शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

तोकियो में अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन

तोकियो । भारत-जापान राजनयिक संबंध स्थापना की ६०वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में तोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरेन स्टडीज़, तोक्यो के सभागार में २८ से ३० जनवरी २०१२ तक तीन-दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन हुआ, जिसमें जापान और भारत के अलावा मारिशस, त्रिनिदाद, डेनमार्क, अमेरिका आदि अनेक देशों के विद्वानों एवं साहित्यकारों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। उद्घाटन सत्र में विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. ताकेशि फुजिइ ने आयोजन समिति के अध्यक्ष के रूप में अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय ने १९०८ में ही हिन्दी भाषा का शिक्षण आरम्भ कर दिया था, जब भारत के विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी का पाठ्यक्रम शुरू नहीं हुआ था। उन्होने बताया कि अगले वर्ष से बंगला की भी पढ़ाई शुरू की जाएगी।

मुख्य अतिथि भारतीय राजदूत श्री आलोक प्रसाद ने कहा कि यह वर्ष भारत-जापान मैत्री का हीरक जयन्ती वर्ष है, जिसकी शुरुआत इस सम्मेलन के माध्यम से हो रही है, क्योंकि विभिन्न देशों संस्कृतियों को जोड़ने में भाषा सेतु का काम करती है। उन्होने बताया कि आज हिन्दी एक राष्ट्रभाषा के रूप में ही नहीं, विश्वभाषा के रूप में भी प्रसिद्धि पा रही है। आज कुल १३७ देशों में हिन्दीभाषी और हिन्दीप्रेमी हैं और विश्व में सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा के रूप में हिन्दी का दूसरा स्थान है। उन्होने कहा कि पिछले साल जापान के प्रधान मंत्री ने भारत की सफल यात्रा की। इस वर्ष भारत के प्रधान मंत्री जापान आयेंगे। उस अवसर पर भी बड़ा समारोह होगा। उन्होने अपील की कि वर्ष भर चलनेवाले इस कार्यक्रम में सभी भाग लें।

समारोह के विशिष्ट अतिथि थे ७४ वर्षीय हिन्दी विद्वान प्रो. तोशियो तनाका ने कहा कि जापानियों में भारतीय संस्कृति, भाषा और जीवन-दर्शन के प्रति स्वाभाविक अनुराग है। मै स्वयं १९५० के दशक में इलाहाबाद विश्वविद्यालय जाकर हिन्दी की विधिवत शिक्षा ली थी और तोक्यो विश्वविद्यालय में हिन्दी के पठन-पाठन को सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया था। मैं महात्मा गांधी से इतना प्रभावित था कि उनके ‘हिन्द स्वराज्य’ और उनकी जीवनी को गुजराती से सीधे जापानी में अनुवाद करने के लिए मैने गुजराती सीखी।

त्रिनिदाद से आये राजनयिक श्री हंस हनुमान सिंह ने कहा कि १८४५ से १९१७ तक यूपी-बिहार के ग्रामीण गिरमिटिया मजदूर के रूप मे त्रिनिदाद अपनी भाषा-संस्कृति की पोटली लेकर गये थे। वहाँ शहरों का नमकरण भी भारतीय शहरों के नाम पर ही हुआ है। मंदिर के पुजारी हिन्दी पढ़ाते थे। गोरखपुर के गाँव से त्रिनिदाद गये पं. कपिलदेव अंग्रेजी नहीं जानते थे, जिन्दगी भर देहाती हिन्दी बोलते रहे, मगर उनके ही पौत्र वी.एस. नायपाल ने अंग्रेज़ी में साहित्य लिखकर नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। इसी तरह हरिशंकर आदेश हिन्दी अधिकारी के रूप में कभी त्रिनिदाद गये थे, मगर आज वे वहाँ के महाकवि हैं। गर्व की बात है कि हिंदीभाषी श्रीमती कमला प्रसाद बिसेसर आज हमारे देश की प्रधानमंत्री हैं। अब वहाँ हिन्दी को विदेशी भाषा के रूप में नहीं,बल्कि राष्ट्रीय भाषा के रूप में पढ़ाने की बात उठ रही है। दुख तब होता है जब हम दिल्ली आकर भी हिन्दी नहीं सुनते।

हंगरी के बुदापेस्ट विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.मारिया नेज्येशी ने बताया कि हंगरी में १८७३ से भारतीय विद्या के रूप में संस्कृत पढ़ायी जाती है। हिन्दी शिक्षण का कार्य वहाँ ५०-६० साल पहले शुरू हुआ। हंगरी में कुल ५०० भारतीय होंगे, मगर बीस वर्षों में दो हजार से ज्यादा लोग वहाँ हिन्दी से जुड़े। उनमें से एक मेरी हंगरियन शिष्या आज ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफ़ेसर है। हिन्दी के कारण ही मैं आज पूरी दुनिया से जुड़ी हुई हूँ।

मारिशस में विश्व हिन्दी सचिवालय के उप महासचिव श्री गंगाधरसिंह सुखलाल ‘गुलशन’ ने विदेशों में फल-फूल रहा नया भारतवंशी समाज अपने पुरखों की थाती को सुरक्षित रखना चाहता है। जापान के विकास का भी यही कारण है कि यह आधुनिकीकरण के यूरोपीय मॉडल को नकारकर अपनी संस्कृति के अनुसार आधुनिकता को परिभाषित कर रहा है। ओसाका विश्वविद्यालय के प्रो. हरजेन्द्र चौधरी ने हिन्दी अपना प्रचार-प्रसार अपने बल पर कर रही है। भारत से सहयोग की अपेक्षा मौन उपेक्षा ज्यादा मिल रही है। जापान के विद्वानों ने जिस तन्मयता और समर्पण भाव से हिन्दी की सेवा की है,वह समर्पंण,वह त्याग भारत सहित किसी भी विकासशील देश के लिए प्रेरणादायक है।
ओसाका के प्रो.तोमियो मिजोकामि ने फ़िल्मी गीतों और संवादों के माध्यम से नयी पीढ़ी को हिन्दी से जोड़ने का अपना अनुभव बताया। उन्होने ‘मुगले आज़म’ ‘मदर इंडिया’ जैसी महत्वपूर्ण फ़िल्मों के संवादों की भव्य पुस्तकें प्रकाशित कर और देश-विदेशों में अपने छात्र-छात्राओं द्वारा हिन्दी नाटकों का मंचन कर एक नया इतिहास रचा।
दैनिक ‘जनसत्ता’ के कार्यकारी सम्पादक और ‘मुअन जोदड़ो’ यात्रावृत्त के यशस्वी लेखक श्री ओम थानवी ने जापानी फ़िल्म निर्देशक कुरसोवा और सत्यजीत राय के सम्बंधों को याद करते हुए ‘अज्ञेय’ की जापान में लिखी ‘अरी ओ करुणा प्र्भामय’ और जापानी लोककथा पर आधारित लम्बी कविता ‘असाध्यवीणा’ की चर्चा की और कहा कि कैदी ‘अज्ञेय’ की जिस पहली कहानी को प्रेमचन्द और जैनेन्द्र ने ‘जागरण’ में छापा था, उसकी एकमात्र प्रति इसी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में सुरक्षित है। डेनमार्क से पधारी डॉ.अर्चना पैन्युली ने कहा कि डेन्मार्क में जो प्रतिष्ठा पाँच करोड़ लोगों की भाषा डैनिश को मिली हुई है, वह भारत में करोड़ों की भाषा हिन्दी को नहीं। मातृभाषा को अपर्याप्त महत्व देना अस्वस्थ लोकतंत्र का परिचायक है और मानव अधिकार के खिलाफ़ है।

सम्मेलन के कुशल संयोजक और संचालक प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण ने धन्यवाद-ज्ञापन के क्रम में बताया कि जापानी छात्र-छात्राओं की भारतीय संस्कृति, वेशभूषा, खानपान के प्रति गहरी रुचि है। ये बच्चे हिन्दी सीखकर उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्र में दोनो देशों के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन रहे हैं। भारत में लगनेवाले उद्योगों में हिन्दी जाननेवाले जापानी युवक-युवतियों की बड़ी माँग है। भारत में अन्य विकसित देशों की भाषाओं के शिक्षण की आज भी पर्याप्त व्यवस्था नही है और प्रतिभाशाली बच्चे यदि अंग्रेज़ी सीखने के बजाय अन्य विदेशी भाषा सीखें, तो उनके लिए रोजगार के ज्यादा अवसर हैं।

इस अवसर पर काव्यपाठ करने के लिए आमन्त्रित, अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित कवि डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र ने प्रारम्भ में कहा कि मैं जापान इसलिए भी आना चाहता था कि यहाँ के नागरिक जिस तरह अपने देश और देश की भाषा और संस्कृति से प्रेम करते हैं, वह भारतीयों के मन में आत्मविश्वास भरने में रोल मॉडल बन सकता है। डॉ मिश्र के गीतों और मुक्तकों ने देर तक बहुदेशीय श्रोताओं को आनन्दित किया।

शाम को जापानी बच्चों ने प्रसिद्ध जापानी लोककथा ‘उराशिमातारो’ के आधार पर डॉ. ऋतुपर्ण द्वारा रचित नाटक ‘प्रसन्ना’ का सफल मंचन कर दर्शकों का मन मोह लिया। दूसरे दिन २९ जनवरी को ‘हिन्दी शिक्षण का वैश्विक परिदृश्य’ पर चर्चा में प्रो.तोमियो मिजोकामि(जापान), प्रो.मारिया नेज्येशी (हंगरी), डा. अर्चना पैन्यूली (देनमार्क), प्रो. सुषम बेदी(अमेरिका) ने अपने अनुभव बाँटे। ‘हिन्दी के वैश्विक प्रचार-प्रसार में हिन्दी सिनेमा और संगीत का योगदान’ विषय पर चर्चा में प्रो.तोमियो मिजोकामि (ओसाका), श्री हंस हनूमान सिंह (त्रिनिदाद), श्री ओम थानवी एवं श्री अतुल तिवारी (भारत) ने अपने विचार व्यक्त किये। तृतीय सत्र ‘नई सदी में हिन्दी का बदलता स्वरूप’ पर था, जिसकी अध्यक्षता प्रो.सुषम बेदी (अमेरिका) ने की। इसमें भारत के डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र, श्री जगदीश उपासने, डॉ. पद्मजा शर्मा और डॉ. अमिषा अनेजा ने जीवन्त चर्चा की। शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत मुंबई के श्री शेखर सेन के कबीर, तुलसी और विवेकानंद पर प्रस्तुत एकल काव्याभिनय और गायन से हुई। उसके बाद ‘ससुराल गेंदा फूल’, ‘डार्लिंग’ आदि गानों से अपार लोकप्रियता हासिल करनेवाली पार्श्वगायिका रेखा विशाल भारद्वाज ने अपने गानों से लोगों को मन्त्रमुग्ध कर दिया।

तीसरे दिन की शुरुआत ‘जापान में हिन्दी: विविध आयाम’ विषय से हुई,जिसमें प्रो. हरजेन्द्र चौधरी (ओसाका) के अलावा योइचि सुकुशिता (तोक्यो), प्रो.हिदेआकि इशिदा (साइतमा), श्रीमती मिवाको कोइजुका (ओसाका), प्रो.योशिफमि मिजुनो (तोक्यो), केइको शिराइ और प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण ने जापान में हिन्दी शिक्षण की उपलब्धियों और कठिनाइयों पर विस्तार से चर्चा की। अन्तिम सत्र ‘सूचना प्रौद्योगिकी एवं जन संचार माध्यमों मेंहिन्दी का अनुप्रयोग पर था, जिसमें श्री आर. चन्द्रशेखर, श्री गगन शर्मा, डॉ. माधुरी सुबोध और श्री मुनीस शर्मा ने भाग लिया।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि ओसाका में भारत के कौंसलाधीश एवं अंग्रेज़ी उपन्यास ‘क्यू एंड ए’ (जिसपर ‘मिलनेयर स्लमडॉग’ बनी) के लेखक श्री विकास स्वरूप थे। भारतीय प्रतिनिधियों की ओर से श्री ओम थानवी और विदेशी प्रतिनिधियों की ओर से श्री हंस हनूमानसिंह ने उद्गार व्यक्त किये। इस अवसर पर भारतीय संस्था ‘स्वयम्प्रभा’ (देहरादून) की ओर से शाल ओढ़ाकर महामहिम विकास स्वरूप, डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र और श्री गंगाधरसिंह सुखलाल ने प्रो.ताकेइ फुजिइ को सम्मानित किया। डॉ. ऋतुपर्ण ने संगोष्ठी का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया और प्रो.ताकेशि फुजिइ ने जापान सरकार, भारत सरकार, प्रतिनिधियों और सहयोगियों के प्रति धन्यवाद-ज्ञापन करते हुए सम्मेलन को सफ़ल बनाने में भारतीय दूतावास के काउंसलर श्री टी.एन.अनंतकृष्ण, डिप्टी चीफ़ ऑफ़ मिशन श्री संजय पांडा, मिनिस्टर (मीडिया) श्री रवि माथुर, एयर इंडिया के मैनेजर (जापान) श्री उज्ज्वल घोष, ‘स्पाइस मैजिक कलकत्ता’ के स्वामी श्री जगमोहन एवं बेला चन्द्राणी, श्रीमती मधुलिका ऋतुपर्ण तथा हिन्दी विभाग के छात्र-छात्राओं के सक्रिय योगदान के प्रति आभार व्यक्त किया।

देवमणि पांडेय के गजल संग्रह ‘अपना तो मिले कोई’ का लोकार्पण

शायर देवमणि पाण्डेय के गजल संग्रह ‘अपना तो मिले कोई’का विमोचन १२ फरवरी को भवंस कल्चरल सेंटर, मुम्बई के एसपी जैन सभागार में धूमधाम से सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर सभागार में कई महत्वपूर्ण शायर, कवि, पत्रकार और कलाकार उपस्थित थे। पुस्तक का लोकार्पण करते हुए मशहूर शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने कहा कि इस किताब के बाद देवमणि पांडेय ने अपनी साहित्यिक यात्रा का पहला पड़ाव पार कर लिया है। इस किताब को पढ़ते हुए कई शेरों पर उंगली ठहर गई और कई शेर चमकते हुए दिखे। देवमणि ने अपनी मेहनत से पाठकों का विश्वास प्राप्त किया है। उन्होने देवमणि पाण्डेय के कुछ शेर भी पढ़े।

इस अवसर पर अब्दुल अहद साज़ ने कहा कि हिंदी ग़ज़ल से उर्दू शायरी की तरफ़ आने वालों में देवमणि पांडेय का नाम अलग मुकाम रखता है। यूँ तो देवमणि पाण्डेय के कलाम में कई पहलू हैं मगर दो पहलू ज़्यादा साफ़ हैं। एक तो उनका तज़रुब-ए-इश्क़ (प्रेम-अनुभव) और दूसरा आज के समाज के बीच बसर करते हुए सामान्य आदमी का कर्ब और घुटन! उन्होंने अपने पैरो चली ज़मीन और अपने सर पर लदे हुए आसमान को अपने क़लम से ब-ख़ूबी दर्शाया है। देवमणि पाण्डेय का यह काव्य संकलन ‘अपना तो मिले कोई’ पढ़ते हुए आपको ये अंदाज़ा बख़ूबी हो सकेगा कि उर्दू के आसमान पर हिंदी के सितारे कितनी ख़ूबसूरती से टाँके जा सकते हैं और हिंदी के गुलशन में उर्दू के फूल कितने प्यार से खिलाए जा सकते हैं। ज़फ़र गोरखपुरी, शमीम तारिक़ , डॉ. शैलेश श्रीवास्तव, युसूफ दीवान, हैदर , अब्दुल अहद साज, ज़मीर काजमी, राम गोविंद अतहर, शमीम तारिक़, ज़फ़र गोरखपुरी आदि वरिष्ठ रचनाकारों ने देवमणि पांडेय को शुभकामनाएँ व्यक्त करते हुए अपना रचनाएँ पढ़ीं।

देवमणि पांडेय ने शाल और गुलदस्ता भेंट करके किताबुन्निसा का स्वागत किया। समारोह की अध्यक्षता नक़्श लायलपुरी साहब ने की। कार्यक्रम के बीच में देवमणि पाण्डेय ने अपनी रचनायात्रा पर अपने विचार रखते हुए मजरूह सुल्तानपुरी को याद किया और बोले कि मेरा परिचय यह है कि मैं मजरूह साहब के नगर सुल्तानपुर का हूँ। इस लोकार्पण समारोह में किताब के डिजायनर जैन कमल ने अपनी बात रखी और एक जैनमुनि की ओर से देवमणि को मोतियों की माला भेट की। समारोह के आरम्भ में वरिष्ठ शायर नंदलाल पाठक ने शायरों का स्वागत किया। कवयित्री माया गोविंद ने देवमणि पांडेय को उनकी लगनशीलता और लेखन की तारीफ करते हुए इस तरह बधाई दी-

‘अपना तो मिले कोई’ कृति ये जो तुम्हारी है हर दिल में उतर जाए आशीष हमारी है
बज़्में अदब में छाए यह है दुआ हमारी हर दिल अज़ीज़ होगी हर इक ग़ज़ल तुम्हारी
तेरे सुख़न का ऐ देव अंदाज़ है निराला घायल के लिए मरहम प्यासों के लिए प्याला

समारोह का संचालन कवयित्री प्रज्ञा विकास ने किया उन्होंने भी अपने कलाम पढ़े। आभार प्रदर्शन समकालीन हिंदी कविता के चर्चित कवि बोधिसत्व ने किया। इस मौके पर साहित्य, संगीत और सिने जगत से कुमार प्रशांत, यज्ञ शर्मा, डॉ.सत्यदेव त्रिपाठी, हृदयेश मयंक, डॉ.सुषमा सेन, कविता गुप्ता, खन्ना मुज़फ्फरपुरी, रेखा रोशनी, बसंत आर्य, अनंत श्रीमाली, सिंगर राजकुमार रिज़वी, संगीतकार विवेक प्रकाश, गायिका रश्मिश्री, उदघोषिका प्रीति गौड़ और वीर सावरकर से प्रसिद्ध अभिनेता शैलेंद्र गौड़ उपस्थित थे।
चित्र में : (बाएं से दाएं)- संचालक प्रज्ञा विकास, शायर देवमणि पांडेय, शायर ज़फ़र गोरखपुरी, लोक गायिका डॉ. शैलेश श्रीवास्तव, शायरा दीप्ति मिश्र, कवयित्री माया गोविंद, चित्रकार जैन कमल

अवनीश सिंह चौहान को थिंक क्लब वार्षिक पुरस्कार

संयुक्त राज्य अमेरिका: संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित द थिंक क्लब ने पूर्वाभास के संपादक अवनीश सिंह चौहान को हिंदी भाषा और साहित्य की उन्नति हेतु थिंक क्लब वार्षिक पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की है। थिंक क्लब हिंदी भाषा की उन्नति के लिए प्रतिबद्ध है। पुरस्कार की रकम १५,००० रुपये है। थिंक क्लब का मानना है कि पूर्वाभास के द्वारा किये गए प्रयास हिंदी जगत के संघर्षरत कवियों ओर लेखकों के लिये आवश्यक मंच प्रदान करते हैं।

थिंक क्लब की ओर से पुरस्कार चयन समिति ने उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए कामना की है कि उनका यह रचनात्मक कार्य अनवरत चलता रहे। इस पुरस्कार हेतु चयन समिति के अध्यक्ष अनिल श्रीवास्तव (प्रबंध सम्पादक, थिंक क्लब पब्लिकेशन्स,ब्लूमफील्ड हिल्स, मिशीगन, यूं एस ए) ने ८ फरवरी २०१२ को यह घोषणा की है।

बांग्ला फ़ीचर फिल्म में डॉ. अभिज्ञात का अभिनय व हिन्दी कविता

नेचर पार्क में बांग्ला फिल्म "एक्सपोर्टः मिथ्या किन्तु सत्य" के एक दृश्य में बाएँ से डॉ.अभिज्ञात व पुलक देव

कोलकाता, भ्रूण के निर्यात जैसे गंभीर विषय को पूरी शिद्दत से उठाने वाली बांग्ला फ़ीचर फ़िल्म "एक्सपोर्टः मिथ्या किन्तु सत्य" में हिन्दी के सुपरिचत कवि-पत्रकार डॉ.अभिज्ञात ने अभिनय किया है। इस फिल्म में न सिर्फ़ उन्होंने एक कवि की भूमिका निभाई है बल्कि अपने नये कवि संग्रह 'खुशी ठहरती है कितनी देर' में संग्रहित कविता 'करतूतें' का कुछ अंश उन्होंने इसमें पढ़ा है। कोलकाता के 'नेचर पार्क' में उन्होंने फिल्म की अपनी शूटिंग पूरी की। अपने छात्र जीवन में डॉ.अभिज्ञात रंगमंच से जुड़े थे और उस दौर में उन्होंने अभिनय और नाट्य निर्देशन किया था। उसके कुछ वर्ष बाद उन्होंने एक बांग्ला धारावाहिक 'प्रतिमा' में अभिनय किया था, जिसमें डॉक्टर की भूमिका निभाई थी। अब वे अपने कवि रूप को बड़े परदे पर साकार कर रहे हैं। फिल्म का विवरण इस प्रकार है-प्रस्तुति-फिल्म बी आइडियल, प्रोड्यूसर-प्रसन्न कुमार राय, कहानी, स्क्रिप्ट और निर्देशन-समीर बनर्जी। अभिनयः शुभाशीष मुखर्जी, अरुण मुखर्जी, स्वागत, पुलकिता घोष, विश्वजीत चक्रवर्ती, महेश कौशिक, चंद्रचूर, पूजा बनर्जी, डॉ.अभिज्ञात, पुलक देव। प्रोडक्शन टीमः चीफ असिस्टेंट डायरेक्टर-अरुणांशु चौधरी, असिस्टेंट डाय़रेक्टर-प्रतीति घोष, स्वपन नंदी, अरनब साह, समीर राय, सिनेमेट्रोग्राफी-विनोद गौतम, एडिटिंग-कृष्णा कान्त पाल, आर्ट डायरेक्टर-मानिक भट्टाचार्य, संगीत-राजा राय। कुल दो रवीन्द्र संगीत-‘जाते जाते एकला पथे’ व ‘जा हासिए जाय’। दोनों की गायिका जया विश्वास।

डॉ. अभिज्ञात पेशे से पत्रकार हैं और इन दिनों सन्मार्ग में डिप्टी न्यूज एडिटर हैं। बतौर साहित्यकार भी उन्होंने अपनी पहचान बनायी है तथा सात कविता संग्रह, दो उपन्यास और एक कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। दूसरा कहानी संग्रह शीघ्र प्रकाश्य है। उन्होंने कवि केदारनाथ सिंह पर कलकत्ता विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट किया है।


उषा राजे सक्सेना को ‘विद्या वाचस्पति’- डी.लिट् की मानद उपाधि

साहित्य साधना में मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा के लिए, पं. रामखेलावन पाण्डेय की स्मृति में राष्ट्र-भाषा प्रचार परिषद- प्रयाग द्वारा ‘साहित्य प्रवीण’ की मानद उपाधि से सम्मानित, विदुषी लेखिका उषा राजे सक्सेना को साहित्य, संस्कृति, समाज एवं विदेश में अमूल्य हिंदी सेवा के लिए ‘देवगुरू वृहस्पति अकादमी’- कानपुर, उत्तर प्रदेश, ने दिनांक २९ नवंबर २०११ को ‘साहित्य वाचस्पति’- डी.लिट. की मानद उपाधि से विभूषित और पुरस्कृत किया। तत्पश्चात जनवरी २०१२ को प्रवासी दुनिया एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद- दिल्ली ने विष्णु प्रभाकर जन्म शताब्दी समारोह एवं अक्षरम् के दसवें अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव में उन्हें ‘अक्षरम साहित्य सम्मान’ से अलंकृत किया।

हिंदी के प्रति समर्पित उषा जी, हिंदी से संबंधित विभिन्न आयोजनों में सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं। विश्व हिंदी सम्मेलन से लेकर ब्रिटेन में वैश्विक स्तर पर आयोजित हिंदी आयोजनों में आपका उल्लेखनीय योगदान रहा है। ब्रिटेन में प्रकाशित हिंदी की त्रैमासिक पत्रिका पुरवाई से जुड़ी उषा जी पिछले बीस वर्षों से ब्रिटेन के साहित्यिक परिदृश्य से जुड़ी हुई हैं।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

व्यंग्यकार एवं चित्रकार मनोहरलाल हर्ष की पुस्तक मूषक पुराण का विमोचन

बीकानेर । हास्य व्यंग्य रचनाकार एवं चित्रकार मनोहरलाल हर्ष कवि हृदय की पुस्तक मूषक पुराण का विमोचन रविवार को मरूधर हैरिटेज होटल में हुआ। विमोचन की कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लालेश्वर महादेव मंदिर शिवबाड़ी के अधिष्ठाता संवित सोमगिरी जी महाराज ने कहा कि पुराणों में हमारा धर्म और संस्कृति समाहित है, कृति मूषक पुराण में हर्ष ने पुराण शब्द और पुराणों के प्रति श्रद्धाभाव का प्रदर्शन करते हुए पौराणिक प्रसंगों का बारीकी से चित्रण किया है, जो एक बेजोड़ मिसाल है। उन्होंने कहा कि मनोहरलाल हर्ष की कविताओं में गहराई और सौम्यता है, इनके माध्यम से उनके चित्त को टटोलें तो ऐसा लगता है कि मानो वे सागर में कुछ ढूंढ रहे हैं, कविताएं मोती के समान पिरोई हुई लगती हैं। महाराज ने कहा कि कवि ने पौराणिक और समसामयिक घटनाओं को मूषक पुराण में वर्णित करते हुए समाज का ध्यान आकर्षित किया है।

सोमगिरी जी महाराज ने कहा कि मूषक भगवान श्री गणेश का वाहन है और यह आध्यात्म और बुद्धि का प्रतीक है, कवि ने नूतन तरीके से हास्य और व्यंग्य का समावेश किया है। पुस्तक लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि और बीकानेर के महापौर भवानी शंकर शर्मा ने कहा कि पुस्तक में रिश्वतखोरों के प्रति रोष है तो आतंकवादियों को नेस्तनाबूद करने का हौसला भी है, इसमें संगीत की साधना और हास्य रस की फुहार का अनोखा संगम है। हर्ष की कविताओं में हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ राष्ट्र प्रेम, परमार्थ और स्पष्टवादिता का भी अनूठा संगम है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति अकादमी के अध्यक्ष श्याम महर्षि ने कहा कि मूषक की हमारी पौराणिक संस्कृति में गणेश के वाहन के रूप में विशिष्ट पहचान है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समाज में गंभीरता और भागमभाग के दौर में हास्य-व्यंग्य की यह पुस्तक सुखद अहसास कराएगी। वरिष्ठ कवि और साहित्यकार भवानी शंकर व्यास विनोद ने कहा कि हर्ष की कविताएं गुदगुदाने वाली हैं, इससे पाठक हंसने के साथ-साथ सोचने पर भी मजबूर होंगे। उन्होंने छः तरीकों के व्यंग्यों का जिक्र करते हुए कहा कि कविहृदय ने मूषक पुराण में चूहों को माध्यम बनाकर समाज की असहनीय स्थितियों पर आक्रोष व्यक्त किया है।

मूषक पुराण पर अपनी पाठकीय टीप में वरिष्ठ साहित्यकार सरल विशारद ने कहा कि पुस्तक में चूहों के माध्यम से सामाजिक बुराईयों पर कटाक्ष किए गए हैं। उन्होंने चूहे को मानवता के लिए उपयोगी जीव बताते हुए कहा कि जीवन रक्षक औषधियों का शोध चूहों पर ही किया जाता है। लोकार्पण समारोह में रचनाकार मनोहर लाल हर्ष ने मूषक पुराण की चुनिंदा कविताओं का पाठ करते हुए मूषक पुराण बनाने का कारण, मूषक की किस्मों और पौराणिक कथाओं के बारे में बताया। समारोह के संरक्षक गीतकार एवं वरिष्ठ उद्घोषक चंचल हर्ष ने कहा कि मूषक की कथा अपने आप में अद्भुत है, उन्होंने कविता पाठ किया और सभी का आभार व्यक्त किया। समारोह का संचालन प्रसिद्ध व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने किया। युवा साहित्यकार संजय आचार्य वरूण ने पुस्तक पर पत्रवाचन किया। लोकार्पण समारोह में लेखक, कवि, साहित्यकार तथा गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

‘देवराज वर्मा उत्कृष्ट काव्य सृजन सम्मान- २०१२’ हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित

साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’ के तत्वावधान में गतवर्षों की भाँति इस वर्ष भी स्व. श्री देवराज वर्मा की सप्तम् पुण्यतिथि ७ दिसम्बर, २०१२ को उत्कृष्ट साहित्यिक कृति पर प्रदान किये जाने वाले ‘देवराज वर्मा उत्कृष्ट काव्य सृजन सम्मान- २०१२’ हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जाती हैं जिसके अंतर्गत रु0 ११००/= की नकद धनराशि, अंगवस्त्र, मानपत्र, श्रीफल नारियल तथा प्रतीक चिन्ह प्रदान किया जायेगा। उक्त सम्मान हेतु काव्य की किसी भी विधा में वर्ष २०१२ तथा२०१२ में प्रकाशित मौलिक साहित्यिक कृति प्रविष्टि हेतु पात्र होगी। सम्मान हेतु कृति का चयन एक निर्णायक मंडल द्वारा किया जायेगा। निर्णायक मंडल का निर्णय अंतिम तथा प्रत्येक स्थिति में मान्य होगा जिस पर किसी भी प्रकार की आपत्ति अथवा विवाद स्वीकार्य नहीं होगा। सम्मान हेतु पता लिखा एक पोस्ट कार्ड तथा एक पता लिखा टिकिट लगा लिफाफा सहित मौलिक साहित्यिक कृति की ४ प्रतियाँ दिनांकः ३१ अगस्त, २०१२ तक पंजीकृत/स्पीडपोस्ट/कोरियर द्वारा योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’, संयोजक- साहित्यिक संस्था ‘अक्षरा’, ए.एल.-४९, सचिन स्वीट्स के पीछे, दीनदयाल नगर फेज़-प्रथम्, काँठ रोड, मुरादाबाद-२४४००१ (उ.प्र.) के पते पर पहुँच जानी चाहिए। अंतिम तिथि के पश्चात प्राप्त किसी भी प्रविष्टि का उक्त सम्मान हेतु संज्ञान लिया जाना संभव नहीं होगा।