रविवार, 30 अक्टूबर 2011

हिंदी-मराठी त्रैमासिक पत्रिका शब्दसृष्टि के `हिंदी-मराठी आदान-प्रदान विशेषांक' का प्रकाशन समारोह

हिंदी-मराठी द्विभाषिक त्रैमासिक पत्रिका शब्दसृष्टि के `हिंदी-मराठी आदान-प्रदान विशेषांक' का प्रकाशन समारोह हिंदी के वरिष्ठ समीक्षक व `शब्दसृष्टि' के परामर्शदाता श्रद्धेय डॉ. रामजी तिवारी जी की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्याध्यक्ष तथा हिंदी के सुप्रसिद्ध कहानीकार व अनुवादक डॉ. दामोदर खडसे जी भी उपस्थित थे। यह समाहोह मुंबई मराठी ग्रंथसंग्रहालय, मुंबई के `प्रा. सुरेंद्र गावस्कर सभागृह' में संपन्न हुआ। समारोह में सिद्धार्थ पारधे लिखित मराठी आत्मकथा `कॉलनी' के हिंदी अनुवाद विमोचन भी किया गया।

समारोह की प्रारंभ में, `शब्दसृष्टि' के संस्थापक व पत्रिका के संपादक प्रा. मनोहर ने अपने स्वागत भाषण में, शब्दसृष्टि की साहित्य-कला व वैचारिक-भाषिक-सांस्कृतिक भूमिका को स्पष्ट करते हुए सिद्धार्थ पारधे की आत्मकथा `कॉलनी' तथा पत्रिका के `हिंदी-मराठी आदान-प्रदान विशेषांक' के बारे में अपने विचार रखे। उन्होंने `कॉलनी' इस आत्मकथा की दो प्रमुख विशेषताएँ बताईं पहली तो यह कि `कॉलनी' में लेखक की प्रामाणिकता और पारदर्शिता बहुत ही सहज रूप से व्यक्त हुई है, जिसका आज के साहित्य में अभाव दिखाई देता है और दूसरी यह कि यह आत्मकथा दलित और दलितेतर समाज में समन्वय का, समझदारी तथा सेतु का काम करती है। उन्होंने `शब्दसृष्टि' पत्रिका के आगामी विशेषांक `कविश्रेष्ठ कुसुमाग्रज व अज्ञेय विशेषांक', `कोंकणी भाषा, साहित्य व संस्कृति विशेषांक', `भारतीय संस्कृति व कला विशेषांक' और `गुजराती भाषा, साहित्य व संस्कृति विशेषांक' प्रकाशित होने की जानकारी भी दी। `कॉलनी' लिखने का कारण स्पष्ट करते हुए आत्मकथाकार श्री. सिद्धार्थ पारधे ने कहा कि वे अपने अनुभवों को विश्व से साझा करना चाहते थे। हिंदी `कॉलनी' की प्रस्तावनाकार तथा `शब्दसृष्टि' की संस्थापक व पत्रिका की संपादक डॉ. विजया ने `कॉलनी' व `हिंदी-मराठी आदान-प्रदान विशेषांक' पर बोलते हुए कहा कि यह कृति इतनी संवेदनशील है कि कई दिनों तक उससे बाहर निकला नहीं जा सकता।  पुस्तक पर अपना वक्तव्य देते हुए हिंदी के वरिष्ठ आलोचक व चिंतक डॉ. त्रिभुवन राय जी ने कहा कि उन्हें सिद्धार्थ का रचनाकार भीतर तक प्रभावित कर गया था। उनके अनुसार, `कॉलनी' संवेदना के धरातल पर पाठक को ले जाती है और सत्यम् शिवम् सुंदरम् का दर्शन कराती है। पुस्तक पर टिप्पणी करते हुए प्रमुख वक्ता हिंदी-मराठी के अभ्यासक व अनुवादक डॉ. गजानन चव्हाण जी ने कहा, `` मुझे मराठी व हिंदी `कॉलनी' को पढ़ने का सुअवसर प्राप्त हुआ, कृति से बहुत प्रभावित हुआ, पाँच दिन तक भीतर ही भीतर रोता रहा। अनुभूति नूतन है।'' मराठी साहित्य में १९६० के बाद `दलित साहित्य' का उदय हुआ और `दलित साहित्य' का मर्म है- संघर्ष, नकार व विद्रोह, पर `कॉलनी' इन सबसे अलग है। दलित साहित्य ने कुछ लोगों को जोड़ा और कुछ लोगों को दूर रखा, पर `कॉलनी' ने अपनी आस्था के बल पर समाज को जोड़ने का काम किया है। `कॉलनी' में नकार या विद्रोह नहीं है; यह दूसरे ही किस्म की रचना है।

प्रमुख अतिथि के रूप में उपस्थित डॉ. दामोदर खडसे जी ने अपने वक्तव्य में `शब्दसृष्टि' के `हिंदी-मराठी आदान-प्रदान विशेषांक' को `महाविशेषांक' बताते हुए, प्रा. मनोहर व डॉ. विजया को उनके अथक परीश्रम के लिये बधाई दी। और कहा कि भाषाओं के बीच सेतु बनाने जैसा संदेश यह विशेषांक देना चाहता है, वह साफ-साफ नज़र आता है। `कॉलनी' के संदर्भ में उन्होंने कहा कि प्रादेशिक सीमाओं को तोड़ते हुए अनुवाद ही रचना को भारतीय स्तर पर ले जाता है। ऐसी रचनाएँ और आयें तथा पाठक को यश और संघर्ष का सुंदर चित्र देखने को मिले। समारोह के अध्यक्ष डॉ. रामजी तिवारी जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि रचना स्वयमेव बन जाती है, प्रसूत होती है। जो सही जीवन जीता है, वह मनोभावों को अभिव्यक्त कर सकता है। श्री. पारधे अपने सारे गुणों को सिद्ध करते हुए सिद्धार्थ नाम भविष्य में भी सार्थक करेंगे, ऐसी मनोकामना है। उन्होंने कहा कि साहित्य को भारतीय धरातल पर पहुँचना चाहिए, भारतीय संदर्भ होंगे तो दो भाषाओं में सेतु निर्माण होगा।

समारोह के प्रारंभ में `सरस्वती वंदना' का प्रस्तुतिकरण एवं अंत में आभार-ज्ञापन का महत्त्वपूर्ण कार्य समारोह की संयोजक डॉ. मुक्ता नायडू तथा संपूर्ण कार्यक्रम का सूत्र-संचालन व संयोजन डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया। `शब्दसृष्टि' के परामर्शदाता मा. प्रा. कमलाकर सोनटक्के व डॉ. सूर्यबाला तथा महाराष्ट्र राज्य के पूर्व भाषा संचालक डॉ. न. ब. पाटील, डॉ. राजम नटराजन पिल्ले, सुश्री भारती पारधे, श्री. रमेश पारधे, आदि मान्यवर एवं शोधछात्र-छात्राओं ने उपस्थित रहकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई, जो सुधी पाठक पत्रिका का `हिंदी-मराठी आदान-प्रदान विशेषांक' तथा सिद्धार्थ पारधे लिखित मराठी आत्मकथा का हिंदी अनुवाद `कॉलनी' पुस्तक खरीदना चाहते हैं, वे प्रमुख वितरक `अरू पब्लिकेशन्स प्रा. लि.' से फोन न. ०२२-२८३४३०२२(मुंबई) व ०११-४३५५६६००(दिल्ली) तथा ई-मेल : shpl.mumbai@gmail.com पर और अधिक जानकारी के लिए फोन न. ९७७३०५८६८० (`शब्दसृष्टि कार्यालय) ९८२१५४५२८८(प्रा. मनोहर) एवं ९८२१९०२२७६(डॉ. विजया) तथा ईमेल shabdasrishti@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।

- प्रस्तुति : प्रा. मनोहर

‘बीसवाँ अंतर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन’ अमृतसर में सम्पन्न

पंजाबी त्रैमासिक पत्रिका ‘मिन्नी’, ‘पंजाबी साहित्य अकादमी, लुधियाना’ व ‘पिंगलवाड़ा चैरिटेबल सोसायटी, अमृतसर’ के संयुक्त तत्त्वाधान में ‘बीसवाँ अंतर्राज्यीय लघुकथा सम्मेलन’ ८ अक्तूबर, २०११ को पिंगलवाडा काम्प्लैक्स, अमृतसर(पंजाब) में सम्पन्न हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ.इंदरजीत कौर (अध्यक्षा, पिंगलवाड़ा सोसायटी), डॉ. सुखदेव सिंह खाहरा, डॉ. इकबाल कौर, डॉ. अनूपसिंह (उपाध्यक्ष, पंजाबी साहित्य अकादमी) व बलराम अग्रवाल (दिल्ली) ने की।

पत्रिका ‘मिन्नी’ के संपादक-मंडल के सदस्य श्याम सुन्दर अग्रवाल ने पंजाब, हरियाणा,हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश व दिल्ली से सम्मेलन में पधारे अतिथियों का स्वागत करते हुए इस सम्मेलन के उद्देश्य संबंधी जानकारी दी। कार्यक्रम के प्रारंभ में पंजाबी-आलोचक डॉ. दरिया ने अपना आलेख ‘इक्कीवीं सदी दे पहिले दहाके दी मिन्नी कहाणी, समाजिक ते सभ्याचारक संदर्भ’ शीर्षक से पढ़ा। उन्होंने कहा कि किसी भी सामाजिक परिवर्तन पर प्रतिकर्म सबसे पहले लघुकथा में ही व्यक्त होता है। श्री भगीरथ परिहार ने अपने आलेख ‘मुठ्ठीभर आसमान के लिए: लघुकथा में स्त्री -विमर्श’ में लघुकथा-साहित्य में प्रस्तुत स्त्री की विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया। दोनों आलेखों पर डॉ. अनूप सिंह, सुभाष नीरव व डॉ. बलदेव सिंह खाहरा ने अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अगले चरण की शुरुआत पत्रिका ‘मिन्नी’ के अंक-९३ के विमोचन से हुई। इसके साथ ही डा. श्याम सुन्दर दीप्ति व श्याम सुन्दर अग्रवाल द्वारा संपादित दो लघुकथा-संकलनों ‘विगत दशक की पंजाबी लघुकथाएँ’ (हिन्दी) व ‘दहाके दा सफ़र’ (पंजाबी) का विमोचन अध्यक्ष-मंडल की ओर से किया गया। इसी चरण में सुकेश साहनी व रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ द्वारा संपादित संकलन ‘मानव मूल्यों की लघुकथाएँ’ तथा बलराम अग्रवाल की ओर से संपादित पुस्तक ‘समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद’ का विमोचन भी किया गया।

प्रथम-सत्र का आख़िरी चरण सम्मान समारोह का रहा। समारोह दौरान हिंदी के वरिष्ठ लेखक श्री सूर्यकांत नागर(इन्दौर) को ‘माता शरबती देवी समृति सम्मान’, हिंदी के सुपरिचित लेखक श्री सुकेश साहनी (बरेली) को ‘श्री बलदेव कौशिक स्मृति सम्मान’, पंजाबी के जाने-माने लघुकथाकार श्री हरभजन सिंह खेमकरनी (अमृतसर) को ‘लघुकथा डॉट कॉम सम्मान’, पंजाबी लघुकथा में आलोचना और मौलिक लेखन के लिए जाने वाले श्री निरंजन बोहा (बोहा, पंजाब) को ‘प्रिं. भगत सिंह सेखों समृति सम्मान’ तथा पंजाबी पत्रिका ‘अणु’ के संपादक श्री सुरिंदर कैले (लुधियाना) को ‘गुरमीत हेयर समृति सम्मान’ से नवाजा गया। पुस्तक विमोचन व सम्मान समारोह में श्रीमती अनवंत कौर, तलविंदर सिंह, अरतिंदर संधू, डॉ. शेर सिंह मरड़ी व हरिकृष्ण मायर ने अध्यक्ष-मंडल के साथ सहयोग किया। अपने अध्यक्षीय भाषण में डॉ. इंदरजीत कौर ने समाज में लेखकों की सकारात्मक भूमिका तथा अच्छे साहित्य की आवश्यकता पर जोर दिया।

सम्मेलन का दूसरा सत्र ‘जुगनूआँ दे अंग-संग’ अमृतसर से लगभग दस किलोमीटर दूर पिंगलवाड़ा सोसायटी के मानांवाला कम्प्लैक्स में हुआ। देर शाम शुरू हुआ यह सत्र रात के बारह बजे तक चला। इस सत्र में श्री सुरेश शर्मा व सूर्यकांत नागर (इन्दौर), सुभाष नीरव व बलराम अग्रवाल (दिल्ली), ऊषा मेहता दीपा (चंबा), अशोक दर्द (डलहौजी), डॉ. शील कौशिक व डॉ. शक्तिराज कौशिक (सिरसा) व श्याम सुन्दर अग्रवाल (कोटकपूरा) ने हिन्दी में अपनी लघुकथाएँ पढ़ीं। हरप्रीत सिंह राणा व रघबीर सिंह महिमी (पटियाला), जगदीश राय कुलरीआँ व दर्शन सिंह बरेटा (बरेटा), बिक्रमजीत ‘नूर’ (गिद्दड़बाहा), निरंजन बोहा (बोहा), विवेक (कोट ईसे खाँ) रणजीत आज़ाद काँझला (धूरी), अमृत लाल मन्नन, हरभजन खेमकरणी व डॉ. श्याम सुन्दर ‘दीप्ति’(अमृतसर) ने पंजाबी में अपनी रचनाएँ पढ़ीं। पढ़ी गई रचनाओं पर अन्य के साथ भगीरथ परिहार (कोटा), सुकेश साहनी (बरेली), सुभाष नीरव(दिल्ली) व डॉ.सुखदेव सिंह सेखों (अमृतसर) ने विशेष रूप से अपने विचार व्यक्त किए।

-श्याम सुन्दर अग्रवाल

केंद्रीय हिंदी संस्थान : पुरस्कारों की घोषणा

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा १९६१ ई. में संस्थापित स्वायत्त संगठन केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल द्वारा संचालित एक स्वायत्तशासी शैक्षिक संस्था है| संस्थान का मुख्यालय आगरा में स्थित है| इसके आठ केंद्र इन नगरों में सक्रिय हैं - दिल्ली (१९७०), हैदराबाद (१९७६), गुवाहाटी (१९७८), शिलांग (१९८७), मैसूर (१९८८), दीमापुर (२००३), भुवनेश्वर (२००३) तथा अहमदाबाद (२००६)|

दिनांक १० अक्तूबर को एक पत्रकार सम्मेलन के दौरान संस्थान के निदेशक प्रो़. मोहन ने बताया कि भारत की एकता की एक महत्वपूर्ण कड़ी हिंदी है| आधुनिक भारत के लिए राष्ट्रीय एकता सबसे बड़ा मूल्य है, जो केंद्रीय हिंदी संस्थान के हर कार्यक्रम के मूल में विद्यमान रहा है| प्रत्येक वर्ष केंद्रीय हिंदी संस्थान हिंदी में प्रचार-प्रसार के लिए कुल १४ पुरस्कार हिंदी विद्वानों को देता है|

इस अवसर पर केंद्रीय हिंदी संस्थान के माननीय उपाध्यक्ष प्रो. अशोक चक्रधर ने वर्ष २००८ एवं २००९ के लिए निम्न पुरस्कारों की घोषणा की है--
१. गंगाशरण सिंह पुरस्कार
(हिंदी प्रचार-प्रसार एवं हिंदी प्रशिक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष २००८ के लिये- १. श्री गिरीश कर्नाड, २. श्री माधुरी छेड़ा, ३. श्री बल्ली सिंह चीमा तथा वर्ष २००९ के लिये- १. श्री वाई. लक्ष्मी प्रसाद, २. श्री मधुर भंडारकर, ३.श्री दामोदर खडसे, ४.श्री चमनलाल सप्रू।

२. गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार
(हिंदी पत्रकारिता तथा रचनात्मक साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष २००८ के लिये- 1. श्री पंकज पचौरी, 2. श्री विनोद अग्निहोत्री तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री ब्रजमोहन बख्शी, 2. श्री बलराम

३.आत्माराम पुरस्कार
(वैज्ञानिक एवं तकनीकी साहित्य और उपकरण विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. प्रो. यशपाल एवं 2. श्री मुहम्मद ख़लील तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री सुभाष लखेड़ा, 2. श्री नरेंद्र सहगल

४.सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार
(हिंदी के विकास से संबंधित सर्जनात्मक/आलोचनात्मक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सेवाओं के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्री नंदकिशोर आचार्य एवं 2. श्री विजय बहादुर सिंह तथा वर्ष 2009 के लिये- १. श्री अजित कुमार एवं 2. श्री गोपाल चतुर्वेदी

५. महापण्डित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार
(हिंदी में खोज एवं संधान करने तथा यात्रा विवरण आदि के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्री गोपाल राय एवं 2. डॉ. विमलेश कांति वर्मा तथा वर्ष 2009 के लिये 1. डॉ. हरिमोहन एवं 2. डॉ. विक्रम सिंह

६. डॉ. जार्ज ग्रियर्सन पुरस्कार
(एक विदेशी हिंदी विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्री हरमन वैन ऑलफन (यू.एस.ए.) तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री ली जंग हो (कोरिया)

७. पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार
(किसी भारतीय मूल के विद्वान को विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय कार्य के लिये)
वर्ष 2008 के लिये- 1. श्रीमती पूर्णिमा वर्मन तथा वर्ष 2009 के लिये 1. श्री सुरेंद्र गंभीर

कॉमरेड पेरिन दाजी की किताब ‘‘यादों की रोशनी में’’ का विमोचन

२ अक्टूबर 2011 को इंदौर प्रेस क्लब के राजेन्द्र माथुर सभागृह में अटाटूट लोग जिस नेता की याद में आयोजित सभा में इकट्ठे थे वह न कभी सत्ता में रहा और न ही बरसों से राजनीति में सक्रिय था। फिर भी न केवल हॉल में क्षमता से ज़्यादा लोग मौजूद थे बल्कि बाहर लगी स्क्रीन पर भी लोगों की भीड़ जमा थी। और यह सब तब था जब कार्यक्रम स्थल की क्षमता देखते हुए ज़्यादा लोगों को बुलाने की कोशिशों को धीमा करना पड़ा था।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की इंदौर ज़िला परिषद् द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में इकट्ठे हुए विभिन्न तबक़ों के लोगों के दिलों में कॉमरेड होमी दाजी का नाम सिर्फ़ इसलिए नहीं था कि वे दो बार विधायक रहे और एक बार सांसद। बल्कि इसलिए कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने चुनावी राजनीति का इस्तेमाल जनता के हक़ में किया और इस पूँजीवादी लोकतंत्र के भीतर, अधिक संसाधन न होते हुए भी जनता का विश्वास कैसे अर्जित किया जाता है, यह करके दिखाया।  २००९ में जब होमी दाजी नहीं रहे तो उनकी जीवनसंगिनी पेरिन ने हीरालाल के कहने पर दाजी की ज़िंदगी के बारे में एक किताब लिखनी शरू की थी जिसका विमोचन था 2 अक्टूबर को।  विमोचन के पूर्व ही किताब के एक अंश की एकल नाट्य प्रस्तुति डॉ. यामिनी ने दी जिसका निर्देशन विनीत तिवारी ने ही किया था। उस संक्षिप्त किन्तु शानदार ब्रेष्टियन प्रस्तुति ने दर्शकों को पूरी किताब पढ़ने की तीव्र उत्सुकता से भर दिया। इसके उपरांत कॉमरेड पेरिन दाजी ने कहा कि फल के ठेलेवाले महेंद्रकुमार के केलों के पैसे तो वे चुका सकती हैं लेकिन उस प्यार का कोई मूल्य नहीं जो इन जैसे लाखों मेहनतकश लोगों ने दाजी को दिया और जिसकी वजह से अनेक तकलीफ़ों के बावजूद दाजी को आख़िरी साँस तक ज़िंदगी से प्यार रहा। उनके संक्षिप्त किंतु भावुक संबोधन से सभी उपस्थितों की आँखों में आँसू भर आये।

कार्यक्रम की अध्यक्षता की भाकपा जिला परिषद के सदस्य व प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई के उपाध्यक्ष श्री एस. के. दुबे ने और भाकपा जिला परिषद के सदस्य एडवोकेट ओमप्रकाश खटके भी मंच पर मौजूद थे। कार्यक्रम  का संयोजन व संचालन किया प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य महासचिव कॉमरेड विनीत तिवारी ने। कॉमरेड पेरिन दाजी की किताब के संपादक भी वही हैं। यह किताब भारतीय महिला फ़ेडरेशन की केन्द्रीय इकाई व प्रगतिशील लेखक संघ की इन्दौर इकाई द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित की गई है। कविता पोस्टरों व होमी दाजी के चित्रों की प्रदर्शनी भी इस मौके पर इप्टा इंदौर के सचिव श्री अशोक दुबे ने लगायी थी जो काले-सफ़ेद चित्रों के साथ अतीत के एक चमकदार दौर की याद दिला रही थी और उस दौर को वर्तमान में हासिल करने के लिए उकसा रही थी। कार्यक्रम के दौरान और कार्यक्रम के बाद लगते ‘‘कॉमरेड होमी दाजी को लाल सलाम’’ के जोशीले नारे बुजुर्ग कॉमरेडों की आँखों में उम्मीद की एक चमक पैदा कर रही थीं।
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सारिका श्रीवास्तव
सचिव, भारतीय महिला फे़डरेशन, इंदौर शाखा.
द्वारा शहीद भवन, 64, न्यू देवास  रोड, इंदौर.
09425096544

कोपनहेगन में हिन्दी सांस्कृतिक संगोष्ठी

९ अक्तूबर २०११ को कोपनहेगन में चाँद शुक्ला हदियाबादी का सांस्कृतिक कैफे ट्रंकबार हिन्दी संगोष्ठी से एक बार फिर गूँज उठा। इस कार्यकम की नींव तब पड़ गई थी जब मई २०११ में अभिव्यक्ति अनुभूति की संपादक पूर्णिमा वर्मन कोपनहेगन आयी थी और उनकी प्रेरणा से डेनमार्क में ऐसा पहला साहित्यिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ था। पूर्णिमा वर्मन ने कोपनहेगन निवासी भारतीयों को प्रेरित किया था कि वे इसी तरह नियमित रूप से मिलते रहे और अपनी हिन्दी भाषा व भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देते रहें।
इस द्वितीय हिन्दी संगोष्ठी में डेनमार्क निवासी कई भारतीयों ने अपनी भागीदारी दी। सुखद संयोग से इस बार डा. विजया सती उपस्थित थीं। डा. सती दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफेसर हैं और आजकल एल्ते विश्वविद्यालय बुदापैश्त हंगरी में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से नियुक्त हिन्दी की विजिटिंग प्रोफेसर है। डा. सती की उपस्थिति से कार्यक्रम और अधिक प्रभावी हो गया।

हम सभी जानते हैं कि हिन्दी एक बृहत देश हिन्दुस्तान की राजभाषा और एक विशाल जनसंख्या की मातृभाषा है। दुनिया में हिन्दी बोलने वालों की संख्या पहले से तीसरे स्थान पर निश्चित की जाती रही है। विश्व में किसी देश की भाषा की माँग उसकी राष्ट्री्य शक्ति को चित्रित करती हैं। इसे देखते हुए पिछले कुछ वर्षों में हिन्दी की स्थिति में तेजी से विकास हुआ है। विशेषकर विदेशों में रहने वाले भारतीय हिन्दी व भारतीय संस्कृति के विकास को लेकर काफी सक़िय होते जा रहे हैं। आज विदेशों से काफी अच्छा हिन्दी साहित्य लिखा जा रहा है। हिन्दी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं। विश्व के अनेकों विश्वविद्यालयों में हिन्दी के पाठ्यक्रम शुरू हो गए हैं। हिन्दी एक भाषा ही नहीं, हमारी संस्कृति व पराम्पराओं की अभिव्यक्ति भी है। सो देश-विदेश में चलते सामाजिक  सांस्कृतिक व धार्मिक क्रियाकलाप एवम् गतिविधियाँ भी बढ़ी हैं।

कोपनहेगन में आयोजित संगोष्ठी का विषय था- कोपनहेगन निवासी भारतीय हिन्दी को कितना आवश्यक समझते हैं? अपने जीवन में कितना वे हिन्दी को अपनाते हैं? कितनी वे हिन्दी पत्रिकायें व पुस्तकें पढ़ते है? अपने बच्चों को हिन्दी सीखने के लिये वे कितना प्रेरित करते हैं। इस कार्यकम में कोपनहेगन में भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। उन्होंने प्रकाश डाला कि अपनी संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यक्रमों द्वारा कैसे वे हिन्दी व भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहित करते हैं। इस विषय पर डा रश्मि सिंगला, सुखदेव सिंह सन्धू, डा. सुरेश बिहारी माथुर, सुनीता मंगा, डा सुभाष धर, गुरूचरण मिंगलानी, डा सुधीर शर्मा, स्वाति डंगवाल, सतीश सरीन एवं चाँद शुक्ला आदि कई बुद्विजीवियों ने अपने विचार प्रस्तुत किये। अन्त में विजयाजी ने एलते विश्वविद्यालय में विदेशियों को हिन्दी व भारतीय संस्कृति को पढ़ाने के अपने रोचक व जानकारीपूर्ण अनुभव सुनाए। कार्य का समापन गजल व कविता पाठ से हुआ।

-अर्चना पैन्यूली

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार [2011] समारोह संपन्न

चित्र में-पुरस्कृत हिंदी साहित्यकार मटमरि, तेलुगु कथाकार डी. कामेश्वरी एवं रंगमंच कलाकार रेकेंदर नागेश्वर राव ‘बाब्जी’. साथ में डॉ. पी.वी. रंगाराव, सी. वी. चारी तथा स्मारक ट्रस्ट के पदाधिकरीगण।

हैदराबाद, ५ अक्तूबर, २०११, श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्वर्गीय वेमूरि आंजनेय शर्मा के ९५ वें जयंती समारोह के संदर्भ में वर्ष २०११ के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। यह समारोह स्थानीय रवींद्र भारती सभागार में संपन्न हुआ।

समारोह की अध्यक्षता आंध्र प्रदेश भूदान यज्ञ बोर्ड के अध्यक्ष श्री सी.वी.चारी ने की तथा आंध्र प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. पी.वी. रंगाराव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वर्ष २०११ का वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार हिंदी साहित्य के लिए वरिष्ठ व्यंग्यकार मटमरि उपेंद्र को प्रदान किया गया जबकि तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार विख्यात तेलुगु कथाकार डी. कामेश्वरी ने एवं तेलुगु रंगमंच के लिए सुप्रसिद्ध कलाकार रेकेंदर नागेश्वर राव ‘बाब्जी’ ने प्राप्त किया। तीनों सम्मानित विभूतियों को शाल, स्मृतिचिह्न तथा १० हज़ार की नक़द राशि भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ट्रस्ट की ओर से छात्र-छात्राओं को ‘प्रतिभा पुरस्कार’ तथा ‘सरस्वती पुरस्कार’ भी प्रदान किए गए। मुख्य अतिथि डॉ. पी.वी. रंगाराव ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा बहुमुखी प्रज्ञाशाली थे जो हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए अपना सारा जीवन उत्कृष्ट सेवाएँ प्रदान करते रहे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारतीय भाषाओं को सर्वप्रथम कंप्यूटर पर लाने का श्रेय वे. आंजनेय शर्मा को ही जाता है। अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री सी.वी. चारी ने आंजनेय शर्मा के साथ अपने 60 साल के निकट संबंधों को स्मृतिपटल पर लाते हुए बताया कि आंजनेय शर्मा का जीवन भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय तथा आदर्श है। उन्होंने आगे यह भी कहा कि श्री पी.वी. नरसिंहा राव तथा आंजनेय शर्मा के अथक प्रयास से ही दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च षिक्षा विभाग में विभिन्न चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम आरंभ किए गए जो आज़ भी अबाध चल रहे हैं।

समारोह का संचालन सी.सी.एम.बी. के हिंदी अधिकारी चंद्रशेखर ने किया तथा श्रीमती शारदा और बालाजी ने कार्यक्रम के आरंभ में सुगम संगीत प्रस्तुत किया। समारोह में ट्रस्ट के प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा तथा अन्य न्यासियों ने भी भाग लिया। इस कार्यक्रम में नगरद्वय के अनेक विशिष्ट हिंदी सेवी और गणमान्य विद्वान उपस्थित थे।

– वेमूरि ज्योत्स्ना कुमारी.

स्मृति मंजूषा और भीगे पंख का विमोचन

’ज्ञान प्रसार संस्थान’ के तत्वावधान में नीरजा द्विवेदी के संस्मरण ’स्मृति मंजूषा’ एवं महेश चन्द्र द्विवेदी के उपन्यास ’भीगे पंख’ का लोकार्पण २५ सितम्बर, २०११ को सिटी मांटेसरी स्कूल, गोमतीनगर, लखनऊ के भव्य सभागार में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर लेखिका नीरजा द्विवेदी ने सस्वर भावभीनी सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।

’स्मृति मंजूषा’ के विषय में लेखिका ने कहा कि इसके लेख उनके अमेरिका एवं इंग्लैंड के प्रवास के दौरान घटित ऐसी घटनाओं के संस्मरण हैं, जो एक सामान्य भारतीय के लिये अनोखी अथवा शिक्षाप्रद हैं। समीक्षक डा. मधु चतुर्वेदी ने बताया कि इसमें वर्णित घटनायें पाश्चात्य जीवन-प्रणाली, सभ्यता एवं संस्कृति के अतिरिक्त वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य एवं भौतिक प्रगति को बडे रुचिकर ढंग से चित्रित करतीं हैं। इनमें अनेक बातें यथा समता का भाव, कार्य के प्रति निष्ठा, नियमों का पालन, किसी कार्य को छोटा न समझने की मान्यता, दिन-प्रतिदिन के कार्यों में बरती जाने वाली ईमानदारी एवं जीवन के प्रति उत्साहपूर्ण दृष्टिकोण हमारे लिये अनुकरणीय है।

'भीगे पंख’ उपन्यास का परिचय देते हुए महेश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि इस उपन्यास का विचार थामस ए. हैरिस की प्रसिद्ध पुस्तक ’आई. एम. ओ. के. : यू. आर. ओ. के.’ पढकर आया था। तीनों मुख्य पात्र मोहित, सतिया और रज़िया क्रमशः ’आई. एम. नौट ओ. के.: यू आर ओ. के.’, ’आई एम. ओ. के.: यू आर नौट ओ. के.’ एवं ’आई एम. नौट ओ. के.: यू आर नौट ओ. के.’ की असामान्य मनःस्थिति के हैं। इस कारण उनके पंख भीगे हुए हैं और वे पूरी उडान भरने में असमर्थ हैं। समीक्षक श्री संजीव जायसवाल ने उपन्यास में ग्रामीण परिवेश के एवं विशेषतः निम्न वर्ग की सामाजिक स्थिति के वर्णन को अद्भुत बताया और कहा कि इसे पढकर अमृत लाल नागर की ’नाच्यो बहुत गोपाल’ की याद ताज़ा हो जाती है।

श्री के. विक्रम राव ने अध्यक्षीय भाषण में दोनो पुस्तकों को अपने अपने क्षेत्र की विशेष उपलब्धि बताते हुए उन्हें पठनीय एवं संग्रहणीय बताया।

पूर्वोतर नागरी लिपि राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न

ईटानगर, २४-२५ सितम्बर, पूर्वोत्तर नागरी लिपि राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा ३४वाँ अखिल भारतीय नागरी लिपि सम्मेलन अरूणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में संपन्न हुआ। स्थानीय देरानातुंग शासकीय महाविद्यालय के जुबली हाल में द्विदिवसीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में उच्च शिक्षा निदेशक डा. जोरांग बाईंगी, राजीव गांधी विश्वविद्यालय के उपकुलपति डा. मिदान, नागरी लिपि परिषद, दिल्ली के अध्यक्ष श्री सी.वी.चारी तथा महासचिव डा. परमानंद पांचाल ने देवनागरी को विश्व की सर्वश्रेष्ठ एवं वैज्ञानिक लिपि बताते हुए सभी से अपनी लिपि के साथ-साथ एक अतिरिक्त लिपि के रूप में देवनागरी अपनाने की जरूरत पर बल दिया।

डा. पांचाल ने आचार्य विनोबा भावे द्वारा स्थापित नागरी लिपि परिषद के उद्देश्यों की चर्चा करते हुए लिपि रहित बोलियों के लिए देवनागरी को श्रेष्ठ विकल्प बताया। हिन्दी में बोलते हुए डा. जोरांग बाईंगी ने जहाँ अनेक सुझाव दिये वहीं देवनागरी को राष्ट्रीय एकता के लिए आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि अरूणाचल प्रदेश में अनेक बोलिया हैं किन्तु वहां की संपर्क भाषा हिन्दी है। इससे पहले देरानातुंग कालेज के प्रधानाचार्य ने दिल्ली तथा देश के विभिन्न भागों से आये विद्वानों का स्वागत करते हुए अरूणाचल की समस्त हिन्दी प्रेमी जनता की ओर से शुभकामनाएं व्यक्त की। इसी सत्र में 2011 का प्रतिष्ठित विनोबा नागरी सम्मान निशी जनजाति की विदुषी एवं सहायक आचार्य डा. जोरम आनिया ताना को प्रदान किया गया। पुरस्कार में पुण्पगुच्छ, स्मृतिचिन्ह, प्रशस्तिपत्र, शाल तथा आठ हजार की नकद राशि संस्था के अध्यक्ष श्री सी.वी.चारी के कर कमलों से डा. ताना को जनजाति साहित्य के देवनागरीकरण के लिए भेंट की गई। कार्यक्रम संचालन डा. तुम्बम रिबा जोमो ने किया। इस सम्मेलन के पाँच सत्रों में पूर्वोत्तर की बोलियों के लिए देवनागरी का प्रयोग, भारतीय भाषाओं के लिए सम्पर्क लिपि देवनागरी, अरूणाचल प्रदेश की बोलियां और नागरीलिपि, सूचना प्रौद्योगिकी और नागरी लिपि तथा पूर्वात्तर भारत के साहित्य का नागरी लिपि में प्रकाशन (नेशनल बुक ट्रस्ट के सौजन्य से) पर विस्तृत चर्चा के दौरान अनेक भाषाविदों ने विभिन्न पक्षों को प्रस्तुत कर देवनागरी के अधिकाधिक प्रयोग पर बल दिया। चर्चा में भाग लेने वाले जहां पूर्वोत्तर के नागरी प्रेमी विद्वानों ने कुछ ध्वनियों के लिए अतिरिक्त चिन्हों की जरूरत बताई वहीं अनेक छात्रों ने अपने शोधपत्र और आलेख प्रस्तुत कर संगोष्ठी की अभूतपूर्व सफलता और सार्थक संवाद को प्रमाणिकता प्रदान की।

विभिन्न सत्रों की अध्यक्षता साहित्य अकादमी दिल्ली के उपसचिव डा. बिजेन्द्र त्रिपाठी, नेशनल बुक ट्रस्ट के डा. ललित मंडोरा, दिल्ली से प्रकाशित होने वाले राष्ट्रकिंकर के संपादक डा. विनोद बब्बर, भारत सरकार में निदेशक रहे प्रो. सोमदत्त दीक्षित, हिन्दी संस्थान के डा. उमाकांत खुबालकर ने की वहीं डा. श्री भगवान शर्मा, श्री नाहर सिंह वर्मा, डा. तारो सिन्दिक, डा. वीरेन्द्र परमार, डा.राजेन्द्र नाथ महरोत्रा, डा. विनोद मिश्र, डा. अशोक पाण्डेय ने चर्चा में हस्तक्षेप कर संगोष्ठी के विषय स्पष्ट करने तथा चर्चा को आयाम प्रदान करने में उल्लेखनीय योगदान किया। प्रथम दिवस देर रात तक चले कवि सम्मेलन में ३२ कवियों ने अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ प्रस्तुत की। डा. बृजपाल सिंह ‘संत’ द्वारा संचालित कवि-गोष्ठी ने आधे से अधिक स्थानीय कवियों की सहभागिता और उनका उत्साह देखते ही बनता था। इस कवि गोष्ठी को टीवी चैनलों ने प्रसारित कर संदेश जन-जन तक पहुँचाया। समापन सत्र में कालेज की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत जन जातीय नृत्य ने समा बाँध दिया। अंत में संस्था के महामंत्री डा. परमानंद पांचाल ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए नागरी लिपि परिषद की ओर से ऐसे और आयोजनों की जानकारी भी दी। उन्होंने अरूणाचल प्रदेश के लोगों की सदभावना तथा उनके आथित्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए ईटानगर में अपनी स्थायी शाखा खोलने की घोषणा भी की।

दिल्ली से संगोष्ठी में भाग लेने वालों में पंचवटी लोकसेवा समिति, दिल्ली के सरंक्षक डा. अम्बरीश कुमार, यथासंभव के दीपक गोयल, आचार्य ओमप्रकाश, श्री राजकुमार .पाराशर, रमेश कुमार भी शामिल थे। सम्मेलन संचालिका डॉ. डा. जोरम आनिया ताना व सहसंचालिका डा. तुम्बम रिबा जोमो के नेतृत्व में स्थानीय छात्रों, कवियों तथा चीन की सीमा के निकट से आये शायर अन्नु बशार, उपन्यासकार जोरंग सीराम ने समारोह को सफल बनाने व अन्य व्यवस्थाओं की सफलता के लिए दिन रात कार्य किया।

- विनोद बब्बर

रामायण की पाँच कथाओं के हिंदी और डच संस्करण का लोकार्पण

सूरीनाम की विदुषी महिला श्रीमती कार्मेन मरहई ने रामायण पर केंद्रित एक ऐसा अनूठा प्रयास किया है जो एक तरफ तो गैर भारतीयों को रामकथा से जोड़ेगा और दूसरी तरफ सूरीनाम में बसे प्रवासी भारतीयों को अपनी मातृभाषा हिन्दी से। श्रीमती मरमई द्वारा हिन्दी और डच में अनुवादित रामायण की पाँच कथाओं की पुस्तक का लोकार्पण पारामारिबो में हुआ।

अति प्राचीन होते हुए भी रामायण सर्वथा नवीन है। विश्व के लेखक और साहित्यकार पिछली कई सदियों से रामायण से प्रेरणा लेकर अपनी सृजन प्रक्रिया को नया आयाम दे रहे है। लेखकों ने रामायण के आधार पर अनेक कृतियों की रचना की, कई तरह से इसकी व्याख्या हुई है और ये सिलसिला अभी भी जारी है। सूरीनाम की विदुषी महिला श्रीमती कार्मेन मरहई ने ऐसा ही एक प्रयास किया।

दीपावली से पहले उन्होंने सूरीनाम के हिन्दी और डच भाषियों को रामायण से जुडी एक अनूठी सौगात दी। पारामारिबो की सांस्कृतिक संस्था माता गौरी में हुए एक गरिमामय कार्यक्रम में उनकी इस पुस्तक का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर पारामारिबो के कई विशिष्टजन उपस्थित थे। कार्यकर्म को संबोधित करते हुए राजदूतावास की हिंदी व संस्कृति अधिकारी श्रीमती भावना सक्सैना ने रामायण कि प्रासंगिकता की चर्चा की। उन्होंने कहा कि ये सूरीनाम में हिंदी टंकण कार्यशाला की सफलता का प्रतीक भी है। उन्होंने इस अद्भुत प्रयास के लिए मरहई परिवार व सूरीनाम के हिंदी प्रेमियों को बधाई दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन युवा हिंदी छात्रा कुमारी मोती रंगीला ने किया। इस अवसर पर रामायण समाज ने सुमधुर रामायण वाचन भी किया।

उल्लेखनीय है कि इस पुस्तक में बालकांड से प्रयाग महिमा, अयोध्याकांड से लक्ष्मण व निशादराज संवाद , अरण्यकांड से पंचवटी का राम लक्ष्मण संवाद और शबरी माता की नवधा भक्ति तथा उत्तरकांड से पुरजन उपदेश की व्याख्या बहुत सरल ढंग से डच और हिंदी में की गई है। डच भाषा में लिखे आमुख में संक्षेप में रामायण का परिचय दिया गया है। इसके हिन्दी भाग की टाइपिंग श्रीमती मरहई की सुपुत्री श्रीमती रमोना औसान ने की और खास बात ये है कि सिर्फ इस पुस्तक के लिए उन्होंने हिन्दी की टाइपिंग सीखी।

श्रीमती मरहई सूरीनाम में रामायण की सक्रिय प्रचारक हैं। वे पारामारिबो की सांस्कृतिक संस्था माता गौरी में रामायण कक्षाएं भी लेती है जिसमें सब मिलकर रामायण पाठ करते हैं व श्रीमती मरहई उसकी व्याख्या करती हैं। सरल हृदया कार्मेन जी कर्म को प्रधान मानती हैं और यही कारण है कि आज के इस युग में जब प्रत्येक पुस्तक पर लेखक का चित्र व परिचय होना अवश्यंभावी हो गया है, इस पुस्तक में कार्मेन जी ने अपना चित्र व परिचय कुछ नहीं दिया है। वह कहती हैं "मेरा उद्देश्य सिर्फ रामायण प्रचार प्रसार है और वही आवश्यक है, मैं नहीं"।

-भावना सक्सेना