सोमवार, 28 नवंबर 2011

कविता समय सम्मान हिंदी के वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी को और कविता समय युवा सम्मान युवा कवि प्रभात को

कविता समय सम्मान २०१२  हिंदी के वरिष्ठ कवि इब्बार रब्बी को और कविता समय युवा सम्मान २०१२ युवा कवि प्रभात को जनवरी में जयपुर में हो रहे दूसरे सालाना आयोजन में दिया जायेगा। ये सम्मान “प्रतिलिपि” और “दखल विचार मंच” के सहयोग से हिंदी कविता के प्रसार, प्रकाशन और उस पर विचार विमर्श के लिए २०११ में ग्वालियर में बोधिसत्व, गिरिराज किराडू और अशोक कुमार पाण्डेय द्वारा स्थापित मंच कविता समय की ओर से दिये जाते हैं। कविता समय सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और पाँच हजार रुपये की राशि तथा कविता समय युवा सम्मान के तहत एक प्रशस्ति पत्र और ढाई हजार रुपये की राशि प्रदान की जाती है.

कविता समय सम्मान हर वर्ष ६० वर्ष से अधिक आयु के एक वरिष्ठ कवि को दिया जाता है जिसकी कविता ने निरंतर मुख्यधारा कविता और उसके कैनन को प्रतिरोध देते हुए अपने ढंग से, अपनी शर्तों पर एक भिन्न काव्य-संसार निर्मित किया हो और हमारे-जैसे कविता-विरोधी समय में निरन्तर सक्रिय रहते हुए अपनी कविता को विभिन्न शक्तियों द्वारा अनुकूलित नहीं होने दिया हो. कविता समय युवा सम्मान ४५ वर्ष से कम आयु के पूर्व में अपुरस्कृत ऐसे कवि को दिया जाता है जिसकी कविता की ओर, उत्कृष्ट संभावनाओं के बावजूद, अपेक्षित ध्यानाकर्षण न हुआ हो.

(अशोक कुमार पाण्डेय)
सदस्य संयोजन समिति, कविता समय

गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह 'खबरदार जो व्यंग्य लिखा' का विमोचन

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने ऊना जिला मुख्यालय में आयोजित एक समारोह में हिमाचल साहित्य अकादमी से सम्मानित साहित्यकार गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह 'खबरदार जो व्यंग्य लिखा' का विमोचन किया। इस संग्रह की भूमिका देश के तीन शीर्षस्थ व्यंग्यकारों- गोपाल चतुर्वेदी, प्रेम जनमेजय और सुभाष चन्द्र ने लिखी है और दिल्ली के एक प्रमुख प्रकाशन संस्थान ने इसका प्रकाशन किया है। इस व्यंग्य संग्रह में गुरमीत बेदी के ७८ व्यंग्य लेख संग्रहित हैं जो देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित व चर्चित हो चुके हैं। 'इसलिए हम हंसते हैं' और 'नाक का सवाल' व्यंग्य संग्रहों के बाद गुरमीत बेदी की व्यंग्य की यह तीसरी पुस्तक है। उनकी कविता, कहानी व शोध की एक-एक पुस्तक के अलावा तीन उपन्यास धारावाहिक रूप से प्रकाशित हो चुके हैं। उनके दूसरे व्यंग्य संग्रह नाक को सवाल को कनाडा की विरसा संस्था पुरस्कृत कर चुकी है। बेदी को कविता संग्रह- मौसम का तकाजा के लिए १९९४ में हिमाचल साहित्य अकादमी का अवार्ड भी मिल चुका है। उनके व्यंग्य लेखों का अनुवाद पंजाबी, तेलगू, मराठी व गुजराती भाषा सहित कई भाषाओं में हुआ है एवं कविता व कहानी संग्रहों पर दो विद्यार्थी हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय से एम.फिल भी कर चुके हैं। गुरमीत बेदी हिमाचल प्रदेश के ऊना जिला में जिला लोक संपर्क अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।

पुस्तक की भूमिका में देश के शीर्षस्थ व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी ने लिखा है- 'गुरमीत के लेखन में मुझे जो सबसे अधिक प्रभावित करता है, वह है इनका व्यंग्य का अनूठा अंदाज। प्रतिष्ठित व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने इस व्यंग्य संग्रह पर अपनी टिप्पणी दर्ज करते हुए लिखा है- 'गुरमीत बेदी दांतों के बीच जिह्ना समान व्यवस्था के बीच रहते हुए भी अपनी जिह्ना को लोकतांत्रिक प्रहार से युक्त किए हुए हैं... व्यवस्थागत विसंगतियों के विरुद्ध खतरनाक व्यंग्य लिखने का उनका साहस मंद नहीं पड़ा है।' विमोचन समारोह में मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल ने कहा कि गुरमीत बेदी ने अपने साहित्यिक लेखन से समूचे उत्तरी भारत में अपनी पहचान बनाई है और प्रदेश का नाम रोशन किया है। इस अवसर पर बोलते हुए मुख्य संसदीय सचिव सतपाल सिंह सत्ती ने कहा कि सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और विचारात्मक व्यंग्यों से भरपूर गुरमीत बेदी का यह व्यंग्य संकलन उनकी शुद्ध सात्विक व्यंग्य चेतना का परिचायक है।

विमोचन समारोह में, मुख्य संसदीय सचिव वीरेन्द्र कंवर, गगरेट के विधायक प्रवीण शर्मा, प्रदेश जल प्रबंधन बोर्ड के उपाध्यक्ष प्रवीण शर्मा, डीसी के.आर. भारती सहित अनेक साहित्यकार, लेखक , रंगकर्मी व बुद्धिजीवी उपस्थित थे। पुस्तक का प्रकाशन 'भावना प्रकाशन , १०९-ए, पटपड़गंज, दिल्ली- ११००९१' ने किया है। आकर्षक छपाईयुक्त पृष्ठ की इस पुस्तक का मूल्य ३०० रूपए है।

स्वयं प्रकाश को कथाक्रम सम्मान

लखनऊ, सुप्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार स्वयं प्रकाश को १९वें आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान से अलंकृत किया गया। उन्हें यह सम्मान आलोचक मुद्राराक्षस और उपन्यासकार गिरिराज किशोर ने दिया। सम्मान के तहत १५ हजार रुपये का चेक, स्मृति चिह्न, अंग वस्त्र और सम्मान पत्र दिया गया। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के यशपाल सभागार में हुए सम्मान समारोह के अध्यक्ष मुद्राराक्षस थे। आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर ने स्व. श्रीलाल शुक्ल को याद करते हुए कहा कि वो हम सब के लिए कितना मायने रखते थे इसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।  बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर डॉ. राजकुमार ने सम्मानित कथाकार स्वयं प्रकाश के लेखन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सांप्रदायिकता के विषय पर लिखी गई उनकी कहानियाँ काफी चर्चित रही हैं। उनकी अधिकतर कहानियों का जन्म वास्तविक परिवेश में हुआ है। स्वयं प्रकाश की कहानियों की विशेषता है कि उनकी शुरुआत चरित्रों से नहीं, उनकी आंतरिक भावनाओं से होती है। वह प्रेमचंद की परम्परा के असल वाहक हैं, जो यथार्थ को दिशा देता है।
पुरस्कार ग्रहण करने के बाद कथाकार स्वयं प्रकाश ने हाल ही में ज्ञानपीठ से सम्मानित वरिष्ठ उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल को नमन करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अमरकांत को भी ज्ञानपीठ सम्मान से समादृत करने के लिए ज्ञानपीठ परिवार को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पहली बार कहानीकारों का दिल ज्ञानपीठ वालों ने जीता। वैश्वीकरण और बाजारवाद पर प्रहार करते हुए स्वयं प्रकाश ने कहा कि बाजार हमारे छोटे भाइयों यानी नयी पीढ़ी में घुस चुका है। वह हमारे मूल्यों को नष्ट कर रहा है। इस कारण हमें सोचना होगा कि हमें किस प्रकार का समाज बनाना होगा।
सम्मान सत्र के तत्काल बाद 'वर्तमान समय के प्रश्न और रचनाकारों की भूमिका' विषय पर संगोष्ठी प्रारम्भ हुई जो अगले दिन भी जारी रही। इस चर्चा का प्रारंभ कथाकार  राकेश कुमार सिंह के पत्र वाचन से हुआ जिन्होंने कहा कि भूमण्डलीकरण का नकाब मौजूदा समय में भी पूरी तरह से उतरना बाकी है। संगोष्ठी में समाजशास्त्री अभय कुमार दुबे,  साहित्यकार प्रभाकर श्रोत्रिय, उद्भावना के सम्पादक अजेय कुमार, उपन्यासकार रवीन्द्र वर्मा, कहानीकार शशांक, उपन्यासकार मैत्रेयी पुष्पा, उपन्यासकार शिवमूर्ति, आलोचक वीरेन्द्र यादव, वसुधा के सम्पादक राजेन्द्र शर्मा, वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश, युवा कथाकार राकेश बिहारी, प्रो. रमेश दीक्षित, प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी, पुनर्नवा के सम्पादक राजेन्द्र राव, कथाकार  कविता, सारा राय, डा. रंजना जायसवाल, अमरीक सिंह दीप, हरीचरन प्रकाश , मूलचंद गौतम  व प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी आदि की सक्रिय भागीदारी रही।
गोष्ठी में जब तब विवाद-संवाद की स्थितियां बनीं। पहले दिन गिरिराज किशोर ने प्रलेस पर आरोप लगाया कि अपने समारोह में प्रकाशित स्मारिका में यशपाल जैसे लेखक का चित्र न छापकर बड़ी गलती की है। वहीं अंतिम क्षणों में स्थानीय पत्रकार के। विक्रम राव के अध्यक्षीय उद्बोधन के बाद भी बोलने पर आपत्ति की जाने से थोड़ी अप्रिय स्थिति हो गई,जिसे बाद में ठीक कर लिया गया। दो दिन चले इस आयोजन में बड़ी संख्या में लेखकों-पाठकों का जुटना सचमुच साहित्य के प्रति आकर्षण का ही प्रमाण है।

प्रस्तुति- विशेष संवाददाता

ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी अनुवाद को मिला राष्ट्रीय स्तर का सम्मान

शुक्रवार, ११ नवम्बर २०११ को सिडनी की लेखिका और कवयित्री रेखा राजवंशी को एबोरीजनल्स की ड्रीम टाइम एनीमेशन फिल्म के हिन्दी अनुवाद के लिए राष्ट्रीय स्तर का रनर-अप अवार्ड मिला।

यह पुरस्कार का आयोजन ऑस्ट्रेलिया की अनुवाद और दुभाषिया सेवा संस्था AUSIT (ऑस्ट्रेलियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंटरप्रेटर्स एंड ट्रांसलेटर्स) राष्ट्रीय स्तर पर करती है। ऑस्ट्रेलिया भी भारत की भाँति विविधता का देश है और यहाँ दुनिया भर की भाषाएँ बोली जाती हैं, तो यह नामांकन सभी भाषाओं के अनुवादकों और दुभाषियों के लिए खुला हुआ था। नामांकन की अंतिम तारीख थी, नौ सितम्बर। निर्णायक मंडल में भाषा विशेषज्ञों का एक दल चुना जाता है जो अनुवाद की गुणवत्ता के साथ साथ यह भी देखता है कि नामांकित परियोजना का विषय कितना महत्त्वपूर्ण है।

पहली बार ये पुरस्कार विक्टोरिया में २००४ में आयोजित किए गए थे परन्तु २००७ में इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाने लगा। ये पुरस्कार छः श्रेणियों में संस्थाओं और व्यक्तियों को दिए जाते हैं। जिसमें से श्रेष्ठतम अनुवाद (Excellence in Translation Aaward) के लिए एबोरीजनल नेशंस ऑस्ट्रेलिया के प्रोड्यूसर कीथ सैल्वेट ने रेखा राजवंशी को नामांकित किया था। प्रोड्यूसर कीथ सैल्वेट द्वारा निर्मित ड्रीम टाइम एनीमेशन फिल्मों को कई अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड्स मिल चुके हैं। एबोरीजनल्स ऑस्ट्रेलिया के प्रथम निवासी थे, बाद में यहाँ अंग्रेज आए और इसे ब्रिटेन का एक हिस्सा बना लिया गया। परन्तु अब यहाँ एबोरीजनल्स को पूरा सम्मान दिया जाता है और उनकी संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों, विश्वासों, कला और साहित्य को जिंदा रखने के लिए सरकार प्रयासरत रहती है। ड्रीम टाइम कहानियाँ वे कहानियाँ हैं जो एबोरीजनल्स की अनेक पीढ़ियों में मौखिक रूप से हस्तांतरित होती रही हैं। ऑस्ट्रेलिया के एबोरीजनल्स की भी कई प्रजातियाँ हैं और सभी में ये कहानियाँ प्रचलित रही हैं। पिछले साल रेखा राजवंशी ने १३ ड्रीमिंग कहानियों का अनुवाद किया था, इनमें से एक लोकप्रिय कहानी 'तस्मानिया का टाइगर' का अनुवाद निर्णय के लिए भेजा गया था। निर्णायक मंडल ने उसे काफी उच्च स्तर का अनुवाद माना और इस प्रोजेक्ट को महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि ये अनुवाद ऑस्ट्रेलिया के प्रथम वंशजों की जातक कथाओं को न सिर्फ भारत के हिन्दी वासियों बल्कि दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों तक पहुँचाएगा।

पुरस्कार उत्सव ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा की ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के भवन में आयोजित किया गया था और इसमें गणमान्य अतिथियों के अलावा अनुवाद और दुभाषिया सेवा के सभी लोग उपस्थित थे। सुरुचि संपन्न औपचारिक भोज के बीच इन छह श्रेणियों के पुरस्कारों की घोषणा की गई, और हिन्दी अनुवाद को मिलने वाले इस पुरस्कार ने हिन्दी प्रेमियों को न सिर्फ गौरवान्वित किया है बल्कि ऑस्ट्रेलिया में हिन्दी की स्थिति को मज़बूत भी बनाया है।

सुधीर, गीताश्री और संदीप को सृजनगाथा सम्मान

रायपुर, वरिष्ठ कवि व 'दुनिया इन दिनों' के प्रधान संपादक डॉ. सुधीर सक्सेना, भोपाल को उनकी कविता संग्रह 'रात जब चंद्रमा बजाता है' तथा स्त्री विमर्श के लिए प्रतिबद्ध लेखिका व आउटलुक, हिन्दी की सहायक संपादिका, गीताश्री को उनकी संपादित कृति 'नागपाश में स्त्री' तथा युवा पत्रकार, दैनिक भारत भास्कर (रायपुर) के संपादक श्री संदीप तिवारी 'राज' की पहली कृति 'ये आईना मुझे बूढ़ा नहीं होने देता' के लिए वर्ष २०११ के सृजनगाथा सम्मान (www.srijangatha.com ) से अलंकृत किया गया है। यह निर्णय देश के चुनिंदे १००० युवा साहित्यकार-पाठकों की राय पर निर्धारित किया गया। यह सम्मान उन्हें चौंथे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, बैंकाक, थाईलैंड में १७ दिसंबर, २०११ को दी जायेगी। सम्मान स्वरूप उन्हें ११-११ हजार का चेक, प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और साहित्यिक कृतियाँ भेंट की जायेंगी ।
साहित्य, संस्कृति और भाषा के लिए प्रतिबद्ध साहित्यिक संस्था (वेब पोर्टल) सृजन गाथा डॉट कॉम पिछले पाँच वर्षों से ऐसी युवा विभूतियों को सम्मानित कर रही है जो कला, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं । इसके अलावा वह तीन अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलनों का संयोजन भी कर चुकी है। सम्मेलन का मूल उद्देश्य स्वंयसेवी आधार पर हिंदी-संस्कृति का प्रचार-प्रसार, भाषायी सौहार्द्रता एवं सांस्कृतिक अध्ययन-पर्यटन का अवसर उपलब्ध कराना है। आयोजन संयोजक जयप्रकाश मानस व डॉ. सुधीर शर्मा ने बताया है कि इस वर्ष इसके अलावा मुंबई की कथाकार संतोष श्रीवास्तव, संस्कृति कर्मी सुमीता केशवा, हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए प्रतिबद्ध रवीन्द्र प्रभात (लखनऊ), आधारशिला के संपादक दिवाकर भट्ट (देहरादून), सिनेमा लेखन के लिए प्रमोद कुमार पांडेय (मेरठ), नागपुर विवि के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रमोद कुमार शर्मा, प्रवासी लेखिका देवी नागरानी (यूएसए), ओडिया से हिन्दी अनुवादक श्री दिनेश माली(ब्रजराजनगर, ओडिसा) हिन्दी के प्रकाशक श्री शांति स्वरूप शर्मा (यश पब्लिकेशंस, दिल्ली), युवा लेखिका अलका सैनी (चंडीगढ़) आदि को उनकी उल्लेखनीय सेवा के लिए सृजनश्री से सम्मानित किया जायेगा ।


रायपुर से डॉ. सुधीर शर्मा की रपट

हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच द्वारा राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन का आयोजन

हिमालय साहित्य, संस्कृति एवं पर्यावरण मंच के तत्वावधान में २० अक्तूबर, २०११  दोपहर २.३० बजे शिमला माल रोड़ पर स्थित रोटरी टाउन हाल में ‘पहाड़ की रचनाशलता पर‘ एक ’राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता प्रतिष्ठित कथाकार और आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह ने की।

डॉ. सिंह ने कहा कि ’कथा में पहाड़’ पहाड़ की रचनाशीलता को सामने लाने वाला एक ऐतिहासिक दस्तावेज है जिसमें इसके संयोजक और कथाकार एस आर हरनोट एवं सम्पादक वरिष्ठ कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकान्त ने सभी प्रकार के रागद्वेष से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ रूप से पर्वतीय जन-जीवन को गहनता से रेखांकित करने वाली कहानियों को प्रस्तुत किया है। डॉ0 विजय मोहन सिंह ने १९७५ से १९८२ के दौरान शिमला में व्यतीत किए अपने समय को याद करते हुए हुए अत्यन्त भावुन अंदाज में कहा कि शिमला की मेरी यह यात्रा अतीत और स्मृतियों के बीच एक अन्तर यात्रा है और आज मेरी उम्र काफी हो चुकी है और अब लगने लगा है कि कहीं यह आखरी आखरी यात्रा न हो। उन्होंने अज्ञेय की एक कविता से अपना वक्तव्य समाप्त किया।

प्रमुख वक्ता प्रो0 कुमार कृष्ण ने कहा कि ‘कथा में पहाड़‘ वास्तव में पहाड़ के मनुष्यों की एक ऐसी महागाथा है जहां उनके दुःख, अवसाद, पीड़ा, वेदना, आक्रोश, चुनौतियों, दुर्भिसन्धियों, संघर्ष एवं जीविविषा को एक स्थान पर महसूस किया जा सकता है। पांच सौ पचपन पृष्ठों के इस वुहद कथा ग्रन्थ की सबसे बड़ी खसुसियत यह है कि इसमें जहां एक ओर रमा प्रसाद पहाड़ी जैसे कहानीकार की कहानी को शामिल किया गया है वहां दूसरी ओर ४१ वर्षीय आत्मा रंजन की कहानी को भी स्थान दिया गया है। पहाड़ की रचनाशीलता को प्रस्तुत करने वाला यह ऐतिहासिक दस्तावेज आने वाली पीढ़ी के लिए एक लाइटहाउस का काम करता रहेगा। पुस्तक का मूल्यांकन प्रस्तुत करते हुए आलोचक डॉ. हेमराज कौशिक ने इस कथा संकलन को अत्यन्त श्रमसाध्य बताया जिसे श्रीजिसे श्रीनिवास श्रीकातं जैसे रचनाकार ने अपनी बेबाक समीक्षात्मक टिप्पणियों के साथ लम्बी भूमिका के द्वारा हिन्दी कहानी के पाठकों को अमूल्य धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया है।

आयोजन के प्रारम्भ होने से पूर्व हिमाचल के तीन रचनाकार साथियों सर्वश्री रत्न सिंह हिमेश, डॉ0 शम्मी शर्मा और डॉ0 ठाकुर दत शर्मा आलोक को दो मिनट का मौन रखकर भावभीनी श्रद्धांजति अर्पित की गई। मंच के अध्यक्ष और लेखक तथा इस कथा-ग्रन्थ के संयोजक श्री एस आर हरनोट ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इस योजना के कई पहलुओं पर प्रकाश डाला और सभागार में उपस्थित सभी का स्वागत किया। मंच का संचालन कला, भाषा एवं संस्कृति अकादेमी के सचिव एवं साहित्यकार डॉ0 तुलसी रमण ने किया। इस आयोजन में नेपाली लेखक जगदीश राणा, राम दयाल नीरज, सत्यन शर्मा, सरोज वशिष्ठ, रेखा, तेज राम शर्मा, बद्रीसिंह भाटिया, डॉ0 जगन सिंह, डॉ0 कृपा शंकर सिंह, आर सी शर्मा, आत्मा रंजन, जगत प्रसाद शास्त्री, इस्मिता सिंह सहित कई गणमान्य लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी उपस्थित थे।
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सृजन ने आयोजि‍त की वि‍वि‍ध वि‍धाओं की हि‍न्दी साहि‍त्य चर्चा

विशाखापटनम की हि‍न्दी साहि‍त्य, संस्कृति‍ एवं रंगमंच को समर्पि‍त संस्था “सृजन” ने दि‍नांक ३० अक्टूबर २०११ को डाबा गार्डन्स स्थित पवन एनक्लेसव के प्रथम तल पर वि‍वि‍ध वि‍धाओं की हि‍न्दीस साहि‍त्य चर्चा का आयोजन कि‍या। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. टी महादेव राव, सचि‍व, सृजन ने की जबकि‍ संचालन कि‍या सृजन के अध्ययक्ष नीरव कुमार वर्मा ने। स्वागत भाषण देते हुए कार्यक्रम एवं सृजन संबंधी वि‍वरण प्रस्तुजत कि‍या सृजन के संयुक्त सचि‍व डॉ. संतोष अलेक्स ने। सृजन ने हाल ही में दि‍वंगत हि‍न्दी‍ के मूर्धन्य साहि‍त्यसकार श्रीलाल शुक्ल तथा सृजन के वरि‍ष्ठ सदस्य, राजभाषा अधि‍कारी ओम प्रकाश एवं सृजन के समर्थक, हि‍न्दी कार्यक्रम अधि‍शासी आकाशवाणी रमणन स्वामी को दो मि‍नट का मौन रखकर श्रद्धांजलि‍ अर्पि‍त की।

कार्यक्रम में सबसे पहले श्रीमती मीना गुप्ता ने दीपावली पर्व को अंधेरे पर उजाले की जीत बताते हुए कवि‍ता “दीप पर्व” सुनाया। साथ ही टीवी धारावाहि‍कों से प्रभावि‍त वर्तमान जीवन शैली पर अपनी कवि‍ता “मेरे घर आई सुनामी” प्रस्तुत की। श्रीमति‍ श्वेता कुमारी ने स्त्री शक्ति‍ की बढती उपलब्धि‍यों का लेखा जोखा अपनी कवि‍ता “नारी” में प्रस्तुत किया। वि‍श्वनाथाचारी ने अपनी “धरती और आकाश” कवि‍ताओं के माध्यम से प्रकृति‍ की महत्ता दर्शाई। अपनी व्यंग्य क्षणि‍काओं, गीत “हि‍न्दी से हि‍न्दुस्तान” लेकर प्रस्तुात हुए जी.अप्पांराव ‘राज’ जि‍समें भारत की महानता का बखान था। श्री जी. ईश्वदर वर्मा द्वारा “तमसोमा ज्योदर्ति‍गमय” में दुर्जनों पर सज्जनों के द्वारा द्वि‍गुणि‍त दीप जलाकर उजाला करने का आह्वान कि‍या गया। पवन कुमार गुप्ता ने “मां का दूध” कवि‍ता पढी जबकि‍ श्रीनि‍वास ने “शि‍क्षक” एवं “महान भारत” कवि‍ताएँ प्रस्तुतत कीं। इसी क्रम में रामप्रसाद यादव ने “मन क्यों नहीं लगता?” और “लफ्ज” कवि‍ताएँ पढीं जि‍समें मानवीय सम्बंधों में घटती आत्मीयता एवं बढते भौति‍कवाद की बिंबात्मक प्रस्तुति‍ थी। अपनी हास्य कहानी “सेफ्टी डि‍वाइज” में मशीनों पर आश्रि‍त मानव की कठि‍नाइयों का खुलासा प्रस्तु‍त कि‍या तोलेटि‍ चंद्रशेखर ने। “मोटापा” शीर्षक हास्य कवि‍ता में बी.एस. मूर्ति‍ ने वर्तमान में मानव जीवन की वि‍डंबना पर हँसाया। जे. एस. यादव ने द्रौपदी को बिंब बनाकर वर्तमान समाज में नारी की वि‍डंबना एवं ग्रामीण जीवन से टूटकर एकाकी होते मानव की त्रासदी अपनी कवि‍ताओं “कलयुग की द्रोपदी” तथा “जब से छुटा मेरा गाँव” में पेश कि‍या। “मैं अबला कि‍ तू अबला” कवि‍ता में वर्तमान समाज में पति‍ पत्नीक के संबंधों, स्त्री शक्ति का अच्छा खुलासा कि‍या श्रीमती दीपा गुप्ता ने। बीरेंद्र राय ने “चंदीले सपने” में सपने और उनसे जुडी शृंखला और यथार्थ प्रस्तुत कि‍या। पर्यावरण प्रदूषण, प्रकृति के प्रकोप एवं ओजोन परत पर भावपूर्ण कवि‍ता “बुद्धि‍शाली पेश” कि‍या डॉ. एम. सूर्यकुमारी ने। वि‍भि‍न्न स्थि‍ति‍यों को बि‍म्ब बनाकर डॉ सन्तोक अलेक्स ने अपनी कवि‍ता “आँखें” पढी। एकाकी होते मानवीय संबंधों, वि‍षम परि‍स्थि‍‍ति‍यों एवं क्षीण होते मानवीय मूल्यों पर आक्रोश व्यंक्त कि‍या डॉ. टी. महादेव राव ने अपनी दो गजलों- “आओ जीने का” तथा “अजीब बशर हैं” में। नीरव कुमार वर्मा ने अपनी कहानी “यादों के दायरे” में दो सहेलि‍यों की मर्मस्पर्शी कथा प्रस्तुत की।

इस कार्यक्रम में कृष्ण कुमार गुप्ता, वि‍जय कुमार राजगोपाल, अशोक गुप्ता, सी एच ईश्वर राव आदि‍ ने सक्रि‍य हि‍स्सा लि‍या। पढी गई प्रत्येक रचना पर चर्चा हुई जि‍से सभी ने सराहा। सभी का मत था कि‍ इस तरह के कार्यक्रमों से लि‍खने के लि‍ए प्रोत्साहन एवं प्रेरणा मि‍लती है। डॉ. सन्तोष अलेक्स के धन्यावाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

-डॉ. टी. महादेव राव
सचि‍व – सृजन

भारतीय हिन्दी परिषद का 39वाँ अधिवेशन और अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी

लखनऊ, १५-१६ अक्तूबर २०११ आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय के द्वारा आयोजित द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी सफलता पूर्वक संपन्न हुई।

पहले सत्र ’’नई सदी में हिन्दी का वैश्विक परिदृश्य’’ विषय पर संगोष्ठी को पूर्व राज्यपाल श्री माता प्रसाद जी ने उद्बोधित किया। अध्यक्षीय वक्तव्य देते लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज कुमार मिश्र ने दिया। इसके पूर्व भारतीय हिन्दी परिषद के अध्यक्ष प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल का वक्तव्य हुआ। परिषद के प्रधानमंत्री प्रो० लक्ष्मीनारायण भारद्वज ने परिषद का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

हिन्दी विभाग एवं भारतीय हिन्दी परिषद के पूर्व अध्यक्ष व प्रतिष्ठित साहित्यकार प्रो० सूर्य प्रसाद दीक्षित ने परिषद के गौरवपूर्ण इतिहास एवं उसके क्रिया कलापों पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डाला। इस अवसर पर हिन्दी की सेवा के लिए समर्पित २४ साहित्य प्रेमियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। उद्धाटन सत्र के केन्द्र बिन्दु रहे कोह जोहं किम् ने दक्षिण कोरिया में हिन्दी की दशा एवं दिशा का उल्लेख करते हुए हिन्दी की सर्जन्नात्मक गतिविधियों एवं अनुवाद के माध्यम से हिन्दी की सामर्थ्य और शक्ति का उल्लेख किया। इस अवसर पर डॉ० रमेश चन्द्र त्रिपाठी द्वारा संपादित स्मृति-उपायन, डॉ० बलजीत श्रीवास्तव द्वारा संपादित-शोध सृजन पत्रिका और डॉ० उषा गुप्त द्वारा लिखित- अमेरिका में हिन्दी’ पुस्तक का लोकर्पण किया गया। उद्घाटन समारोह का संचालन-भारतीय हिन्दी परिषद के साहित्य मंत्री- डॉ० वीरेन्द्र नारायण यादव और आभार प्रदर्शन संगोष्ठी के आयोजन सचिव एवं हिन्दी विभाग के प्रोफेसर पवन अग्रवाल ने किया।

संगोष्ठी के दूसरे दिन समानान्तर नौ संगोष्ठियाँ सम्पन्न हुई। प्रथम संगोष्ठी ’समकालीन हिन्दी गद्य’ विषय पर शोद्य-पत्रों का वाचन किया गया जिसकी अध्यक्षता डॉ. लक्ष्मी नारायण भारद्वाज ने की। विषय प्रवर्तन डॉ. खुशीराम शर्मा ने किया और वक्ता के रूप में पद्मश्री सम्मान से सम्मानित मेहरून्निसा परवेज, डॉ. लक्ष्मण सहाय (ग्वालियर), प्रो. म.मा. कडू (नागपुर) तथा डॉ. यतीन्द्र तिवारी (कानपुर) ने अपने विचार व्यक्त किये। संचालन डॉ. अलका पाण्डेय ने किया।

दूसरी संगोष्ठी ’समकालीन विमर्श (दलित, स्त्री, आदिवासी) विषय पर शोध-पत्रों का वाचन किया गया, जिसकी अध्यक्षता, पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष, प्रो. सरला शुक्ल ने की। वक्ता के रूप में राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के प्रो. नंद किशोर पाण्डेय, प्रो. कालीचरण स्नेही, डॉ. क्षमाशंकर पाण्डेय, डॉ. निर्मला, डॉ. राजेश कुमार, डॉ. केदार सिंह, प्रो. कात्यायनी सिंह, डॉ. अर्चना शर्मा, डॉ. मुनीत शर्मा, डॉ. पंकज सिंह, डॉ. कमलेश कुमारी रानी, डॉ. आदित्य प्रियदर्शी, डॉ. किरन शर्मा और अमेरिका से पधारे डॉ. राम बाबू गौतम ने भी अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन डॉ. रविकान्त ने किया।

’हिन्दी लोक वाङमय’ विषय पर तीसरी संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. आद्याप्रसाद द्विवेदी, (गोरखपुर) ने की। विषय प्रवर्तन डॉ. भरत सिंह ने किया तथा प्रो. राम दरश राय, डॉ. चन्द्रमणि शर्मा, डॉ. कुसुम सिंह डॉ. समीर कुमार झा, डॉ. नलिन रंजन तथा अस्मि पाण्डेय ने अपने पत्रों का वाचन किया। संचालन डॉ. परशुराम पाल ने किया।

‘प्रयोजनमूलक हिन्दी’ विषय से सम्बन्धित चौथी संगोष्ठी की अध्यक्षता डॉ. पूरनचन्द टण्डन (दिल्ली) ने की। प्रमुख वक्ता जोधपुर से पधारे डॉ. श्रवण कुमार मीणा के वक्तव्य के बाद ३२ शोध-पत्र प्रस्तुत हुए जिसमें डॉ. मुक्ता खन्ना, डॉ. रेखा गुप्ता, डॉ. विद्या रानी, डॉ. किरन शर्मा, डॉ. तारकेश्वर नाथ सिन्हा, डॉ. अनिल सिंह, डॉ. मिथिलेश कुमारी मिश्र, डॉ. अनीता, डॉ. सुरेश माहेश्वरी आदि ने की अपने शोध-पत्रों का वाचन किया। संचालन डॉ. हेमांशुसेन ने किया।

’जन संचार और हिन्दी’ विषय संबंधित पाँचवी संगोष्ठी अध्यक्षता प्रो. त्रिभुवन नाथ शुक्ल ने की। विषय प्रवर्तन श्री कैलाशचंद पंत ने किया तथा डॉ. दीपक प्रकाश त्यागी ने हिन्दी के तीन स्वरूपों की विवेचना की। इस संगोष्ठी में डॉ. संजीव कुमार दुबे (मुम्बई), डॉ. अवधेश कुमार (भोपाल), डॉ. हरीश अरोड़ा (दिल्ली), डॉ. सुबोध अग्निहोत्री (उत्तराखण्ड), डॉ. सोनू अन्नपूर्णा और हनुमान प्रसाद शुक्ल (जयपुर) ने अपने पत्रों का वाचन किया। इस संगोष्ठी का संचालन डॉ. रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने किया।

छठी संगोष्ठी ’भाषा प्रौद्योगिकी’ विषय की अध्ययक्षता प्रो. सूर्य प्रसाद दीक्षित ने की। विषय-प्रवर्तन पुणे से पधारे श्री अमित श्रीवास्तव ने किया और डॉ. पुनीत मिश्र, डॉ. प्रवण शास्त्री, डॉ. शोभा रानी श्रीवास्तव, डॉ. उषा मिश्र आदि शोध-पत्र वाचन किया।

’अवध संस्कृति और राम साहित्य’ विषय पर आधारित सातवीं संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह (इलाहाबाद) ने की। इस संगोष्ठी में डॉ. एन.जी. देवकी (केरल), डॉ. मनोरमा अवस्थी, डॉ. आभा त्रिपाठी, प्रो. मीरा दीक्षित (इलाहाबाद), डॉ. सभापति मिश्र, डॉ. सुरेशपति त्रिपाठी, डॉ. पवन कुमार आदि ने अपने विचार व्यक्त किये। संचालन प्रो. प्रेमशंकर तिवारी ने किया।

’हिन्दी की भाषिक समस्याएँ’ विषय पर आठवीं संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. धर्मदेव तिवारी (गुवाहाटी) ने की। विषय प्रवर्तन प्रो. राम किशोर शर्मा (इलाहाबाद) ने किया। प्रो. नरेश मिश्र (रोहतक), प्रो. भगवान देव पाण्डेय (हरिद्वार), डॉ. एम. शेषन (चेन्नई) ने अपने शोध-पत्रों का वाचन किया। संचालन प्रो. योगेन्द्र प्रताप सिंह ने किया।

नौवीं संगोष्ठी ’देशान्तरी हिन्दी’ विषय की अध्यक्षता डॉ. यज्ञप्रसाद तिवारी (शहडोल) ने तथा विषय प्रवर्तन डॉ. रामलखन गुप्त (जबलपुर) तथा श्रीयुत श्रीधर पराड़कर (ग्वालियर) ने किया। मुख्य अतिथि डॉ. उषा गुप्ता (प्रवासी अमेरिका) थीं। डॉ. कामता कमलेश (अमरोहा), डॉ. विमला सिंहल (मीलवाड़ा), डॉ. करूणा शंकर उपाध्यक्ष (मुम्बई), डॉ. टी.एन. सिंह ने पत्र वाचन किया। संचालन डॉ. राहुल पाण्डेय ने किया।

भारतीय हिन्दी परिषद एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में मुख्य अतिथि माननीय श्री सुभाष पाण्डेय, संस्कृति मंत्री उ.प्र. सरकार थे। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. यू.एन. द्विवेदी प्रतिकुलपति लखनऊ विश्वविद्यालय की। कार्यक्रम तीन पुस्तकों का लोकार्पण माननीय मंत्री जी ने किया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का प्रतिवेदन डॉ. रमेश चन्द्र त्रिपाठी ने किया तथा संचालन डॉ. वीरेन्द्रनारायण यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. कैलाश देवी सिंह ने किया।

'नए समय में मीडिया' पर लेख आमंत्रित

दिल्ली । बदलते वक्त के साथ मीडिया का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। भाषा, कंटेंट, प्रजेंटेशन, ले आउट से लेकर विज्ञापन और मार्केटिंग तक में बदलाव आया है। अखबार से लेकर २४X७ समाचार चैनलों तक खबरों से खेलने में माहिर हो गए हैं। आकाशवाणी से लेकर एफएम चैनलों ने संचार माध्यम के विकल्पों को व्यापक किया है तो सीटिजन जर्नलिज्म से लेकर सोशल मीडिया ने तो मीडिया की परिभाषा ही बदलकर रख दी है।
वेब मीडिया से लेकर सोशल मीडिया नए इतिहास को लिखने में अग्रसर हो रहा है और अपनी उपयोगिता साबित कर रहा है। हाल के दिनों में दुनिया के तमाम कोनों में जिस तरह के जन आंदोलन हुए, उसमें फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब, आर्कुट जैसे तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स की भूमिका अहम रही। ब्लॉग पर नित नई कहानियां लिखी जा रही हैं। जनतांत्रिक मूल्य व्यापक हो रहे हैं। फिल्मों में भी बदलाव साफ-साफ दिख रहा है।
नए दौर का मीडिया काफी शक्तिशाली हो चुका है तो विज्ञापन का दवाब संपादकीय टेबुल पर पड़ने लगा है। पेड न्यूज से लेकर पीआर कांसेप्ट ने खबरों के चुनाव को बदलने का काम किया है और पाठकों/ दर्शकों को पता ही नहीं होता कि उनके सामने जो खबरें रखी गई हैं, वह वास्तव में खबर है या किसी पीआर एजेंसी की रपट। राडिया मामला सामने आ चुका है। पेड न्यूज पर संसद में बहस हो चुकी है। किसानों की आत्महत्या कर खबरें सुर्खियां नहीं बनती। सोशल मीडिया पर अंकुश लगाने के लिए विभिन्न देशों की सरकारें एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है।
मीडिया अध्ययन के मामले में विदेशों को छोड़ दें तो भारत के विभिन्न विश्वविद्यालय में मीडिया में समान कोर्स के सिलेबस तक अलग-अलग हैं। संस्थानों में जो पढ़ाया जाता है, प्रैक्टिल लेवल पर छात्रों को उससे कम ही वास्ता पड़ता है। पत्रकारों और संपादकों को काम करने के घंटे अनिश्चित हैं। महिला पत्रकारों के शोषण का मामला अकसर यहां-वहां उठता दीखता है। बीबीसी और सीएनएन जैसे चैनलों में बुजुर्ग एंकर बखूबी समाचार पढ़ रहे होते हैं जबकि भारत में सुंदर महिला एंकर की डिमांड है। मीडिया में नौकरी की कोई सिक्योरिटी नहीं होती। मीडिया संस्थान का कारोबार पिछले दो दशक में जितना बढ़ा है, उतना कर्मचारियों का वेतन नहीं। भाषाई पत्रकारिता हर तरफ छा रही है।
वक्त का तकाजा है कि नए समय की मीडिया और इसके हालात, इसके कारोबार पर विचार-विमर्श किया जाए। मीडिया की अंदरूनी और बाहरी हालातों पर नजर रखी जाए जिससे वस्तुस्थिति सामने आए। आंकड़ों के खेल को भी समझा जाए। इसी के मद्देनजर त्रैमासिक पत्रिका 'पांडुलिपि" अपने नए आयोजन में 'मार्च-मई,२०१२' अंक को 'नए समय में मीडिया"पर केंद्रित कर रहा है। इसके लिए आप आलेख, शोधपरक/विमर्शात्मक आलेख, समीक्षा, साक्षात्कार, कार्टून, परिचर्चा, विदेशी मीडिया, सिटीजन जर्नलिज्म, वेब पत्रकारिता, वेब साहित्य मसलन कहानी, कविता, उपन्यास आदि ३१ दिसंबर, २०११ तक भेज सकते हैं। अपने लेख ई-मेल, डाक, फैक्स तीनों से भेज सकते हैं। इससे इतर मीडिया से संबंधित किसी इतर मुद्दे पर लिखना चाहें तो भी स्वागत है। खास पहलू पर विचार-विमर्श करना चाहें तो कर सकते हैं। पता है:-
विनीत उत्पल
अतिथि संपादक
पांडुलिपि
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भोपाल से जया केतकी की रपट