रीमती वालेचा व पत्रकार ओमप्रकाश सिंह का विशेष योगदान रहा। कार्यक्रम का सफल संचालन कवि पत्रकार आलोक भट्टाचार्य ने किया और अतिथियों का आभार सोनू पाहूजा ने व्यक्त किया

ओमप्रकाश सिंह
प्रचार प्रभारी

अभिव्यंजना द्वारा आकांक्षा यादव को ''काव्य-कुमुद'' सम्मान


कानपुर की चर्चित साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्था ''अभिव्यंजना'' द्वारा युवा कवयित्री एवं साहित्यकार श्रीमती आकांक्षा यादव को हिंदी साहित्य में सृजनात्मक योगदान एवं काव्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवा के लिए ''काव्य-कुमुद'' की उपाधि से सम्मानित क्या गया है। देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं एवं अंतर्जाल पर प्रकाशित होने वाली श्रीमती आकांक्षा यादव वर्तमान में राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, नरवल, कानपुर में प्रवक्ता है। नारी विमर्श, बाल विमर्श एवं सामाजिक सरोकारों संबंधी विमर्श में विशेष रुचि रखने वाली श्रीमती आकांक्षा यादव को इससे पूर्व भी विभिन्न साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। हाल ही में आपको राष्ट्रीय राजभाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा ''भारती ज्योति'', मध्य प्रदेश नवलेखन संघ द्वारा ''साहित्य मनीषी सम्मान'', छत्तीसगढ़ शिक्षक-साहित्यकार मंच द्वारा ''साहित्य सेवा सम्मान'', ग्वालियर साहित्य एवं कला परिषद द्वारा ''शब्द माधुरी'' एवं भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा ''वीरांगना सावित्रीबाई फुले फेलोशिप सम्मान'' से सम्मानित किया गया है।

उमेश्वर दत्त 'निशीथ'
संयोजक- अभिव्यंजना
सी-३२९, कैलाश विहार, कल्यानपुर, कानपुर

प्रेम जनमेजय को व्यंग्यश्री सम्मान


'आधुनिक जीवन विसंगतियों से भरा हुआ है और बाज़ारवाद ने तो हमारे जीवन की स्वाभाविकता को नष्ट कर दिया है। व्यंग्यकार अपने समय का समीक्षक होता है इस कारण समाज में उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। व्यंग्यकार का कर्म मनोरंजन करना कतई नहीं है, उसका कर्म तो ऐसी रचना का सृजन करना है जो सोचने का बाध्य करे। प्रेम जनमेजय अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यंग्य की इसी भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। उनकी रचनाओं में विनोद नहीं है अपितु विसंगतियों को लक्षित कर एक संवेदनशील रचनाकार की उभरी पीड़ा है।' यह उद्गार प्रख्यात आलोचिका डॉ. निर्मला जैन ने, प्रतिष्ठित व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय को तेरहवें व्यंग्यश्री सम्मान से सम्मनित किए जाने पर, अपने अध्यक्षीय भाषण में अभिव्यक्त किए गए। व्यंग्य-विनोद के शीर्षस्थ रचनाकार पं. गोपालप्रसाद व्यास के संबंध में डॉ. जैन ने कहा कि व्यास जी ने उर्दू के गढ़ दिल्ली में हिंदी का अलख जमाया। गोपालप्रसाद व्यास के जन्मदिन पर प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस व्यंग्य विनोद दिवस का इस बार का विशेष आकर्षण उनकी प्रिय पुत्री डॉ. रत्ना कौशिक के निर्देशन में निर्मित वेबसाईट के शुभारंभ का था। इस वेबसाईट के निर्माण की सभी वक्ताओं ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

प्रेम जनमेजय ने सम्मान को ससम्मान ग्रहण करते हुए कहा- यदि लेखक का लक्ष्य पुरस्कार है तो यह एक ऐसा लाक्षागृह है जिसमें से उसे कोई कृष्ण भी नहीं निकाल सकता है। १८ मार्च १९४९ को जन्में डॉ. प्रेम जनमेजय की अब तक नौ व्यंग्य कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। वे 'व्यंग्य यात्रा' पत्रिका संपादक हैं। इस अवसर पर श्रीलाल शुक्ल पर केंद्रित 'व्यंग्य यात्रा' के अंक का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने अपनी व्यंग्यात्मक उक्तियों एवं हिंदी व्यंग्य की स्थिति को स्पष्ट तो किया ही साथ में पं. गोपालप्रसाद व्यास की रचनाशीलता और प्रेम जनमेजय की विशिष्ट रचनात्मकता की चर्चा की। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने सामयिक लेखन पर व्यंग्य करते हुए कहा कि आज का रचनाकार टखने तक के पानी में तैरने की प्रतियोगिता का खेल खेल रहा है। उन्होंने कहा कि प्रेम जनमेजय ने सतत व्यंग्य-लेखन तो किया ही है पर उससे बड़ा काम 'व्यंग्य यात्रा' का कुशल संपादन एवं प्रकाशन कर के किया है।

समारोह के आरंभ में हिंदी भवन के मंत्री प्रख्यात कवि डॉ. गोविंद व्यास ने अपने स्वागत भाषण में व्यंग्यश्री सम्मान की पारदर्शी प्रक्रिया की चर्चा करते हुए कहा कि हमारा प्रयत्न रहा है कि इस सम्मान की प्रतिष्ठा पर आँच न आए। उन्होंनें गोपालप्रसाद व्यास के हास्य व्यंग्य साहित्य का अभूतपूर्व योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि उनसे मिले संस्कारों का ही परिणाम है कि हिंदी भवन की प्रतिष्ठा दिनों दिन बढ़ रही है। हिंदी भवन के अध्यक्ष त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने आशीर्वचन देते हुए व्यास जी के योगदान का स्मरण किया और प्रेम जनमेजय को उनके उत्कृष्ट व्यंग्य लेखन के लिए बधाई दी। उन्होंनें पं. गोपालप्रसाद व्यास के विशिष्ट रचनात्मक योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि उनपर निर्मित वेबसाईट इस महान रचनाकार के अनेक आयाम उद्घाटित करेगी। इस अवसर पर खचाखच भरे हॉल में राजधानी के अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकार उपस्थित थे।

प्रस्तुतिः देवराजेंद्र

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में निराला जयंती आयोजित


हैदराबाद , २ फरवरी, वसंत पंचमी के अवसर पर दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में महाप्राण निराला की ११३ वीं जयंती मनाई गई तथा ''वसंत पंचमी - निराला जयन्ती व्याख्यानमाला'' का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने की। सरस्वती पूजन और ''वर दे वीणावादिनी'' के गायन के साथ कार्यक्रम आरम्भ हुआ। आंध्र - सभा के सचिव के. विजयन ने अतिथियों का स्वागत किया. पीएच. डी. शोधार्थी अंजली मेहता और अर्पणा दीप्ति ने निराला के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला तथा अखिलेश हठीला ने निराला की कविताओं का वाचन किया। डॉ. बलविंदर कौर ने अतिथि व्याख्यानकर्ताओं का परिचय दिया। उद्घाटन भाषण करते हुए 'स्वतंत्र वार्ता' के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ला ने वसंत पंचमी को सरस्वती के जन्मदिन के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि की सृजनशीलता की शक्ति की आराधना का उत्सव मानते हुए यह स्पष्ट किया कि सर्जना की आराधना में सत्य, शिव और सुंदर की साधना निहित है और प्रेम इसका आधारतत्व है। उन्होंने सरस्वती के मिथकीय स्वरुप की व्याख्या करते हुए कहा कि विचार-रूप में सरस्वती विधाता की संगिनी अर्थात पत्नी है तथा रचना अथवा सृष्टि-रूप में पुत्री भी है, उन्होंने निराला को स्रष्टा और सृष्टि की विराट और उदात्त संभावनाओं को व्यक्त करने वाले कवि के रूप में भारतीय कविता के गौरव की संज्ञा दी।

इस अवसर पर ''महाप्राण निराला की सर्जनात्मकता'' की व्याख्या करते हुए मुख्यवक्ता डॉ. कविता वाचक्नवी ने कहा कि निराला आधुनिक हिन्दी कविता के शीर्ष पुरुष और विरल कवि हैं। प्रकृति, प्रेम, प्रगति और पौरुष को निराला के साहित्य के मूलबिंदु बताते हुए उन्होंने निराला को व्यक्तिगत लगाव और हुंकार के ऐसे कवि बताया जिनकी बहु-आयामी और विलक्षण रचनाशीलता निरंतर मौलिक चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है.निराला की रचनाओं को प्रतिभा के विस्फोट का प्रतीक मानते हुए डॉ.कविता ने कहा कि उन्हें किसी एक विचारधारा तक सीमित करना उचित नहीं है, बल्कि उनका पाठ-विश्लेषण नई-पुरानी आलोचना दृष्टियों से करने पर ही सरोकार की व्यापकता और विश्व-दृष्टि की विराटता को समझा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि डॉ. कविता वाचक्नवी ने ''हिन्दुस्तानी एकेडेमी'' द्वारा प्रकाशित अपनी शोधपूर्ण कृति ''समाज भाषाविज्ञान : रंग शब्दावली : निराला काव्य'' में निराला की काव्य भाषा का समाज भाषावैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन करते हुए रंग-शब्दावली के आधार पर उनकी काव्य-चेतना का विश्लेषण किया है। अध्यक्षासन से संबोधित करते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने निराला की रचनाओं में निहित उदात्त-तत्त्व पर प्रकाश डालने के साथ-साथ ''जागो फिर एक बार'' जैसी कविताओं की कालजयी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। इस अवसर पर चंद्रमौलेश्वर प्रसाद, डॉ.जी. नीरजा, डॉ.मृत्युंजय सिंह तथा भगवंत गौड़र भी मंचासीन थे।

संस्थान के पीएच डी, एम.फिल., एम.ए., अनुवाद और पत्रकारिता पाठ्यक्रम के जिन छात्रों, शोधार्थियों और प्रतिभागियों ने चर्चा -परिचर्चा द्वारा प्रश्नोत्तर सत्र को जीवंत बनाया उनमें डॉ. शक्ति कुमार द्विवेदी, डॉ.सुषमा देवी, डॉ.बी. बालाजी, शिव कुमार राजौरिया, श्रद्धा तिवारी, कैलाशवती, सलमा कौसर, रीना झा, पी ज्योति, वंदना पाटिल, ,पुष्प कुमारी, निशा सोनी, वेंकट रमन, अशोक तिवारी, एस वंदना, सीमा मिश्रा, गणाचारी श्रीनिवास राव, आकाश, राजेंद्र गौड़, मुहम्मद कुतुबुद्दीन, पूनम पंवार, के नागेश्वर राव, प्रियंका रथ, राम कृष्ण, अनुराधा पाण्डेय और रेखा के नाम उल्लेखनीय हैं। शिव कुमार राजौरिया ने धन्यवाद प्रकट किया।

गोवा में बहुभाषिक कविसम्मेलन आयोजित


गोवा की प्रसिद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था इंस्टिट्यूट मिनेझिस ब्रागान्झा (पणजी) के तत्वावधान में भारतीय गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में पणजी स्थित आर्ट गैलरी सभागृह में ''बहुभाषिक कवि सम्मलेन'' आयोजित किया गया। कवि सम्मलेन की अध्यक्षता वरिष्ठ कोंकणी साहित्यकार रमेश भगवंत वेलुस्कर ने की तथा संचालन संस्थान के सचिव अशोक परब ने किया।

इस अवसर पर डॉ.ऋषभ देव शर्मा और लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने हिन्दी, प्रमोद जोशी और प्रवीण बांदेकर ने मराठी, फिलोमिना सानफ्रांसिस्को और एंड्रू डिकुन्हा ने कोंकणी, डॉ. उषा उपाध्याय ने गुजराती, डॉ. एन. गोपी ने तेलुगु तथा सावित्री राजीवन ने मलयालम भाषा में काव्य-पाठ किया। कार्यक्रम की विशेष उपलब्धि यह रही कि सभी हिंदीतर भाषी कवियों ने अपनी मातृभाषा में पठित कविताओं के हिन्दी-काव्यानुवाद का भी वाचन किया जिसकी श्रोताओं ने भूरि-भूरि प्रशंसा की।

इस अवसर पर विख्यात तेलुगु कवि प्रो. एन. गोपी की गोवा -प्रवास के दौरान रचित तेलुगु काव्यकृति के हिन्दी अनुवाद ''समुद्र, मैं और गोवा'' का लोकार्पण भी संपन्न हुआ। आर शांता सुन्दरी द्वारा अनूदित इस पुस्तक का लोकार्पण समारोह के अध्यक्ष रमेश भगवंत वेलुस्कर ने किया तथा रचनाकार ने प्रथम प्रति गोवा के प्रमुख शिक्षाविद मोहन दास सुर्लेकर को समर्पित की।

(चित्र-परिचय : गोवा में संपन्न बहुभाषिक कवि-सम्मलेन के अवसर पर) (प्रथम पंक्ति में)- सावित्री राजीवन, फिलोमिना सानफ्रांसिस्को, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, ऋषभ देव शर्मा, रमेश भगवंत वेलुस्कर तथा मोहनदास सुर्लेकर, (द्वितीय पंक्ति में)- प्रमोद जोशी, प्रवीण बांदेकर, एंड्रू डिकुन्हा तथा अशोक परब इनसेट में डॉ. एन. गोपी की काव्यकृति ''समुद्र, मैं और गोवा'' का लोकार्पण करते हुए कोंकणी कवि रमेश भगवंत वेलुस्कर