सोमवार, 30 जनवरी 2012

पर्यटक जी को अंतिम प्रणामः

१९८० एवं ९० के दशक में लखनऊ में उभरते साहित्यकारों- विशेषकर कवियों को एकजुट कर नवोदित साहित्यकार परिषद नामक एक मंच प्रदान करनेवाले रामनारायण त्रिपाठी पर्यटक आज ३० जनवरी २०१२ को पंचतत्त्व में विलीन हो गए। कैंसर की कष्टकारक लंबी बीमारी से विगत रविवार को दोपहर बाद उन्होंने पार्थिव शरीर त्याग दिया।

१९८९ में भाई पर्यटक जी के नेतृत्व में नवोदित साहित्यकार परिषद द्वारा लखनऊ के मिनी रवींद्रालय में मनाया गया पं. माखनलाल चतुर्वेदी जन्म शताब्दी समारोह इतना भव्य एवं चर्चित रहा कि उसके सामने राज्य सरकार द्वारा कानपुर में लाखों रुपए खर्च करके मनाया गया सरकारी समारोह भी फीका पड़ गया था। उसी वर्ष नवोदित साहित्यकार परिषद ने लोकगीतों के संकलन पर अद्वितीय काम करनेवाले पं. रामनरेश त्रिपाठी का जन्मशताब्दी समारोह भी पूरी गरिमा के साथ मनाया गया। इस समारोह में परिषद को आशीर्वचन देने के लिए लखनऊ की शान समझे जानेवाले वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय अमृतलाल नागर जी भी उपस्थित थे ।  संगठनकुशल भाई पर्यटक जी एवं परिषद के राष्ट्रीय महासचिव राजेश राय के नेतृत्व में जो महत्वपूर्ण काम किये गए उसके लिये वे सदा याद किये जाएँगे।
-मुंबई से ओमप्रकाश तिवारी की रपट

रविवार, 29 जनवरी 2012

सृजनात्मक एवं पत्रकारिता पुरस्कार २०११ का सफल आयोजन

राजस्थान पत्रिका समूह एवं माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय , भोपाल की ओर से गत २२ जनवरी २०१२ (रविवार) को पत्रिका मुख्यालय, केसरगढ़, जयपुर में आयोजित पं झाबरमल स्मृति व्याख्यान के अवसर पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री बी एल जोशी के हाथों 'पत्रिका सृजनात्मक एवं पत्रकारिता पुरस्कार २०११' हिन्दी साहित्यकारों एवं पत्रकारों को प्रदान किये गए।

कहानी का प्रथम पुरस्कार जोधपुर की कथाकार डा ज़ेबा रशीद को 'मौसम और पहली तारीख़' पर, द्वितीय पुरस्कार दिल्ली के कथाकार सुभाष नीरव को उनकी कहानी 'रंग बदलता मौसम' पर, कविता मे प्रथम पुरस्कार जोधपुर के कवि/ग़ज़लकार बृजेश अम्बर को तथा द्बितीय पुरस्कार रतलाम के कवि अज़हर हाशमी को प्रदान किया गया। इन रचनाओं का चयन वर्ष २०१० में राजस्थान पत्रिका समूह के अखबार में प्रकाशित रचनाओं में से किया गया। प्रथम पुरस्कार में ११-११ हज़ार रूपये व द्बितीय पुरस्कार में ५-५ हज़ार रुपये तथा प्रशस्तिपत्र दिए गए। इस अवसर पत्रकारिता के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्य के लिए बहुत से पत्रकारों को भी सम्मानित किया गया। मंच पर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू, पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी मौजूद थे। समारोह में पूर्व न्यायाधीश व भारतीय विधि आयोग के सदस्य शिव कुमार शर्मा, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य विजय शंकर व्यास, राज्य मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष एन के जैन, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष बी डी कल्ला, सांसद ज्ञान प्रकाश पिलानिया, जयपुर की मेयर सुश्री ज्योति खंडेलवाल, चीफ़ काज़ी खालिद उस्मानी, पंडित झाबरमल शर्मा के पौत्र व छत्तीसगढ़ के पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा सहित लगभग एक हजार के करीब साहित्य प्रेमी, पत्रकार और विशिष्ट जन उपस्थित थे।

राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित इस समारोह की विस्तृत रिपोर्ट के लिए नीचे दिये गए लिंक पर क्लिक करें-
http://epaper.patrika.com/22979/Rajasthan-Patrika-Jaipur/23-01-2012#page/9/2
समारोह के कुछ विशेष चित्र संलग्न हैं।

डॉ अ कीर्तिवर्धन को डी.लिट. की मानद उपाधि

मुज़फ्फरनगर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अ कीर्तिवर्धन को उनके साहित्यक योगदान एवं हिंदी की सेवा के लिए 'विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार' के १६वे राष्ट्रीय अधिवेशन मे 'विद्यासागर '(डी. लिट.) की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया।

श्री राम नाम सेवा आश्रम, मौन तीर्थ, गंगा घाट, उज्जैन (मध्य प्रदेश) में आयोजित विद्यापीठ के १६वें महाधिवेशन मे स्थानीय नागरिकों, पत्रकारों, समाजसेवियों, गुरुकुल के विद्यार्थियों के अलावा देश के कोने कोने से आये १५० से अधिक साहित्यकारों ने भाग लिया। दो दिन तक चले इस महाधिवेशन मे मुख्य अतिथि मध्य प्रदेश के खनन मंत्री श्री मालू जी रहे, अध्यक्षता जाने माने साहित्यकार डॉ रामनिवास मानव ने की, मंचासीन रहे डॉ तेज नारायण कुशवाहा, कुलपति, डॉ अमर सिंह वधान, सरदार जोबन सिंह, डॉ. देवेंदर नाथ साह तथा सञ्चालन किया डॉ प्रेम चंद पाण्डेय ने। विदित हो कि डॉ अ कीर्तिवर्धन को (मध्य प्रदेश) की साहित्यिक -सांस्कृतिक संस्था 'कादंबरी द्वारा उनकी श्रेष्ठ निबंध कृति 'चिंतन बिंदु' के लिए स्वर्गीय ब्रहम कुमार प्रफुल्ल सम्मान से अलंकृत किया गया जिसके अंतर्गत अंगवस्त्रम,प्रशस्ति पत्र के साथ सम्मान राशि भी प्रदान कि गयी थी।

डॉ अ कीर्तिवर्धन कि अब तक ७ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। जतन से ओढ़ी चदरिया' बहुचर्चित रही जो कि बुजुर्गों कि समस्याओं पर केन्द्रित है। डॉ अ कीर्तिवर्धन पर 'कल्पान्त' पत्रिका ने अपना विशेषांक 'साहित्य का कीर्तिवर्धन' प्रकाशित कर उनके कृतित्व व व्यक्तित्व पर व्यापक प्रकाश डाला है। कीर्ति वर्धन जी कि अनेक रचनाओं का उर्दू, तमिल, नेपाली, अंगिका, अंग्रेजी मैथिली मे अनुवाद व प्रकाशन भी हो चुका है। डॉ. कीर्तिवर्धन को अब तक देश कि अनेक संस्थाओं से ५० से अधिक सम्मान मिल चुके हैं। आप बहुप्रकाशित एवं बहु पठनीय लेखक के रूप मे देश विदेश मे जाने जाते हैं तथा इन्टरनेट पर भी चर्चित हैं। हम आपके सुखद भविष्य कि मंगलकामना करते हैं।

रमेश चंद गह्तोरी,
नैनीताल बैंक
जाग्रति एन्क्लेव,विकास मार्ग
दिल्ली-९२

कलानाथ मिश्र के कथा संग्रह ;दो कमरे का मन; का लोकार्पण

पटना,१५ नवम्बर, साहित्यिक पत्रिका नयीधरा द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में कथाकार कलानाथ मिश्र के कथा संग्रह ;दो कमरे का मन; का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में व्याख्यान कर रहे जाने माने साहित्यकार एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राचार्य डॉ0 हरीश नवल ने कहा कि विश्व बाजार की उत्तर आधुनिक संस्कृति ने भारतीय समाज एवं रिश्तों की बुनियाद को गहरे प्रभावित किया है, जिसे कलानाथ मिश्र की कहानियों में देखा जा सकता है। समारोह की अध्यक्षता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने की, जबकि संचालन प्रसिद्ध कवि समालोचक एवं नई धरा के संपादक डॉ. शिवनारायण ने किया।

डॉ. नवल ने कहा कि कलानाथ मिश्र की कहानियों में वर्तमान जीवन के सामाजिक रिश्तों का यथार्थ दर्शन चित्रित है। आरम्भ में अतिथियों का स्वागत करते हुए ए. एन. कॉलेज के प्रधनाचार्य डॉ. हरिद्वार सिंह ने कहा कि कलानाथ मिश्र हिन्दी के चर्चित कहानीकार हैं उनकी कहानियाँ मन को छूती हैं और जीवन के यथार्थ से परिचित कराती है। मुख्य वक्ता के रूप में दिल्ली से आए प्रसिद्ध लेखक एवं व्यंग्य यात्रा के संपादक डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि ‘दो कमरे का मन’ समकालीन जीवन की आधुनिकता का दर्पण है। टूटते, बदलते रिश्तों के कारक तत्वों की सूक्ष्मता से कलानाथ मिश्र की कहानियाँ परिचित कराती हैं। आरम्भ में पुस्तक परिचय देते हुए कवि पत्राकार निविड़ शिवपुत्रा ने कहा कि कलानाथ की कहानियाँ उत्तर आधुनिक जीवन-संस्कृति की मार्मिक व्याख्या करती है।

वरिष्ठ पत्राकार गिरीश पंकज;रायपुर. छत्तीसगढ़ ने कहा कि कलानाथ मिश्र ने अपनी कहानियों में बाजारवाद के कारण जन्मी समकालीन जीवन परिस्थितियों को बारीकी से उठाया है। उन्होंने कहा कि आज प्रगतिशीलता और बाजारवाद के नाम पर कहानी के साथ अत्याचार किया जा रहा है, जिससे साहित्यकारों को बचना चाहिए। नईधरा के संपादक शिवनारायण ने कहा कि कलानाथ मिश्र की कथा संवेदना भावोत्थान का दर्शन है। दो कमरे का मन, आम का पेड़, डॉलर पुत्रा, मोक्ष जैसी इनकी कहानियाँ सहज संबंधें की छिजती संवेदना का करूण आख्यान है। आज की हिन्दी कहानी कला, संवेदना और वस्तु चेतना के स्तर पर आम आदमी के जीवन की व्याख्या करती है, जिसे कलानाथ जी की कहानियों के द्वारा देखा जा सकता है। इस अवसर पर लालित्य ललित, दिल्लीद्ध, अनूप श्रीवास्तव, लखनऊ, सुभाष चंदर, दिल्ली, फजल इमाम मल्लिक, दिल्ली, महेन्द्र ठाकुर, रायपुर, फारूख अफ्रीदी, जयपुरद्ध, रामरतन यादव, फतुहा आदि जाने माने लेखकों ने ‘दो कमरे का मन’ की कहानियों की प्रशंसा करते हुए कलानाथ मिश्र को अपने समय की संवेदना का रचनाकरा बताया। अपने लेखकीय उद्गार व्यक्त करते हुए कथाकार कलानाथ मिश्र ने कहा कि अपनी कहानियों के लिए मुझे अपने परिवेश समाज से ही पात्रा मिल जाते हैं। मेरे भीतर की आवेष्टनमूलक संवेदना. परिवेशगत संवेदनशीलता ने ही मेरे भीतर के कथाकार को उजागर किया, जिसे नई धरा पत्रिका ने पाठकों के बीच प्रतिष्ठित किया।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र ने कहा कि आज देश-समाज और जीवन में वैश्कि बाजारवाद इतने तनाव भर दिए हैं कि कलानाथ मिश्र जैसे साहित्यकार और प्रासंगिक हो जाते हैं तथा उनकी कहानियाँ उस तनाव से मुक्ति का जरिया बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि कलानाथ अपनी लेखनी से साहित्य की सेवा कर रहे हैं जो राष्ट्र की सेवा करने के बराबर है। आज दुनिया में संवेदनशीलता और मानवीयता का अभाव हो गया है। परम्पराएँ और संस्कार नष्ट होते जा रहे हैं। अपनी कहानियों में माध्यम से लेखक ने विश्व में उत्पन्न इसी संकट की ओर इशारा करते हुए उनके पुनर्स्थापन की कोशिश की है। उन्होंने कहा कि साहित्यकारों को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना चाहिए।

इस सारस्वत समारोह का आरम्भ डॉ. प्रतिभा सहाय द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ तथा समापन साहित्यकार डॉ. रामशोभित प्रसाद सिंह के ध्न्यवाद ज्ञापन से हुआ। देश के विभिन्न भाग से आए जाने माने साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए डॉ. सिंह ने कहा कि कलानाथ की कहानियाँ आज के जीवन दर्शन की कथा कहती हैं तथा मानवीय रिश्तों को बारीकी से व्याख्यायित करती हैं। इस अवसर पर प्रसिद्ध कलाकार ए.पी. बादल, गणनाथ मिश्र, ध्रुव कुमार, डॉ. संजय सिंह, भवनाथ मिश्र, शिववंश पांडेय, भावना शेखर, राजकिशोर राजन, विजय नाथ मिश्र, डॉ. धीरज कुमार, जवाहर पांडे, राजकुमारी मिश्र, सुभाष प्र. सिंह, राजकिशोर राजन, विशुद्धानन्द, लघु कथा आन्दोलन के सतीशराज पुष्करना, सहित समारोह में पटना के साहित्यिक समाज के अनेक गणमान्य सदस्यों ने भाग लिया।

समन्विता शैली
305, अमन अपार्टमेन्ट
शांतिनिकेतन कॉलोनी
भूतनाथ रोड, पटना-800026

हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ द्वारा शमशेर की कविता पर संगोष्ठी आयोजित

दिनांक ३ जनवरी २०१२, हिंदी विभाग, चौधरी चरण सिंह विष्वविद्यालय, मेरठ में राष्ट्रीय संगोष्ठी 'शमशेर बहादुर सिंह व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाधर्मिता' का आयोजन सफलता पूर्वक किया गया। उदघाटन सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व विभागाध्यक्ष एवं जानी-मानी आलोचक प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि यह गौरव की बात है कि इतना बड़ा कवि स्थानीय स्तर पर हुआ। शमशेर की स्थिति दो मेडों पर खड़े हुए कवि की स्थिति है। उन्होंने वामपन्थी और प्रेम दोनों ही तरह की कविताएँ लिखी। उन्हें रूप का कवि, एन्द्रियता का कवि तथा बिम्बों का कवि कहा गया। शमशेर उनमें से एक हैं जिन्होंने ऊँचाई ग्रहण की।

इस अवसर पर माननीय कुलपति डॉ. विपिन गर्ग ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विभाग में लगातार आयोजित हो ऐसी मेरी अपेक्षा है। दिल्ली से आए डॉ. रामेश्वर राय ने व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता विशेष तैयारी की माँग करती है। विजय देव नारायण साही ने कहा है कि शमशेर बुनियादी रूप से दुरूहता के कवि हैं। प्रो. राय ने मलयज की पंक्तियां व्यक्त करते हुए कहा कि शमशेर की कविता की कुछ निजी माँगें हैं। डीन कलासंकाय प्रो. आर.एस. अग्रवाल ने कहा कि शमशेर हमारे विश्वविद्यालय परिक्षेत्र के अंग रहे है, हमारे विश्वविद्यालय क्षेत्र के ऐसे व्यक्ति के विविध आयामों की चर्चा हिंदी विभाग ने की, ये गौरव का विषय है। उद्घाटन सत्र का संचालन ललित कुमार सारस्वत, परियोजना अध्येता, उत्कृष्ट अध्ययन केन्द्र, हिन्दी विभाग ने किया।

संगोष्ठी के दूसरे सत्र ’’शमशेर की कविता के विविध आयाम’’ सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि पद्मश्री लीलाधर जगूडी ने कहा कि शमशेर को समझने के लिए खास तैयारी की जरूरत है। शमशेर से टक्कर लेनी चाहिए वे शब्दों को गायब कर देते है, जैसे - ’एक नीला आइना बेठोस।’ - इससे वह केवल आकाश कहना चाहते है और आकाश जिस दिन ठोस हो जाएगा तो मैं हाथ पैर भी नहीं हिला पाऊँगा। ऐसा बिम्ब पूरे साहित्य में नहीं मिलता। उन्हें समझने के लिए उनकी भाषा को, बिम्बों को जानना होगा। इस सत्र में डॉ. जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि एक नये कवि के रूप में जब मैं उन्हें देखता हूँ, कविता की कला सीखने के लिए मैं जिन लोगों के पास जाता हूँ उनमें पहला नाम शमशेर का है। उनकी कविता अपने आप को पहचाने का सलीका सीखाती है, आप सीखते जायेंगे कि एक अच्छी कविता के क्या-क्या गुण हों ? प्रो. दुर्गाप्रसाद गुप्त ने कहा कि शमशेर की पूरी कविता पर पश्चिमी आंदोलनों का प्रभाव है। उस पर प्रतीकवाद, प्रभाववाद, रूपवाद, दादावाद, व्यंजनावाद का प्रभाव है। इसलिए पश्चिमी आंदोलनों के संदर्भ में शमशेर की कविताओं को देखा जाए। द्वितीय सत्र का संचालन एस. डी. कालिज, मुजफरनगर के प्रवक्त डॉ. विश्वम्भर पाण्डेय ने किया।

तृतीय सत्र ‘शमशेर का गद्य और अन्य पक्ष’ विषय पर केन्द्रित रहा। सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. प्रेमचन्द पातंजलि, दिल्ली ने कहा कि जब व्यक्ति जीवित रहता है तो उसे कोई याद नहीं करता, यही विडम्बना शमशेर के साथ भी रही। ईर्ष्या जन्य पीढ़ी ने शमशेर को पनपने नहीं दिया। साहित्य के मठाधीशों ने उन्हें दूर रखा। वे किसी मठ से बंधने वाले कवि नहीं थे शमशेर निराला का कौरवी एडीसन है। मेरी इच्छा है कि उनके नाम पर पुस्तकालय अथवा स्मारक बनना चाहिए। डॉ. गजेन्द्र सिंह ने कहा कि शमशेर आधुनिक संदर्भों में ऐसे साहित्यकार है जिन्हें पढ़ा जाना जरूरी है। शमशेर को साहित्यिक गुटबदियों के कारण उस तरह से नहीं पढ़ा गया जैसे पढ़ा जाना चाहिए। परिवेश से व्यक्ति अपने गद्य का निर्माण करता है। हर व्यक्ति संघर्ष से आगे बढ़ता है। तृतीय सत्र का संचालन शोध छात्र मोनू सिंह ने किया। संगोष्ठी में हिन्दी विभाग अध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने आभार व्यक्त किया।

चित्रा मुद्गल को रूस का अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान

मास्को। मानवीय सरोकारों की पैरोकार हिन्दी की जानी-मानी लेखिका चित्रा मुदगल को रूस का अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान-२००९ दिए जाने की घोषणा की गई है। रूस के 'भारत मित्र समाज' की ओर से प्रतिवर्ष हिन्दी के एक प्रसिद्ध लेखक-कवि को मास्को में हिन्दी-साहित्य का यह महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मान दिया जाता है। इस क्रम में समकालीन भारतीय लेखकों में अपना विशिष्ट स्थान रखने वाली और कथा-लेखन के प्रति विशेष रूप से समर्पित चित्रा मुदगल को जल्द ही यह सम्मान मास्को में आयोजित होने वाले गरिमापूर्ण कार्यक्रम में दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि पहली बार यह सम्मान किसी महिला लेखिका को मिला है।

मूल रूप से मानवीय संवेदना के पक्ष में खड़ी नज़र आने वाली लेखिका चित्रा मुदगल का जन्म १० दिसम्बर १९४३ को चेन्नई में हुआ था और अब तक उनके नौ कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और संपादन की छह पुस्तकों सहित विविध विधाओं की कुल ४१ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस भरी-पूरी साहित्यिक सम्पदा वाली लेखिका चित्रा मुदगल की अंतरराष्ट्रीय ख्याति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी अनेक पुस्तकों का चेक, इतालवी, स्पेनिश, चीनी और नेपाली सहित कई अंतरराष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। मराठी, बंगाली, मलयालम, पंजाबी, कन्नड़, उर्दू, गुजराती, तमिल, असमिया आदि भारतीय भाषाओं में भी उनकी पुस्तकों का अनुवाद बहुत पहले ही हो चुका है।

चित्रकला में गहरी रुचि रखने वाली चित्रा मुद्गल ने जे० जे० स्कूल ऑफ़ आर्टस से फ़ाइन आर्टस का अध्ययन किया और पढ़ाई के दौरान श्रमिक नेता दत्ता सामंत के संपर्क में आकर श्रमिक आंदोलन से भी जुड़ीं, जहाँ उन्होंने उत्पीड़न और बदहाली में जीवन-यापन करने वाली महिलाओं के उत्थान और बुनियादी अधिकारों के साथ-साथ दलित, उत्पीड़न और निम्नवर्ग के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया। हिन्दी साहित्य के अनेक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित चित्रा मुदगल, के० के० बिड़ला फाउंडेशन का तेरहवाँ व्यास सम्मान पाने वाली प्रथम लेखिका हैं। सहस्त्राब्दि का पहला इंदु शर्मा कथा सम्मान (यूके) भी उन्हीं खाते में दर्ज़ है। २०१० में चित्रा मुदगल को उदय राज सिंह सम्मान और तमिलनाडु का चिन्नप्पा भारती सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। 

'भारत मित्र' समाज के महासचिव अनिल जनविजय ने मास्को से जारी विज्ञप्ति में यह सूचना दी है कि प्रसिद्ध रूसी कवि अलेक्सान्दर सेंकेविच की अध्यक्षता में हिन्दी साहित्य के रूसी अध्येताओं व विद्वानों की पाँच सदस्यीय निर्णायक-समिति ने चित्रा मुद्गल को वर्ष 2009 के अंतरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान के लिए चुना है। इस निर्णायक-समिति में हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध रूसी विद्वान ल्युदमीला ख़ख़लोवा, रूसी कवि अनातोली पारपरा, कवयित्री और हिन्दी साहित्य की विद्वान अनस्तसीया गूरिया, कवि सेर्गेय स्त्रोकन और लेखक व पत्रकार स्वेतलाना कुज़्मिना शामिल थे। सम्मान के अन्तर्गत चित्रा मुदगल को पन्द्रह दिन की रूस-यात्रा पर बुलाया जाएगा। उन्हें रूस के कुछ नगरों की साहित्यिक-यात्रा कराई जाएगी तथा रूसी लेखकों से उनकी मुलाक़ातें आयोजित की जाएँगी।

चित्रा मुद्गल से पहले यह सम्मान हिन्दी के कवि विश्वनाथप्रसाद तिवारी, उदयप्रकाश, लीलाधर मंडलोई, आलोक श्रीवास्तव, बुद्धिनाथ मिश्र, पवन करण, कहानीकार हरि भटनागर और महेश दर्पण आदि को दिया जा चुका है।

नार्वे में रुआल्द अमुन्द सेन की याद में लेखक गोष्ठी


ओस्लो, ३० जनवरी को वाइतवेत सेंटर, ओस्लो में लेखक गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह गोष्ठी लेखक रुआल्द अमुन्दसेन के दक्षिण ध्रुव में पहला कदम रखने की शताब्दी पर आयोजित की गयी जिसकी अध्यक्षता करते हुए सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने अमुन्दसेन के जीवन पर प्रकाश डाला। गोष्ठी के लिए भारतीय राजदूत आर के त्यागी और स्थानीय मेयर थूर्स्ताइन विंगेर की शुभकामनाएं पढ़ी गयीं। बाद में कविता पाठ हुआ जिसमें इंगेर मारिये लिल्लेएन्गेन और राजकुमार भट्टी, नीलम लखनपाल और अलका भरत थे। कार्यक्रम का समापन माया भर्ती ने नव वर्ष पर शुभकामनाये देते हुए किया और सूचना दी कि भारतीय-नार्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम का आगामी कार्यक्रम २६ जनवरी २०१२ को संपन्न होगा

संगीता एस सीमोनसेन और शरद आलोक लखनऊ विश्वविद्यालय में सम्मानित


विदेशों में हिंदी के शिक्षण से जुड़ी हिंदी स्कूल नार्वे की प्रधानाचार्या संगीता एस सीमोनसेन को लखनऊ विश्वविद्यालय में डॉ. विद्याविन्दु सिंह द्वारा सम्मानित किया गया। उन्हें विदेशों में हिंदी सेवा के लिए प्रतीक चिन्ह और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया।  इसी के साथ विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता से ३२ वर्षों (तीन दशकों) से हिन्दी पत्रिकाओं 'परिचय', 'स्पाइल-दर्पण' और 'वैश्विका' के सम्पादक और प्रतिष्ठित साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल को भी उनके हिन्दी पत्रकारिता में अमूल्य योगदान और साहित्य सृजन के लिए लखनऊ विश्विद्यालय ने शाल ओढ़ाकर और प्रो. प्रेमशंकर तिवारी ने प्रतीक चिन्ह दिया।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो के दी सिंह ने की तथा कार्यक्रम का काव्यात्मक एव. सुरचिपूर्ण सञ्चालन किया डॉ. कृष्णा जी श्रीवास्तव ने कार्यक्रम में शरद आलोक को विदेशों में हिन्दी पत्रकारिता को एक नया आयाम देने वाला और साहित्य में आँधियों में जलने वाले दीपक की संज्ञा दी। डॉ. विद्या विन्दु सिंह ने कार्यक्रम सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' की हिन्दी सेवा पर प्रकाश डालने वालों में लखनऊ विश्विद्यालय से प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. पवन अग्रवाल, अमेरिका से आये वी पी सिंह और गायत्री सिंह तथा अन्य विद्वतजन थे।

साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक को सेतु सम्मान

विभिन्न देशों के मध्य नार्वे, स्वीडेन, फिनलैंड और डेनमार्क में हिंदी साहित्य, फिल्म और नाटक में योगदान के सेतु कार्य के लिए सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' को सेतु सम्मान दिया गया। फिल्माचार्य आनन्द शर्मा ने कहा कि उन्हें अन्तरराष्ट्री लघु फिल्म समारोह एक्प्रेशन २०११ आयोजन सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' के बिना अधूरा रह जाता। उन्होंने शुक्ल के नाटको और उनके द्वारा किये गए विदेशी नाटकों के स्तरपूर्ण अनुवाद के लिए कहा कि हिन्दी जगत उन्हें सदा याद रखेगा। आनन्द शर्मा ने कहा कि शरद आलोक द्वारा अनुवादित नाटक जो हमने लखनऊ-महोत्सव में मंचन किया था वह यूट्यूब पर उपलब्ध है। लखनऊ के अनेक साहित्यकार और जिसमें योगेन्द्र विक्रम सिंह, चित्रा और चन्द्र मोहन सहित अनेक गणमान्य रंगकर्मी उपस्थित थे। साहित्यकार प्रो योगेन्द्र प्रताप सिंह, सतेन्द्र सिंह 'शलभ', डॉ. कृष्णा जी श्रीवास्तव. इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। लखनऊ महोत्सव में नाटकों के प्रदर्शन की शुरुआत उत्तर प्रदेश कलाकार संघ के तत्वावधान में सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने द्वीप जलाकर की तथा उद्घाटन सत्र में प्रसिद्ध साहित्यकार सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाटक बकरी के निदेशक को भी शरद आलोक द्वारा सम्मानित कराया गया। ये कार्यक्रम गोमती नगर में संगीत नाटक अकादमी और जयशंकर प्रेक्षागृह, राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह , कैसरबाग़, लखनऊ में संपन्न हुए।