सोमवार, 26 दिसंबर 2011

अभिव्यक्ति-२०११ नवगीत परिसंवाद एवं विमर्श का सफल आयोजन

चित्र में- जमीन पर बैठे बाएँ से प्रवीण सक्सेना, आनंद कुमार गौरव, पूर्णिमा वर्मन, डॉ. अमिता दुबे, संध्या सिंह और अवनीश कुमार चौहान। कुर्सी पर बाएँ से- वीरेन्द्र आस्तिक, कमलेश भट्ट कमल, मधुकर अष्ठाना, ओम प्रकाश चतुर्वेदी पराग, माहेश्वर तिवारी, ओम प्रकाश सिंह, निर्मल वर्मा, शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान, पीछे खड़े हुए बाएँ से- डॉ जगदीश व्योम, अनिल श्रीवास्तव, जय प्रकाश त्रिवेदी, श्याम श्रीवास्तव, विनय भदौरिया, सत्येन्द्र तिवारी, जय चक्रवर्ती, आदित्यकुमार वर्मन (पीछे), रमा कान्त, डॉ. विजयकर्ण (पीछे), शैलेन्द्र श्रीवास्तव, योगेन्द्र वर्मा व्योम, गीता सिंह, सुनील कुमार परिहार एवं सत्येन्द्र रघुवंशी।
लखनऊ २६ एवं २७ नवंबर २०११ को अभिव्यक्ति विश्वम् के सभाकक्ष में जाल पत्रिकाओं अभिव्यक्ति एवं अनुभूति (http://www.abhivyakti-hindi.org तथा http://www.anubhuti-hindi.org ) द्वारा नवगीत परिसंवाद एवं विमर्श का सफल आयोजन किया गया। इस अवसर पर १८ वरिष्ठ नवगीतकारों सहित नगर के जाने माने अतिथि, वेब तथा मीडिया से जुड़े लोग, संगीतकार व कलाकार उपस्थित थे। निरंतर दो दिवस चले छह सत्रों में नवगीत के विभिन्न पहलुओं, यथा- नवगीत की वर्तमान स्थिति, नवगीत का उद्गम इतिहास, वर्तमान चुनौतियों एवं नवगीत हेतु आवश्यक मानकों एवं प्रतिबद्धताओं पर विस्तृत सार्थक चर्चा हुई।

पहले दिन की सुबह कार्यक्रम का शुभारंभ लखनऊ की बीएसएनल के जनरल मैनेजर श्री सुनील कुमार परिहार ने दीप प्रज्वलित कर किया। सरस्वती वंदना रश्मि चौधरी ने पंकज चौधरी की तबला संगत के साथ प्रस्तुत की। दो दिनों के इस कार्यक्रम में प्रतिदिन तीन तीन सत्र हुए जिसमें अंतिम सत्र मनोरंजन संगीत और कविता पाठ के रहे।

नवगीतों पर आधारित पूर्णिमा वर्मन के फोटो कोलाज की प्रदर्शनी इस कार्यक्रम में आकर्षण का केन्द्र रही। प्रदर्शनी के लिये उन्हीं नवगीतकारों के नवगीतों को चुना गया था जो वहाँ उपस्थित नहीं थे, यह आयोजकों की दूरदर्शिता का परिचायक तो था ही साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से उन नवगीतकारों को फोटो-कोलाज के माध्यम से इस समारोह में सम्मिलित तथा सम्मानित करना भी था।

२६ नवंबर का पहला सत्र समय से संवाद शीर्षक से था। इसमें विनय भदौरिया ने अपना शोधपत्र नवगीतों में राजनीति और व्यवस्था, शैलेन्द्र शर्मा ने नवगीतों में महानगर, रमा कान्त ने नवगीतों में जनवाद, तथा निर्मल वर्मा ने अपना शोधपत्र क्या नवगीत आज के समय से संवाद करने में सक्षम है पढ़ा। अंतिम वक्तव्य वरिष्ठ रचनाकार माहेश्वर तिवारी जी ने दिया।

दूसरे सत्र का विषय था- नवगीत की पृष्ठभूमि कथ्य-तथ्य, आयाम और शक्ति। इसमें अवनीश चौहान ने अपना शोध पत्र नवगीत कथ्य और तथ्य, वीरेन्द्र आस्तिक ने नवगीत कितना सशक्त कितना अशक्त, योगेन्द्र वर्मा ने नवगीत और नई पीढ़ी तथा माहेश्वर तिवारी ने नवगीत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पढ़ा। अंतिम वक्तव्य डॉ ओमप्रकाश सिंह का रहा।

सायं चाय के बात तीसरे सत्र में आनंद सम्राट के निर्देशन में शोमू, आनंद दीपक और रुचिका ने सुमग संगीत का कार्यक्रम प्रस्तुत किया। संगीत सम्राट आनंद का था तथा गायक थे रुचिका श्रीवास्तव और दीपक। गिटार और माउथ आर्गन पर संगत शोमू सर ने की। कार्यक्रम में वरिष्ठ गीतकार माहेश्वर तिवारी एवं कुमार रवीन्द्र के नवगीतों को प्रस्तुत किया गया। इसके बाद पूर्णिमा वर्मन ने अपनी पावर पाइंट प्रस्तुति दी जिसका विषय था- हिंदी की इंटरनेट यात्रा अभिव्यक्ति और अनुभूति के साथ नवगीत की पाठशाला तक।

दूसरे दिन का पहला सत्र नवगीत वास्तु शिल्प और प्रतिमान विषय पर आधारित था। इसमें जय चक्रवर्ती ने नवगीत का शिल्प विधान, शीलेन्द्र सिंह चौहान ने नवगीत के प्रतिमान, आनंद कुमार गौरव ने गीत का प्रांजल रूप है नवगीत, डॉ ओम प्रकाश ने समकालीन नवगीत के विविध आयाम तथा मधुकर अष्ठाना ने नवगीत और उसकी चुनौतियाँ विषय पर अपना वक्तव्य पढ़ा। अंतिम वक्तव्य वीरेन्द्र आस्तिक ने दिया।

दूसरे सत्र में जिसका शीर्षक था- नवगीत और लोक संस्कृति में डॉ. जगदीश व्योम ने लोकगीत में लोक के छीजने की पीड़ा, श्याम नारायण श्रीवास्तव ने नवगीतों में लोक की भाषा के प्रयोग तथा सत्येन्द्र तिवारी ने नवगीत में भारतीय संस्कृति विषय पर अपना शोधपत्र पढ़ा। अंतिम वक्तव्य रमाकांत का रहा। दोनो दिनों के इन चारों सत्रों में प्रश्नोत्तर एवं परिसंवाद के सत्र वैचारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहे।

दूसरे दिन के अंतिम सत्र में कविता पाठ का कार्यक्रम था जिसमें उपस्थित रचनाकारों ने भाग लिया। कविता पाठ करने वाले रचनाकारों में थे- अनिल श्रीवास्तव, संध्या सिंह, विनय भदौरिया, अवनीश सिंह चौहान, डॉ. जगदीश व्योम, वीरेन्द्र आस्तिक, शैलेन्द्र शर्मा, सत्येन्द्र तिवारी, रमा कान्त, जय चक्रवर्ती, डॉ. ओम प्रकाश सिंह, योगेन्द्र वर्मा व्योम, माहेश्वर तिवारी, आनंद गौरव, कमलेश भट्ट कमल, श्याम श्रीवास्तव, शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान, मधुकर अष्ठाना, निर्मल शुक्ल, पूर्णिमा वर्मन, सत्येन्द्र रघुवंशी विजय कर्ण, डॉ. अमिता दुबे, और राजेश शुक्ल। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि ओम प्रकाश चतुर्वेदी पराग रहे। धन्यवाद ज्ञापन के बाद सबको स्मृतिचिह्न प्रदान किये गए।

चौबीसवां अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन सम्पन्न

बिहार राज्य माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उदघाटन बी.एन. मण्डल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. अमरनाथ सिन्हा ने किया। समारोह की अध्यक्षता बिहार–राष्ट्रभाषा परिषद की उपनिदेशक तथा परिषिद् पत्रिका की सम्पादक डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र ने की।

कार्यक्रम का शुभ आरंभ कलानेत्री पल्लवी विश्वास सुमधुर कण्ठ से निकले मंगलाचरण से हुआ। इसके बाद गोपाल सिंह ने नेपाली की भतीजी एवं लोकप्रिय गायिका सविता सिंह नेपाली ने कविवर नेपाली के चर्चित गीत ‘हम बाबुल की चिड़ियाँ रे’ का गायन प्रस्तुत कर श्रोताओं को भावुकता के शिखर तक पहुँचा दिया। इसके बाद राजकुमार प्रेमी ने स्वररचित देश–गान प्रस्तुत किया। संस्था के संयोजक प्रख्यात कथाकार एवं आलोचक डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने अपने स्वागत–भाषण में कहा कि लघुकथा किसी कथानक का संक्षिप्तीकरण नहीं है, अपितु यह अपने आप में एक पूर्ण रचना है जो पूरी क्षिप्रता के साथ स्थूल से सूक्ष्म तक पहुँचकर अपना औचित्य बहुत ही सलीके से प्रस्तुत करती है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि सन् १९८८ में जब लघुकथा–सम्मेलनों का सिलसिला शुरू किया था तो हमने पच्चीस सम्मेलन करने का निर्णय लिया था। अगला वर्ष यानी २०१२ में आयोजित सम्मेलन पच्चीसवाँ होगा, जिसे द्वि दिवसीय रूप में पटना में ही आयोजित किया जाएगा।

इस अवसर पर प्रख्यात आलोचक डॉ. विजेन्द्र नारायण सिंह, मगध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति तथा व्याकरणाचार्य डॉ. रामदेव प्रसाद एवं ‘आरोह–अवरोह’ के संपादक डॉ. शंकर प्रसाद, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रधानमंत्री राम नरेश सिंह एवं बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संरक्षक सदस्य डॉ. रमेश चन्द्र पाण्डेय आदि ने अपने विचार प्रकट किये। समारोह में रेली से पधारे सुकेश साहनी, कुरुक्षेत्र से रामकुमार आत्रेय, मुंबई से पधारीं उज्ज्वला केलकर, नागपुर से उषा अग्रवाल एवं डॉ.मिथिलेश अवस्थी, जबलपुर से सनातन कुमार बाजपेयी एवं मोहन लोधिया, बोकारो से डॉ. अब्ज़ इत्यादि की उपस्थित रहे।

अतिथियों के उद्बोधन के पश्चात सम्मान–समारोह आरंभ हुआ, जिसमें सप्रथम विक्रम सोनी को डॉ. परमेश्वर गोयल लघुकथा शिखर सम्मान से सम्मानित किया गया, इसके पश्चात देश के कोने–कोने से पहुँची अन्य प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। भारत से बाहर हाइकु के क्षेत्र में विशेष कार्य करने के लिए डॉ भावना कुँअर और डॉ हरदीप सन्धु को ‘ हाइकु -रत्न सम्मान’ प्रदान किया । लोकार्पण समारोह में ‘टेढ़े–मेढ़े रास्ते’ (पुष्पा जमुआर) , तीसरी यात्रा (वीरेन्द्र कुमार भारद्वाज), सच बोलते शब्द (राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बन्धु), हाथी के दांत (ब्रजनंदन वर्मा), जेठ की धूप (रामचन्द्र यादव), चीखती लपटें (सनातन कुमार बाजपेयी), खामोशियों की झील में (आलोक भारतीय), डॉ परमेश्वर गोयल लघुकथा शिखर सम्मान का इतिहास (सतीशराज पुष्करणा) इत्यादि अनेक पुस्तकों का लोकार्पण हुआ । इस अवसर पर नीलम पुष्करणा द्वारा पुष्करणा ट्रेडर्स की ओर से पुस्तक प्रदर्शनी एवं सिद्धेश्वर द्वारा अपनी बनाई कविता एवं लघुकथा पोस्टर प्रदर्शनी लगाई गई, जिसे उपस्थिति कथाकारों ने देखा, परखा एवं भूरि–भूरि प्रशंसा की।

दूसरे सत्र विचार विमर्श में डॉ. अनीता राकेश (छपरा),उज्ज्वला केलकर (मुम्बई), डॉ. सिद्धेश्वर कश्यप (मधेपुरा) और जीतेन कुमार वर्मा (वर्धमान) द्वारा लघुकथा विषयक आलेख पढ़े गए तथा उन पर सुकेश साहनी, नचिकेता, डॉ. रामदेव प्रसाद, डॉ. यशोधरा राठौर इत्यादि ने अपने सार्थक विचार रखते हुए आलेखों की प्रशंसा की। तीसर सत्र में लघुकथा पाठ हुआ, जिसमें तेईस कथाकारों ने लघुकथा पाठ किया। पठित लघुकथा पर डॉ. मिथिलेश अवस्थी, नृपेन्द्र नाथ गुप्त, नचिकेता, अनीता राकेश इत्यादि ने सार्थक टिप्पणी करते हुए पठित लघुकथाओं पर न केवल संतोष जताया अपितु प्रशंसा व्यक्त की कि इस विधा हेतु यह शुभ संकेत है कि इस प्रकार की श्रेष्ठ लघुकथाएँ आज प्रकाश में आ रही है। जो लघुकथा के उज्जवल भविष्य की ओर संकेत करती है। सम्मेलन के प्रथम तीन सत्रों का कुशल संचालन डॉ. सतीशराज पुष्करणा ने किया तथा कवि सम्मेलन का संचालन कविवर राजकुमार प्रेमी ने किया। प्रचार मंत्री वीरेन्द्र भारद्वाज के धन्यवाद ज्ञापन के साथ चौबीसवाँ अखिल भारतीय सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।

डॉ. सतीशराज पुष्करणा

दिल्ली संवाद की ओर से लोकार्पण और विचार संगोष्ठी

साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ’दिल्ली संवाद’ की ओर से ९ दिसम्बर,२०११ को साहित्य अकादमी सभागार, नई दिल्ली में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने की और मुख्य अतिथि थे डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन वरिष्ठ लेखक और पत्रकार बलराम ने किया। इस आयोजन में भावना प्रकाशन, पटपड़गंज, दिल्ली से प्रकाशित चर्चित चित्रकार और लेखक राजकमल के उपन्यास ’फिर भी शेष’ पर चर्चा से पूर्व भावना प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित दो पुस्तकों – वरिष्ठतम कथाकार हृदयेश की तीन खण्डों में प्रकाशित ’संपूर्ण कहानियां’ और वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल की ’साठ कहानियां’ तथा वरिष्ठ व्यंग्यकार प्रेमजनमेजय पर केंद्रित कनाडा की हिन्दी पत्रिका ’हिन्दी चेतना’ का लोकार्पण किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए बलराम ने भावना प्रकाशन, उसके संचालक श्री सतीश चन्द्र मित्तल और नीरज मित्तल के विषय में चर्चा करने के बाद वरिष्ठतम कथाकार हृदयेश के हिन्दी कथासाहित्य में महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अपने समय के सशक्त रचनाकार रहे हैं जो अस्सी पार होने के बावजूद आज भी निरंतर सृजनरत हैं। वरिष्ठ कथाकार रूपसिंह चन्देल के उपन्यासों और कहानियों की चर्चा करते हुए बलराम ने कहा कि चन्देल के न केवल कई उपन्यास चर्चित रहे बल्कि अनेक कहानियां भी चर्चित रहीं। उन्हीं में से श्रेष्ठ कहानियों का संचयन है उनका कहानी संग्रह – ’साठ कहानियां’। प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेमजनमेजय की व्यंग्ययात्रा पर प्रकाश डालते हुए बलराम ने कहा कि समकालीन व्यंग्यविधा के क्षेत्र में उनका महत्वपूर्ण योगदान है और उनके योगदान का ही परिणाम है कि कनाडा की हिन्दी चेतना ने उनपर केन्द्रित विशेषांक प्रकाशित किया। लेखकों पर बलराम की परिचायत्मक टिप्पणियों के बाद दोनों पुस्तकों और पत्रिका के लोकार्पण डॉ. नामवर सिंह, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय और डॉ. अर्चना वर्मा द्वारा किया गया।

लोकार्पण के पश्चात राजकमल के उपन्यास ’फिर भी शेष’ पर विचार गोष्ठी प्रारंभ हुई। डॉ. अर्चना वर्मा ने अपना विस्तृत आलेख पढ़ा। आलेख की विशेषता यह थी कि उन्होंने विस्तार से उपन्यास की कथा की चर्चा करते हुए उसकी भाषा, शिल्प और पात्रों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। वरिष्ठ गीतकार डॉ. राजेन्द्र गौतम ने उपन्यास की प्रशंसा करते हुए उसे एक महत्वपूर्ण उपन्यास बताया। वरिष्ठ कथाकार अशोक गुप्ता ने उपन्यास पर अपना सकारात्मक मत व्यक्त करते हुए उसके कवर की प्रशंसा की। डॉ. ज्योतिष जोशी ने उसके पात्र आदित्य के चरित्र पर पूर्व वक्ताओं द्वारा व्यक्त मत से अपनी असहमति व्यक्त करते हुए कहा कि उपन्यास ने उन्हें चौंकाया बावजूद इसके कि उसमें गज़ब की पठनीयता है जो पाठक को अपने साथ बहा ले जाती है। उपन्यास पर अपना मत व्यक्त करते हुए बलराम ने कहा कि यह एक महाकाव्यात्मक उपन्यास है।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय ने अपना लंबा वक्तव्य दिया। उन्होंने उपन्यास के अनेक अछूते पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए पूर्व वक्ताओं से अपनी असहमति व्यक्त की, लेकिन लेखक की भाषा और शिल्प की प्रशंसा करने से अपने को वह भी रोक नहीं पाए। भावना प्रकाशन के नीरज मित्तल ने उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर बड़ी मात्रा में दिल्ली और दिल्ली से बाहर के साहित्यकार और साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। डॉ. कमलकिशोर गोयनका,डॉ. रणजीत शाहा, बलराम अग्रवाल,सुभाष नीरव, रमेश कपूर, प्रदीप पंत, उपेन्द्र कुमार, गिरिराजशरण अग्रवाल, राजकुमार गौतम सहित लगभग पचहत्तर साहित्यकार और विद्वान उपस्थित थे।

प्रस्तुत – सुभाष नीरव

थाईलैंड में संपन्न हुआ चौंथा अंतराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन

बैंकाक एवं पटाया, १६ से २१ दिसम्बर, बैकाक स्थित फुरामा सिलोम तथा पटाया स्थित मंत्रपुरा रिज़ोर्ट के सभागार में साहित्य, संस्कृति और भाषा की अंतरराष्ट्रीय वेब-पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम तथा छत्तीसगढ़ राज्य की बहुआयामी साहित्यिक संस्था सृजन-सम्मान द्वारा आयोजित चार दिवसीय चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें बड़ी संख्या में हिंदीप्रेमियों ने प्रतिभागिता रेखांकित की। सम्मेलन में हिंदी के आधिकारिक विद्वान, अध्यापक, लेखक, भाषाविद्, पत्रकार, तकनीकी जानकार एवं अनेक हिंदी प्रचारक के रूप में डॉ. डी.के.जोशी, डॉ. कल्पना टेंभुलकर, डॉ. सुखदेव, अखिल सिंह, डॉ. सत्यविश्वास, क्रियेटिव ट्रेवेल्स के डायरेक्टर विक्की मल्होत्रा, सन्नी मलहोत्रा सहित 5० से अधिक भारतीय तथा थाईलैंड के संस्कृतिकर्मियों ने भाग लिया तथा पर्यटन स्थलों के सांस्कृतिक अध्ययन का लाभ उठाया।
समारोह के प्रारंभ में आयोजन के संयोजक और सृजनगाथा डॉट कॉम के संपादक जयप्रकाश मानस ने स्वागत भाषण देते हुए विस्तार से अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों के बारे में बताया। इस आयोजन को थाईलैंड में आयोजित करने के मूल उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए वेब पत्रिका सृजनगाथा के संपादक जय प्रकाश मानस ने बताया कि सांस्कृतिक दृष्टि से भारत और थाईलैंड में कई समानताएँ हैं। यहाँ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मलेन आयोजित करने के पीछे पवित्र उद्देश्य यही था कि हिंदी संस्कृति थाई संस्कृति के करीब लाना और हिंदी भाषा को यहाँ के वैश्विक वातावरण में प्रतिष्ठापित करना। कार्यक्रम का संचालन साहित्य वैभव के संपादक डॉ. सुधीर शर्मा ने किया। इस अवसर पर स्वर्णभूमि एअरपोर्ट के स्टेशन मास्टर व हिन्दी सेवी श्री संजय सिंह विशेष रूप से उपस्थित थे।

दूसरे सत्र में वरिष्ठ कवि व 'दुनिया इन दिनों' के प्रधान संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना, भोपाल को उनकी कविता संग्रह 'रात जब चंद्रमा बजाता है' तथा स्त्री विमर्श के लिए प्रतिबद्ध लेखिका व आउटलुक, हिन्दी की सहायक संपादिका, गीताश्री को उनकी संपादित कृति 'नागपाश में स्त्री' तथा युवा पत्रकार, दैनिक भारत भास्कर (रायपुर) के संपादक श्री संदीप तिवारी 'राज' की पहली कृति 'ये आईना मुझे बूढ़ा नहीं होने देता' के लिए वर्ष २०११ के सृजनगाथा सम्मान (www.srijangatha.com) से अलंकृत किया गया। यह निर्णय देश के चुने हुए १००० युवा साहित्यकार-पाठकों की राय पर निर्धारित किया गया था। सम्मान स्वरूप उन्हें ११-११ हजार का चेक, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और साहित्यिक कृतियां भेंट की गईं। इसके हिन्दी के चार चिट्ठाकार यहाँ एकसाथ सम्मानित हुए, जिसमें रवीन्द्र प्रभात , नुक्कड़ ब्लॉग की कथा लेखिका अलका सैनी (चंडीगढ़) और उडिया भाषा के अनुवादक ब्लॉगर दिनेश कुमार माली प्रमुख थे। लघु पत्रकारिता के लिए आधारशिला के संपादक दिवाकर भट्ट (देहरादून), ग़ज़लगो सुमीता केशवा (मुंबई) तथा पत्रकारिता के लिए बीपीएन टाईम्स के संपादक ताहिर हैदरी (रायपुर), पीपुल्स समाचार दैनिक के युवा पत्रकार ब्रजेश शुक्ला (जबलुपुर) को भी सृजनश्री सम्मान से अलंकृत किया गया।

इस अवसर पर हिन्दी साहित्य को चिट्ठाकारिता से जोड़ने वाली पत्रिका वटवृक्ष के तृतीय अंक, दिनेश कुमार माली की पुस्तक बंद दरवाजा, (साहित्य अकादमी से सम्मानित ओडिया लेखिका सरोजिनी साहू के कथा संग्रह का हिन्दी अनुवाद) तथा चित्रकार व कवि डॉ. जे.एस.बी.नायडू की दो किताबों का भी विमोचन हुआ, जिसमें ‘जाने कितने रंग’ प्रमुख है।  अंतिम सत्र कविता पाठ की अध्यक्षता की वरिष्ठ कवि डॉ. सुधीर सक्सेना ने की, विशिष्ट अतिथि थे आधार शिला के संपादक डॉ. दिवाकर भट्ट और पांडुलिपि के संपादक जयप्रकाश मानस। इस सत्र में डॉ. जे.एस.बी.नायडू, दिनेश माली, सुमीता केशवा, सीमा श्रीवास्तव, लतिका भावे, युक्ता राजश्री झा, रवीन्द्र प्रभात, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. दीपक बी. जोशी, संदीप शर्मा आदि ने कविता पाठ किया। चौंथे अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन की खास विशेषता रही दो चित्रकारों की कलाकृतियों की खुली प्रदर्शनी। ये दो कलाकार थे डॉ. जे.एस.बी.नायडू (रायपुर) तथा नागपुर विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय के विभागाध्यक्ष तथा वरिष्ठ चित्रकार डॉ. दीपक बी. जोशी। श्री नायडू के चित्रों की प्रदर्शनी बैंकाक आर्ट गैलरी में भी प्रदर्शित की गई जिसे उल्लेखनीय प्रतिसाद मिला। आयोजन में वैभव प्रकाशन का उल्लेखनीय सहयोग रहा। सृजन-सम्मान की ओर से महासचिव जयप्रकाश मानस और डॉ. सुधीर सक्सेना ने घोषणा की कि अगला आयोजन २4जून से १ जुलाई तक रुस के मास्को, ताशकंद, समरकंद और उज्बेकिस्तान में होगा जिसमें बड़ी संख्या में देश और विदेश के साहित्यकार, रंगकर्मी, हिन्दी-अध्यापक, ब्लॉगर्स तथा पत्रकार भाग लेंगे।

उल्लेखनीय है कि साहित्य, संस्कृति और भाषा के लिए प्रतिबद्ध साहित्यिक संस्था (वेब पोर्टल) सृजन गाथा डॉट कॉम पिछले पाँच वर्षों से ऐसी युवा विभूतियों को सम्मानित कर रही है जो कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं।

बैंकाक से रवीन्द्र प्रभात की रपट