सोमवार, 26 सितंबर 2011

श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक गल्प के रंग का लोकार्पण

शिमला, 6 अगस्त 2011, बचत भवन में जानेमाने कवि-आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक गल्प के रंग का लोकार्पण प्रख्यात आलोचक डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय के हाथों संपन्न हुआ। इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जिस भाषा के पास अच्छे आलोचक नहीं होते उस भाषा का विकास संभव नहीं हो पाता। हिन्दी के पास आलोचना की लम्बी परम्परा रही है। हमारे पास पुरानी पीढ़ी से लेकर युवा पीढ़ी तक के आलोचक शामिल हैं। अच्छी रचना आलोचक को खुद अपने पास बुलाती है। डॉ0 श्रोत्रिय ने श्रीनिवास श्रीकांत की आलोचना पुस्तक पर विस्तार से बात करते हुए कहा कि श्री निवास मूलतः कवि हैं लेकिन इस पुस्तक के माध्यम से उनका श्रेष्ठ मर्मज्ञ आलोचक सामने आया है जिससे उनकी आलोचना दृष्टि की ऊंचाई का पता चलता है। श्रीनिवास श्रीकांत ने पुस्तक में 15 आलोचना निबन्ध लिखें हैं जिसमें हिन्दी के ग्यारह लेखक, मराठी के दो और जर्मन के हैं। उन्होंने पुस्तक में संग्रहीत निर्मल वर्मा, कमलेश्वर, मृदुला गर्ग, केशव और हरनोट की पुस्तकों पर लिखे आलोचना लेखों के साथ गुण्टर ग्रास पर लिखे आलेख को सबसे श्रेष्ठ आलोचना लेख बताया। उन्होंने कहा कि पुस्तक में संग्रहीत अन्य लेख भी आलोचना की दृष्टि से अच्छे बन पडे हैं।

कार्यक्रम की शुभारम्भ एस आर हरनोट ने श्रीनिवास श्रीकांत की कविताओं से किया और कहा कि श्रीनिवास श्रीकांत के रचनाकर्मी जीवन में दो लम्बे अन्तराल है। एक 1954 और 1970 के बीच और दूसरा सहत्तर के मध्य से नई सदी के लगभग मध्य तक, जब वे न अपना कुछ प्रकाशित करवा पाए और न इतनी चर्चा में ही रहे। 2007 में एकाएक बात करती है हवाएँ, 2008 में घर एक यात्रा है और 2010 में हर तरफ समंदर है और कथा में पहाड़ से ये पुनः अपनी शीत निद्रा से अकस्मात जागे हैं और श्रीश्री जी ने समकालीन कविता में ही नहीं, समकालीन रचनात्मक आलोचना में भी अपनी एक विशिष्ठ पहचान बना कर हिन्दी के समकालीन लेखक वर्ग को अपनी ओर आकर्षित किया है। कथा में पहाड़ लगभग 40 महत्वपूर्ण कथाकारों की कहानियों को टिप्पणियों के साथ पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत करना आसान काम नहीं था। वरिष्ठ आलोचक डॉ0 हेमराज कौशिक ने श्रीनिवास श्रीकांत के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला और उनकी आलोचना दृष्टि पर "गल्प के रंग" के संदर्भ में विस्तार से बात की। इस अवसर पर प्रसिद्ध कथाकार केशव नारायण, आलोचक आत्मा रंजन, चर्चित युवा कवि सुरेश सेन निशांत एवं  नेपाली लेखक जगदीश राणा ने भी अपने विचार प्रकट किये। वयोवृद्ध कवि और लेखक श्रीनिवास श्रीकांत ने इस अवसर पर एकल कविता पाठ भी किया और उन्होंने तरन्नुम में गीत और गजलें भी सुनाई। मंच का सफल संचालन आत्म रंजन ने किया। इस आयोजन में शिमला व प्रदेश के विभिन्न भागों से लगभग 130 लेखक उपस्थित थे जिनमें सत्येन शर्मा, राम दयाल नीरज, सुदर्शन वशिष्ठ, सुशील कुमार फुल्ल, बद्री सिंह भाटिया, राजकुमार राकेश, रमेश चन्द्र शर्मा, जयवंती डिमरी, श्रीनिवास जोशी, कुल राजीव पंत आर0डी0 शर्मा, मस्त राम शर्मा, एस.शशि, मीनाक्षी पाल, राजेन्द्र राजन, ओम प्रकाश भारद्वाज, रत्न चंद निर्झन, रमेश शर्मा, खेम राज शर्मा, जगम प्रसाद शास्त्री, विशम्भर सूद, प्रमुख थे। समारोह का आयोजन हिमालय साहित्य, संस्कृति और पर्यावरण मंच द्वारा किया गया।

एस आर हरनोट,
द्वारा-हि0प्र0 पर्यटन विकास निगम, रिट्ज एनैक्सी, शिमला-171001

हिडिम्ब के दूसरे संस्करण का लोकार्पण

एस आर हरनोट के बहु चर्चित उपन्यास ‘हिडिम्ब‘ का दूसरा संस्करण ‘आधार प्रकाशन प्रा. लि.‘ से हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इस उपन्यास का पहला संस्करण वर्ष 2..4 में आया था और आते ही इसे आलोचकों, लेखकों और पाठकों की भरपूर प्रशंसा मिली। दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में इस उपन्यास का विमोचन प्रख्यात आलोचक-साहित्यकार प्रो. नामवर सिंह ने किया था। उपन्यास का पहला संस्करण वर्ष 2008 में ही समाप्त हो चुका था। हरनोट का यह पहला उपन्यास है जबकि उनके अब तक 7 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इस उपन्यास पर हिमाचल विश्वविद्यालय सहित, पंजाब, पटियाला और कई अन्य विश्वविद्यालयों में एम.फिल तथा पी.एच.डी की जा चुकी है। शायद ही कोई हिन्दी की ऐसी पत्रिका होगी जिसमें इस उपन्यास की समीक्षाएं न आई हों। इस उपन्यास पर जिन प्रमुख्य और वरिष्ठ आलोचकों ने पत्रिकाओं और गोष्ठियों में चर्चा की है उनमें प्रो. मधुरेश, डॉव वीर भारत तलवार,प्रो. सूरज पालीवाल, ज्ञॅ. खगेन्द्र ठाकुर, डॉ. सदानंद शाही, श्रीनिवास श्रीकान्त, ज्ञान प्रकाश विवेक, सुंदर लोहिया, डॉ. रानू मुखर्जी, डॉ. राजेन्द्र बड़गुजर, डॉ. भरत प्रसाद, डॉ. राजेन्द्र कुमार सेन, डॉ. संजय राय, डॉ. पल्लव, नेम चंद अजनबी और डॉ. ललित कार्तिकेय शामिल हैं।

प्रसिद्ध वरिष्ठ आलोचक प्रो. मधुरेश के अनुसार हिडिम्ब ‘‘हिमाचल के एक दुर्गम अंचल को केंद्र में रखकर अपने समय के कुछ बड़े सवालों को उठाता है।  इस उत्तर आधुनिक दौर में भूमंडलीकरण की आंधी में, परिवार, परिवेश, प्रकृति, पर्यावरण, जंगल, जमीन, कैसे नष्ट हो रहे हैं और आदमी किस तरह निःसहाय और अकेला पडता जाता है, हरनोट इसे बहुत धीरज से देखते, समझते और खोलते हैं।‘‘  प्रसिद्ध आलोचक डॉ खगेन्द्र ठाकुर ने इस उपन्यास को राजनीतिक उपन्यास माना है वे कहते हैं कि‘ यह राजनीतिक इसलिए नहीं है कि इसमें एक मंत्री है। राजनीति असल वर्ग-स्वार्थों के टकराव की अभिव्यक्ति है और यही इस उपन्यास की कथा प्राणधारा है।‘‘ साखी के संपादक और जानेमाने आलोचक डॉ. सदानंद शाही के अनुसार ‘‘हरनोट प्रेमचन्द की परम्परा के कथाकार हैं। जब हम किसी कथाकार को प्रेमचन्द की परम्परा का कथाकार कहते हैं तो इसका अर्थ होता है समाज के शापित,दलित और उपेक्षित वर्ग को साहित्य में केन्द्रीयता प्रदान करना। इस दृष्टि से हिडिम्ब एक महत्वपूर्ण उपन्यास है जिसकी कथा में वह तीक्ष्णता और तीव्रता मौजूद है जो मध्यवर्गीय चकाचौंध को भेदकर उस ग्रामीण अंचल तक पहुंचती है जहां आज भी असली भारत निवास करता है।‘‘   प्रख्यात आलोचक प्रो. सूरजपाल का कहना है कि ‘‘हिडिम्ब आज की सत्ता का असली चेहरा प्रस्तुत करता है जिसे हरनोट ने जोरदार मिथ के साथ अपनी पूरी क्षमता के साथ शावणू जैसे दलित के चरित्र के साथ गढा है।‘‘ श्रीनिवास श्रीकान्त, वरिष्ठ कवि और आलोचक के अनुसार ‘‘हिडिम्ब एक रचनात्मक उपन्यास है जो साम, दाम, दण्ड और भेद की नीतियों की व्याख्या करता है और उसे एक स्वस्थ उपाख्यान के कथावृत्त में पिरोता है। इसकी पूरी कहानी कुल 28 कथावृत्तों में उकेरी गई है जिसके विस्तार में हिमाचल के पूरे पर्वतशास्त्र को संजोया गया है। जाति, पार्थक्य, पर्यावरण, देव संस्कृति का सही स्वरुप, अनुबन्धीय विवाहादि इसके कुछ तात्विक पहलू है। हिन्दी में ऐसी रचनाओं से रचनात्मक साहित्य के इतिहास में एक और सकारात्मक अध्याय जुड़ता है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति न होगा।‘‘  जानेमाने वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार डॉ. वीरभारत तलवार के अनुसार ‘‘दलित जीवन पर लिखा यह एक ऐसा उपन्यास है कि उसको पढकर आश्चर्यचकित रह जाना पडा। हिन्दी में हिडिम्ब जैसा उपन्यास दलित जीवन पर कोई दूसरा नहीं है!‘‘

’समकालीन भारतीय सन्दर्भ और हिन्दी’विषय पर संगोष्ठी आयोजित

मेरठ, दिनांक 13 सितंबर 2011, हिन्दी विभाग, चैधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में ’हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष्य में ’समकालीन भारतीय सन्दर्भ और हिन्दी’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में वरिष्ठ कवि एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली में पूर्व प्राध्यापक रहे प्रो. केदारनाथ सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज समय आ गया है कि हिन्दी के माध्यम से अन्य भारतीय भाषाओं तथा उसके साहित्य की बात हो। आज इस बात की बेहद जरूरत है कि औपचारिक क्षेत्रों से हिन्दी का विकास हो तथा यह अनौपचारिक क्षेत्रों में भी आए। आज की हिन्दी एक बड़ा काम कर रही है कि इससे भारतीय साहित्य के इतिहास का निर्माण हो रहा है। आज हिन्दी भारत की सेतुभाषा बन चुकी है क्योंकि अगर आप एक भाषा से दूसरी भाषा में जाना चाहे तो अनुवाद इसका माध्यम है। हिन्दीभाषियों को भी दूसरी भाषाएं -दक्षिण की भाषाएं सीखनी चाहिए ताकि अनुवाद कर सकें। अनुवाद के क्षेत्र में हिन्दी में रोजगार है। इसलिए हिन्दी वालों को दूसरी भाषाओं के साथ प्रत्यक्ष संबंध जोड़ना होगा।

इस अवसर पर केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ कथाकार प्रो. गंगा प्रसाद ’विमल’ ने कहा कि बोल-चाल की भाषा का हिन्दी में भरपूर प्रयोग होता है। सरकारी काम-काज में हिन्दी का प्रयोग धीरे-धीरे बढ़ रहा है। समाचार पत्रों की संख्या में भास्कर, उमर उजाला, दैनिक जागरण आदि पत्रों की संख्या दूसरी भाषा इकाइयों से ज्यादा है। हिन्दी की गति फिल्मों व संचार माध्यमों में भी बढ़ रही है। देश में जो प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा में मातृ-भाषाओं का प्रयोग किया जाता है इसका अनुपात आज बढ़ा है। यह हिन्दी की बढ़ी हुई स्थिति को देखने का वैज्ञानिक तरीका है। आज हिन्दी को समकालीन सन्दर्भों में जानना जरूरी है। आज विश्व स्तर पर हिन्दी के प्रति जो रुझान कम था, वह बढ़ रहा है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. एच.सी. गुप्ता ने कहा कि हिन्दी बोलने में हमें गर्व करना चाहिए। हमें भी पाठ्यक्रम निर्माण हिन्दी में करना होगा, तभी हम अति विकसित देशों की श्रेणी में आ सकेंगे। हिन्दीभाषी लोग दुनियाँ में 3. से 4. वर्षो के भीतर बढ़े हैं अगर यह ठीक बात है तो हिन्दी का प्रसार भी तेजी से बढ़ना चाहिए। माननीय कुलपति ने कहा कि ’हिन्दी दिवस’ हमारे लिए औपचारिकता है। हर दिन हमारे लिए ’हिन्दी दिवस’ है। हर दिन हमें हिन्दी की बात करनी चाहिए। अन्त में हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. नवीन चन्द्र लोहनी ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कहा कि हम हिन्दी के क्षेत्रीय रूप पर भी काम कर रहे हैं तो दूसरी ओर राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रवासी साहित्य पर पाठ्यक्रम निर्धारित किया है। कार्यक्रम का संचालन मोनू सिंह एवं प्रगति ने किया।

हिन्दी दिवस के इस अवसर पर प्रो. वाई विमला, प्रो.एस.के. दत्ता, डा. महेश गर्ग, मेरठ के साहित्यकार पं. ईश्वर चन्द्र गंभीर, ज्वाला प्रसाद कौशिक ’साधक’, सुमनेश ’सुमन’, तुषा शर्मा, आदि तथा डॉ. अशोक मिश्र, डॉ. सीमा शर्मा, डॉ. रवीन्द्र कुमार, डा. गजेन्द्र सिंह, विवेक, अंजू, आरती राणा, अमित कुमार, ललित सारस्वत, नेत्र पाल, तथा छात्र-छात्राओं में कौशल, दलीप, पिण्टू, शिवानी, चंचल, संध्या, मिलिन्द, ब्रह्मसिंह, ज्योति, मनीषा, मोहनी, कपिल, आयुषी, पूजा, चरण सिंह, अनुराधा, राहुल आदि उपस्थित रहे।

--हिन्दी परिषद् , हिन्दी विभाग, चै. चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ

इंजीनियर जगदीप सिंह दाँगी विशिष्ट अकादमी सम्मान 2011 से सम्मानित

लिम्का बुक ऑफ़ रिकार्ड में दर्ज युवा कम्प्यूटर इंजीनियर जगदीप सिंह दाँगी को इस वर्ष पंजाब कला साहित्य अकादमी (पंकस) जालंधर द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रदान किए जाने वाले ‘विशिष्ट अकादमी सम्मान 2011’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिन्दी के विकास हेतु अद्वितीय योगदान के लिय प्रदान किया गया है। उक्त सम्मान श्री दाँगी को दिनाँक 11 सितम्बर 2011 को जालंधर (पंजाब) में आयोजित पंजाब कला साहित्य अकादमी (पंकस) के राष्ट्रीय समारोह में लायंस भवन में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि पूर्व निकाय मंत्री मनोरंजन कालिया तथा विशिष्ट अतिथि हिमाचल प्रदेश के पूर्व बागवानी मंत्री ठाकुर सत्य प्रकाश जी ने प्रदान किया। इस अवसर पर देश के विभिन्न प्रांतों से आये हुए कई हिन्दी कवि व साहित्यकार उपस्थित थे।

मध्य-प्रदेश के गंजबासौदा में जन्मे जगदीप सिंह दाँगी ने कम्प्यूटर के क्षेत्र में हिन्दी के विकास में उल्लेखनीय कार्य किया है। यह सम्मान उन्हें उनके प्रथम हिन्दी सॉफ़्ट्वेयर आई-ब्राउजर++(हिन्दी एक्सप्लोरर), प्रखर फ़ॉन्ट परिवर्तक, यूनिदेव, शब्द-अनुवादक, शब्द-ज्ञान आदि सॉफ़्ट्वेयर के विकास के फलस्वरूप प्रदान किया है। इन्हें पूर्व में भी अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत किया गया है। वर्ष 2010 के जेसीआई राष्ट्रीय पुरस्कार "आउटस्टैन्डिंग यंग पर्सन ऑफ़ इंडिया -2010" के अतिरिक्त कंप्यूटर के क्षेत्र में केबिन केयर एविलिटी फ़ाउंडेशन ने जगदीप सिंह दाँगी को राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कार और एक लाख रूपये की राशि के साथ-साथ वर्ष 2008 का मास्टरी अवार्ड प्रदान किया। वे वर्तमान में अटल बिहारी वाजपेयी - भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी एवम् प्रबंधन संस्थान ग्वालियर में वैज्ञानिक/इंजीनियर के पद पर रह कर हिन्दी सॉफ़्ट्वेयर के क्षेत्र में लगे हुए हैं।

रवीन्द्र प्रभात की पुस्तक 'हिंदी ब्लॉगिंग का इतिहास" का लोकार्पण

लखनऊ, ११ सितंबर २०११ भारतीय जन नाट्य संघ की उत्तर प्रदेश इकाई और लोकसंघर्ष पत्रिका के तत्वावधान में लखनऊ के कैसरबाग स्थित जयशंकर प्रसाद सभागार में सहारा इंडिया परिवार के अधिशासी निदेशक श्री डी. के. श्रीवास्तव के कर कमलों द्वारा हिंदी के मुख्य ब्लॉग विश्लेषक श्री रवीन्द्र प्रभात की सद्य: प्रकाशित पुस्तक 'हिंदी ब्लॉगिंग का इतिहास" का लोकार्पण हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार और आलोचक श्री मुद्रा राक्षस, दैनिक जनसंदेश टाइम्स के मुख्य संपादक डॉ. सुभाष राय, वरिष्ठ साहित्यकार श्री विरेन्द्र यादव, श्री शकील सिद्दीकी, रंगकर्मी राकेश जी,पूर्व पुलिस महानिदेशक श्री महेश चन्द्र द्विवेदी, साहित्यकार डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल आदि उपस्थित थे।

इस वृहद् कार्यक्रम का उदघाटन करते हुए श्री डी. के. श्रीवास्तव ने कहा कि मैं रवीन्द्र प्रभात जी को व्यक्तिगत रूप से बधाई देना चाहूंगा कि उन्होंने पहली बार ब्लॉगिंग का इतिहास लिखा है। इससे अभिव्यक्ति की इस नयी विधा को आगे बढ़ाने तथा हिंदी भाषा के व्यापक प्रसार में मदद मिलेगी । इस अवसर पर दैनिक जनसंदेश टाइम्स के मुख्य संपादक डॉ. सुभाष राय, प्रख्यात रंगकर्मी श्री राकेश ने और वरिष्ठ आलोचक श्री विरेन्द्र यादव, वरिष्ठ साहित्यकार श्री शकील सिद्दीकी, साहित्यकार डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल और पुस्तक के लेखक श्री रवीन्द्र प्रभात ने अपने विचार प्रकट किये। सभा की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री मुद्रा राक्षस ने की और सभा का संचालन डॉ. विनय दास तथा धन्यवाद ज्ञापन रवीन्द्र प्रभात ने किया।

डॉ. राधेश्याम शुक्ल को ''रामनाथ गोइन्का पत्रकार शिरोमणि पुरस्कार''

समग्र लेखन के लिए डॉ. बालशौरि रेड्डी और अनुवाद के लिए डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद सम्मानित
हैदराबाद, २८ अगस्त २०११, कमला गोइन्का फाउंडेशन ने गत रविवार की शाम यहाँ पोट्टी श्रीरामुलु तेलुगु विश्वविद्यालय के सभागार में आयोजित एक भव्य पुरस्कार एवं सम्मान समारोह में हिंदी दैनिक 'स्वतंत्र वार्त्ता' के सम्पादक डॉ. राधे श्याम शुक्ल को प्रतिष्ठित ''रामनाथ गोइन्का पत्रकार शिरोमणि पुरस्कार'' प्रदान किया। इस अवसर पर डॉ. शुक्ल को हिंदीतर क्षेत्र के वरिष्ठ हिंदी पत्रकार के रूप में सम्मानित करते हुए फाउंडेशन की ओर से प्रशस्ति पत्र, उत्तरीय, श्रीफल, स्मृतिचिह्न और सरस्वती की प्रतिमा के साथ ५१ हज़ार रुपए की राशि भी प्रदान की गई। ६२ वर्षीय डॉ. राधेश्याम शुक्ल अपने विद्यार्थीकाल से ही सोद्देश्य पत्रकारिता से जुड़े रहे हैं तथा विगत १३ वर्षों से हैदराबाद में रहकर समाचार पत्र सम्पादक के अतिरिक्त अपने व्याख्यानों ओर लेखों के माध्यम से हिंदी भाषा और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं।

साथ ही, इस समारोह में वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. बाल शौरि रेड्डी को उनके समग्र लेखन के लिए ''भाभीश्री रमादेवी गोइन्का सारस्वत सम्मान''तथा आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष डॉ. यार्लगड्डा लक्ष्मी प्रसाद को डॉ. हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा के हिंदी से तेलुगु में अनुवाद के लिए ''गीतादेवी गोइन्का हिंदी-तेलुगु अनुवाद पुरस्कार'' से सम्मानित किया गया। ये सभी सम्मान मुख्य अतिथि ज्ञानपीठ पुरस्कार ग्रहीता साहित्यकार डॉ.सी. नारायण रेड्डी के हाथों भेंट किए गए। डॉ. सी. नारायण रेड्डी ने तीनों हिंदी साहित्यकारों की हिंदी-सेवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा अपनी हिंदी-ग़ज़ल सुना कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। इस अवसर पर समारोह के अध्यक्ष प्रसिद्ध कला-संग्राहक एवं समीक्षक जगदीश मित्तल और विशेष अतिथि एम. उपेंद्र के अतिरिक्त पुरस्कारदाता संस्था के श्यामसुंदर गोइन्का, ललिता गोइन्का,ॐ प्रकाश गोइन्का, सुशील गोइन्का, संजय गोइन्का भी बालकृष्ण गोइन्का मंच पर उपस्थित थे।

पुरस्कार के स्वीकृति भाषण में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कमला गोइन्का फाउंडेशन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए हिंदी के अखिल भारतीय स्तर पर ज़ोरदार प्रचार की आवश्यकता बताते हुए कहा कि भाषा और साहित्य वस्तुतः सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय संस्कृति के संवाहक ही नहीं संरक्षक और संप्रेषक भी होते हैं, अतः उत्तर और दक्षिण के सतही भेदों को भुलाकर हिंदी को समस्त भारतीय भाषाओँ के प्रतीक के रूप में आधुनिक विश्व के समक्ष समग्र भारत की पहचान बनकर उभरना होगा। डॉ. शुक्ल ने इस कार्य के लिए बुद्धिजीवियों के स्तर पर एक बड़े सामाजिक आन्दोलन की आवश्यकता बताते हुए आंदोलन सभी भाषाओँ के साहित्यकारों का आह्वान किया कि वे इस विचार को मूर्त रूप दें। डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने इस उद्देश्य से एक नवचेतना मंच के गठन की घोषणा करते हुए उसके संयोजक राम गोपाल गोइन्का को अपनी पुरस्कार राशि मंच के लिए प्रदान करने की घोषणा की। इससे प्रेरित होकर कमला गोइन्का फाउंडेशन के संस्थापक न्यासी श्याम सुन्दर गोइन्का ने भी इस नवगठित मंच को पुरस्कार के बराबर अर्थात ५१ हज़ार रुपए की राशि प्रदान करने की घोषणा की।

अध्यक्षीय संबोधन में पद्मश्री जगदीश मित्तल ने हिंदी की समृद्धि पर प्रकाश डालते हुए साहित्येतर विषयों और कलाओं के विविध पक्षों पर व्यापक लेखन की आवश्यकता जताई तथा भारतीय भाषाओं, भारतीय कलाओं एवं भारतीय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए आंदोलन के स्तर पर काम किए जाने के विचार का समर्थन करते हुए पुरस्कृत साहित्यकारों और आयोजक संस्था को शुभकामनाएँ दीं। धन्यवाद प्रस्ताव के बाद जन-गण-मन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

-ऋषभदेव शर्मा
आचार्य एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद -500004

कवि उद्रभ्रांत को भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार

भोपाल: विगत 25 अगस्त, 2011 को भारत भवन सभागार में मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद की साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ हिंदी कवि श्री उद्भ्रांत को उनकी लम्बी कविता ‘अनाद्यसूक्त’ के लिए अकादमी का वर्ष 2008 का अखिल भारतीय भवानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार प्रदान किया गया। ‘पूर्वग्रह’ के 123वें अंक में संपूर्ण प्रकाशित होकर पहले ही चर्चा में आई इस लम्बी कविता को कवि ने नौ स्पंदों में विभक्त किया है। अकादमी द्वारा प्रकाशित अलंकरण समारोह की पुस्तिका में कहा गया है कि कवि ने ‘‘नासदीय सूक्त की परंपरा में नए प्रयोग कर सृष्टि के उन्मेष और रहस्य को जानने के लिए वैदिक और तांत्रिक जानकारी का उपयोग किया है। ऐसी भावभूमि वैदिक और औपनिषद् काव्य के बाद कुछ निर्गुणीय कवियों में ही दिखाई देती है। अनाद्यसूक्त में एक शब्दीय पंक्ति का उपयोग कर उसके भीतर समाहित दार्शनिक अर्थों का संप्रेषण, कवि के सोच को अर्थवान बनाता है।’’

इसके अतिरिक्त निबंध संग्रह ‘विवेचना के सुर’ के लिए प्रो. शरद नारायण खरे (मंडला) को माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, ‘एक अचानक शाम’ पर कहानी के लिए मनमोहन सरल (मुम्बई) को मुक्तिबोध पुरस्कार, उपन्यास ‘काहे री नलिनी’ के लिए उषा यादव (आगरा) को वीरसिंह देव पुरस्कार और आलोचना पुस्तक ‘गांधी: पत्रकारिता के प्रतिमान’ के लिए डॉ. कमलकिशोर गोयनका (दिल्ली) को आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार से भी अलंकृत किया गया।

सभी पुरस्कृत रचनाकारों को नारियल, शॉल, सम्मान-पत्र के साथ इक्यावन हज़ार रुपये की धनराशि उत्तर प्रदेश की संस्कृति मंत्री माननीय श्री लक्ष्मीकांत शर्मा द्वारा प्रदान की गयी।
- सुनील तोमर

पत्रकार सुबोध कुमार नंदन को राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार


हिन्दुस्तान पत्र के युवा पत्रकार सुबोध कुमार नंदन को उनके पुस्‍तक ‘बिहार के पर्यटन स्‍थल और सांस्‍कृतिक धरोहर’ को पर्यटन मंत्रालय की ओर से राहुल सांकृत्‍यायन पर्यटन पुरस्‍कार योजना 2009-10 के तहत प्रथम पुरस्‍कार मिला है। पिछले वर्ष यह पुरस्‍कार उत्‍तराखंड के मुख्‍यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को उनकी पुस्‍तक ‘हिमालय का महाकुम्‍भ नन्‍दा राजजात’ को मिला था। नंदन की पुस्‍तक का प्रकाशन प्रभात प्रकाशन नई दिल्‍ली ने किया है।

पुरस्‍कार के रूप में सुबोध कुमार नंदन को बीस हजार रुपये का चेक और प्रमाण पत्र प्रदान किया गया है। उल्‍लेखनीय है कि पिछले वर्ष (दस दिसम्‍बर) को पटना में आयोजित ‘पुस्‍तक मेला’ में इस पुस्‍तक का लोकार्पण मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने किया था। सुबोध कुमार नंदन की यह पहली पुस्‍तक है। इसके पूर्व पर्यटन क्षेत्र में बढ़ावा व जागरुकता पैदा करने के लिए 2008 में श्री नंदन को बिहार सरकार ने पर्यटन सम्‍मान प्रदान किया था। वर्तमान में सुबोध कुमार नंदन हिंदुस्‍तान (भागलपुर) में संपादकीय विभाग में कार्यरत हैं।

श्री नंदन पिछले 15 वर्षों से पत्रकारिता में हैं। देश के सभी प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में उनके आलेख विशेषकर पर्यटन व पुरातत्‍व पर प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा भारतीय रेल, सेल अर्पण, कादम्‍बनी, बिहार आदि पत्रिकाओं में भी आलेख का प्रकाशन होता रहता है। ज्ञातव्‍य है कि पर्यटन मंत्रालय की ओर से पर्यटन से संबंधित विषयों पर मूल रूप से हिंदी में लिखी गई पुस्‍तकों को पुरस्‍कृत करने के लिए ‘राहुल सांकृत्‍यायन पर्यटन पुरस्‍कार योजना’ चलाई जा रही है। इस योजना का मुख्‍य उद्देश्‍य भारतीय पर्यटन से संबंधित विषयों पर हिंदी में मौलिक पुस्‍तक लेखन को बढ़ावा देना है।