सोमवार, 28 मार्च 2011

शरद जोशी के नाटक एक था गधा.. का कोटा में मंचन


कोटा : भारत सरकार के सँस्थान इंस्ट्रुमेंटेशन लि. के क्लब मेँ होली मिलन के अवसर पर् प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी द्वारा लिखित बहुचर्चित नाटक ‘एक था गधा उर्फ अलादाद खाँ’ के चुटीले एवँ व्यँग्य से भरे सँवादोँ ने उपस्थित दर्शकोँ को खूब ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया। सप्त शृंगार संस्था द्वारा प्रस्तुत एवँ अरविन्द शर्मा द्वारा निर्देशित इस नाट्क मेँ वर्तमान स्थितियों पर सटीक कटाक्ष किए गए जिसका लोगोँ ने जम कर आनन्द उठाया।

नाटक के माध्यम से बताया गया था कि झूठी शानौ शौकत तथा समाज मेँ अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए सामंतवादी लोग अपने मतलब के लिए एक आम आदमी का बलिदान भी आसानी से कर सकते हैँ। नाटक के एक पात्र झुग्गन धोबी के गधे जिसका नाम अलादाद था की मृत्यु हो जाती है। जुग्गन के विलाप करने पर लोग समझते है कि उसके किसी रिश्तेदार की मौत हो गई। यह खबर नगर के नवाब तक पहुँचती है तथा वे समाज मेँ लोकप्रियता हासिल करने के लिए यह एलान कर देते है कि अलादाद खाँ को पूरे सम्मान के साथ दफनाया जायेगा तथा उसके जनाज़े मेँ वे शरीक हो कर उसे कन्धा देँगे। भेद खुलने पर जब यह पता चलता है कि मरने वाला आदमी नहीं गधा था तो अपनी इज्जत और आबरू बचाने के चक्कर मेँ अलादाद खाँ नामक एक आदमी को पकड कर लाया जाता है और उसकी हत्या करके उसका जनाज़ा बडी शान से निकाला जाता है जिसमेँ नवाब साहब शरीक होकर कन्धा देते है।

नवाब की भूमिका मेँ अब्दुल सलाम, कोतवाल बने गोविन्द तिवारी, जुग्गन धोबी धीरज तोमर, नत्थू दर्जी हेमराज कछावा, पानवाला नवीन अरोरा, चिँतक की भूमिका मेँ मनोज पाठक, दीपक गौतम और विजय मैथुल, नागरिक के अभिनय मेँ सँदीप राय, पियूष पारीक एवँ आशीश मोदी एवँ कैलाश प्रजापति, रामकली के रूप मेँ ज्योति भदौरिया, अलादाद खाँ वैभव गौतम एवँ सूत्रधार बने शिवाशिव दाधीच ने अपने सशक्त अभिनय से दर्शकोँ को बाँधे रखा। सँगीत ब्रजेश दाधीच तथा रामू ने दिया रूप सज्जा दयानन्द सप्रे तथा अश्वथामा दाधीच ने तथा प्रकाश व्यवस्था विवेक शर्मा ने सँभाली ।

इससे पूर्व गीत, संगीत, नृत्य एवं हास्य कविताओं ने भी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। संगीतकार ब्रजेश दाधीच् के निर्देशन मेँ कोटा के उभरते गायक मार्कण्डेय दाधीच तथा बून्दी से आई गायिका रजनी शर्मा एवं तरुण जाँगिड ने अपने गीतों से एवं नृत्य गुरू संगीता झाँवर के निर्देशन मेँ उनकी शिष्याएँ प्रग्या काबरा, एश्वर्या झाँवर, सौम्या गोयल, सलौनी सक्सेना एवं रक्षित पंचौली ने अपने नृत्योँ से कार्यक्रम मेँ चार चाँद लगा दिए। ताल वाद्य पर संगत सोनू तथा रोशन ने की। कोटा के जाने माने हास्य कवि सुरेश पण्डित ने भी अपनी रचनाओँ से खूब गुदगुदाया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आई.एल. संस्थान के निदेशक (उत्पादन) श्री पी एम. भारद्वाज थे। क्लब के महासचिव एम सी माहेश्वरी ने अतिथियोँ का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन शरद तैलंग ने किया।

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. कमलाप्रसाद का निधन

मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ का शोक प्रस्ताव- इन्दौर, २५ मार्च २०११। कमलाप्रसादजी ने पूरे देश के प्रगतिशील और जनपक्षधरता वाले रचनाकारों को उस वक्त देश में इकट्ठा करने का बीड़ा उठाया जब प्रतिक्रियावादी, अवसरवादी और दक्षिणपंथी ताकतें सत्ता, यश और पुरस्कारों का चारा डालकर लेखकों को बरगलाने का काम कर रहीं हैं।


उनके इस काम को देश की विभिन्न भाषाओं और विभिन्न संगठनों के तरक्कीपसंद रचनाकारों का मुक्त सहयोग मिला और एक संगठन के तौर पर प्रगतिशील लेखक संघ देश में लेखकों का सबसे बड़ा संगठन बना। इसके पीछे दोस्तों, साथियो और वरिष्ठों द्वारा भी कमांडर कहे जाने वाले कमलाप्रसादजी के सांगठनिक प्रयास प्रमुख रहे। उन्होंने जम्मू-कश्मीर से लेकर, पंजाब, असम, मेघालय, प. बंगाल और केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में संगठन की इकाइयों का पुनर्गठन किया, नये लेखकों को उत्प्रेरित किया और पुराने लेखकों को पुन: सक्रिय किया। उनकी कोशिशें अनथक थीं और उनकी चिंताएँ भी यही कि सांस्कृतिक रूप से किस तरह साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता और संकीर्णतावाद को चुनौती और शिकस्त दी जा सकती है और किस तरह एक समाजवादी समाज का स्वप्न साकार किया जा सकता है। 'वसुधा` के संपादन के जरिये उन्होंने रचनाकारों के बीच पुल बनाया और उसे लोकतांत्रिक सम्पादन की भी एक मिसाल बनाया। कमलाप्रसादजी रीवा विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्षरहे, मध्य प्रदेश कला परिषद के सचिव रहे, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के अध्यक्ष रहे और तमाम अकादमिक-सांस्कृतिक समितियों के अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे, अनेक किताबें लिखीं, हिन्दी के प्रमुख आलोचकों में उनका स्थान है, लेकिन हर जगह उनकी सबसे पहली प्राथमिकता प्रगतिशील चेतना के निर्माण की रही। उनके न रहने से न केवल प्रगतिशील लेखक संघ को, बल्कि वंचितों के पक्ष में खड़े होने और सत्ता को चुनौती देने वाले लेखकों के पूरे आंदोलन को आघात पहुँचा है। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संगठन तो खासतौर पर उन जैसे शुरुआती कुछ साथियों की मेहनत का नतीजा है। उनके निधन से पूरे देश के लेखक, रचनाकार, पाठक, साहित्य व कलाओं का वृहद समुदाय स्तब्ध और शोक में है। कमलाप्रसादजी ने जिन मूल्यों को जिया, जिन वामपंथी प्रतिबद्धताओं को निभाया और जो सांगठनिक ढाँचा देश में खड़ा किया, वो उनके दिखाये रास्ते पर आगे बढ़ने वाले लोग सामने लाएगा। और प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, फैज, भीष्म साहनी, कैफी आजमी, परसाई जैसे लेखकों के जिन कामों को कमलाप्रसादजी ने आगे बढ़ाया था, उन्हें और आगे बढ़ाया जाएगा। मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की राज्य कार्यकारिणी उन्हें अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करती है।


ध्यातव्य है कि हाल ही में उन्हें रायपुर के प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था ‘प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान’ द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर आलोचना के लिए दिए जानेवाले महत्वपूर्ण सम्मान प्रमोद वर्मा आलोचना सम्मान की घोषणा की गई थी। यह सम्मान उन्हें आगामी १४-१५ मई को भिलाई में फ़ैज़ अहमद फ़ैज और केदारनाथ अग्रवाल पर होनेवाले राष्ट्रीय विमर्श के अवसर पर प्रदान किया जाने वाला था। ज्ञातव्य हो कि वरिष्ठ वर्ग में यह सम्मान अब तक श्रीभगवान सिंह, भागलपुर और श्री मधुरेश, बरेली तथा युवा वर्ग में यह सम्मान श्री कृष्णमोहन, वाराणासी तथा ज्योतिष जोशी, दिल्ली को प्राप्त हो चुका है । इस सम्मान के तहत 21 हज़ार की नगद राशि, प्रतीक चिन्ह, शाल, श्रीफल तथा प्रमोद वर्मा समग्र भेंट किया जाता है। 14/02/1938, सतना (म.प्र.) में जन्मे श्री कमला प्रसाद एम.ए., पीएच. डी.व सागर विश्वविद्यालय से डी. लिट थे । उनकी अन्य प्रकाशित कृतियाँ हैं - साक्षात्का र- वार्तालाप, बच्चों की पुस्तक- जंगल बाबा, विनिबंध- यशपाल, अवधेश प्रताप सिंह । उन्हें इसके पूर्व म. प्र. सा‍हित्य अकादमी का नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है । वे भोपाल, म. प्र. में रहकर सृजनरत थे।



--पुन्नीसिंह (अध्यक्ष) विनीत तिवारी (महासचिव)शैलेन्द्र शैली (कार्यकारी महासचिव) सम्पर्क: विनीत तिवारी-९८९३१९२७४०, शैलेन्द्र शैली-९४२५०२३६६९

श्री समीर लाल के उपन्या्स देख लूँ तो चलूँ का विमोचन


इंटरनेट तथा ब्लाग जगत के चर्चित नाम श्री समीर लाल समीर की लघु उपन्याटसिका ’देख लूँ तो चलूँ’ का विमोचन जबलुपर में देश के शीर्ष कहानीकार श्री ज्ञानरंजन ने किया इस अवसर पर वरिष्ठर साहित्यलकार श्री हरिशंकर दुबे भी उपस्थित थे। ब्लाअग जगत में उड़नतश्तलरी के नाम से अपना बहुचर्चित ब्लानग चलाने वाले श्री समीर लाल की ये पुस्तमक शिवना प्रकाशन से प्रका‍शित होकर आई है।

यात्रा वृतांत की शैली में लिखी गई इस उपन्यारसिका में कई रोचक संस्मारण श्री समीर ने जोड़े हैं। जबलपुर के सत्य अशोका होटल के सभागार में आयोजित विमोचन समारोह में मुख्यब अतिथि के रूप में पहल के संपादक तथा देश के शीर्ष कथाकार श्री ज्ञानरंजन उपस्थित थे जबकि कार्यक्रम की अध्यवक्षता वरिष्ठं स‍ाहित्यतकार श्री हरिशंकर दुबे ने की। पुस्तरक विमोचन के पश्चाात बोलते हुए श्री ज्ञानरंजन ने कहा कि छोटे उपन्यासों की एक जबरदस्त दुनिया है। समीर लाल ने इसी उपन्यास का प्रथम स्पर्श किया है, उनकी यात्रा को देखना दिलचस्प होगा। किताब में अमूर्तता नहीं है, उसका कागज बोलता है, फड़फड़ाता है, उसमें चित्रकार का आमुख है, उसमें मशीन है, स्याही है, लेखक का ऐसा श्रम है जो यांत्रिक नहीं है।

पुस्तक की चर्चा करते हुए श्री ज्ञानरंजन ने कहा कि देख लूँ तो चलूँ में हमें आधुनिक संसार की कदम कदम पर झलक मिलती है। समीर लाल ने अपनी यात्रा में एक जगह लिखा है- हमसफरों का रिश्ता! भारत में भी अब रिश्ता हमसफरों के रिश्ते में बदल रहा है। फर्क इतना ही है कि कोई आगे है कोई पीछे। श्री ज्ञानरंजन ने समीर लाल के बारे में कहा कि समीर लाल का स्वागत होना चाहिए। उन्होंने मुख्य बिंदु पकड़ लिया है। उनके नैरेशन में एक बेचैनी है जो कला की जरुरी शर्त है। समीर लाल का उपन्यास पठनीय है, उसमें गंभीर बिंदु हैं और वास्तविक बिंदु हैं। मैं उन्हें अच्छा शैलीकार मानता हूँ। यह शैली भविष्य में बड़ी रचना को जन्म देगी। उन्हें मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामना। अपने अध्यक्षीय उदबोधन में शिक्षाविद मनीषी एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य डॉ हरि शंकर दुबे ने कहा कि ये पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि कितनी सच्चाई के साथ और कितनी जीवंतता के साथ और कितनी आत्मीयता के साथ समीर लाल ने अपने समय को, अपने समाज को, अपनी जड़ों को, जिगरा के साथ देखने का साहस संजोया है। कवि-लेखक एवम ब्लागर डा० विजय तिवारी ’किसलय’ ने पुस्त क पर बोलते हुए कहा कि कार ड्राईव करते वक्त हाईवे पर घटित घटनाओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन श्रृंखला ही ’देख लूँ तो चलूँ’ है। यह महज यात्रा वृतांत न होकर समीर जी के अन्दर की उथल पुथल, समाज के प्रति एक साहित्यकार के उत्तरदायित्व का भी सबूत है। अवमूल्यित समाज के प्रति चिन्ता भाव हैं। इस अवसर पर युवा विचारक एवम सृजन धर्मी श्री पंकज स्वामी ’गुलुश’ समीक्षक इंजिनियर ब्लागर श्री विवेकरंजन श्रीवास्तव, लेखक समीर लाल के पिता श्रीयुत पी०के०लाल ने भी अपने विचार रखे।

लेखक श्री समीर लाल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि किसी रचना कार के लिये उसकी कृति का विमोचन रोमांचित कर देने वाला अवसर होता है जब श्री ज्ञानरंजन जी, डा० हरिशंकर दुबे सहित विद्वजन उपस्थित हों तब वे क्या कहें और कैसे कहें और कितना कहें? ” कार्यक्रम के अंत में श्रीमति साधना लाल ने आभार प्रदर्शन कर सभी के प्रति कृतज्ञता अंत:करण से व्यक्त की। कार्यक्रम का संचालन गिरीश बिल्लोनरे मुकुल ने किया। -गिरीश बिल्लोरे ’मुकुल’

बाबा नागार्जुन पर दो दिवसीय राष्ट्रीय विमर्श सम्पन्न

बिलासपुर। प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान द्वारा बाबा नागार्जुन की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर राष्ट्रीय संगोष्ठी विमर्श ‘फिर फिर नागार्जुन’ का दो दिवसीय का आयोजन अपने समय के महत्वपूर्ण कवि श्रीकांत वर्मा और आलोचक प्रमोद वर्मा की नगरी बिलासपुर के राघवेन्द्र सभागार में 27-28 फरवरी को ऐतिहासिक सफलता के साथ संपन्न हुआ। स्वागत भाषण संस्थान के अध्यक्ष श्री विश्वरंजन ने दिया। उद्धाटन के पश्चात वयोवृद्ध शिक्षाविद्, लेखक और निबंधकार श्री जगमोहन मिश्र को उनके विशिष्ट योगदान के लिए प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान से साल, श्रीफल व स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर बाबा नागार्जुन पर केंद्रित एकाग्र ‘फिर फिर नागार्जुन’ (संपादक-विश्वरंजन) जारी किया गया साथ ही संस्थान द्वारा प्रकाशित समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवियों के कविता संग्रह का पहला सेट जारी किया गया। ये कविता संग्रह है- ‘बेतरतीब’ कवि (प्रभात त्रिपाठी, रायगढ़), ‘सीढ़ी उतरती है अँधेरे गर्भ गृह में’ (विश्वजीत सेन, पटना), ‘भूलवश और जानबूझकर’ (नासिर अहमद सिकंदर, भिलाई), ‘अबोले के विरूद्ध’ (जयप्रकाश मानस, रायपुर), ‘राजा की दुनिया’ (बी.एल.पाल, दुर्ग), ‘किताब से निकलकर प्रेम कहानी’ (कमलेश्वर साहू, दुर्ग), ‘चाँदनी थी द्वार पर’ (सुरेश पंडा,रायपुर)। इसके अलावा संस्थान द्वारा ही प्रकाशित आलोचनात्मक कृतियों ‘युग की नब्ज़’ (श्रीप्रकाश मिश्र, इलाहाबाद), ‘हिंदी के श्रेष्ठ आख्यानक प्रगीत’ (डॉ. बलदेव, रायगढ़), ‘साहित्य और सहभागिता’ (वारीन्द्र वर्मा, बिलासपुर), ‘समय का सूरज’ (चेतन भारती, रायपुर), इस मौक़े पर संस्थान की त्रैमासिक पत्रिका ‘पाण्डुलिपि’ के तीसरे अंक के साथ-साथ लघुपत्रिका ‘देशज’ (संपादक-अरुण शीतांश) के आलोचना अंक (अतिथि संपादक-जयप्रकाश मानस) व ‘साहित्य वैभव’ (संपादक डॉ. सुधीर शर्मा) का भी विमोचन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध आलोचक अजय तिवारी ने की।

प्रथम दिवस के तृतीय सत्र (‘बाबा को याद करते हुए’) में आमंत्रित साहित्यकार सर्वश्री श्रीभगवान सिंह, श्रीप्रकाश मिश्र, डॉ. रघुवंशमणि, परितोष चक्रवर्ती, भारत भारद्वाज, रमेश खत्री, अमित झा, जयशंकर बाबू, शिवदत्त बाघवेल, श्री आनंद मदोही, डॉ. शैलेन्द्र कुमार त्रिपाठी आदि ने बाबा से जुड़े रोचक और मार्मिक संस्मरण सुनाए । श्री रमेश दवे, डॉ. अजय तिवारी और डॉ. विजय बहादुर सिंह ने नागार्जुन से संबंधित अपने विचार रखे। सत्र के समापन पर स्व. प्रमोद वर्मा की पत्नी डॉ. कल्याणी वर्मा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया। प्रथम दिवस के अंतिम सत्र ‘वाणी’ में आमंत्रित कवयित्रियों में जया जादवानी, किरण अग्रवाल, मीता दास, प्रभा सरस, विद्या गुप्ता, जया द्विवेदी, रानू नाग, आभा श्रीवास्तव, गीता विश्वकर्मा, सुषमा श्रीवास्तव आदि द्वारा काव्य-पाठ किया गया। संचालन युवा कवि नासिर अहमद सिकंदर ने किया।

दूसरे दिन प्रथम सत्र ‘बाबा का गद्य’ सत्र में द्वारा बाबा की कहानी, उपन्यास, निबंधपत्र आदि गद्यात्मक विधाओं को केंद्र में रखकर आमंत्रित रचनाकारों, आलोचकों द्वारा बातचीत की गई। आलोचक डॉ. प्रफुल्ल कोलख्यान (कोलकाता), गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र (देहरादून), आलोचक डॉ. देवराज, आलोचक-कवि श्रीप्रकाश मिश्र, युवा आलोचक डॉ. रघुवंश मणि, युवा आलोचक पंकज पराशर (अलीगढ़), समीक्षक राजेन्द्र उपाध्याय(दिल्ली), आलोचक डॉ. बल्देव(रायगढ़), युवा कवि अरूण शीतांश(आरा), अजय तिवारी और विजय बहादुर सिंह इस सत्र के प्रमुख वक्ता थे। इस सत्र का संचालन आलोचक और कवि डॉ. प्रेम दुबे ने किया आभार प्रदर्शन नवभारत बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री सईद खान द्वारा किया गया। द्वितीय सत्र प्रारंभ करने के पूर्व दिवंगत हुए देश और राज्य भर के उपस्थित प्रमुख साहित्यकारों द्वारा भवदेव पांडेय, सत्येंद्र सिंह नूर, विनोद तिवारी को मौन श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

स्मरण सत्र (बाबा को याद करते हुए) में उनके सानिध्य में बिताए क्षणों को उपस्थित साहित्यकारों ने याद किया। डॉ. पालेश्वर शर्मा, प्रभात त्रिपाठी, विजय बहादुर सिंह, रमेश दबे, मुमताज, रवि श्रीवास्तव, नंद किशोर तिवारी, महावीर अग्रवाल, रघुवंश मणि, श्रीप्रकाश मिश्र, उदभ्रांत, डॉ.देवराज के संस्मरणों में बाबा पुन: जीवित हो उठे। रात्रि ‘वाणी’ के अंतर्गत आमंत्रित कवियों- डॉ. बुद्विनाथ मिश्र, उदभ्रांत, रमेश खत्री, डॉ. देवराज, विश्वरंजन, परितोष चक्रवर्ती, श्रीप्रकाश मिश्र, डॉ.शैलेंद्र कुमार त्रिपाठी, रघुवंश मणि, प्रफुल्ल कोलख्यान, विमलेश त्रिपाठी, प्रभात त्रिपाठी, भारत भरद्वाज, सुधीर सक्सेना, अरूण शीतांश, शिवदत्त बावलकर, डॉ.चितरंजन कर, डॉ.बलदेव, डॉ.अजय पाठक, मुमताज, सतीश जायसवाल, डॉ. राजेन्द्र सोनी, अब्दुल सलाम कौसर, बी.एल.पाल, जयप्रकाश मानस, कमलेश्वर साहू, चेतन भारती, रामकुमार तिवारी, वंदना केंगरानी आदि ने विभिन्न रंगों और शिल्पों वाली कविताओं का पाठ किया । देश भर से पधारे लगभग ३०० साहित्यकारों एवं साहित्य प्रेमियों की निंरतर और सफलता उपस्थिति वाले इस दो दिवसीय आयोजन में संस्थान के कार्यकारी निदेशक जयप्रकाश मानस, सचिव सुरेंद्र वर्मा, कोषाध्यक्ष राजेश सोंथलिया, राम पटवा, बेणुधर देवांगन, हरि नायक, विनय सिंह ठाकुर, लीलाधर पटेल, आदि का उल्लेखनीय सहयोग रहा।

-- जयप्रकाश मानस संपादक,
www.srijangatha.com
कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक)

शिवाजी विश्वविद्यालय, कोल्हापुर, महाराष्ट्र में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी संपन्न


चित्र में कविता रेगे शरद आलोक का सम्मान करते हुए शिवाजी विश्व विद्यालय कोल्हापुर और दक्षिण भारत हिंदी परिषद् और केन्द्रीय हिंदी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में डॉ. पद्मा पाटिल के संयोजन में २२ और २३ फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी 'साहित्य और इतिहास' विषय पर संपन्न हुई। कार्यक्रम के उद्घाटक थे राजेंद्र मोहन भटनागर और अध्यक्षता की शिवाजी विश्विद्यालय के उपकुलपति प्रो. ना. ज. पवार प्रमुख उपस्थिति थी सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद' आलोक' की। विश्वप्रसिद्ध नाटककार हेनरिक इबसेन पर अंतर्राष्ट्रीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने प्रकाश डालते हुए कहा की इबसेन के नाटकों का दुनिया में सबसे अधिक प्रदर्शन हुआ है और वह आधुनिक नाटक के पितामह थे। शरद आलोक ने इबसेन के नाटकों, क्नुत हामसुन के उपन्यासों, नार्वेजीय लोककथाओं के अलावा डेनमार्क के एच सी अन्दर्सन की कथाओं का अनुवाद हिंदी में किया है। इस संगोष्ठी में हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने और भारत के गौरवपूर्ण इतिहास के नायकों जैसे गुरुगोविंद सिंह, क्षत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, साहू महाराज, रानी लक्ष्मीबाई आदि की सही तस्वीर साहित्य में प्रस्तुत करने पर विचार विमर्श हुआ। विदेशी इतिहासकारों द्वारा भारतीय नायकों की तस्वीर अधिकतर धूमिल और विदेशी शासन से प्रभावित दिखाई गयी है। साहित्यकारों का उत्तरदायित्व है कि वे इतिहास के उपेक्षित नायकों और गलत तस्वीर को ठीक करके उन्हें गौरव प्रदान कर अमर बनाएँ। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी में जिन भारतीय प्रतिनिधियों ने भाग लिया वे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्णाटक, महाराष्ट्र, प। बंगाल, राजस्थान, उडीसा, और अन्य राज्यों से थे। विदेशों से आये प्रतिनिधियों में नार्वे से सुरेशचन्द्र शुक्ल, इटली से अलाक्संद्रा, श्वेता दीप्ति और संजीत वर्मा नेपाल और मारीशस से रेशमी रामधूनि थीं। विदेशी प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया। डॉ. वसंत केशव मोरे ने सभी को धन्यवाद दिया और शिवाजी पर वृहद् प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया जिसे सभी ने सराहा।


साठे कालेज दिल्ली में शरद आलोक सम्मानित

साठे कालेज दिल्ली में शरद आलोक का व्याख्यान और सम्मान २३ फरवरी को साठे कालेज मुंबई में हिंदी विभाग की तरफ से सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' का व्याख्यान नार्वे के साहित्यकारों ब्योर्नस्त्यारने ब्योर्नसन और नाटककार हेनरिक इबसेन पर संपन्न हुआ जिसमे कार्यक्रम के अंत में शरद आलोक का सम्मान शाल, पुष्पगुच्छ और शाल से प्रधानाचार्य कविता रेगे द्वारा किया गया। कार्यक्रम के संयोजक अध्यक्ष हिंदी विभाग डॉ. प्रदीप कुमार सिंह थे जो एक पत्रिका के संपादक भी हैं। कार्यक्रम में विद्यालय के अध्यापकों, विद्यार्थियों के अलावा प्रसिद्ध लेखक श्रीमती कमलेश बक्शी, कपिल कुमार, दिनेश सिंह, डॉ. मनप्रीत कौर और अन्य थे।

- माया भारती (नार्वे)