मंगलवार, 27 मार्च 2012

यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी, स्पेन- 2012

वय्यादोलिद के विश्वविद्यालय एशियन स्टडीज़ ने भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के सौजन्य से वय्यादोलिद, स्पेन में १५,१६-१७ मार्च,२०१२ को “विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया। इस संगोष्ठी का मूल उद्देश्य यूरोप के विभिन्न देशों में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण पर दृष्टिपात करना था। संगोष्ठी में भारत सहित २१ देशों के ३३ प्रतिष्ठित विद्वान सम्मिलित हुए। जिन्होंने हिन्दी के विश्व रूप पर प्रकाश डालते हुए हिन्दी अध्ययन और अध्यापन से संबंधित समस्याओं और उनके निदान पर चर्चा की।

उद्घाटन सत्र

संगोष्ठी का उद्घाटन वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के उपकुलपति, स्पेन में भारत के राजदूत, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय की डिप्टी डीन, कासा दे ला इंडिया के निदेशक तथा संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से किया गया। तदुरांत भारत सरकार के विदेश मंत्री महोदय श्री एस.एम. कृष्णा का संदेश पढ़ा गया। विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो.मार्कोस साक्रिस्तान ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि प्रागैतिहासिक काल से ही वय्यादोलिद शहर तथा विश्वविद्यालय पर एशिया का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। इन देशों की संस्कृति के प्रभाव से वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में एशियाई अध्ययन की परम्परा का सूत्रपात हुआ। वर्ष २००० में एशियन स्टडीज़ सेंटर की स्थापना हुई। इस आयोजन के लिये भारतीय दूतावास माद्रिद और कासा दे ला इंडिया का सहयोग सराहनीय रहा।

वय्यादोलिद विश्वविद्यालय भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सहयोग से भारतीय अध्ययन में एक स्नातकोत्तर डिग्री आरम्भ करने जा रहा है, जो क्रियान्वयन के अंतिम चरण में है। हिन्दी भाषा के अध्यापन की दिशा में भी वय्यादोलिद विश्वविद्यालय अग्रणीय है। वर्ष २००४ में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सहयोग से वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में विभिन्न स्तरों पर हिन्दी भाषा का अध्यापन शुरू हुआ। इस केन्द्र में प्राचीन तथा आधुनिक भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा सामाजिक पक्षों के बारे में कई संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है।

भारत तथा स्पेन के मध्य सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ाने के लिए वर्ष २००३ में स्पेन में वय्यादोलिद की नगर परिषद, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय तथा भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के सौजन्य से कासा दे ला इंडिया की स्थापना की गई, जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों का आयोजन किया जाता है। स्पेन तथा भारत के संबंध द्रुत गति से बढ़ रहे हैं और यह विकास शैक्षिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग में दिखाई देने लगा है।

स्पेन में भारतीय राजदूत महोदय श्री सुनील लाल ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने भाषण में हिंदी की संपन्न परंपरा का ज़िक्र करते हुए बताया कि अन्य भारतीय भाषाओं के संपर्क में आने के कारण हिंदी स्वयं लाभान्वित हुई है तथा उसने उन्हें भी लाभान्वित किया है। भारत की २२ स्वीकृत भाषाएँ उसकी बहुभाषिकता स्थिति को द्योदित करती हैं तथा राजभाषा के माध्यम से भारत की अनेकता में एकता परिलक्षित होती है। विश्व का सबसे बड़ा प्रजातंत्र भारतवर्ष २०५० तक सबसे बड़ी अर्थ व्यवस्था के रूप में उभरेगा और अन्तर्राष्ट्रीय कार्य बल में महत्वपूर्ण भारतीय साझेदारी के कारण हिंदी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित होगी। उन्होंने संगोष्ठी की सफलता के लिए शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि इस संगोष्ठी में सम्मिलित सभी विद्वान योरोप में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण को और प्रभावी बनाने के तरीकों पर विचार विमर्श करेंगे और अध्यापन में भाषा के साथ भारत की संस्कृति और दर्शन का भी समन्वय करेंगे।

प्रो. उदय नारायण सिंह ने ‘नया शतक नई दिशा - भारतीय भाषाओँ के शिक्षण की समस्याएँ और संभावनाएँ’ विषय पर अपना बीज वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भाषा की अपनी पहचान होती है और उनके पठन पाठन की अपनी समस्याएँ होती हैं। भारतीय बहुभाषिकता के वातावरण में हिंदी पर अन्य भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। अंग्रेज़ी, स्थानीय भाषाएँ और बोलियां हिंदी की शब्दावली और अक्सर संरचना को भी प्रभावित करती हैं। हिंदी के विदेशी अध्येताओं को इसका ज्ञान अवश्य देना चाहिए। उन्हें भारतीय व्यवहार की स्थिति से अवगत कराना आवश्यक है। हिंदी एक ओर मानक हिंदी है, जो साहित्य में व्यवहृत होती है तो दूसरी ओर बोलचाल की मिश्र हिंदी है, जिसका प्रयोग आम जनता करती है और उसे टेलिविज़न पर भी देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह समझना आवश्यक है कि हिंदी एक भाषा संसार का नाम है, सीमित क्षेत्र का वाचिक संप्रेक्षण माध्यम मात्र नहीं। हिंदी भाषा शिक्षण के क्षेत्र में सम्प्रति हमारे समक्ष अनेक प्रकार की चुनौतियाँ हैं, जिसके लिए हमें कुछ अनोखे और असाधारण ढंग से सोचने विचारने की आवश्यकता है। बीज भाषण के उपरांत संगोष्ठी के शैक्षिक निदेशक प्रोफ़ेसर श्रीश चंद्र जैसवाल ने संगोष्ठी के आयोजकों की ओर से सर्वप्रथम भारत सरकार के विदेश मंत्री महोदय का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी शुभकामनाएँ हमारे इस शैक्षिक अनुष्ठान को सफलता पूर्वक संपन्न कर पाने में अत्यंत सहायक होंगी. उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रशासन एवं हिंदी विभाग को उनके सकारात्मक रवैये और उदार अनुदान के लिए आभार व्यक्त किया।
  
वय्यादोलिद विश्वविद्यालय के रैक्टर प्रो. मार्कोस साक्रिस्तान, वाइस रैक्टर प्रो.लुईस सांतोस,एशियन स्टडीज़ सेंटर के प्रो. ऑस्कर रामोस्त था उनके सहयोगियों ने संगोष्ठी के आदि से अंत तक पूर्ण सहयोग दिया, कासा दे ला इंडिया के निदेशक डॉ गियर्मो तथा उनके सहयोगियों के परिश्रम और संपर्कों के बिना इस संगोष्ठी का आयोजन असंभव था, इन सभी अधिकारियों को धन्यवाद देने के उपरांत उन्होंने पूर्व भारतीय राजदूत सुश्री सुजाता मेहता तथा नए राजदूत श्रद्धेय सुनील लाल, काउंसलर श्री बिराजा प्रसाद, सांस्कृतिक सचिव श्रीमती पोलोमी त्रिपाठी तथा काउंसलर श्री पिल्लै का के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उक्त सभी अधिकारियों के निरंतर सहयोग और दिशा निर्देशन संगोष्ठी के लिए नितान्त आवश्यक थे। अंत में प्रो .जैसवाल ने संगोष्ठी में २१ देशों से आये हुए सभी गणमान्य प्रतिभागियों का हार्दिक धन्यवाद किया, जिनमें विश्व हिंदी सचिवालय की महासचिव श्रीमती पूनम जुनेजा, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति श्री विभूति नारायण राय, केन्द्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा के उपाध्यक्ष और विश्व प्रसिद्ध कवि श्री अशोक चक्रधर, विश्वभारती शान्तिनिकेतन के प्रोवाइस चांसलर प्रो. उदय नारायण सिंह, टेक्सस विश्वविद्यालय के एमरेटस प्रोफ़ेसर हर्मन ओल्फेन सम्मिलित थे. उन्होंने सभी प्रतिभागियों से आगामी सत्रों में सार्थक सहयोग की कामना की, जिससे स्पेन में आयोजित हिंदी की पहली संगोष्ठी को सफल बनाया जा सके।

प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्चिमी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’

संगोष्ठी के प्रथम शैक्षिक सत्र ‘पश्चिमी तथा मध्य यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ की अध्यक्षता प्रो. हर्मन वैन ऑल्फ़ेन ने की। इस सत्र में छह आलेख पढ़े गए। न्यू यूनिवर्सिटी, लिस्बन के प्रो. अफज़ाल अहमद ने पुर्तगाल में हिन्दी शिक्षण का इतिहास बताते हुए आग्रह किया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के ज्ञान के साथ साथ भारत की विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्टता का ज्ञान भी कराया जाना चाहिए। विएना विश्वविद्यालय की अलका चुडाल ने विएना में हिन्दी शिक्षण का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सामने रखा तथा वर्तमान पाठ्यक्रम की पूरी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वहाँ के विद्यार्थी योग, शास्त्रीय संगीत और भारतीय नृत्य से आकर्षित होकर बारीकी से उन्हें समझने के लिए हिन्दी पढ़ते हैं। तोरीनो विश्वविद्यालय की आलेस्सान्द्रा ने इटली में हिन्दी शिक्षण की जानकारी देते हुए इस तथ्य पर बल दिया कि विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से भारतीय संस्कृति में प्रवेश मिल जाता है। उन्होंने बताया कि इटली के व्यापारिक निगमों में हिन्दी का ज्ञान रखने वाले विद्यार्थियों को रोज़गार के अवसर भी मिल रहे हैं। यॉर्क विश्वविद्यालय के महेंद्र किशोर वर्मा ने मानक हिन्दी और/या प्रामाणिक हिन्दी पर अपने आलेख में पाठ्य सामग्री चयन और पाठ्य सामग्री की रचना के विषय से संबंधित बिंदुओं पर प्रकाश डाला। उनके अनुसार भारत में हिन्दी के बदलते स्वरूप को ध्यान में रखते हुए मानक हिन्दी तथा प्रामाणिक हिन्दी के महत्व की व्याख्या की जानी चाहिए। घेंट विश्वविद्यालय, बेल्जियम से आए रमेश चन्द्र शर्मा ने आग्रह किया कि हमें यूरोप के विश्वविद्यालयों में हिन्दी का एक सामाजिक वातावरण तैयार करना चाहिए, जिसमें एक ओर हिन्दी का भाषा वैज्ञानिक आधार हो दूसरी ओर उसका एक सामाजिक आधार हो। उन्होंने एक ऐसे पाठ्यक्रम की आवश्यकता व्यक्त की, जो शब्द और संस्कृति दोनों का ज्ञान दे सके।  कासा एसिया, माद्रिद की शेफ़ाली वर्मा ने स्पेन में हिंदी के अध्येताओं के समक्ष आनेवाली व्यावहारिक कठिनाइयाँ रखीं और उनके समाधान के लिए आग्रह किया। कुल मिलाकर यह सत्र हिन्दी से आत्मीय रिश्ता जोड़ने की आकांक्षा से युक्त सत्र रहा।

द्वितीय शैक्षिक सत्र भाषा प्रौद्योगिकी और हिंदी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग

‘भाषा प्रौद्योगिकी और हिंदी शिक्षण में उसका अनुप्रयोग’ विषय पर आधारित दूसरे शैक्षिक सत्र के अध्यक्ष थे प्रो.अशोक चक्रधर। इस सत्र के प्रारंभ में श्रीश जैसवाल ने हिन्दी के प्रचार प्रसार में अध्ययन – अध्यापन तथा उसे विश्व भाषा के रूप में स्थापित करने के लिए कम्प्यूटर के अनुप्रयोग पर बल दिया। अशोक चक्रधर ने कहा कि हिन्दी के प्रगामी प्रयोग के लिए भारत सरकार और विभिन्न संस्थानों को ही उत्तरदायी न माना जाए, वरन व्यक्तिगत स्तर पर इसके लिए प्रयास किए जाएँ। अपनी रोचक और प्रभावी पावर पौइन्ट प्रस्तुति के माध्यम से उन्होंने कंप्यूटर पर उपलब्ध आधुनिकतम अनुप्रयोग दिखाए, जो हिन्दी शिक्षण के लिए नितांत उपयोगी हैं। हिन्दी के मानकीकरण के संबंध में सभी के प्रयासों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अशुद्धियों को छोड़कर प्रबुद्धि पर ध्यान देना चाहिए। गेनादी श्लोम्पर ने हिन्दी पाठ्य सामग्री निर्माण में टेलिविज़न व रेडियो आदि के महत्व पर प्रकाश डाला। टी.वी. समाचार के आधार पर हिन्दी शिक्षण सामग्री तैयार करते हुए उन्होंने चुनाव, सामाजिक आंदोलन, अन्तर्राष्ट्रीय संबंध, खेलकूद आदि विषयक समाचारों को तथा भाषा की रोचकता और सुग्राह्यता को महत्व दिया। प्रो. हर्मन वैन ऑल्फेन ने बताया कि अमेरिका में हिन्दी शिक्षण संबंधी इतिहास का परिचय देते हुए कहा कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की संख्या में वृद्धि होने के कारण १९८५ के बाद वहाँ हिन्दी शिक्षण का तेज़ी से प्रसार हुआ। उन्होंने पिछले पचास वर्षों में हिन्दी भाषा शिक्षण में प्राद्योगिकी के प्रयोग का वर्णन करते हुए आधुनिक युग में उसकी उपयोगिता और नवीनतम विकासों के अनुप्रयोग पर बल दिया। ऐश्वर्ज कुमार ने बताया कि यूरोपीय आर्थिक मंदी हिन्दी के पठन पठान पर प्रभाव डाल रही है। हिन्दी के प्रति खुद हिन्दी भाषियों या भारतीयों की सोच मौजूदा स्थिति की जिम्मेदार है। इस मानसिकता को बदलना होगा । कविता वाचक्नवी ने भाषा प्रकार्यों के अधुनातन सन्दर्भ और हिन्दी विषय पर अपनी प्रस्तुति दी। उन्होंने वैश्वीकरण के सकारात्मक पक्षों के ऊपर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि हिन्दी विश्व में दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, किन्तु इंटरनेट आदि माध्यमों के प्रयोग में अन्य भाषाभाषियों से काफ़ी पीछे हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा समाज के लिए उपलब्ध सॉफ्टवेयर की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि तकनीकी दृष्टि से हिन्दी को कंप्यूटर की चुनौती व प्रयोक्ता – सापेक्ष होने की यात्रा में बहुत आगे जाना अभी शेष है।

तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’
तृतीय शैक्षिक सत्र ‘शेष यूरोप में हिन्दी शिक्षण : वर्तमान परिदृश्य’ पर केंद्रित था. इस सत्र की अध्यक्षता प्रो.मोहन कान्त गौतम ने की। इस सत्र के पहले वक्तव्य में स्लोवेनिया विश्वविद्यालय के अरुण मिश्र ने अपने विश्वविद्यालय में हिन्दी अध्यापन की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि वहाँ के विद्यार्थियों को व्याकरण आदि विषयों के साथ साथ भारतीय संस्कृति का भी ज्ञान दिया जाता है। शीघ्र ही वहाँ भारतीय अध्ययन प्रकोष्ठ को वैधानिक मान्यता मिलेगी और उसके साथ ही हिन्दी शिक्षण में तीव्र गति से प्रगति होगी। बिल्जाना ज्रनिक ने ज़ाग्रेव विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण और हिंदी विभाग की अन्य गतिविधियों पर प्रकाश डालते हुए अपने विद्यार्थियों की भाषा अधिगम सम्बन्धी समस्याएँ सामने रखीं तथा यह भी बताया कि वे कैसे उनका निदान करती हैं। दानूता स्तासिक ने वारसा विश्वविद्यालय में हिन्दी के नियमित अध्ययन- अध्यापन की चर्चा करते हुए बताया कि अब तक ९० विद्यार्थियों को हिन्दी एम.ए. की डिग्री मिल चुकी है। उन्होंने कहा कि हिन्दी हमारा भरण पोषण करते हुए भूमंडलीकृत दुनिया में अपनी पहचान को भी स्थापित करने में सहायता देती है। हैंज़ वर्नर वेसलर ने उप्साला विश्वविद्यालय, स्वीडन में हिन्दी व संस्कृत के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि वहाँ हिन्दी शिक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है। वहाँ के विद्यार्थियों में हिंदी मीडिया में अधिक दिलचस्पी है ।  इंदिरा गाज़िएवा ने रूसी सरकारी मानविकी विश्वविद्यालय में हिन्दी शिक्षण का चित्र उपस्थित करते हुए अध्यापन में आने वाली कठिनाइयों का ज़िक्र किया। मॉस्को विश्वविद्यालय रूस की ल्युदमीला खोख्लोवा ने बताया कि साम्यवादी काल में विद्यार्थियों को हिन्दी के माध्यम से पार्टी साहित्य पढ़ाया जाता था, लेकिन रूस के पुनर्गठन के बाद हिन्दी शिक्षण पद्धति बदल गई। विद्यार्थियों की भारतीय संस्कृति. धर्म में बहुत जिज्ञासा है और उनके अनुसार उनके विश्वविद्यालय में हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है। बुखारा विश्वविद्यालय रूमानिया की सबीना पोपर्लान ने बताया के वहाँ भारतीय दर्शन और चिंतन के अध्ययन की एक परंपरा रही है। उनके विश्वविद्यालय में भारतीय संस्कृति पर कई किताबें लिखी गई हैं। ज़्यादातर शोध कार्य भाषा विज्ञान से संबंधित होता है। एल्ते विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट की विजया सती ने कहा कि हंगरी में तीन वर्षों का इंडोलॉजी अध्ययन कराया जाता है। यहाँ का मूल उद्देश्य संवाद है, जिसके माध्यम से संस्कृति और हिन्दी की जानकारी भी दी जाती है, भारतीय संस्कृति से जुड़े उपादानों का परिचय भी दिया जाता है। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश की जाती है। मोहन कान्त गौतम ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि हिन्दी के विकास की प्रक्रियाओं को हमें देखना है। हम इस क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए मीडिया का उपयोग कर सकते हैं। हिन्दी को रोज़गारपरक बनाने की कोशिश होनी चाहिए। इससे हमारे यूरोपीय विद्यार्थी हिन्दी का प्रयोग अपने रोज़गार के लिए कर सकते हैं। हिंदी भाषा का व्यावहारिक रूप अपनाना अधिक उपयुक्त है।

चतुर्थ शैक्षिक सत्र ‘हिन्दी शिक्षण तथा पाठ्यक्रम संबंधी समस्याएँ तथा समाधान’

संगोष्ठी का श्री विभूति नारायण राय की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। सत्र के प्रारंभ में वर्धा विश्वविद्यालय के जगन्नाथन ने हिन्दी की दो प्रमुख समस्याओं – संदर्भानुसार उपयुक्त पाठ्यक्रमों व सन्दर्भ ग्रंथों की कमी और भाषा व भाषा शिक्षण दोनों ही क्षेत्रों में मानकीकरण के अभाव को सामने रखा। उन्होंने लचीले, समस्तरीय और गुणता वाले पाठ्यक्रम के निर्माण पर बल दिया, जिसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जा सके और जो घटत्व के सिद्धांत का पालन करे। इस प्रकार सभी शैक्षिक संस्थाएँ मानकीकरण के मंच पर एकत्र होकर देश विदेश के विद्वानों द्वारा निर्मित पाठ्य सामग्री का लाभ ले सकेंगी। जे.एन.यू. दिल्ली की वैश्ना नारंग ने विदेशी भाषा के शिक्षण और भाषा को दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाने के पक्षों के भेद उभारने का प्रयास किया। उन्होंने यूरोपीय सन्दर्भों में हिन्दी भाषा अध्ययन –अध्यापन प्रक्रिया के आधार पर हुए विदेशी भाषा अधिगम के अंतर्गत संज्ञान प्रक्रिया को स्पष्ट किया। वारसा विश्वविद्यालय के कैलाश नारायण तिवारी ने हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ाने के लिए विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों की विभिन्नता को समाप्त करते हुए एक उच्च स्तरीय मानक पाठ्यक्रम के निर्माण की बात कही, जिसमें उन्होंने भारतीय तथा विदेशी विद्वानों के पूर्ण सहयोग पर बल दिया। लूसान विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड के नवीन चन्द्र लोहानी ने ‘हिन्दी साहित्य शिक्षण के लिए आलोचना मानदंडों की मुश्किलों’ पर चर्चा करते हुए बताया कि हिन्दी साहित्य को समझने के मानदंड संस्कृत, काव्य शास्त्र, पाणिनि व्याकरण तथा विश्व के आलोचनाशास्त्रों से प्राप्त वैचारिकी द्वारा मिले हैं। सोफ़िया विश्वविद्यालय के नारायण राजू ने हिन्दी शिक्षण में भारतीय सांस्कृतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ का महत्व स्थापित किया। लिस्बन विश्वविद्यालय से आए शिव कुमार सिंह ने पुर्तगाल में विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण व्यवस्था से संबंधित चुनौतियों को प्रस्तुत किया। उन्होंने हिन्दी सीखने की प्रेरणा और शिक्षण पद्धतियों का ज़िक्र करते हुए सांस्कृतिक सन्दर्भों के महत्व को दर्शाया तथा यूरोप की स्थानीय भाषाओं में हिन्दी शिक्षण संसाधन तैयार करने पर बल दिया। हैम्बर्ग विश्वविद्यालय की तात्याना ओरान्स्कया ने हिन्दी शिक्षण के संबंध में विश्व हिन्दी दिवस के महत्व के बारे में कुछ विचार रखते हुए उसकी सकारात्मक भूमिका को स्वीकार किया तथा बताया कि यूरोपीय विश्वविद्यालयों में हिन्दी शिक्षण की समस्या के मूल में भारत की गृहभाषा- राजनीति ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक और राजनैतिक तथ्य भी हैं। कासा एसिया, बार्सिलोना से आईं दीप्ति गुलानी ने स्पेन में हिन्दी भाषा अध्ययन की अपेक्षाओं और कठिनाइयों पर प्रकाश डाला। उन्होंने हिन्दी शिक्षण की व्यावहारिक समस्याओं का उल्लेख किया और बताया कि स्पेन में हिन्दी के प्रति दिलचस्पी बढ़ रही है। इस सत्र के अंतिम वक्ता लाइडन विश्वविद्यालय, नैदरलैंड के मोहन कान्त गौतम ने यूरोप में हिन्दी अध्ययन की विस्तृत समस्याएँ और उनके समाधान पर अपनी प्रस्तुति की। उन्होंने आशा व्यक्त की कि यूरोपियन संसद यूरोप में प्रचलित सभी भाषाओं को मान्यता प्रदान करेगी और हिन्दी भाषा तथा इसका विशाल साहित्य यूरोप की सभ्यता को और अधिक संपन्न करेगा।

समापन सत्र

संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. उदय नारायण सिंह ने की। इस सत्र में चारों शैक्षिक सत्रों की रिपोर्ट क्रमशः विजया सती, शिव कुमार सिंह. रमेश शर्मा तथा ऐश्वर्ज कुमार ने प्रस्तुत की। तदुपरांत संगोष्ठी में उठे सभी मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई और अंत में संगोष्ठी की ओर से की जाने वाली संस्तुतियों पर विचार विमर्श हुआ। गंभीर चिंतन और पारस्परिक विचार विनिमय के बाद सर्वसम्मति से विदेश मंत्रालय के समक्ष निम्नलिखित संस्तुतियों को रखने का निर्णय हुआ –
  • १. आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्यूयॉर्क की प्रमुख संस्तुति “अन्तर्राष्ट्रीय मानक हिन्दी पाठ्यक्रम” की परियोजना को क्रियान्वित किया जाए और उसमें हिन्दी के सामाजिक और सांस्कृतिक सन्दर्भौं का समावेश किया जाए।
  • २. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण में संलग्न भारतीय एवं भारतेतर प्राध्यापकों को भाषा शिक्षण प्रविधि. साहित्य शिक्षण प्रविधि. हिन्दी व्याकरण. हिन्दी का सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भ आदि विषयों में प्रशिक्षित किया जाए।
  • ३. यूरोप में इस प्रकार की शैक्षिक संगोष्ठियां विदेश मंत्रालय के सहयोग से हर दो वर्ष में नियमित रूप से आयोजित की जाएँ। वर्ष २०१४ की यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी वारसा विश्वविद्यालय में आयोजित करने का प्रस्ताव है।
  • ४. पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक २४ घंटे का हिन्दी भाषा चैनल प्रारम्भ किया जाए, जिसमें हिन्दी की सभी प्रयुक्तियाँ उपलब्ध हों तथा वेब पर हिन्दी की विशाल सामग्री को एक स्थान पर हिन्दी अध्येताओं को उपलब्ध कराया जाए।
  • ५. अंग्रेज़ी से इतर विदेशी भाषाओं को दृष्टि में रखकर मल्टीमीडिया सहित हिन्दी शिक्षण सामग्री का निर्माण किया जाए।
  • ६. विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण के लिए स्नातकोत्तर स्तर का पाठ्यक्रम विकसित किया जाए।
  • ७. भारतीय संस्कृति संबंध परिषद द्वारा विभिन्न विदेशी विश्वविद्यालयों में हिन्दी पीठों की संख्या में वृद्धि की जाए।
  • ८. हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी शिक्षण की उपयोगी पुस्तकें तथा मल्टी मीडिया सामग्री उन सभी विश्वविद्यालयों को विदेश मंत्रालय द्वारा उपलब्ध कराई जाएँ, जहाँ हिन्दी अध्ययन अध्यापन की सुविधाएँ हैं।
  • ९. अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के डायनमिक पोर्टल पर वर्चुअल क्लास रूम की व्यवस्था की जाए, जिसके माध्यम से विदेशों में अध्ययनरत हिन्दी विद्यार्थियों को हिन्दी साहित्य तथा हिन्दी भाषा के विद्वानों के विभिन्न विषयों पर व्याख्यान उपलब्ध कराए जाएँ।
  • १०. विश्व में विदेशी भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण से संबंधित उक्त सभी संस्तुतियों के क्रियान्वयन के लिए विदेश मंत्रालय के अतिरिक्त भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा और विश्व हिंदी सचिवालय,मॉरिशस उत्तरदायित्व लें तथा एतदर्थ प्रभावी परियोजनाएँ बनाए।

समापन समारोह की अध्यक्ष एशियन स्टडीज़ की प्रो. ब्लांका ने संगोष्ठी के सफल आयोजन पर बधाई दी और आशा व्यक्त की कि इस अवधि में हुई विद्वत्तापूर्ण चर्चा - परिचर्चा से सभी प्रतिभागी लाभान्वित हुए होंगे। मुख्य अतिथि के रूप में विश्व हिन्दी सचिवालय, मॉरिशस की महासचिव श्रीमती पूनम जुनेजा ने संगोष्ठी की सार्थकता को रेखांकित किया। उन्होंने आश्वासन दिया कि विश्व हिंदी सचिवालय संगोष्ठी द्वारा की गई संस्तुतियों पर अपेक्षित कार्रवाई करेगा। विशिष्ट अतिथि महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के उपकुलपति श्री विभूति नारायण राय ने कहा कि यह संगोष्ठी अपनी उत्कृष्टता के लिए याद की जायेगी। इसने आगामी संगोष्ठियों के लिए मानक स्थापित किये हैं। उन्होंने कहा कि संगोष्ठी द्वारा पारित सभी संस्तुतियों का स्वागत है तथा उनका विश्वविद्यालय संस्तुतियों को क्रियान्वित करने का उत्तरदायित्व लेता है। संगोष्ठी की समाप्ति कासा दे ला इंडिया के निदेशक डॉ गियार्मो रोड्रगेज़ के धन्यवाद ज्ञापन से हुई।

भाषा और संस्कृति का अन्योन्याश्रित संबंध है। संगोष्ठी के पहले दिन गहन चिंतन और विचार मंथन के उपरांत शाम को कासा दे ला इंडिया के सभागार में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें स्पेन के जिप्सी समुदाय के पारंपरिक नृत्य फ़्लेमेंको को उसके भारतीय स्रोत से जोड़ने का प्रयास किया गया तथा साथ ही भरतनाट्यम, कत्थक, हंस वीणा, तबला और मृदंगम एवं फ़्लेमेंको नृत्य और गायन का अन्तर्राष्ट्रीय कलाकारों ने अद्भुत समागम किया। स्पेन की प्रसिद्ध भरतनाट्यम विशेषज्ञ मोनिका देला फुएंते द्वारा हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘इस पार प्रिये तुम हो मधु है’ पर किया गया मोहक नृत्य दर्शनीय था। सांस्कृतिक कार्यक्रम के उपरांत भारतीय राजदूत महोदय द्वारा प्रतिभागियों के स्वागत में प्रीति भोज दिया गया। संगोष्ठी में सभी प्रतिभागियों को स्थानीय परिभ्रमण के लिए भी ले जाया गया । इस प्रकार स्पेन की पहली तीन दिवसीय संगोष्ठी यूरोप में हिंदी के उज्जवल भविष्य की कामना के साथ संपन्न हुई।

यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी, २०१२ के प्रतिभागियों की वर्णक्रमानुसार सूची इस प्रकार है-
१. अफ़ज़ल अहमद, प्रोफ़ेसर, लिस्बन विश्व विद्यालय, पुर्तगाल,
२. अलका ऐत्रय चुडल, वरिष्ठ लेक्चरर, विएना विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रिया
३. अलेस्सांद्रा कोंसोलारो, एसोसिएट प्रोफ़ेसर, रोम विश्वविद्यालय, इटली
४. अरूण प्रकाश मिश्रा.अतिथि प्रोफ़ेसर, स्लोवेनिया विश्वविद्यालय, स्लोवेनिया
५. अशोक चक्रधर, उपाध्यक्ष,केन्द्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा, भारत
६. इंदिरा गाज़िएवा, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, मॉस्को विश्वविद्यालय, रूस
७. उदय नारायण सिंह, प्रोवाइस चांसलर, विश्व भारती,कोलकाता, भारत
८. ऐश्वर्य कुमार, हिंदी प्राध्यापक, केम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड
९. कविता वाचक्नवी, लेखिका, लंदन, इंग्लैंड
१०. कैलाश नारायण तिवारी, अतिथि प्रोफ़ेसर, वारसा विश्वविद्यालय, पोलैंड
११. गेनादी श्लोम्पेर, हिंदी प्राध्यापक,तेलेविव विश्वविद्यालय, इजराइल
१२. जगन्नाथन वी.आर.,निदेशक, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, पूर्व प्रोफ़ेसर,इग्नू, दिल्ली, भारत
१३. जस्टीना कुरोव्सका, रिसर्च फ़ैलो , बॉन विश्वविद्यालय, जर्मनी
१४. तात्याना औरन्स्कया, हैम्बर्ग विश्वविद्यालय, जर्मनी
१५. दानूता स्तानिक, प्रोफ़ेसर, वारसा विश्वविद्यालय, पौलेण्ड
१६. दीप्ति गोलानी, हिन्दी प्राध्यापक, कासा एशिया, बार्सीलोना, स्पेन
१७. नवीन चंद्र लोहानी, लूसान विश्वविद्यालय, स्विट्ज़रलैंड
१८. नारायण राजू वी.एस.एस.सिरीवुरी, अतिथि प्रोफ़ेसर, सोफ़िया विश्वविद्यालय, बल्गारिया
१९. पूनम जुनेजा, महासचिव , विश्व हिंदी सचिवालय, मॉरिशस
२०. बिल्जाना ज़्रनिक, हिंदी प्राध्यापक, ज़ाग्रेब विश्वविद्यालय, क्रोएशिया
२१. महेंद्र किशोर वर्मा, ऑनरेरी फ़ैलो, यॉर्क विश्वविद्यालय, इंग्लैंड
२२. मोहन कान्त गौतम, प्रोफ़ेसर, पश्चिम व पूर्व यूरोपीय विश्वविद्यालय, नैदरलैंड
२३. रमेश शर्मा, अतिथि प्रोफ़ेसर, घेंट विश्वविद्यालय, बेल्जियम
२४. ल्युदमिला खोख्लोवा, एसोसि़एट प्रोफ़ेसर, मॉस्को स्टेट विश्वविद्यालय, रूस
२५. विजया सती, अतिथि प्रोफ़ेसर, एल्ते विश्वविद्यालय, बुडापेस्ट, हंगरी
२६. विभूति नारायण राय, वाइस चांसलर, महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, भारत
२७. वैश्ना नारंग, प्रोफ़ेसर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली, भारत
२८. शिव कुमार सिंह, लेक्चरर, लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल
२९. शेफ़ाली वर्मा,हिंदी प्राध्यापिका, कासा एशिया, माद्रिद, स्पेन
३०. श्रीश जैसवाल, अतिथि प्रोफ़ेसर, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय, स्पेन
३१. सबीना पोपर्लान, लेक्चरर, बुखारेस्ट विश्वविद्यालय, रोमानिया
३२. हर्मन वैन ऑलफ़ेन, प्रोफ़ेसर एमेरेटस, टेक्सस विश्वविद्यालय, ऑस्टिन, अमेरिका
३३. हैंज़ वेर्नर वैस्लर, अतिथि प्रोफ़ेसर, उप्साला विश्वविद्यालय, स्वीडन

विवरण सहयोग- प्रो. श्रीश चंद्र जैसवाल, शैक्षिक निदेशक हिंदी संगोष्ठी, वय्यादोलिद विश्वविद्यालय, स्पेन

(चित्र सहयोग- श्रीश चंद्र जैसवाल, गेनादी श्लोम्पेर एवं कविता वाचक्नवी)
संगोष्ठी के अन्य चित्र यहाँ देखें-

गुरुवार, 15 मार्च 2012

वैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ है नागरी लिपि- जस्टिस जोइस

शनिवार १० मार्च, २०१२ को नई दिल्ली के आजाद भवन में नागरी लिपि राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के पद से बोलते हुए सांसद जस्टिस एम.रामा जोइस ने कहा, ‘नागरी लिपि पूर्णतयः वैज्ञानिक एवं विश्व की सर्वश्रेष्ठ लिपि है। भारत की सभी भाषाओं की एक अतिरिक्त लिपि के रूप में यह राष्ट्रीय एकता का सेतुबंध है इसलिए मैंने संसद सदस्य के रूप में पेश अपे प्राईवेट बिल के द्वारा हर भारतीय नागरिक के लिए इसका प्रशिक्षण अनिवार्य करने का सुझाव दिया है।’ उन्होंने संसद में विभिन्न स्थानों पर सुनहरी अक्षरों से नागरी लिपि में लिखे सद्वाक्यों की चर्चा भी की।

भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद एवं नागरी लिपि परिषद के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस एक दिवसीय संगोष्ठी के अध्यक्ष सांसद डॉ. रामप्रकाश, विशिष्ट अतिथि पूर्व सांसद डॉ. रत्नाकर पाण्डेय, विशेष अतिथि लोकसभा चैनल के संपादक श्री ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, प्रवासी साहित्यकार डॉ. उषा राजे सक्सेना ने भी नागरी लिपि की जरूरत पर बल दिया। इससे पूर्व संस्था के महामंत्री डॉ. परमानंद डा. पांचाल ने आचार्य विनोबा भावे द्वारा स्थापित नागरी लिपि परिषद के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए नागरी को विश्वलिपि बनने के सर्वदा योग्य बताया। सभी का स्वागत श्री बलदेवराज कामराह ने किया। इसी सत्र में प्रतिष्ठित विनोबा नागरी सम्मान कर्नाटक से पधारे नागरी सेवा डा. इसपाक अली को प्रदान किया गया। पुरस्कार में पुण्पगुच्छ, स्मृतिचिन्ह, प्रशस्तिपत्र, शाल तथा आठ हजार की नकद राशि प्रदान की गई। नागरी लिपि के प्रचार- प्रसार में अपना सर्वस्व समर्पित कर देने वाले प. गौरीदत्त की स्मृति में आरंभ किया गया प्रथम प.गौरीदत्त नागरी सेवी सम्मान श्री आनंद स्वरूप पाठक को उनकी दीर्घकालीन नागरी सेवाओं के लिए प्रदान किया गया। इसके अरिक्त राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित नागरी निबन्ध प्रतियोगिता के विजेता छात्रों और उनके विद्यालयों को भी पुरस्कार प्रदान किए गए। धन्यवाद ज्ञापन गगनांचल के संपादक डा. अजय गुप्ता ने किया।

भोजनोपरान्त सत्र ‘सूचना प्रौद्योगिकी और नागरी लिपि कम्प्यूटर प्रयोग के संदर्भ में’ विषय पर महत्वपूर्ण चर्चा को समर्पित रहा। इस सत्र की अध्यक्षता जाने- माने पत्रकार श्री राहुलदेव ने की। वक्ता डॉ. ओम विकास, डॉ. बी.एन.शुक्ला, श्री अनिल जोशी, डॉ.. भारद्वाज ने वर्तमान युग को सूचना का युग बताते हुए इन्टरनेट पर हिन्दी के बढ़ते कदमों से परिचित करवाया वहीं इसके अधिकाधिक प्रयोग के लिए आधुनिकतम प्रौद्योगिकी की जानकारी पर बल दिया। बहुत बढ़ी संख्या में उपस्थित हिन्दी, नागरी प्रेमियों ने विशेषज्ञों से अनेक प्रश्न भी पूछे जो उनकी रूचि से अधिकं आवश्यकता का प्रमाण थे। अंत में संस्था की कार्यसमिति के सदस्य श्री विनोद बब्बर ने सभागार में उपस्थित विद्वानों, का आभार व्यक्त करते हुए ऐसी कार्यशालाओं की आवश्यकता पर बल दिया।

बुधवार, 14 मार्च 2012

आधुनिक हिंदी काव्य पर दो दिन की व्याख्यानमाला संपन्न

हैदराबाद, १३ मार्च, २०१२. दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के तत्वावधान में यहाँ स्नातकोत्तर छात्रों के निमित्त ''आधुनिक हिंदी काव्य का इतिहास'' विषयक दो-दिवसीय व्याख्यानमाला सोमवार और मंगलवार को आयोजित की गई। चार सत्रों में संपन्न इस आयोजन की अध्यक्षता प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने की।

अतिथि वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए उस्मानिया विश्वविद्यालय और इफ्लु से संबद्ध रहे प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने साहित्येतिहास दर्शन पर प्रकाश डाला और विस्तार से भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावादी और उत्तर-छायावादी हिंदी कविता की प्रवृत्तियों, उपलब्धियों और सीमाओं का तत्-तत् कालीन राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय परिस्थितियों के संदर्भ में गंभीर विवेचन किया। आरंभ में डॉ. साहिरा बानू ने अतिथि वक्ता का परिचय दिया तथा बाद में डॉ.गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. गोरखनाथ तिवारी , डॉ.मृत्युंजय सिंह और शोधार्थियों ने टिप्पणियाँ कीं। परवीन सुल्ताना ने धन्यवाद प्रकट किया।

ऋषभदेव शर्मा

बुधवार, 7 मार्च 2012

कवि नचिकेता प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान से विभूषित

नव गठित संस्थान ‘साहित्य की चौपाल’ एवं जनवादी लेखक संघ, छत्तीसगढ़ के संयुक्त तत्वावधान में सिंघई विला, भिलाई में महाशिवरात्रि २० फरवरी, २०१२ को आयोजित एक भव्य समारोह में बिहार के सुविख्यात जनवादी गीतकार नचिकेता को प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान-२०१० से सम्मानित किया गया। उल्लेखनीय है कि प्रथम प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान से चौथे सप्तक के कवि एवं राष्ट्रीय हिंदी अकादमी के अध्यक्ष डॉ. स्वदेश भारती को मई, २००९ में सम्मानित किया गया था। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के अध्यक्ष व पुलिस महानिदेशक, होमगार्डस् सुकवि श्री विश्वरंजन की अध्यक्षता में सम्पन्न इस आयोजन में छत्तीसगढ़ी राजभाशा आयोग के अध्यक्ष पं. दानेश्वर प्रसाद शर्मा, सुप्रसिद्ध समालोचक श्री ओमराज, देहरादून एवं वरिष्ठ कवि अशोक शर्मा विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे। इस अवसर पर ‘साहित्य की चौपाल, भिलाई-दुर्ग’ द्वारा श्री ओमराज को समस्त साहित्यिक अवदान के लिये मानपत्र व स्मृतिचिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।  

अपने स्वागत वक्तव्य में ‘साहित्य की चौपाल’ के संयोजक श्री अशोक सिंघई ने कहा कि स्मृतिशेष प्रमोद वर्मा प्रदेश की एकमात्र पीठ, बख्शी सृजन पीठ के संस्थापक अध्यक्ष थे और उन्होंने चार वर्षों तक इस आसंदी को सुशोभित करते हुए भिलाई-दुर्ग के साहित्यकारों को प्रेरित व संस्कारित किया। प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान की स्थापना पुरोधा साहित्यकार के प्रति अंचल की एक विनम्र साहित्यिक श्रद्धांजलि है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री विश्वरंजन ने प्रमोद वर्मा सम्मान के लिये आयोजक संस्थानों एवं सम्मानित कवि श्री नचिकेता व प्रो. ओमराज बधाई व शुभकामनाएँ देते हुये कहा कि प्रमोदजी मेरे अनौपचारिक रूप से साहित्यिक गुरु थे। वे कहते थे कि पहले कवियों को खूब पढ़ो और जब लगे कि कुछ नया कहा जा सकता है तब लिखना शुरू करो। नवगीत समकालीन गीत कहे जाना चाहिये। कविता कितनी महान है यह समय तय करता है। जो कवि ५०० वर्षों तक टिक जाये वही महान कवि हैं जैसे कबीर, तुलसी और सूरदास कालजयी सिद्ध हो गये हैं। जो रचना मनुष्य के आंतरिक एवं बाह्य संघर्षों से जुड़ी नहीं है वह कविता नहीं है। नचिकेताजी की कविताएँ मुझे संघर्षों से प्राण व रस लेती नजर आती हैं।

श्री नचिकेता ने कहा कि केदारनाथ अग्रवाल की कविताई से मैं प्रभावित हुआ और जनगीतों की ओर मेरी यात्रा प्रारम्भ हुई। रामधारी सिंह दिनकर जैसा पुरस्कार मैं ठुकरा चुका हूँ किन्तु साहित्य की चौपाल से प्रमोद वर्मा सम्मान के प्रस्ताव को मैं न नहीं कह सका। मैं उनका हृदय और मस्तिष्क से सम्मान करता रहा हूँ इसलिये यह सम्मान मेरे लिये हर्ष और गौरव का प्रसंग है। उन्होंने अपनी रचनाओं का पाठ भी किया। ‘इस्पातों में जिसने पाया जीवन का आधार, नमन सौ बार उसे, नमन उसे सौ बार’ पँक्तियों से उन्होंने इस्पात की धरती भिलाई को नमन किया। चौपाल में उपस्थित लोक के प्रश्नों के उन्होंने उत्तर भी दिये। प्रो. ओमराज ने कहा कि ‘साहित्य की चौपाल’ नाम में जनवाद छिपा हुआ है। देश के शहर-शहर में साहित्य की चौपाल होनी चाहिये ताकि साहित्य से समाज का सीधा सम्वाद पुनः प्रारम्भ हो सके। पं. दानेश्वर प्रसाद शर्मा ने अपना शुभाशीष देते हुए भावी आयोजनों की सफलता की कामना की। श्री अशोक शर्मा ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

समालोचक-कवि श्री नासिर अहमद सिकंदर ने श्री नचिकेता का परिचय देते हुये उनकी अनेकों कृतियों का उल्लेख किया। उन्होंने नचिकेताजी के लेखन पर जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री शिवकुमार मिश्र के क्लब-आलेख का पाठ भी किया। प्रगतिशील लेखक संघ का प्रतिनिधित्व करते हुये इस दौर के महत्वपूर्ण कवि श्री शरद कोकास ने बनारस के नामचीन शायर जनाब अलकबीर के संदेश का पाठ किया जिसमें वाराणसी की साहित्यिक संस्था ‘अग्नि संगम’, प्रगतिशील लेखक संघ, उत्तरप्रदेश की ओर से बधाई व शुभकामनाएँ थीं। उन्होंने छत्तीसगढ़ प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री ललित सुरजन, श्री अरुण सीतांश की ओर से प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार, आलोचक श्री मलय, जबलपुर, प्रगतिशील लेखक संघ, छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ ग्रन्थ अकादमी के संचालक व प्रखर पत्रकार श्री रमेश नैयर सहित देश के महत्त्वपूर्ण संस्थानों व साहित्यकारों की बधाइयों का भी उल्लेख किया।
 
जनवादी लेखक संघ, छत्तीसगढ़ की ओर से जनाब मुमताज़ ने अंत में आभार व्यक्त किया जबकि श्री अशोक सिंघई ने आयोजन का संयोजन व संचालन किया। इस अवसर पर ‘बहुमत’ के सम्पादक व कथाकार श्री विनोद मिश्र, तेलुगु साहित्य के जाने-माने समीक्षक सर्वश्री जी. श्रीरामुलु, रायपुर से जयप्रकाश मानस, ‘भिलाई वाणी’ के सम्पादक रुद्रमूर्ति, ग्रैंड चैनल के राघवेन्द्र, चित्रकार सुश्री सुनीता वर्मा, सांगीतिक संस्था ‘गुँजन’ के अध्यक्ष शैलेन्द्र श्रीवास्तव, नरेश विश्वकर्मा, राजा राम रसिक, ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के सम्पादक प्रदीप भट्टाचार्य, कवयित्री संतोश झांजी, प्रो. नलिनी बख्शी, प्रो. शीला शर्मा, प्रशान्त कानस्कर, जनाब शेख निजामी, रामबरन कोरी ‘कशिश’, शायरा प्रीतलता ‘सरु’ एवं नीता काम्बोज, पत्रकार एस. अहलुवालिया सहित भारी सँख्या में साहित्यकार व साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।

- अशोक सिंघई, भिलाई
संयोजक- साहित्य की चौपाल
भिलार्इ (छत्तीसगढ़)

अविनाशवाचस्‍पति की व्‍यंग्‍य पुस्‍तक ‘व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल’ लोकार्पित

विश्‍व पुस्‍तक मेले के अवसरपर अविनाश वाचस्‍पति विरचित व्‍यंग्‍य पुस्‍तक ‘व्‍यंग्‍यका शून्‍यकाल’ का लोकार्पण वरिष्‍ठ व्‍यंग्‍यकार-साहित्‍यकारडॉ. शेरजंग गर्ग के कर कमलों से सोमवार २८ फरवरी २०१२ को नई दिल्‍ली के प्रगतिमैदान में संपन्‍न हुआ। इस अवसर पर अनेक चर्चित साहित्‍यकार-रचनाकार उपस्थित रहे। जिनमें डॉ. प्रेम जनमेजय, अनूप श्रीवास्‍तव, कवि मदन कश्‍यप, कथाकार संजीव और कवि-व्‍यंग्‍यकारउपेन्‍द्र कुमार उल्‍लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्‍त जयपुर से हरि शर्मा, मैनपुरी सेशिवम् मिश्र तथा नई दिल्‍ली से हिन्‍दी चिट्ठाकार साथियों पवन चंदन, राजीव तनेजा,पद्मसिंह, सुमित प्रताप सिंह इत्‍यादि सैकड़ों चिट्ठाकारों ने भारी तादाद मेंशिरकत करके कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की। हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन के डॉ.गिरिराजशरण अग्रवाल, मीना अग्रवाल एवं अयन प्रकाशन के श्री भूपी सूद भी कार्यक्रममें अंत तक मौजूद रहे।

इस अवसर पर बोलते हुए सुविख्‍यात व्‍यंग्‍यकार डॉ. शेरजंग गर्ग ने कहा, 'मैंने पढ़ा है कि अविनाश शब्‍दों के साथ किस तरह खेलते हैं, सिर्फ खेलते ही नहीं, स्थितियों और परिस्थितियों को भी व्‍यंग्‍य का निशाना बनाते हैं। बहुत से व्‍यंग्‍यकारों को हम पढ़ते हैं तो समझ नहीं पाते कि यह क्‍या कह रहे हैं। लेकिन अविनाश के मामले में मैंने महसूस किया है कि उनमें भाषा के साथ व्‍यंग्‍यकी समझ है, विसंगतियों की समझ है। अगर हम उदयप्रकाश की मोहनदास को पढ़ें तो पता लगेगा कि व्‍यंग्‍य होता क्‍या है ? हरिशंकर परसाई, श्री लाल शुक्‍ल ने मात्र व्‍यंग्‍य के लिए व्‍यंग्‍य नहीं लिखा, इन्‍होंने जीवन के दृष्टिकोण को सामने रख कर लिखा। जीवन की तकलीफों और विसंगतियों को समझते हुए लिखा जो कि एक बहुत बड़ी बात है।

अविनाश वाचस्‍पति ने जिस प्रकार छोटे छोटे टुकड़ों मे, छोटे छोटे विषयों को उठाकर व्‍यंग्‍य की सृष्टि की है, उसके लिए बधाई देते हुए डॉ.गर्ग ने कहा कि यह तुम्‍हारी पहली किताब है। अगर पहली किताब इतनी सुंदर रचनाओं के साथ इतने अच्‍छे रूप में छप सकती है, तो अपनी अन्‍य रचनाओं को तैयार रखो। बहुत सारे प्रकाशक इसमें व्‍यंग्‍य की नई दृष्टि को देखकर इन्‍हें प्रकाशित करना चाहेंगे।

उल्‍लेखनीय है कि हिन्‍दी चिट्ठाकारी में सर्वाधिकचर्चित व्‍यक्तित्‍व अविनाश वाचस्‍पति के लगभग ३५ हिंदी चिट्ठे हैं, जिन पर वे सदैव सक्रिय रहकर हिंदी का विकास कर रहे हैं और सबको प्रोत्‍साहित कर रहे हैं। अंतर्जाल पर किए गए इनके कार्यों की एक विशिष्‍ट पहचान है। भारत सरकार के ‘सूचना और प्रसारण मंत्रालय’ के ‘हिंदी साहित्‍य सम्‍मान’ से वर्ष २००८-२००९ के लिये इन्‍हें सम्‍मानित किया जा चुका है। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग पर रवीन्‍द्र प्रभात के साथ मिलकर संपादित की गई इनकी पहली प्रामाणिक पुस्‍तक ‘हिन्‍दीब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति’ को प्रगतिशील ब्‍लॉगर लेखकसंघ, लखनऊ द्वारा ‘हिंदी चिट्ठाकारी का शिखर सम्‍मान’ प्रदान करने की घोषणा की गई है। हिन्‍दी चिट्ठाकारी पर डॉ. हरीश अरोड़ा के साथ संपादित ‘ब्‍लॉग विमर्श’ नामक पुस्‍तक शीघ्रप्रकाशित हो रही है।

प्रेषक : पवन ‘चंदन’, 1/12, रेलवे कालोनी, सेवा नगर, नई दिल्‍ली 110003
मोबाइल 9990005904/9717631876 ई मेल :
pawanchandan@gmail.com

बुदापैश्त, हंगरी में विश्व हिंदी समारोह का आयोजन

भारतीय दूतावास, बुदापैश्त के सांस्कृतिक केन्द्र में एक मार्च की शाम को विश्व हिन्दी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर भारतीय राजदूत मान्य श्री गौरी शांकर गुप्त जी एवां प्रथम सचिव श्री जे एन माझी सहित समस्त दूतावासकर्मी सपरिवार मौजूद थे। ओत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग के छात्र-छात्राओं के साथ मिलकर बुदापैश्त के हिन्दी प्रेमी जन समुदाय ने रोचक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये। कार्यक्रम का संचालन विभाग में स्नातकोत्तर हिन्दी के छात्र शागि पीटर ने किया तथा अनुवाद दानियल बालोघ ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के आरम्भ में भरतनाट्यम शैली में गणेश वन्दना की गई। इसके बाद महामहिम राजदूत महोदय ने विश्व में हिन्दी की व्याप्ति और महत्व को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह का सन्देश पढ़कर सुनाया। उन्होंने इस अवसर पर बुदापैश्त वासी हिन्दी-प्रेमियों की बड़ी सांख्या में उपस्थिति को हर्ष का विषय बताया। भरतनाट्यम की एक और भावपूर्ण प्रस्तुति के बाद भारोपीय अध्ययन विभाग में तीसरे वर्ष की छात्राओं ने मधुर स्वर में सुप्रसिद्ध गीत “होंगे कामयाब” गाया।
विभाग तथा दूतावास की ओरिएंटेशन कक्षाओं में भाग लेने वाले उत्साही हिन्दी प्रेमियों ने मिलकर लोकप्रिय हिन्दी कविताओं का पाठ किया, जिसमें अज्ञेय जी की कविता ‘चुपचाप’ और ‘मधुशाला’ की अनेक रुबाइयाँ शामिल थीं। कार्यक्रम के बीच ही हिन्दी सुलेखन प्रतियोगिता संपन्न हुई और तीन सवर्श्रेष्ठ पुरस्कार प्रदान किये गए। ऐल्ते विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफ़ेसर डॉ विजया सती ने हिन्दी दिवस और विश्व हिन्दी दिवस मनाए जाने की साथर्कता को रेखांकित करते हुए हिन्दी के बढ़ते प्रभाव पर टिप्पणी की।
दूतावास की ओर से विभाग के सवर्श्रेष्ठ दो छात्रों - द्ववतीय वर्ष से किराय पीटर और सालेर पीटर को पुरस्कृत किया गया। अनौपचारिक कक्षा में हिन्दी सीखने वाले श्री तमाश को भी दूतावास की ओर से पुरस्कार प्रदान किया गया। कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी सदस्यों को भी दूतावास की ओर से प्रोत्साहन-स्वरूप प्रतीक चिह्न प्रदान किये गए। कार्यक्रम की समाप्ति पर सबको विस्मित करते हुए माननीय राजदूत महोदय ने महाभारत प्रसंग पर केंद्रित अपनी कविता सुनाई। दूतावास के सौजन्य से स्वादिष्ट भारतीय समोसे, इडली, चटनी तथा अन्द्य मिश्रित जलपान के साथ समारोह उल्लासपूर्वक संपन्न हुआ।

प्रस्तुति : विजया सती
अतिथि प्रोफेसर, भारोपीय अध्ययन विभाग, बुदापैश्त, हंगरी