रविवार, 24 अप्रैल 2011

प्रमोद वर्मा युवा कविता सम्मान के लिये कृतियाँ आमंत्रित

रायपुर । राज्य की प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संगठन प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान अब देश की समकालीन युवा कविता को प्रोत्साहित करने के लिए एक और राष्ट्रीय सम्मान देगा । संस्थान द्वारा लिये गये निर्णायानुसार वर्ष 2010 से प्रत्येक वर्ष 40 वर्ष की आयु के कम उम्र के एक ऐसे युवा कवि को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमोद वर्मा कविता सम्मान दिया जायेगा जिसने वर्ष भर की प्रकाशित हिन्दी कविताओं में अपने नवाचारी प्रयोग से हिन्दी कविता संसार को नयी दृष्टि देने का अनूठा प्रयास किया हो साथ ही जनतांत्रिक मूल्यों के विकास, सामाजिक सरोकारों और मानव के सम्मुख भावी चुनौतियों को समझने की नयी भाषा और प्रभावकारी शिल्प रचा हो।

सम्मान-विवरण

चयनित युवा कवि को एक आत्मीय और राष्ट्रीय आयोजन में 5001 रुपये का नगद पुरस्कार, प्रतीक चिन्ह, प्रशस्ति चिन्ह, प्रमोद वर्मा समग्र, शॉल-श्रीफल से अभिनंदित किया जायेगा। इसके अलावा उसकी किसी काव्य-कृति के पाण्डुलिपि का प्रकाशन भी संस्थान के पूर्ण सहयोग से किया जायेगा। जिसकी 100 प्रतियाँ सम्मानित कवि को भेंट किया जायेगा। यह सम्मान इस वर्ष 23-24 जुलाई, 2011 को संस्थान के वार्षिक और राष्ट्रीय आयोजन में दिया जायेगा।

चयन प्रकिया

१. चयन हेतु प्रारंभिक अनुशंसा- ऐसे युवा कवि के नाम की प्राथमिक अनुशंसा सहृदय पाठक, मित्र कवि, साहित्य-अध्यापक, आलोचक, समीक्षक, पत्र-पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य, पुस्तक प्रकाशक अपनी टिप्पणी, कवि की बायोडेटा, प्रकाशित खास पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कुछ कवितायें (यदि संग्रह प्रकाशित हुआ हो तो उसकी 3 प्रतियाँ के साथ-) चयन समिति के संयोजक प्रेषित कर सकते हैं । स्वयं कवि भी आत्मीय भाव से पहल करते हुए भी अपनी प्रविष्टि संयोजक को भेज सकते हैं । प्रविष्टि भेजते वक़्त इस बात का अवश्य ध्यान रखा जाये कि कवि की कविताएँ या कविता संग्रह वर्ष 1 जनवरी 2010 से 31 दिसंबर 2010 के मध्य प्रकाशित हुए हों ।

२. अंतिम निर्णय हेतु चयन समिति का गठन- युवा कवियों के पक्ष में प्राप्त प्रविष्टियों में से अंतिम चयन करने हेतु निम्नांकित विशेषज्ञों की एक चयन समिति प्रस्तावित किया गया है -
• डॉ. अजय तिवारी, वरिष्ठ आलोचक, दिल्ली
• श्री अग्निशेखर, प्रतिष्ठित कवि, जम्मू
• श्रीप्रकाश मिश्र, संपादक, उन्नयन, इलाहाबाद
• श्री नासिर अहमद सिंकदर, युवा कवि, भिलाई
• श्री जयप्रकाश मानस, कवि एवं संयोजक, रायपुर
प्रविष्टि प्राप्ति की अंतिम तिथि : 15 जून, 2011

प्रविष्टि भेजने का पता –
संयोजक,
प्रमोद वर्मा कविता सम्मान चयन समिति,
एफ-3, छ.ग.मा.शि.मं. आवासीय परिसर
दयानंद उप डाकघर के पास, पेंशनवाड़ा,रायपुर-छत्तीसगढ़-492001,
ईमेल-pandulipipatrika@gmail.com

शशि पाधा के कविता संग्रह का विमोचन

अमेरिका में रह रही अग्रिम पंक्ति की कवयित्री शशि पाधा के काव्य संग्रह "अनंत की ओर " का विमोचन बुधवार को "के एल सहगल" हाल में हुआ। कार्यक्रम में जम्मू यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो वरुण साहनी मुख्य अतिथि थे।युवा हिंदी लेखक संघ के अध्यक्ष श्री अशोक कुमार ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की।

यह शशि पाधा का तीसरा संग्रह है। इससे पहले इनके दो कविता संग्रह "मानस मंथन " एवं "पहली किरण" प्रकाशित हो चुके हैं। इस संग्रह में प्रकृति एवं प्रेम का संवेदनशील संगम है जिसमे हमें कवयित्री के अंतर्संसार के दर्शन होते हैं। मुख्यत: गीतों की रचना करने वाली कवयित्री ने इस संग्रह के द्वारा दोहों तथा नवगीतो की दुनिया में भी प्रवेश किया है। शशि पाधा ने अमेरिका के नार्थ केरोलिना यूनिवर्सिटी एट चैपल हिल में हिंदी भाषा का अध्यापन कार्य किया। वर्ष २००७ में इन्होंने न्यूयार्क में आयोजित ८वें विश्व हिंदी सम्मलेन में भाग लिया। शशि जी अंतर्राष्ट्रीय विश्व हिंदी समिति तथा विश्व हिंदी न्यास संस्थाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ी हुई हैं।

इस समारोह में कुलपति प्रो वरुण साहनी ने कहा कि अमेरिका में रहते हुए शशि पाधा ने हिंदी साहित्य की यात्रा को आगे बढ़ा कर अत्यंत सराहनीय कार्य किया है तथा उनकी पुस्तक में देश प्रेम और परदेस में रहने पीड़ा की झलक मिलती है। शशि ने संक्षेप में इस पुस्तक से जुड़े अपने अनुभव सब के साथ सांझा किये और संग्रह में छपी कुछ रचनाओं का पाठ किया। उन्होंने प्रकाशन में सहयोग देने वाले मानवी प्रकाशन के श्री इंदु भूषण का आभार व्यक्त करते हुए सभागार में उपस्थित सभी साहित्यकारों का धन्यवाद किया।

कार्यक्रम के अंत में संगीत का कार्यक्रम हुआ जिसमें जम्मू के जाने माने गायक श्री शाम साजन ने उनकी दो रचनायो को संगीत बद्ध कर पेश किया तथा सुश्री प्रतिमा शर्मा ने भी एक सुन्दर गीत की प्रस्तुति की। इस कार्यक्रम में जम्मू विश्व विद्यालय के शिक्षक, डोगरी तथा हिंदी के, साहित्यकार तथा रेडियो/ दूर दर्शन से जुड़े गणमान्य लोग उपस्थित थे। स्वागत भाषण "युहिले" के प्रधान श्री शेख मोहमाद कल्याण ने दिया और आमंत्रित मेहमानों का धन्यवाद उपसचिव डा पवन कुमार ने किया।

कॉलेज ऑफ़ वोकेशनल स्टडीज, दिल्ली में राष्ट्रीय संगोष्ठी

कविता की प्रासंगिकता: संदर्भ अज्ञेय, नागार्जुन, शमेशर बहादुर सिंह, एवं केदारनाथ अग्रवाल
‘जो बीत जाता है उसके पुर्नावलोकन की बाते उठती है और जब हम इनपर चर्चा करते हैं तो नई बातें सामने आती हैं। आवश्यक्ता है इस निरंतर पुर्नावलोकन की।’ ये उद्गार कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज ,दिल्ली विश्वविद्यालय, द्वारा ‘कविता की प्रासंगिकता: संदर्भ अज्ञेय, नागार्जुन, शमेशर बहादुर सिंह, एवं केदारनाथ अग्रवाल’ विषय पर कॉलेज ऑफ वोकेशनल स्टडीज द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सहयोग से आयोजित, दो दिवयीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते समय प्रसिद्ध आलोचिका निर्मला जैन ने कहे। अपने अध्यक्षीय भाषण में अशोक वाजपेयी ने कहा-इन चारों कवियों ने यथार्थ और वैकल्पिक यथार्थ की कल्पना की। विशिष्ट अतिथि विश्वनाथ त्रिपाठी ने कहा - इन कवियों की राजनतिक समझ को स्वातंत्र्य प्रेम की नज़र से भी देखा जाए क्योंकि ये चारो कवि स्वाधीनता काल के कवि हैं। प्राचार्य डॉ. इंद्रजीत ने अतिथियों का स्वागत एवं धन्यवाद किया उद्घाटन सत्र के आरंभ में संगोष्ठी के संयोजक डॉ. प्रेम जनमेजय ने प्रस्तावित विषय के संबंध में विस्तार से बताया इस अवसर पर प्रेम जनमेजय द्वारा संपादित पुस्तक ‘श्रीलाल शुक्लः विचार विश्लेषण एवं जीवन’ का लोकार्पण भी किया गया।

संगोष्ठी का पहला सत्र केदारनाथ अग्रवाल पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता डॉ. नित्यानंद तिवारी ने की, मुख्य अतिथि थे डॉ. खगेंद्र ठाकुर। डॉ. बली सिंह, डॉ. द्वारिकाप्रसाद चारुमित्र एवं डॉ. विनय विश्वास ने अपने आलेख पढ़ें। डॉ. नित्यानंद तिवारी ने अध्यक्षीय भाषण दिया। सत्र का संचालन डॉ. रत्नावली कौशिक ने किया।

संगोष्ठी का दूसरा सत्र नागार्जुन पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता प्रो. गोपेश्वर सिंह ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ. विजय बहादुर सिंह। इस सत्र में डॉ. अनामिका, राधेश्याम तिवारी, डॉ. बागेश्री चक्रधर और डॉ. हरीश नवल ने अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन डॉ. वीनू भल्ला ने किया ।

संगोष्ठी का तीसरा सत्र अज्ञेय पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता श्री ओम थानवी ने की तथा मुख्य अतिथि थे डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल। इस सत्र में डॉ. प्रेम जनमेजय, रमेश मेहता, डॉ. अवनिजेश अवस्थी, डॉ. अर्चना वर्मा और डॉ. वीनू भल्ला ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन विनय विश्वास ने किया।

संगोष्ठी का चौथ सत्र शमशेर बहादुर सिंह पर केंद्रित था जिसकी अध्यक्षता डॉ. हरिमोहन शर्मा ने की । इस सत्र में डॉ. दिविक रमेश, डॉ. अजय नावरिया, भारत, डॉ. हेमंत कुकरेती ने अपने विचार रखे। अंत में प्रेम जनमेजय ने चारों सत्रों में चर्चित मुद्दों की संक्षिप्त रिपोर्ट प्रस्तुत की तथा प्रचार्य डॉ. इंदजीत ने सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रस्तुति: शशिभूषण

नव संवत्सर २०६८ के शुभारम्भ पर बदायूँ में काव्य संध्या

बदायूँ ४ अप्रैल २०११। भारतीय नव संवत्सर २०६८ के शुभारम्भ पर डॉ। उर्मिलेश जन चेतना समिति द्वारा
नगर के गुरुद्वारा हाल में आयोजित काव्य संध्या में जहाँ साहित्यकारों ने भारतीय नव वर्ष का स्वागत किया वहीं भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ल्ड कप जीतने पर अपनी काव्यमयी शुभकामनाएँ दीं।

कार्यक्रम का शुभारभ मुख्य अतिथि उप जिलाधिकारी सदर, भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी श्री पवन कुमार एवं रोटरी पोलिओ प्लस कमेटी के श्री श्यामजी शर्मा ने माँ सरस्वती के समक्ष दीप जलाकर एवं पुष्प अर्पित कर किया। इस अवसर पर काव्य संध्या के संयोजक डॉ. अक्षत अशेष, श्री विशाल गाफिल, डॉ. रामबहादुर व्यथित, कुमार आशीष, भारत शर्मा राज, डॉ. शैलेन्द्र कबीर, अशोके खुराना, डॉ. सुधाकर आशावादी, शायर चंद्रप्रकाश दीक्षित ने अपनी रचनाएँ पढ़ीं। मुख्य अतिथि उप जिलाधिकारी सदर, श्री पवन कुमार ने भी इस अवसर पर अपनी काव्यमयी शुभकामनायें दीं एवं सभी से समाज में सौहार्द एवं एकता की अपील की। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री श्यामजी शर्मा ने की।

इस अवसर पर कार्यक्रम में कवि महेश मित्र, अभिषेक अनंत, कुलदीप अंगार, शटवदन शंखधर, प्रदीप विशाल, डॉ. वैकुंठ नाथ शुक्ल ने भी काव्यपाठ किया। कार्यक्रम मे सतीश चन्द्र मिश्र, विपिन अग्रवाल, सुभाष आहूजा, रविन्द्र मोहन सक्सेना, मदनमोहन लाल, राहुल चोवे, विशाल रस्तोगी, अमित वार्ष्णेय, डॉ. उमेश गौर, सूर्यपाल अग्निहोत्री, डॉ. विश्नुप्रकाश मिश्र, हरिभगवान अरोरा एवं अन्य नागरिक उपस्थित रहे। काव्य संध्या का संचालन कामेश पाठक ने किया। अंत में डॉ. अक्षत अशेष ने सभी का आभार व्यक्त किया।

शमशेर शताब्दी समारोह संपन्न


हैदराबाद, 2 अप्रैल, 2011। ‘‘शमशेर बहादुर सिंह हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं के बड़े कवि थे। गद्यकार भी वे उतने ही बड़े थे। वे इकलौते ऐसे आलोचक हैं जिन्होंने हाली की उर्दू रचना ‘मुसद्दस’ और मैथिलीशरण गुप्त की हिंदी रचना ‘भारत भारती’ की गहराई से तुलना करते हुए दोनों के रिश्ते की पहचान की। इक़बाल पर भी हिंदी में उन्होंने ही सबसे पहले लिखा। वे हिंदी और उर्दू के बीच किसी भी प्रकार के भेदभाव और टकराव के विरोधी थे।

ये विचार प्रो. नामवर सिंह ने 30-31मार्च, 2011 को हैदराबाद में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘शमशेर शताब्दी समारोह’ के उद्घाटन सत्र में बुधवार को बीज व्याख्यान देते हुए व्यक्त किए। यह समारोह उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ। समारोह का उद्घाटन डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने किया। इस सत्र के संयोजक प्रो. दिलीप सिंह थे। विशिष्ट अतिथि प्रो. आमिना किशोर रहीं और अध्यक्षता मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मोहम्मद मियाँ ने की।

उद्घाटन के बाद ‘शमशेर की स्मृति’ पर केंद्रित सत्र में प्रो. दिलीप सिंह ने 'शमशेर : व्यक्ति और रचनाकार’ शीर्षक आलेख प्रस्तुत किया, प्रो. तेजस्वी कट्टीमनी ने ‘लोगों की स्मृतियों में बसे हुए शमशेर' पर प्रकाश डाला और डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने शमशेर बहादुर सिंह से जुड़े कई रोचक प्रसंग सुनाए। मुंबई से पधारे भाषावैज्ञानिक डॉ. अब्दुस्सत्तार दलवी ने स्मृति सत्र की अध्यक्षता की, संयोजन प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने किया तथा डॉ. मृत्युंजय सिंह ने वक्ताओं के प्रति आभार प्रकट किया।

‘शमशेर की कविता’ पर केंद्रित विचार सत्र की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से पधारे प्रो.सत्यकाम ने की। अलीगढ़ विश्वविद्यालय से आए डॉ. अब्दुल अलीम ने 'शमशेर : काव्यानुभूति के आयाम’ विषय पर अपना आलेख पढ़ा।
‘शमशेर की काव्यभाषा’ पर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने आलेख प्रस्तुत किया। काव्यभाषा विषयक चर्चा को आगे बढ़ाया उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद के डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने।


जोधपुर से पधारे डॉ. श्रवण कुमार मीणा ने शमशेर की गज़लों का विश्लेषण किया। दिल्ली से पधारे कविवर डॉ. हीरालाल बाछोतिया के आलेख का विषय था ‘शमशेर : शोक गीतों के आईने में’। अध्यक्ष मंडल के सदस्य प्रो. टी. मोहन सिंह ने शमशेर की जनपक्षधरता और प्रयोगधर्मिता को तेलुगु साहित्यकार श्रीश्री से तुलनीय बताया जो शमशेर के समकालीन थे। इस सत्र का संयोजन डॉ. जी.वी. रत्नाकर ने किया तथा डॉ. जी. नीरजा ने वक्ताओं और श्रोताओं का धन्यवाद प्रकट किया।

३१ मार्च, 2011 (गुरुवार) को आयोजित विशेष सत्र में प्रो. नामवर सिंह ने शमशेर से संबंधित संस्मरण सुनाकर श्रोताओं को भावविगलित तो किया ही, वैचारिक रूप से समृद्ध भी बनाया। दूसरे दिन के दो विचार सत्र शमशेर के गद्य को समर्पित रहे। इन सत्रों की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान के प्रो. हेमराज मीणा और ‘स्वतंत्र वार्ता’ के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने की तथा संयोजन डॉ. करनसिंह ऊटवाल और डॉ. शेषुबाबु ने किया। डॉ. हेमराज मीणा ने अपने पीएच.डी. शोध कार्य के दौरान तीन वर्ष शमशेर के साथ रहने के मार्मिक संस्मरण सुनाए। डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने शमशेर बहादुर सिंह को हिंदी और उर्दू की गंगा जमुनी तहज़ीब का कवि बताया। एरणाकुलम (केरल) से आई प्रो. सुनीता मंजनबैल ने शमषेर के डायरी लेखन पर केंद्रित आलेख पढ़ा, डॉ. मृत्युंजय सिंह ने ‘घनत्व और प्रसार का गद्य’ शीर्षक लेख और डॉ.जी. नीरजा ने ‘शमशेर की कहानियाँ’ विषयक आलेख का वाचन किया। गद्य संबंधी इस सत्र के अंत में डॉ. बलविंदर कौर ने सभी के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया।

संगोष्ठी के अंतिम विचार सत्र में प्रो. अमर ज्योति (धारवाड) ने ‘शमशेर की आलोचना दृष्टि’ पर आलेख पढ़ा और अलीगढ़ विश्वविद्यालय से आए डॉ. राजीव लोचन नाथ शुक्ल ने ‘शमशेर की भाषादृष्टि’ पर। कृतज्ञताज्ञापन डॉ. गोरख नाथ तिवारी ने किया। मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. टी.वी. कट्टीमनी ने समाकलन भाषण दिया। श्रीवेंकटेश्वर विश्वविद्यालय, तिरुपति के डॉ. आई.एन. चंद्रशेखर रेड्डी तथा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की डॉ. साहिरा बानू ने अपनी टिप्पणियों में कार्यक्रम की भूरि भूरि प्रशंसा की और कहा कि शमशेर को समझने में इस संगोष्ठी से बड़ी सहायता मिली। कार्यक्रम के परिकल्पक प्रो. दिलीप सिंह ने संतोष जताया कि पूरा आयोजन योजना के अनुरूप चला और शमशेर के व्यक्तित्व और कृतित्व से संबंधित कई गुत्थियाँ खुलीं। उन्होंने हर्ष व्यक्त किया कि सभी शोध पत्रों में वादनिरपेक्ष और पाठकेंद्रित आलोचनादृष्टि देखने को मिली।

समापन समारोह के मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए डॉ. नामवर सिंह ने बताया, ‘‘पिछले दिनों दिल्ली तथा अन्य स्थानों पर शमशेर पर कई गोष्ठियाँ हुईं परंतु उनमें पुनरावृत्ति ही अधिक दिखाई दी तथा कविता पर ही अधिक ज़ोर रहा। इसके विपरीत हैदराबाद के इस समारोह की यह उपलब्धि रही कि यहाँ नई बातें हुईं, अलग अलग दृष्टि से बातें हुईं, सब विधाओं की बातें हुईं और नई रचनाएँ उद्धृत की गईं। डॉ. नामवर सिंह ने इस तुलना को आगे बढ़ाते हुए कहा कि लोग आधा चाँद लिए नाच रहे थे, यहाँ पूरा चाँद देखने को मिला - शमशेर की शमशेरियत का पूरा चाँद। समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने की। समापन समारोह का संयोजन शमशेर की उक्तियों के माध्यम से प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने इतनी रोचक शैली में किया कि स्वयं प्रो. नामवर सिंह ने उनकी संयोजन शैली की मंच से मुक्तकंठ से प्रशंसा की।

इस समारोह में राष्ट्रीय संगोष्ठी के अतिरिक्त तीन अन्य कार्यक्रम भी संपन्न हुए।
1- डॉ. नामवर सिंह के हाथों डॉ. टी.वी. कट्टीमनी द्वारा संपादित समीक्षाकृति ‘दक्खिनी भाषा और साहित्य’ तथा हैदराबाद के प्रतिष्ठित क्रांतिकारी कवि शशि नारायण ‘स्वाधीन’ की काव्यकृति ‘भूख, धान और चिड़िया’ का लोकार्पण किया। पहले दिन की साँझ अभिनेता विनय वर्मा द्वारा एकपात्री नाटक ‘मैं राही मासूम’ का मंचन किया गया और समापन सत्र के उपरांत ‘अलिफ’ के तत्वावधान में प्रो. खालिद सईद ने ‘बहुभाषा कवि सम्मेलन’ आयोजित किया जिसमें हिंदी, उर्दू और तेलुगु के कवियों ने डॉ. नामवर सिंह, डॉ. गंगा प्रसाद विमल, डॉ. अब्दुस्सत्तार दलवी और डॉ. हीरालाल बाछोतिया के सान्निध्य में काव्यपाठ किया।

(रिपोर्टर :संगोष्ठी स्थल से डॉ.मृत्युंजय सिंह,डॉ जी.नीरजा,डॉ.बलविंदर कौर एवं डॉ.गोरखनाथ तिवारी)
[चित्र : डॉ. जी. नीरजा, डॉ. बी. बालाजी एवं राधाकृष्ण मिरियाला]