शनिवार, 26 दिसंबर 2009

यमुनानगर में हरियाणा अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का उद्घाटन

यमुनानगर। हरियाणा के मुख्यमंत्री के अतिरिक्त प्रमुख सचिव और सूचना-जनसंपर्क एवं सांस्कृतिक विभाग निदेशक सह-सचिव शिवरमन गौर ने कहा कि सरकार डी.ए.वी. कॉलेज फॉर गर्ल्स, यमुनानगर द्वारा आयोजित किए जाने वाले हरियाणा अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह को स्थायी बनाने के लिए हरसंभव प्रयास करेगी। श्री गौर आज यहां फिल्म समारोह में ‘फिल्म एप्रीसियेशन कोर्स’ का उद्घाटन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि इस फिल्मोत्सव से देश-विदेश में हरियाणा राज्य की बेहतर छवि विकसित होगी। ‘फिल्म एप्रीसियेशन कोर्स’ के संयोजक प्रो० मनमोहन चड्ढा ने कहा कि सिनेमा केवल व्यापार व मनोरंजन नहीं हो सकता। यह एक शिक्षा भी है। उन्होंने कहा कि 2013 में हम भारतीय सिनेमा की पहली शताब्दी मनाएंगे। सुप्रसिद्ध फिल्म चिंतक विनोद भारद्वाज ने कहा कि सिनेमा की ताकत है कि कोई एक दृश्य आपके मर्म को छू लेता है। उन्होंने कहा कि यह कोर्स इसलिए जरूरी है कि आज की दुनिया में बहस व बातचीत का माहौल बना रहे। आज डी०वी०डी० प्रौद्योगिकी के कारण विश्व की अधिकतर महत्वपूर्ण फिल्में हम सस्ते दामों में खरीदकर देख सकते हैं। आज से 20 साल पहले यह सुविधा नहीं थी। सिनेमा में आज सबके लिए अनन्त सम्भावनायें हैं।

सुप्रसिद्ध रंगकर्मी एवं अभिनेता एम०के० रैना ने फिल्मोत्सव के एक विशेष खण्ड ‘कट्टरता एवं युद्ध के खिलाफ सिनेमा’ का उद्घाटन किया। उन्होंने कहा कि संस्कृति और सिनेमा लोकतंत्र के ‘सेफ्टी वाल्व’ हैं। उन्होंने दुनियाभर में बढ़ रही कट्टरता के खिलाफ सिनेमा के हस्तक्षेप की विस्तार से चर्चा की। इस खण्ड की शुरुआत निर्देशक डेनिस तनोविक की ऑस्कर विजेता बोस्नियाई फिल्म ‘नो मैंस लैंड’ से हुई। आज फिल्मोत्सव में फिल्मकार के. बिक्रम सिंह को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर उनकी चर्चित फिल्म ‘तर्पण’ दिखाई गई। ग्रैंड हरियाणा प्रीमियर खंड में आज सुप्रसिद्ध रंगकर्मी एवं फिल्मकार रंजीत कपूर की फिल्म ‘चिंटूजी’ का प्रदर्शन हुआ। आज फिल्मोत्सव में ‘फोकस कंट्री - पाकिस्तान’ की शुरुआत शोएब मंसूर की फिल्म ‘खुदा के लिए’ से हुई। पहली बार इस फिल्मोत्सव में बच्चों के लिए फिल्मों का विशेष खंड शुरू किया गया है। समाजसेवी श्रीमती भारती प्रसून ने इस खंड का शुभारम्भ किया। इस खंड की शुरुआत विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘ब्लू अम्ब्रेला’ के प्रदर्शन से हुई।

भारतीय उच्चायोग द्वारा कविता प्रतियोगिता एवं साहित्य सम्वाद

१९ दिसम्बर २००९, इन्दिरा गान्धी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र, फ़ेनिक्स मॉरिशस में भारतीय उच्चायोग द्वारा विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष में एक कविता प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है। १९ दिसम्बर को केन्द्र के कक्ष में चयनित रचनाकारों द्वारा कविता पाठ किया गया। हिन्दी के मूर्धन्य कवि श्री सूर्यदेव सिबोरत और वरिष्ठ कथाकार श्री रामदेव धुरन्धर निर्णायक थे। उनका निर्णय १० जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के सन्दर्भ में आयोजित कार्यक्रम के अंतर्गत घोषित किया जाएगा। लेकिन बन्द लिफ़ाफ़े में पड़े उस निर्णय से पहले ही एक विजेता की घोषणा हो गई है, वह है: मॉरिशस की हिन्दी कविता। उच्चायोग और डॉ. करदम के इस आयोजन में सबसे सराहनीय बात यह है कि इस प्रतियोगिता में मॉरिशस की कविता की एक नई पीढ़ी उभरती हुई नज़र आई। मॉरिशस के स्थापित कवियों के स्थान पर इसमें उन युवा कवियों को सुनने का अवसर प्राप्त हुआ जो अभी लिखना प्रारम्भ कर रहे है और सभी कविताएँ भी उच्च कोटी की थी।

अंजली हजगयबी, वशिष्ठ झमन, अरविन्दसिन्ह नेकितसिन्ह, विनय गुदारी, सेहलील तोपासी, जिष्णु होरीसोरन, रितेश मोहाबीर जैसे कुछ ऐसे नाम राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस कार्य में उभर कर आए जो कि मॉरिशस के साहित्य के भविष्य के लिए बहुत शुभ संकेत है। इस कविता पठन के तुरंत बाद मॉरिशस में महिला लेखन की आधारशिला: सुश्री भानुमति नागदान का आख्यान रहा। उन्होंने अपनी कहानियों में नारी विषय पर चर्चा की। यह न केवल बहुत रोचक और विचारोत्तेजक रही साथ ही जैसे मॉरिशस में लिखित साहित्य के एक अविच्छिन्न पक्ष पर परिचर्चा की महत्वपूर्ण शुरुआत भी रही। आशा है इस से अब मॉरिशस के साहित्य में नारी विष्य पर समालोचना को नई गति मिलेगी।

२८ दिसंबर २००९

'कौन कुटिल खल कामी' 'लीलारानी स्मृति पुरस्कार' से पुरस्कृत


'मोगा, पंजाब की संस्था ने दिल्ली की प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था 'शब्दसेतु' के तत्वावधान में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की कृति 'कौन कुटिल खल कामी' को दसवें 'लीलारानी स्मृति पुरस्कार' से सम्मानित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. हरीश नवल ने की तथा कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि नेशनल बुक ट्रस्ट में संपादक, डॉ. बलदेव सिंह बद्दन थे। कार्यक्रम में दिविक रमेश, प्रताप सहगल, गिरीश पंकज, एवं लालित्य ललित ने प्रेम जनमेजय के रचना कर्म तथा व्यक्तित्व पर अपने विचार व्यक्त किए। आरंभ में पुरस्कार-समिति के अध्यक्ष के. एल. गर्ग ने 'कौन कुटिल खल कामी' की समाकलीन हिंदी व्यंग्य साहित्य में विशिष्टता को रेखांकित किया तथा बताया कि इससे पूर्व यह पुरस्कार रवींद्रनाथ त्यागी, ज्ञान चतुर्वेदी, गिरीश पंकज, आदि को दिया जा चुका है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में हरीश नवल ने समाकलीन व्यंग्य परिदृश्य का विस्तृत विश्लेषण करते हुए उसमें प्रेम जनमेजय के व्यंग्य- रचना- कर्म एवं 'व्यंग्य यात्रा' के संपादक के रूप में उनके विशिष्ट योगदान की चर्चा की। इस अवसर पर प्रेम जनमेजय के सद्यः प्रकाशित संकलन 'इक्यावन श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ' , डॉ. बलदेव सिंह बद्दन एवं धर्मपाल सिंघल की पुस्तक 'गुरु रविदास जी की सटीक वाणी' तथा के.एल. गर्ग द्वारा कन्हैयालाल कपूर के चालीस व्यंग्य लेखों के संपादित संकलन 'हास्य-चालीस' का लोकार्पण भी किया गया। डॉ. गर्ग ने 'हास्य चालीसा' पर प्रकाश डाला तथा इसके महत्व को रेखांकित करने के लिए पुस्तक से अंश पढ़ा। डॉ. बद्दन ने संत-साहित्य की परंपरा में रविदास जी की वाणी के महत्व को रेखांकित किया तथा साथ ही प्रेम जनमेजय के व्यंग्य साहित्य में योगदान की चर्चा की। इस कार्यक्रम में सुरेश धींगडा, सुभाष चंदर, श्रवणकुमार उर्मालिया, शशि सहगल, गौरव त्रिपाठी, हर्षवर्धन आर्य, आस्था, स्नेह सुधा, आशा कुंद्रा, समेत अनेक साहित्य प्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. रवि शर्मा एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. हरीश अरोड़ा ने किया।

रवि शर्मा, सचिव 'शब्दसेतु' डॉ. प्रेम जनमेजय

भोपाल में तेजेन्द्र शर्मा का रचना पाठ एवं पुस्तक लोकार्पण


(चित्र में- बाएँ से प्रो. रमेश दवे, तेजेन्द्र शर्मा, ज्ञान चतुर्वेदी, मनोज श्रीवास्तव) संस्कृति, साहित्य तथा ललित कलाओं के लिए समर्पित संस्था स्पंदन भोपाल द्वारा दिनांक २६ नवंबर ०९ को स्वराज भवन, भोपाल में लंदन के प्रतिष्ठित कथाकार तेजेन्द्र शर्मा की अब तक प्रकाशित संपूर्ण कहानियों के प्रथम खण्ड सीधी रेखा की परतें का लोकार्पण समारोह का आयोजन किया गया।
इस अवसर पर तेजेन्द्र शर्मा ने इस संग्रह से अपनी बहुचर्चित कहानी कैंसर का पाठ किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार, चिंतक तथा शिक्षाविद प्रो. रमेश दवे ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी उपस्थित थे। विशिष्ट अतिथि थे श्री मनोज कुमार श्रीवास्तव, आयुक्त जनसंपर्क म.प्र. शासन।

इससे पूर्व संस्था के अध्यक्ष डॉ. शिरीष शर्मा तथा सचिव गायत्री गौड़ ने अतिथियों का स्वागत किया। श्री मनोज श्रीवास्तव ने अपने लिखित आलेख का पाठ करते हुए तेजन्द्र शर्मा की कहानियों को ख़ालिस हिन्दुस्तानी कहानियाँ बताया। उनका मानना था कि तेजेन्द्र की कहानियाँ करुण हैं। उनके पात्र स्मृतियों में रहते हैं। मृत्यु की अनेक अंतरछवियाँ इन कहानियों में देखने को मिलती हैं। डॉ. आनंद सिंह ने कहा कि तेजेन्द्र शर्मा सामान्य कहानीकार नहीं हैं। वे इंटेलिजेण्ट और नॉलेजेबल कहानीकार हैं। वे घटनाओं का तार्किक चित्रण करते हैं। वे ऐसी पृष्ठभूमि तथा परिवेश के रचनाकार हैं जिसकी तुलना अन्य किसी रचनाकार से नहीं की जा सकती। वे अपनी कहानियों में महीन आध्यात्मिकता का सृजन करते हैं। उनकी कहानियों में मानवता का समग्र वेदना तरल रूप में काम करती है। तेजेन्द्र शर्मा के कहानी पाठ करने के नाटकीय ढंग की भी उन्होंने तारीफ़ की। मुख्य अतिथि डा. ज्ञान चतुर्वेदी ने कहानी की परम्परा को विस्तार से रखा। प्रेमचन्द से लेकर नए कहानीकारों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने प्रत्येक धारा की विशिष्टताओं को रेखांकित किया। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी के अनुसार कहानी में किस्सागोई तथा भाषा की कलात्मकता तथा सौन्दर्य बोध होना चाहिये। तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों में ये तत्व हैं। उन्होंने आगे कहा कि कैंसर एक बड़ी कहानी बनते-बनते रह गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रो. रमेश दवे ने कहा कि तेजेन्द्र शर्मा की कहानियाँ लोग और रोग के बीच कंट्राडिक्शन को सामने लाती हैं। उनकी कहानियाँ मृत्यु का बोध करवाती हैं। कैंसर कहानी हो या अन्य इनमें वैकल्पिक जीवन उभर कर आता है। कहानियाँ जो व्यक्ति और परिवार की संवेदना को लोक संवेदना में बदल देती हैं। कैंसर जैसी कहानियों में आई करुणा को ट्रांसफ़ॉर्म कर देना रचनात्मक लेखक का फ़र्ज़ बनता है। तेजेन्द्र अपनी कहानियों में मानसिक द्वन्द्वों को बख़ूबी निभाते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत है भाषा का प्रयोग। कार्यक्रम का संचालन करते हुए उर्मिला शिरीष ने तेजेन्द्र शर्मा के व्यापक अनुभव जगत की बात कही। कार्यक्रम में अन्य गणमान्य अतिथियों के अतिरिक्त राजेश जोशी, हरि भटनागर, वीरेन्द्र जैन, राजेन्द्र जोशी, मुकेश वर्मा, स्वाति तिवारी, आशा सिंह तथा अल्पना नारायण भी उपस्थित थे।

भुवेन्द्र त्यागी की पुस्तकों- 'दहशत के साठ घंटे' और 'आँखों देखी' का लोकार्पण



२६ नवम्बर, २००८ 'नवभारत टाइम्स' के मुख्य उपसंपादक भुवेन्द्र त्यागी की दो पुस्तकों 'दहशत के साठ घंटे' और 'आँखों देखी' के विमोचन समारोह मुख्य अतिथि पूर्व आईपीएस अफसर वाई. पी. सिंह, इंडियन पोस्टल सर्विस की वरिष्ठ अधिकारी और लीड इंडिया कांटेस्ट की फाइनलिस्ट आभा सिंह तथा 'नवभारत टाइम्स' के संपादक शचीन्द्र त्रिपाठी की उपस्थिति में संपन्न हुआ। समारोह के अध्यक्ष 'नवनीत' के संपादक वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ सचदेव ने कहा कि इस किताब में १५ पत्रकारों के २६-११ के ओजस्वी अनुभव पढ़कर लगता है कि पत्रकारिता का भविष्य आशाजनक है।

समारोह का संचालन वरिष्ठ ग़ज़लकार और फिल्म गीतकार देवमणि पांडेय ने किया। समारोह में 'आँखों देखी' किताब में शामिल हिन्दी, मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के १५ पत्रकारों में से अधिकांश पत्रकार उपस्थित थे। ख़तरों से खेलने वाले इन पत्रकारों का स्वागत प्रशिक्षार्थी पत्रकार जितेंद्र दीक्षित और आकांक्षा सिंह ने किया। सौम्य प्रकाशन की निदेशक रीना त्यागी ने आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सौम्य प्रकाशन मीडियाकारों की पुस्तकें ही प्रकाशित करेगा। जिन मीडियाकारों के पास अच्छे विषयों पर स्क्रिप्ट है, वे अपना परिचय और स्क्रिप्ट की सिनॉप्सिस ई-मेल से भेज सकते हैं-saumyaprk@gmail.com

दहशत के ६० घंटे- इस किताब में भुवेन्द्र त्यागी ने २६-११ के आतंकी हमले की पूरी दास्तान चौदह अध्यायों सबसे बड़ा हमला, सीएसटी और कामा पर कहर, दो टैक्सियों के धमाके, ताज की त्रासदी, ट्राइडेंट की टीस, नरीमन हाउस के ज़ख्म, आँखों में आँसू और सीने में गम, फिर गर्व से सिर उठाया, गौरवशाली अतीत, शौर्य को सलाम, जो शहीद हुए, कहर का सफ़र, कहाँ हुई चूक तथा बाद में जो हुआ में कही है। इसमें २९ अगस्त, २००९ तक का घटनाक्रम है।

आँखों देखी- इस किताब में हिन्दी, मराठी, गुजराती और अंग्रेज़ी के प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के १५ पत्रकारों के १६-११ के कवरेज की आँखों देखी है। प्रस्तावना संजय सिंह (रेजिडेंड एडिटर न्यूज एक्स) ने लिखी है। जिन १५ पत्रकारों के अनुभवों को भुवेन्द्र त्यागी ने संपादित किया है, वे हैं- मृत्युंजर बोस व प्रशांत सावंत (सकाल टाइम्स), रेशमा शिवडेकर (महाराष्ट्र टाइम्स), सुनील मेहरोत्रा (नवभारत टाइम्स), श्रीराम वेर्णेकर व उमा कदम (टाइम्स ऑफ इंडिया), जयप्रकाश सिंह व ललित छाजेड (आईबीएन ७), सचिन चौधरी (इंडिया टीवी), सरोजिनी श्रीहर्ष (सहारा समय), सुबोध मिश्रा (स्टार न्यूज), विवेक कुमार भट्ट व राजू इनामदार (आज तक) और विद्या मिश्रा (हैडलाइंस टुडे)।

हाशिए पर पड़े लोगों के लिए पुस्तक - प्रो. भार्गव


हाशिए पर पड़े लोगों का उन्नयन किसी भी सजग नागरिक के लिए चिंता का विषय है। समाजशास्त्री के लिए यह चुनौती है कि वह इन लोगों के लिए बेहतर का मार्ग समाज और व्यवस्था को सुझाए। सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रो. नरेश भार्गव ने उक्त विचार उदयपुर के माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय में आयोजित एक गोष्ठी में व्यक्त किए। समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित इस गोष्ठी में प्रो. भार्गव और कोटा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एम.एल. कालरा ने प्रो. सुरेशचन्द्र राजोरा की अंकुर प्रकाशन द्वारा सद्य प्रकाशित पुस्तक 'फोरेस्ट मेनेजमेंट स्ट्रेटजी एंड ट्राइबल सोशल स्ट्रक्चर` का लोकार्पण भी किया। प्रो. भार्गव ने कहा कि दलितों आदिवासियों के लिए बनाई जाने वाली नीतियों का अध्ययन और समीक्षा भी समाजशास्त्री का दायित्व है जिसे प्रो. राजोरा ने अपनी पुस्तक में बखूबी निभाया है। प्रो. एम.एल. कालरा ने पुस्तक के संदर्भ में भौगोलिक परिवर्तनों की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए कहा कि पारंपरिक देशज ज्ञान का फिर से उपयोग इस दिशा में सकारात्मक होगा। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. एन.के.पंड्या ने आदिवासी जीवन से संबंधित अपने अनुभव सुनाते हुए कहा कि आदिवासी समाज ने जंगल का उपयोग करते हुए भी पर्यावरण संतुलन कायम रखा।

इससे पहले विभागाध्यक्ष प्रो. पी.सी. जैन ने अतिथियों का स्वागत किया। पुस्तक परिचय हिन्दी प्राध्यापक डॉ. पल्लव ने दिया। लेखक डॉ. राजोरा ने पुस्तक लिखने की प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि राजस्थान के आदिवासी समुदाय के संदर्भ में नीतियों का पुनर्विश्लेषण बेहद ज़रूरी है। संयोजन डॉ. निलेश भट्ट ने किया और अंत में डॉ. एस. के. मिश्रा ने आभार माना। गोष्ठी में मानविकी संकाय अध्यक्ष प्रो. एस.एन. अरयर, सामाजिक विज्ञान संकाय अध्यक्ष प्रो. पी.आर.व्यास, प्रो. गिरिश नाथ माथुर, डॉ. बी.मूमिन, डॉ. सुनिता सिंह सहित विभ्रिा विभागों के प्राध्यापक उपस्थित थे।

पल्लव
समन्वयक, मीडिया अध्ययन केन्द्र
माणिक्यलाल वर्मा श्रमजीवी महाविद्यालय
उदयपुर

प्रेमचंद सहजवाला की पुस्तक का लोकार्पण सम्पन्न

चित्र में- पुस्तक का अनावरण करते भारत भारद्वाज, प्रो. चमन लाल, विभूति नारायण राय, हिंमाशु जोशी, साथ में खड़े हैं लेखक प्रेमचंद सहजवाला नई दिल्ली। १२ नवम्बर हिन्द-युग्म ने गाँधी शांति प्रतिष्ठान सभागार में प्रेमचंद सहजवाला द्वारा लिखित पुस्तक 'भगत सिंहः इतिहास के कुछ और पन्ने' का विमोचन-कार्यक्रम आयोजित किया। पुस्तक का विमोचन प्रसिद्ध साहित्यकार और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय ने किया। इस कार्यक्रम में भगत सिंह विषय के घोषित विशेषज्ञ प्रो. चमन लाल, वरिष्ठ कथाकार हिमांशु जोशी और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज ने 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में अपने-अपने विचार रखे। उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया से पहली ऐसी पुस्तक है जो किसी ख़ास विषय पर केन्द्रित है और पहले ब्लॉग पर सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित है। इस पुस्तक के सभी १३ अध्याय पहले हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हैं, जिनमें भगत सिंह के जीवन, जीवन दर्शन और गांधी के साथ इनके मतांतर को रेखाकिंत किया गया है। प्रेमचंद सहजवाला ने इसे पुस्तक रूप देने से पहले सभी अध्यायों को संशोधित और परिवर्धित भी किया है। हिन्द-युग्म ने विमोचन कार्यक्रम के साथ 'बदलते दौर में युवा चेतना और भगत सिंह की परम्परा' विषय पर एक गोष्ठी भी आयोजित किया था, जिसमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष और भगत सिंह से संबंधित कई पुस्तकों और दस्तावेज़ों के संपादक प्रो. चमन लाल, मशहूर कथाकर हिमांशु जोशी, पुस्तक-वार्ता के संपादक और वरिष्ठ आलोचक भारत भारद्वाज और इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विभूति नारायण राय अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। इसके बाद आनंदम संस्था के प्रमुख जगदीश रावतानी ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद किया। मंच का संचालन युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी ने किया। कार्यक्रम में अल्का सिंहा, युवा कवयित्री सुनीता चोटिया, हिन्द-युग्म के संपादक शैलेश भारतवासी, वरिष्ठ कवि मुनव्वर सरहदी, वरिष्ठ शायर मनमोहन तालिब, परिचय-संस्था की प्रमुख उर्मिल सत्यभूषण, इस कार्यक्रम के संयोजक और युवा कवि रामजी यादव, कवि-लेखक रंजीत वर्मा, कामरेड पीके साही, सपर-प्रमख राकेश कुमार सिंह, कवयित्री ममता किरण इत्यादि उपस्थित थे।

मीडिया छात्र समाज के भावी चिकित्सकः डॉ. अली

भोपाल, १९ दिसंबर। मीडिया के छात्र समाज की बुराइयों को पहचान कर उनका निदान करने वाले भावी चिकित्सक हैं। ये विचार कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष डॉ. शाहिद अली ने व्यक्त किए। डॉ. अली में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के जनसंचार विभाग के छात्र-छात्राओं से एक संवाद में कहा कि जनसंचार के क्षेत्र में काम करने वालों की ज़िम्मेदारियाँ बहुत बड़ी हैं। जनसंचारकर्मी वास्तव में समाज की पहचान करता है और उसके आधार पर समस्याओं का निदान करते हैं। उन्होंने कहा कि आनेवाली पीढ़ी ही मीडिया जगत के अंदर आ गई विकृतियों का निदान भी खोजेगी और उसे जनोन्मुखी बनाने में मदद करेगी। उन्होंने कहा कि मीडिया पर पड़े रहे बाज़ार के प्रभावों से मिल रही चुनौतियों का सामना करने के लिए पत्रकारिता के मूल्यों की ओर लौटने की ओर लौटने की ज़रूरत है। समाज और राष्ट्र के निर्माण में संचार माध्यमों की जागरूकता ज़रूरी है। मीडिया का नया परिदृश्य गंभीर और चिंतनशील जनसंचार के शोधार्थियों का है जिसे आगे बढ़ाने की ज़रूरत है। वर्तमान को कोसने से नहीं उसका सामना करने और नए रास्ते बनाने से ही यह क्षेत्र पुनः एक नई उर्जा को प्राप्त कर सकेगा।

कार्यक्रम के प्रारंभ में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष संजय द्विवेदी ने डॉ.अली का स्वागत किया। आभार प्रदर्शन डॉ. मोनिका वर्मा ने किया। आयोजन में विभाग के छात्र-छात्राएँ मौजूद रहे।

संजय द्विवेदी

नारी के अन्तर्मन में झाँकती तस्वीरें


किसी भी कला के अंकुर व्यक्ति में दो तरह से विकसित होते हैं। एक तो जन्मजात ईश्वरीय वरदान के रूप में। दूसरे पारंपारिक रूप से सीख कर या प्रशिक्षण लेकर। सुनीता कोमल के अन्दर कला के अंकुर जन्मजात ईश्वरीय वरदान के रूप में ही प्रस्फ़ुटित हुए हैं। सुनीता कोमल खुद स्वीकार करती हैं कि, ''कला मेरी ज़िन्दगी में उसी तरह आई है जैसे पेड़ पर पत्ते आते हैं।'' यानि कि एकदम प्राकृतिक रूप से। महिला एवं बाल विकास विभाग मध्य प्रदेश में मास्टर ट्रेनर के रूप में नौकरी कर रही सुनीता के चित्रों की एकल प्रदर्शनी १६ नवंबर ०९ से २२ नवंबर ०९ तक ललित कला अकादमी लखनऊ में आयोजित हुई। इस प्रदर्शनी का उद्घाटन हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार श्री कामतानाथ ने किया। सुनीता के चित्रों को देख कर कामतानाथ जी ने उनकी कमेण्ट बुक में लिखा, ''पारंपरिक रूप से स्त्री का बाह्य सौन्दर्य ही चर्चा का विषय रहा है। किन्तु सुनीता के चित्रों में परिलक्षित नारी के सौन्दर्य में एक गहन अन्तरदृष्टि है,जिसके पीछे दुनिया को और बेहतर देखने की उत्कृष्ट आकांक्षा निहित है।'' सचमुच सुनीता कोमल के चित्र व्यक्ति के ऊपर एक अलग प्रभाव डालते हैं। इनके चित्र फ़िगरेटिव ऐब्स्ट्रैक्ट हैं। अपने चित्रों में काले रंग का इस्तेमाल अभिव्यक्ति के एक सशक्त माध्यम के रूप में किया है। इनके ब्लैक इंक और पेंसिल से किए गए स्केच में नारी का एक अगठित लेकिन ज़बर्दस्त प्रभाव डालने वाला रुप उभर कर आया है। इन चित्रों में नारी अपनी सम्पूर्ण विशेषताओं के साथ होते हुए भी एक अलग रूप में सामने आती है। इनकी पेण्टिंग्स में पीला, भूरा, नीला, नारंगी रंग बड़ी खूबसूरती से इनकी अध्यात्मिक रुझान को हमारे सामने लाता है। इन्होंने अपने चित्रों में कमल, मछली, चट्टान जैसे प्रकृति से उठाए गए प्रतीकों का इस्तेमाल पवित्रता, शुचिता, संवेदनशीलता, संघर्ष जैसे जीवन मूल्यों की स्थापना के लिए किया है।

नारी तो इनके स्केच और पेण्टिंग्स दोनों में ही मुख्य विषय वस्तु के रूप में उपस्थित है। सुनीता खुद स्वीकार करती हैं किनारी प्रकृति एवं ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है। नारी ही त्याग की पराकाष्ठा को पार कर सकती है, और सृजन करने में सक्षम हैं। नारी अपनी सम्पूर्ण कोमल भावनाओं प्रेम, दया, करुणा, ममत्व, सहिष्णुता, समर्पण एवं आन्तरिक सौन्दर्य के साथ इनकी पेण्टिंग्स के मुख्य केन्द्र बिन्दु के रूप में मौजूद है। चूँकि सुनीता ने खुद एक लंबा संघर्ष किया है इस मुकाम तक पहुँचने के लिए, इसीलिए नारी संघर्ष का सन्देश भी वे अपनी पेण्टिंग्स के माध्यम से देना चाहती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वनस्पति विज्ञान एवम समाजशास्त्र से पोस्टग्रेजुएट सुनीता ने कला का कोई व्यावसायिक या पारम्परिक प्रशिक्षण नहीं लिया है। फिर भी अपनी पेण्टिंग्स, चित्रों के माध्यम से कला की दुनिया में अपनी उपस्थिति इन्होंने ज़बर्दस्त ढंग से करायी है। इनकी पेण्टिंग्स की कई एकल एवं समूह प्रदर्शनियाँ दिल्ली, मुम्बई, चण्डीगढ़, भोपाल में भी आयोजित हो चुकी हैं। कला के क्षेत्र में कई सम्मान एवम पुरस्कार भी इनके खाते में आ चुके हैं। प्रदर्शनी के अन्तिम दिन ललित कला अकादमी में ही ''स्त्री, सृजन संवाद'' विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन भी किया गया। इस संगोष्ठी में प्रसिद्ध बाल साहित्यकार एवम कवि डॉ. हेमन्त कुमार ख्याति प्राप्त चित्रकार राजीव मिश्र, कवि श्री राम शुक्ल, श्री संजय जायसवाल, नन्द कुमार मनोचा, चौगवां टाइम्स के सम्पादक श्री सुशील अवस्थी ने अपने विचार व्यक्त किए। इनके साथ ही अन्य कई साहित्यकार, कलाकार, मीडियाकर्मी एवं बुद्धिजीवी उपस्थित थे।

हेमन्त कुमार

'सृजन' के तत्वाचवधान में साहि‍त्यय चर्चा कार्यक्रम का सफल आयोजन

वि‍शाखापटनम की हि‍न्दी साहि‍त्य, संस्कृति‍ और रंगमंच के प्रति‍ प्रति‍बद्ध संस्था सृजन ने साहि‍त्य चर्चा कार्यक्रम का आयोजन ११ दिसंबर २००९ को सफलतापूर्वक कि‍या गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता संतोष अलेक्स, संयुक्त सचि‍व, सृजन ने की जबकि‍ साहि‍त्य चर्चा का संचालन सृजन के सचि‍व डॉ. टी महादेव राव ने कि‍या। संतोष अलेक्स ने संस्था की ओर से उपस्थि‍तों का स्वागत कि‍या जबकि‍ डॉ. राव ने सृजन की गति‍वि‍धयों का ब्यौरा प्रस्तुत कि‍या और इस साहि‍त्‍य चर्चा के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि‍ जो नए लेखक, कवि‍ और व्यंग्यकार हि‍न्दी में रचनायें लि‍ख रहे हैं, उन्हें एक सार्थक मंच देना और उनकी रचनाधर्मि‍ता को नि‍खारना और प्रोत्साहि‍त करना इस कार्यक्रम के उद्देश्य है।

साहि‍त्य चर्चा का आरंभ श्री रजनीश ति‍वारी की कवि‍ता 'यह आग कि‍सने लगाई' से हुआ। इस कवि‍ता में वर्तमान समय में प्रांतों को अलग करने के लि‍ए जो आंदोलन और गति‍वि‍धियाँ हो रही हैं, उस पर चोट कि‍या गया और बताया बया कि‍ एकता में ही शक्ति ‍है। बंद की वजह से आम आदमी की जो दुर्दशा होती है उसके बारे में भी कवि‍ता में प्रभावी बातें प्रस्तुत की गई। श्री बी.एस. मूर्ति‍ ने अपनी सामयि‍क कहानी 'आज का भारत' में वर्तमान युवा पीढ़ी की शि‍क्षा, रोज़गार और बदलती स्थिति‍यों का खुलासा था। आज का युवा काफी पढ लि‍खकर भी घर घर सामान बेचते सेल्‍समेन का जो जीवन बि‍ता रहे हैं, उसका लेखा जोखा था।

श्रीमती सीमा शेखर ने दो कवि‍ताओं का पाठ कि‍या। 'टेसू के फूल' कवि‍ता में लुप्त होते वन-सौदर्य के साथ-साथ गुम होते टेसू के फूलों को लेकर कवि‍ की व्यथा थी। 'सृजन' कवि‍ता में व्यक्ति ‍के सर्जनात्म‍कता को गति‍ देती परि‍स्थि‍ति‍याँ और परि‍वेश को रेखांकि‍त कि‍या गया था। आदि‍वासी इलाकों में बेरोज़गारी और प्रकृति‍ के प्रकोपों को उसके साथ बिंब बनाकर 'घाटी में पतन' कहानी में श्री बी वेंकट राव ने पेश कि‍या। आदि‍वासी क्षेत्रों में प्रगति‍ के नाम पर हो रहे शोषण का भी वर्णन था। कवि‍ श्री जी अप्पाराव 'राज' ने राजनीति‍क व्यंग्य कवि‍तायें सुनाई जि‍नमें वर्तमान समय के राजनीति‍ज्ञों की सोच पर करारा व्यं ग्य कि‍या गया। श्री ईश्वर वर्मा ने 'डरना' और 'आकांक्षा' शीर्षक से दो कवि‍ताओं का पाठ कि‍या, जि‍नमें मानवीय दुर्बलताओं और उससे उठने की बात बताई गई। श्रीमति‍ प्रभात भारती ने 'यात्रा संस्मरण' प्रस्तुत कि‍या जो कि‍ काफी वि‍स्तारि‍त होने के बावजूद काफी सराही गई क्योंकि‍ मर्मस्पर्शी वर्णन संस्मरण को जीवंत बना रहा था। उन्होंने वर्तमान स्थिति‍यों पर 'मैं एक माँ हूँ' कवि‍ता भी पढ़ी। श्री संतोष अलेक्सा ने दो छोटी कवि‍तायें 'प्रकृति' और 'प्रेम गीत' पढ़ा, जि‍नमें क्रमश: प्रकृति‍ के बदलावों के साथ मानव के संबंध तथा भौति‍कवादी समाज में प्रेम के अस्ति ‍त्वे का समावेश था। डॉ टी. महादेव राव ने समुद्र को मानवीयता के साथ जोड़कर चार कवि‍तायें 'समुद्र – चार कवि‍तायें' शीर्षक से सुनाईं। समुद्र के खारेपन को वि‍द्रोह का कवच, उसके लगातार तट पर आने को आगे बढ़ने की प्रेरणा, समुद्र का सबकुछ लौटाने के गुण को त्याग के रूप में प्रस्तुत कि‍या गया। श्री वि‍जयकुमार राजगोपाल और श्री के ईश्वर राव ने भी इस कार्यक्रम में सक्रि‍य रूप में हि‍स्सा लि‍या।

सभी रचनाओं पर उपस्थि‍त कवि‍यों और लेखकों ने अपनी अपनी प्रति‍क्रि‍या दी। सभी को लगा कि‍ इस तरह के सार्थक हि‍न्दी‍ कार्यक्रम अहि‍न्दी क्षेत्र में लगातार करते हुए सृजन संस्थाएँ अच्छा: काम कर रही हैं।

संतोष अलेक्स ने धन्यवाद ज्ञापन कि‍या और डॉ. टी. महादेव राव ने प्रति‍भागी रचनाकारों को स्मृति‍ चि‍ह्न प्रदान कि‍ए। ‍