रविवार, 27 फ़रवरी 2011

प्रीमियर क्रिस्टीना कनीली द्वारा भारतीय मूल के निवासियों का सम्मान


सिडनी, ऑस्ट्रेलिया में 18 फरवरी की शाम गवर्नमेंट हाउस में न्यू साउथ वेल्स की प्रीमियर (प्रदेश प्रमुख) क्रिस्टीना कनीली ने भारतीय सबकॉन्टिनेंट कम्यूनिटी अवार्ड से भारतीय मूल के छः व्यक्तियों को उनके योगदान के लिए सम्मानित किया । इन पुरस्कारों की घोषणा पिछले साल नवम्बर में दीवाली के कार्यक्रम के दौरान संसद भवन में की गई थी और इनके लिए नामांकन दिसंबर में खुला था । पुरस्कार की घोषणा के पीछे एक ही उद्देश्य था कि उन लोगों के कार्य का सम्मान किया जाए जिन्होंने किसी भी क्षेत्र में अपना योगदान दिया है, मुख्य रूप से जिन पाँच क्षेत्रों की घोषणा की गई वे थे व्यापार और उद्योग, कला और संस्कृति, सामाजिक सद्भावना और आजीवन उपलब्धि पुरस्कार।

इस कार्यक्रम में गवर्नमेंट हाउस में अनेक जाने-माने लोग उपस्थित थे, जिनमें भारत के कौंसल जनरल अमित दासगुप्ता के अलावा भारतीय विद्या भवन के गंभीर वाट्स, अन्य संस्थाओं के संचालक और मीडिया के लोग भी थे। आकर्षण की बात ये भी थी कि प्रीमियर क्रिस्टीना कनीली ने हल्के नीले रंग की साड़ी पहनी थी जिसने हर भारतीय का दिल जीत लिया । हल्के खान-पान के बीच ही प्रीमियर का भाषण शुरू हुआ निस्में उन्होंने कहा कि न्यू साउथ वेल्स में करीब १००॰००० भारतीय मूल के निवासी हैं, जो ऑस्ट्रेलिया के समाज का महत्वपूर्ण अंग हैं । समुदाय के लोगों ने अनेक क्षेत्रों में अपना योगदान दिया है जैसे शिक्षा, व्यवसाय, कला और सार्वजनिक सेवाएँ । प्रीमियर ने पुरस्कार प्राप्त करनेवाले लोगों को न्यू साउथ वेल्स सरकार की ओर से बधाई देते हुए कहा कि नौकरी और परिवार में संतुलन करते हुए समाज के लिए कुछ कर पाना सचमुच प्रशंनीय है। २०११ के पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति थे- श्री चंद्रू तुलानी- जिन्हें व्यापार और उद्योग के लिए सम्मानित किया गया, चंद्रू तुलानी १९७५ में ऑस्ट्रेलिया आए और अपनी मेहनत से सबसे बड़े आयातक बन गए, उन्होंने होटल व्यवसाय में भी सफलता पाई।

कला और संस्कृति का पुरस्कार मिला सिडनी की जानी-मानी एस बी एस रेडियो के हिन्दी विभाग की प्रोड्यूसर कुमुद मीरानी को, जो समय-समय नाटक और कला के क्षेत्र में योगदान देती रही हैं, कुमुद मीरानी को अपनी रेडियो वृत्तचित्र के लिए पहले भी एशिया पैसिफिक ब्रोडकास्टिंग यूनियन पुरस्कार और इंटरनैशनल एशियन रेडियो पुरस्कार भी मिल चुके हैं । सामाजिक सद्भाव का पुरस्कार मिला श्री पवन लूथरा को जो 'इन्डियन लिंक' समाचार पत्र के सम्पादक तो हैं ही, अन्य सामुदायिक क्षेत्रों में भी अपना योगदान देते रहते हैं, 'इन्डियन लिंक' समाचार पत्र के माध्यम से पवन हर विषय पर संतुलित दृष्टिकोण लोगों तक पहुँचाते रहे हैं विशेष रूप से भारतीय विद्यार्थियों के साथ हुई घटनाओं के मामले में । इसके अलावा राष्ट्रमंडल खेलों या यूरेनियम जैसे मुद्दों को भी उन्होंने अच्छी तरह से लोगों तक पहुँचाया था । आजीवन उपलब्धि पुरस्कार दो लोगों को दिया गया जिनमे एक थे डा० सिधालिंगेश्वर ओरिकोंडे और डा० गुरचरण सिंह सिधू, जिन्होंने पिछले कई सालों से समुदाय में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । एक युवा छात्र मोहित तुलानी को कम्यूनिटी सर्विस पुरस्कार मिला । मोहित ने अनेक स्वैच्छिक परियोजनाओं में, विभिन्न संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण काम किया है और आजकल वे बहुसांस्कृतिक युवा नेटवर्क के सक्रिय सदस्य हैं, पहले भी उन्हें अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं ।

बाद में पार्लियामेंट्री फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया के सह-संयोजक डा० एंड्रयू मक्डोनाल्ड, ने पुरस्कार विजेताओं को बधाई दी और कहा कि भारतीय प्रवासियों के काम की सराहना करने की दिशा में यह एक प्रयास है । भले ही अगले महीने होने वाले चुनावों के मद्देनज़र सरकार ने यह कदम उठाया है, और शायद भारतीय प्रवासियों के वोट लेने के लिए उन्हें खुश किया गया है, जो भी कुछ हो पर भारतीय समुदाय ने कठिन परिश्रम करके ऑस्ट्रेलिया में जो जगह बनाई है और जो नाम कमाया है उसी के चलते आज सरकार उन्हें सम्मानित कर रही है । यहाँ तक कि प्रीमियर ने अपने चुनाव अभियान में हिन्दी का एक वाक्य 'मुझे आपका सहयोग चाहिए' बोलकर सबको चमत्कृत किया है । चूँकि ऑस्ट्रेलिया एक बहु-सांस्कृतिक समाज है, जिसमें अनेक देशों के लोग रहते हैं और करीब साठ मुख्य भाषाओं के अलावा कई अन्य भाषाएँ भी बोली जाती हैं, इसीलिये इस चुनाव-अभियान का प्रचार हिन्दी के साथ-साथ कुछ अन्य भाषाओं में भी अनुवादित कराया गया है । इस बार नए साल के फायर वर्क्स के मौके पर भी हार्बर ब्रिज पर अन्य भाषाओं के साथ हिन्दी में लिखा गया 'सिडनी में आपका स्वागत है', राजनीति कहें या बहु-संस्कृतिवाद, पर ये तो मानना पड़ेगा कि भारतीय समुदाय एक शक्ति के रूप में उभर रहा है और इसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता, और जाने-अनजाने ही पर हिन्दी का प्रचार भी हो ही रहा है ।


रेखा राजवंशी
सिडनी ऑस्ट्रेलिया

विश्वनाथ त्रिपाठी के अस्सीवे जन्मदिन पर बतकही का लोकार्पण


डीयरपार्क दिलशाद गार्डन मे आज दि.16-2-11 को हिन्दी के जाने माने आलोचक और वरिष्ठ साहित्यकार डाँ.विश्वनाथ त्रिपाठी का 80वाँ जन्मदिन मनाया गया। पार्क के खुले आँगन मे जहाँ वे रोज सुबह सैर करते हैं वहीं के कुछ लेखक और पत्रकार मित्रो के सहयोग से यह समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर डीयरपार्क के मित्रो के सहयोग से प्रकाशित बतकही शीर्षक पुस्तक का उन्हे समर्पण किया गया। इस पुस्तक का सम्पादन भारतेन्दु मिश्र ने किया। यह पुस्तक साहित्यिक अड्डेबाजी या साहित्यकारो की गप्प गोष्ठी का एक सहज दस्तावेज है। बाद मे त्रिपाठी जी ने इस पुस्तक का लोकार्पण करते हुए कहा- “मै यहाँ बीस वर्षो से आ रहा हूँ ,यहाँ के हमारे सभी मित्रो ने ये जो मेरे लिए आयोजन किया है इससे बडा आयोजन मेरे लिए और हो नही सकता।हम लोग बरसों से एक साथ यहाँ बैठते है क्योकि यहाँ हम आपस मे अपनी रचनाओ की चर्चा नही करते। साहित्य से इतर केवल गप्प होती है तो इसी लिए यह चल रहा है। दूसरी तरह के महत्वाकान्क्षी बहुत से लोग जो हमारे बीच आये भी वो खुद कुछ न मिलने पर चले गये।..तो हम लोग आपस मे इसी लिए लम्बे समय से जुडे है कि हम किसी को कुछ देने की स्थिति मे नही हैं। इसी लिए यह हमारी गप्प गोष्ठी चल रही है। कुछ आते रहे कुछ जाते रहे। हम सबमे कमियाँ हैं-कमियाँ हैं तभी चल रहा है।“

समारोह का संचालन लखनऊ से पधारे डियरपार्क के पुराने साथी और पत्रकार विभांशु दिव्याल ने किया। संचालन करते हुए उन्होने - बतकही को साहित्य मे अपनी तरह की पहली किताब बताया जिसमे साहित्यकारो की गप्प को लिपिबद्ध किया गया है। इस अवसर पर अन्य वक्ताओ मे बलराम अग्रवाल,अशोक गुजराती,भारतेन्दु मिश्र,रमेश प्रजापति,जयकृष्ण सिंह आदि ने त्रिपाठी जी को स्वस्थ और दीर्घायु होने की शुभकामनाएँ दीं।इसके साथ ही समारोह मे सुश्री काजल पाण्डेय,हरिनारायण,रमेश आजाद,अंगद तिवारी,राम कुमार कृषक,जयशंकर शुक्ल,वरिष्ठ नागरिक अवतार सिंह सहित अनेक मित्रो ने भाग लिया।

सृजन द्वारा समकालीन कवि‍ता पर साहि‍त्य गोष्ठी आयोजित

वि‍शाखपट़नम की हि‍न्दीत साहि‍त्यि‍क संस्था सृजन के तत्वावधान में 13 फरवरी 2011 को समकालीन हि‍न्दी कवि‍ता वि‍षयक साहि‍त्य गोष्ठी‍ का आयोजन कि‍या गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सृजन के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव ने की जबकि संचालन सृजन के संयुक्त सचि‍व डॉ. संतोष अलेक्स‍ ने कि‍या।

कार्यक्रम के आरंभ में डॉ. टी. महादेव राव ने इस साहि‍त्य चर्चा के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि‍ समकालीन कविता के विषय पर चर्चा और समकालीन कवि‍ताओं के पठन के इस आयोजन का उद्देश्य है वर्तमान में कवि‍ताएं कैसी लि‍खी जा रही हैं इसके बारे में साहि‍त्य प्रेमि‍यों को वि‍स्तार में बताना और नये कवि‍यों को समकालीन कवि‍ताएँ लि‍खने के लि‍ए प्रोत्साहि‍त करना। इस अवसर पर डॉ. संतोष अलेक्सा ने ए. अरवि‍न्दाकक्षन का आलेख कवि‍ता की मि‍ट्टी, जो कि‍ समकालीन कवि‍ नागार्जुन की रचनाधर्मि‍ता पर थी, पढा जि‍समें ‘काव्यन प्रवृत्तियाँ नवयुग में कि‍स तरह हों’ इसका वि‍वरण था। भूख, नग्नता जो कि‍ सामयि‍क बि‍म्बक हैं, का नागार्जुन की कवि‍ता में वि‍श्ले‍षण था। श्रीमती सीमाशेखर ने अपनी तीन नई कवि‍ताएँ ‘संरक्षण’, ‘तारे’ और ‘ताल’ का पठन कि‍या जि‍समें जंगलों की कटाई, प्रकृति‍ से बि‍छोह तथा संबंधों में आता अपरि‍चय का वर्णन था। बी.एस. मूर्ति‍ ने कर्मयोगी शीर्षक कवि‍ता में सीमा पर तैनात सैनि‍क और आम आदमी के बीच के अंतर को प्रभावशाली ढ़ंग से प्रस्तुबत कि‍या। अपनी कवि‍ताओं हँसी, जाड़ा के साथ हास्य कवि‍ता आज अगर हमारी शादी होती सुनायी लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने, जि‍समें कवि‍ का फक्कड़पन और समाज पर व्यंग्य नि‍हि‍त था। श्रीमती कि‍रण सिंह ने महादेवी वर्मा की एक रचना सुनाई। अपने सारगर्भि‍त लेख में बीरेन्द्र राय ने समकालीन कवि‍ता के गुणों और लक्षणों की चर्चा करते हुए कहा कि‍ कथ्य‍, रूप, शैली और छंद मुक्तता के कारण नर्इ कवि‍ता अपना अलग स्थान रखती है। श्री राय ने समकालीन कवि‍ताएँ जो‍ प्रेम की कवि‍ताएँ थीं, बेताब सूरज और कहाँ हो तुम सुनायी। आरुणि‍ त्रि‍वेदी ने समकालीन कवि‍ता पर अपने वि‍चार व्यक्त कि‍ए। रामप्रसाद यादव ने तड़प शीर्षक से कवि‍ता सुनाई जि‍समें मानवीय संवेदनाओं के बिम्ब थे।

डॉ. एम. वि‍जयगोपाल ने अपनी कविता छुवन में मानव जीवन के वि‍भि‍न्न पहलुओं को छुआ। जी. अप्पापराव राज और एनसीपी नायुडू ने अपने व्यंग्य रचनाएँ प्रस्तुनत की। डॉ. टी. महादेव राव ने समकालीन कवि‍ता की चर्चा करते हुए अपनी रचना तीन आयाम समय के जो कि‍ कवि‍ता की भूत, वर्तमान और भवि‍ष्यव की स्थिति‍यों का खुलासा था, पढ़ा और अपनी कवि‍ता वि‍नि‍मय का अर्थशास्त्र प्रस्तुत कि‍या जो‍ एकाकी होते मानवीय संबंधों और खोखले समाजवाद को प्रतीक बनाकर लि‍खी गई थीं। डॉ. संतोष अलेक्स ने सीधा और शब्देकोष कवि‍ताएँ पढीं, जो कि‍ आज के परि‍वेश में बदलते जीवन संदर्भों से जुड़ी थीं। कार्यक्रम में कृष्णक कुमार गुप्ताब, वि‍जय कुमार आर. और सीएच ईश्विर राव ने भी सक्रि‍य प्रति‍भागि‍ता की।

सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' सम्मानित


५ फरवरी २०११, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ में नार्वे से पधारे साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' का अभिनन्दन और सम्मान किया गया। श्री सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' के वैश्विक स्तर पर हिन्दी के योगदान की चर्चा करते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो प्रेम शंकर तिवारी ने कहा कि प्रवासी साहित्यकारों की हिन्दी सेवा से ही हिन्दी की वास्तविक अभिवृद्धि होगी।

सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' विश्व के अनेक देशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जाने जाते हैं, कई विश्व हिन्दी सम्मेलनों में प्रतिभाग किया है। हिन्दी की सम्वर्द्धना के लिए स्पाइल-दर्पण पत्रिका पर तथा सुरेशचन्द्र शुक्ल के काव्य पर हिन्दी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय ने शोध कार्य कराया है। गोष्ठी में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की पूर्व निदेशक विद्या बिन्दु सिंह ने लन्दन में हिन्दी की दशा पर प्रकाश डाला और अपने वकतव्य में कहा, कि इक्कीसवीं सदी हिन्दी की सदी है, इसमें गद्य की वे विधायें विकसित हो रही हैं जिनका अभी तक इतिहास में उल्लेख अत्यल्प रहा है, यथा यात्रा डायरी, अभिनन्दन, आत्मकथा, आदि कहानी, फीचर लेखन, फिल्म निर्माण आदि पर प्रकाश डाला। सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' ने कहा कि उनका सम्मान विदेशों में किये जा रहे हिन्दी के प्रचार-प्रसार की तरफ ध्यान दिया जाना और उसे प्रोत्साहित किया जाना है। उन्होंने आगे कहा कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ब्लाग लेखन, ट्रेवलाग लेखन, फेसबुक, आरकुट, यू ट्यूब और मोबाइल तेलीफोन के माध्यम से सन्देश, पत्र और सूचनायें हिन्दी में दिया जाना और उसका प्रयोग देवनागरी के माध्यम से जुड़ना होगा। साथ ही हिन्दी के साथ माध्यम भाषा को लेकर चलना होगा। वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिन्दी स्वीकृत हो जायेगी, तब हिन्दी के प्रति अधिक आकषित होंगे। डा क़ृष्णाजी श्रीवास्तव ने आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' के साहित्यिक योगदान की चर्चा की। गोष्ठी में प्रसिद्ध साहित्यकार डा प़्रताप नारायण टण्डन, फिल्माचार्य आनन्द शर्मा, डा अ़लका पाण्डेय, डा प़रशुराम पाल, डा रामाश्रय सविता, प्रमिला भारतीय, शिव भजन सिंह कमलेश और अन्य ने अपने विचार रखे।

उ प्र विधानसभा में राज्यकर्मचारी साहित्य संस्थान द्वारा सम्मानित राज्यकर्मचारी साहित्य संस्थान द्वारा उत्तर प्रदेश सचिवालय परिसर के मुख्य भवन में एक समारोह का आयोजन, उत्तर प्रदेश सचिवालय परिसर के मुख्य भवन में किया गया जिसमें मात्रभूमि और मात्रभाषा के देशभक्त, हिन्दी भाषा एवं नार्वेजीय भाषा के श्रेष्ठ साहित्यकार सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' को अंगवस्त्र और प्रतीक चिन्ह देकर पत्रपुष्पों से सम्मानित किया गया। उक्त कार्यक्रम की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध साहित्यकार और संस्थान के उपाध्यक्ष विनोदचन्द्र पाण्डेय जी ने की। उक्त कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' जी थे। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री उमेश चन्द्र वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्वमन्त्री, पूर्व अधिवक्ता की पत्नी सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती आशा श्रीवास्तव एवं डा य़ोगेन्द्र प्रताप सिंह रीडर हिन्दी विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय थे। कार्यक्रम का संचालन, संयोजक श्री दिनेश चन्द्र अवस्थी जी ने किया।

सभाध्यक्ष जी ने कहा कि सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' जी प्रवासी भारतीय होते हुए भी हिन्दी की पताका पूरे विश्व में फहरा रहे हैं। वे हिन्दी नार्वेजीय और डेनिश भाषा के विद्वान हैं, मैं इनको इस अवसर पर बधाई और शुभकामनायें देता हूँ। विशिष्ट अतिथि श्रीमती आशा श्रीवास्तव ने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि नार्वेजीय और डेनमार्क की भाषा डेनिश से पुस्तकों का अनुवाद हिन्दी भाषा में करके हिन्दी भाषा के साहित्य के भण्डार को भरा है। वे एक अच्छे पत्रकार भी हैं। समारोह के दूसरे विशिष्ट अतिथि श्री योगेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' जी ने विश्व में हिन्दी की पताका फहराई है। विश्व में हिन्दी की अनेक संस्थाओं से जुडे हैं। उन्होंने भारत और नार्वे के बीच आपसी सौहाद्र बढ़ाने का भी कार्य किया है। संस्थान के मन्त्री श्री विजय प्रसाद त्रिपाठी जी ने कहा कि उन्हें अपने देश की मिट्टी से प्यार है अत: वे हम सभी को अत्यन्त प्रिय हैं। सम्मानित साहित्यकार शरद आलोक जी ने सम्मान करने के लिए राज्यकर्मचारी साहित्य संस्थान के प्रति कृतज्ञता प्रगट की तथा यह अश्वस्थ किया कि वे संस्थान तथा संस्थान के सदस्यों का सहयोग करते रहेंगे। संयोजक डा दिनेश चन्द्र अवस्थी जी ने श्री सुरेशचन्द्र शुक्ल `शरद आलोक' को एक श्रेष्ठ साहित्यकार और अच्छा पत्रकार बताया तथा उनके हिन्दी और नार्वेजीय भाषा में उनके साहित्य सृजन की सराहना की।

उक्त सम्मान समारोह के पाश्चात संस्थान की साहित्य गोष्ठी सम्पन्न हुई जिसमें श्री प्रशान्त शुक्ल, श्री शीलेन्द्र कुमार सिंह चौहान, श्री विजय प्रसाद त्रिपाठी, श्री दिनेश चन्द्र अवस्थी, श्री सुनील कुमार बाजपेई, श्रीमती शोभा दीक्षित 'भावना', श्री विनोदचन्द्र पाण्डेय 'विनोद', श्री मानस मुकुल त्रिपाठी, श्री सुरेश चन्द्र पाडेय, श्री राविशंकर पाण्डेय, श्री शिव शंकर द्विवेदी, श्री वीरेन्द्र बहादुर सिंह 'कुसुमाकर', श्री घनानन्द पाण्डेय 'मेघ' एवं श्री हरी प्रकाश `हरि' ने काव्यपाठ प्रस्तुत किया।

श्री समीर लाल के उपन्यास देख लूँ तो चलूँ का विमोचन


इंटरनेट तथा ब्लाबग जगत के चर्चित नाम श्री समीर लाल समीर की लघु उपन्यासिका ’देख लूँ तो चलूँ’ का विमोचन गत १८ जनवरी को जबलपुर में देश के शीर्ष कहानीकार श्री ज्ञानरंजन ने किया इस अवसर पर वरिष्ठव साहित्येकार श्री हरिशंकर दुबे भी उपस्थित थे । ब्लाइग जगत में उड़नतश्तरी के नाम से अपना बहुचर्चित ब्लाभग चलाने वाले श्री समीर लाल की ये पुस्ताक शिवना प्रकाशन से प्रका‍शित होकर आई है । यात्रा वृतांत की शैली में लिखी गई इस उपन्याासिका में कई रोचक संस्मीरण श्री समीर ने जोड़े हैं । जबलपुर के सत्यग अशोका होटल के सभागार में आयोजित विमोचन समारोह में मुख्यी अतिथि के रूप में पहल के संपादक तथा देश के शीर्ष कथाकार श्री ज्ञानरंजन उपस्थित थे जबकि कार्यक्रम की अध्यदक्षता वरिष्ठँ साहित्याकार श्री हरिशंकर दुबे ने की ।

पुस्तक विमोचन के पश्चात बोलते हुए श्री ज्ञानरंजन ने कहा कि छोटे उपन्यासों की एक जबरदस्त दुनिया है। छोटा हो या बड़ा, सच यह है कि वर्तमान दुनिया में उपन्यासों का वैभव लगातार बढ़ रहा है। यह एक अनिवार्य और जबरदस्त विधा बन गई है और अब उपन्यास जातीय जीवन का एक गंभीर आख्यान बन चुका है। समीर लाल ने इसी उपन्यास का प्रथम स्पर्श किया है, उनकी यात्रा को देखना दिलचस्प होगा। देख लूँ तो चलूँ में अमूर्तता नहीं है, उसका कागज बोलता है, फड़फड़ाता है, उसमें चित्रकार का आमुख है, उसमें मशीन है, स्याही है, लेखक का ऐसा श्रम है जो यांत्रिक नहीं है। उन्होंने कहा कि देख लूँ तो चलूँ में नायक ऊबा हुआ है। हमारे आधुनिक कवि रघुबीर सहाय ने इसे मुहावरा दिया है, ऊबे हुए सुखी का। उपन्यास में समीर लाल ने लिखा है कि बहुत जिगरा लगता है जड़ों से जुड़ने में। समीर लाल सत्य के साथ हैं, उन्होंने प्रवास में रहते हुए भी इस सत्य की खोज की है। श्री ज्ञानरंजन ने समीर लाल के बारे में कहा कि समीर लाल का स्वागत होना चाहिए। उन्होंने मुख्य बिंदु पकड़ लिया है। उनके वक्तव्य में एक बेचैनी है जो कला की जरुरी शर्त है। समीर लाल का उपन्यास पठनीय है, उसमें गंभीर बिंदु हैं और वास्तविक बिंदु हैं। मैं उन्हें अच्छा शैलीकार मानता हूँ। यह शैली भविष्य में बड़ी रचना को जन्म देगी। उन्हें मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामना।

अपने अध्यक्षीय उदबोधन में शिक्षाविद मनीषी एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य डॉ हरि शंकर दुबे ने कहा कि ये पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि कितनी सच्चाई के साथ और कितनी जीवंतता के साथ और कितनी आत्मीयता के साथ समीर लाल ने अपने समय को, अपने समाज को, अपनी जड़ों को, जिगरा के साथ देखने का साहस संजोया है। क्यूँकि मूलतः वो कवि भी हैं तो जब परदेश पर वो लिखते हैं दो लाईन पढ़ना चाहता हूँ- परदेस, देखता हूँ तुम्हारी हालत, / पढ़ता हूँ कागज पर, / उड़ेली हुई तुम्हारी वेदना, / जड़ से दूर जाने की।।। तो जड़ से दूर हो जाने की जो वेदना है परदेश में जाकर बराबर वो देखते हैं मार्मिकता के साथ, इसके अंदर केवल व्यंग्य भर नहीं है जो अन्तर्वेदना है और जो त्रासदी की बात उन्होंने की थी वो त्रासदी कम से कम आगे जाकर के वो प्रकट होना चाहिये- त्रासदी की बात वो बहुत बड़ी बात है। कवि-लेखक एवम ब्लागर डा० विजय तिवारी ’किसलय’ ने पुस्तरक पर बोलते हुए कहा कि कार ड्राईव करते वक्त हाईवे पर घटित घटनाओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन श्रृंखला ही ’देख लूँ तो चलूँ’ है। यह महज यात्रा वृतांत न होकर समीर जी के अन्दर की उथल पुथल, समाज के प्रति एक साहित्यकार के उत्तरदायित्व का भी सबूत है। अवमूल्यित समाज के प्रति चिन्ता भाव हैं। युवा विचारक एवम सृजन धर्मी श्री पंकज स्वामी ’गुलुश’ ने पुस्ताक पर चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ब्लाग और किताबों में फ़र्क है। समीक्षक इंजिनियर ब्लागर श्री विवेकरंजन श्रीवास्तव ने पुस्त क के बारे में कहा कि एक ऐसा संस्मरण जो कहीं कहीं ट्रेवेलाग है, कहीं डायरी के पृष्ठ, कहीं कविता और कहीं उसमें कहानी के तत्व है। कहीं वह एक शिक्षाप्रद लेख है, दरअसल समीर लाल की नई कृति ‘‘देख लूँ तो चलूँ‘‘ उपन्यासिका टाइप का संस्मरण है।

लेखक समीर लाल के पिता श्रीयुत पी०के०लाल ने अपने संक्षिप्त उदबोधन में कहा कि हाँ पूत के पांव पालने में नज़र आ गये थे जब बालपन में समीर ने इंजिनियर्स पर एक तंज लिखा था। लेखक श्री समीर लाल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि किसी रचना कार के लिये उसकी कृति का विमोचन रोमांचित कर देने वाला अवसर होता है जब श्री ज्ञानरंजन जी, डा० हरिशंकर दुबे सहित विद्वजन उपस्थित हों तब वे क्या कहें और कैसे कहें और कितना कहें? ” कार्यक्रम के अंत में श्रीमति साधना लाल ने आभार प्रदर्शन कर सभी के प्रति कृतज्ञता अंत:करण से व्यक्त की। कार्यक्रम का संचालन गिरीश बिल्लोीरे मुकुल ने किया।

-गिरीश बिल्लोरे ’मुकुल’

आकाशवाणी द्वारा गणतंत्र दि‍वस पर वि‍शेष हि‍न्दी कवि‍गोष्ठी


आकाशवाणी, वि‍शाखपटनम केंद्र द्वारा 25 जनवरी 2011 को रात 8 बजे इकसठवें गणतंत्र दि‍वस के अवसर पर वि‍शेष हिंदी कवि‍गोष्ठीष का प्रसारण कि‍या जा रहा है। इस कवि‍गोष्ठी में गणतंत्र भारत, हमारे देश की प्रगति‍ और हमारी एकता और अखंडता के साथ साथ वि‍वि‍ध सामयि‍क वि‍षयों पर प्रसि‍द्ध स्था नीय कवि‍ डॉ टी महादेव राव (उप प्रबंधक-राजभाषा, एचपीसीएल और सृजन संस्थार के सचि‍व), डॉ संतोष अलेक्सह (तकनीकी अधि‍कारी – हि‍न्दी , सीआईएफटी और सृजन संस्थास के संयुक्ता सचि‍व), श्री बीरेन्द्रे राय ( वरि‍ष्ठं प्रबंधक-हि‍न्दी‍, इंडि‍यन बैंक), श्रीमती पी उमारानी (प्रबंधक – हि‍न्दीर, भारतीय स्टे्ट बैंक), श्री तोलेटि‍ चंद्रशेखर (आकाशवाणी) और श्री हनुमंत सिंह‍ (भारतीय नौसेना) अपनी रचनायें प्रस्तु,त करेंगे। कार्यक्रम का संचालन डॉ टी महादेव राव कर रहे हैं। इस पूरे कार्यक्रम का समन्वायन और संयोजन कि‍या आकाशवाणी के प्रसारण नि‍ष्पाादक श्रीमती के इंदि‍रा और कार्यक्रम अधि‍शासी श्री के रमणन स्वा मी ने। आकाशवाणी वि‍शाखपटनम केंद्र राजभाषा हि‍न्दी् के प्रचार प्रसार के लि‍ये इस तरह के वि‍शेष कार्यक्रमों का आयोजन लगातार करता रहा है।

डॉ टी महादेव राव