सोमवार, 30 मई 2011

कोपेनहैगेन में साहित्य संध्या

२२ मई २०११, नन्हीं जलपरी के देश की राजधानी डेन्मार्क के प्रथम सांस्कृतिक कैफे ट्रांकेबार में वैश्विक समुदाय की संरक्षक श्रीमती पूर्णिमा वर्मन का भव्य स्वागत किया गया, जिसमें भारतीय मूल के धार्मिक, सामाजिक और साहित्यिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।  इस कैफे की स्थापना भारतीय मूल के रेडियो कलाकार, प्रोड्यूसर, उद्घोषक और गजलकार तथा रेडियो सबरंग से संस्थापक श्री चाँद शुक्ला हदियाबादी तथा मूलरूप से डेनमार्क की निवासी चित्रकार, कवि, लेखक, अनुवादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती रिगमोर कुबलाक रासमुसेन (रिग मोर) ने की है।

कार्यक्रम का प्रारंभ चाँद हदियबादी ने डेन्मार्क में साहित्यिक गतिविधियों के विषय में बताकर किया। उन्होंने रेडियो सबरंग से ट्रंकबार तक की यात्रा के कुछ रोचक संस्मरणों को अतिथियों के साथ बाँटा औॅर ट्रंकबार की लोकप्रिय परंपराओं के विषय में बताया जिसमें द्वार से सटी खिड़की में रखे झरने में संजोई गई शुभ मणियों को कैफ़े के अतिथियों द्वारा उठाने और कैफे में पहली बार पधारने वाली महिला के गले में एक स्कार्फ पहनाने की मनमोहक परंपराएँ शामिल थीं। उन्होंने रेडियो सबरंग की वेब साइट के नये परिवर्तनों को भी सबके साथ बाँटा।
कोपेनहैगे निवासी प्रवासी उपन्यासकार एवं कथाकार अर्चना पैन्यूली ने कार्यक्रम का संचालन किया। उपस्थित हिंदी कर्मियों का परिचय दिया और उनसे अपने कार्य में आने वाली समस्याओं उनके निराकरणों और अपने कार्य अनुभवों के विषय में बोलने के लिये उन्हें आमंत्रित किया। इस अवसर पर सुनीता मंगा, आशा अरोड़ा और कुमुद माथुर ने हिंदी शिक्षण से संबंधित अपने विचार प्रस्तुत किेये। प्रवासी भारतीयों के लिये हिंदी की उपयोगिता बताते हुए उपन्यासकार व कथाकार राजकुमार कोहली ने कहा कि भारतीय मन की संवेदनाओं का जैसा चित्रण हिंदी भाषा में हो सकता है वैसा अंग्रेजी या अन्य भाषाओं में नहीं हो सकता। रेडियो प्रोड्यूसर एवं उद्घोषक गुरुदयाल सिंह रमता ने कहा कि दूसरी भाषा से हमें धन समृद्धि सबकुछ मिल जाती है लेकिन अपनी भाषा के छूटते ही हम अपनी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं को खो बैठते हैं।

पहले सत्र के बाद अनेक प्रकार के गर्म व ठंडे पेय के साथ समोसे और पकौड़ों का अल्पाहार परोसा गया। दूसरे सत्र का प्रारंभ प्रीति सिंह की तीन छंदमुक्त रचनाओं से हुआ। उनके बाद अर्चना पैन्यूली ने अपनी दो कविताओं का पाठ किया। कुमुद माथुर की एक लंबी कविता के बाद सबके आग्रह पर चाँद हदियाबादी की गजलों ने खूब रंग जमाया। श्रीमती रिगमोर ने पूर्णिमा वर्मन की कुछ रचनाओं के डैनिश अनुवाद का पाठ किया, अंत में पूर्णिमा वर्मन की गजलों और सुरीले गीतों से संध्या संपन्न हुई।
धन्यवाद ज्ञापन चाँद हदियाबादी ने किया। कार्यक्रम में उपरोक्त वक्ताओं के अतिरिक्त रवि मंगा, रघुनाथ माथुर, कमल घोष, शारदा दुलानी, सत्यदेव चतुर्वेदी, ज्योति पैन्यूली, कमल कोहली, प्रवीण सक्सेना और दिनेश शर्मा भी उपस्थित थे।

--दिनेश शर्मा

लन्दन में हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता

रविवार १५ मई लन्दन के नेहरु केंद्र में यू के हिंदी समिति द्वारा वर्ष २०११ की हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता के पुरस्कार समारोह एवं बच्चों की भाषण प्रितियोगिता का आयोजन किया गया। जिसमें लन्दन और उसके आसपास के बहुत से बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।भाषण प्रितियोगिता के ३ मुख्य वर्ग थे एक ९ वर्ष से कम आयु के बच्चे, ९ से १३ वर्ष तक के बच्चे एवं १४ वर्षऔर उससे अधिक तक के बच्चे।सभी बच्चों ने " मित्रता, सिगरेट के दुर्प्रभाव, हिंदी सिनेमा और काश मेरे माता पिता अमीरहोते ।जैसे विषयों पर भाषण पूरे आत्मविश्वास और निपुणता से दिया।

समारोह का सञ्चालन श्री पद्मेश गुप्त, सुरेखा चोफ्ला और लन्दन में हिंदी के छात्र कार्तिक सुब्बुराज और कमलेश वालिया ने किया। सभी विजेताओं को पुरस्कारों का वितरण लन्दन में उच्चायुक्त में हिंदी विभाग के अताशे श्री आनंद कुमार,श्री सतेन्द्र श्रीवास्तव और नेहरु केद्र की दिव्या माथुर ने किया बच्चों का उत्साह वर्धन करते हुए आनंद कुमार ने कहा कि हिंदी पढने और सीखने के लिए जिस भी तरह की सामग्री किसी को भी चाहिए वह उच्चायुक्त से उपलब्ध कराई जाती है और जो भी इसके इच्छुक हो वह इन्हें ले सकता है। भाषण प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती उषा राजे सक्सेना और पत्रकार, लेखक शिखा वार्ष्णेय ने निभाई । निर्णय के सन्दर्भ में उषा राजे ने कहा कि उन्हें बच्चों का उच्चारण देख कर आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता हुई है क्योंकि अब तो भारत में भी बच्चों में हिंदी का इतना अच्छा ज्ञान नहीं देखा जाता और इस प्रतियोगिता के निर्णय में निर्णायकों को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ा।

यू के हिंदी समिति द्वारा आयोजित यू के हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता का यह दसवा वर्ष है। इस प्रतियोगिता के चयनित विजेताओं को भारतीय उच्चायुक्त और भारत के विदेश मंत्रालय के सहयोग से प्रतिवर्ष एक शैक्षिक भ्रमण के लिए भारत भेजा जाता है जहाँ उनकी देख रेख अक्षरम और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद द्वारा की जाती है। हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता का यह कार्यक्रम यूरोप के और सात देशों में चलाया जाता है। और यू के में इसके संयोजक श्री वेद मित्र मोहला ( एम बी ई ) हैं। लन्दन में हुई इस भाषण प्रतियोगिता के पुरस्कारों को श्री सत्येन्द्र श्रीवास्तव अपनी माताजी के नाम पर प्रायोजित करते हैं। और हिंदी ज्ञान की लिखित प्रतियोगिता के पुरस्कारों को डॉ पियूष गोयल द्वारा प्रायोजित किया गया था।

बच्चों को बधाई देते हुए सत्येन्द्र जी ने कहा कि - जब भी घर मे बात करें हिंदी में करे और भारत जब भी जाएँ तो २ हिंदी की किताबें जरुर खरीद कर लायें। अगर इन दो बातों का ध्यान रख लिया जाये तो हिंदी सीखने में बहुत आसानी होगी। इस तरह चाय नाश्ते के साथ इस सफल आयोजन का समापन हुआ। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए किये गए इस बेहतरीन आयोजन के लिए यू के हिंदी समिति के संस्थापक अध्यक्ष श्री पद्मेश गुप्तसहित सभी टीम के सदस्य बहुत बहुत बधाई के पात्र हैं। समारोह में श्री सतेंदर श्रीवास्तव, श्री पद्मेश गुप्त, श्री वेदमोहला, श्री आनंद कुमार ,श्रीमती उषाराजे सक्सेना, श्री के बी एल सक्सेना, श्रीमती शशि वालिया, देविना ऋषि, डॉ पियूष गोयल और श्री ब्रिज गोयल के अलावा लन्दन के बहुत से गणमान्य व्यक्ति और हिंदी प्रेमी उपस्थित थे।

शिखा वार्ष्णेय
लन्दन।

"कौन सी ज़मीन अपनी" का विमोचन

चित्र में --दाएँ से बाएँ-- डॉ. अफ़रोज़ ताज, श्रीमती सरोज शर्मा,
श्रीमती ऊषा देव, श्रीमती बिंदु सिंह, रमेश शौनक
हिन्दी जगत की जानी- मानी कवयित्री, कहानी लेखिका, पत्रकार, रेडियो, टी.वी. तथा रंगमंच की कलाकार सुधा ओम ढींगरा के कहानी संग्रह "कौन सी ज़मीन अपनी" का विमोचन, यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलाईना के तत्त्वाधान में प्रो. अफ़रोज़ ताज द्वारा आयोजित समारोह में संपन्न हुआ। सभा का आरम्भ श्री जान काल्डवेल की स्वागत पंक्तियों और हिंदी विकास मंडल की अध्यक्षा श्रीमती सरोज शर्मा के आशीर्वाद से हुआ।

डॉ. अफ़रोज़ ताज ने सुधा ओम ढींगरा की कृतियों पर चर्चा करते हुए उनकी सीधी सरल भाषा में कहानियाँ लिखने के अंदाज़ की बहुत प्रशंसा की। उन्होंने यह भी कहा कि कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वे भारत से इतनी दूर बैठी लिख रही हैं। उनकी कहानियों में आधुनिकता के साथ- साथ परम्परावाद भी है। जहाँ एक ओर पंजाब के किसानों की बात करतीं हैं तो दूसरी ओर अमरीका के अत्याधुनिक परिवेश का चित्रण भी करतीं हैं। इस समारोह में हिंदी- उर्दू जगत के कई विशिष्ट व्यक्तित्व शामिल हुए जिन्होंने न केवल अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की बल्कि "कौन सी ज़मीन अपनी" की बहुत सराहना की। प्रो.अफ़रोज़ ने कहा कि सुधा जी की रचनाएँ अमेरिका के कई विश्विद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रम में पढ़ाई जाती हैं। रमेश शौनक ने सुधा जी की कहानियाँ को 'समाज की जमी हुई सिल' को तोड़ती कहानियाँ बताया और बिंदु सिंह ने " कौन सी ज़मीन अपनी" के नारी पात्रों पर चर्चा की। उनके अनुसार सुधा जी की कहानियों के नारी पात्र चुप रह कर प्रतिवाद करते हैं, शोर-शराबा नहीं करते। इनकी कहानियों की नारियाँ कभी भी अपनी परम्पराओं को नहीं भूलतीं, जो ग़लत है उसका प्रतिरोध करते हुए अपने आप को सक्षम और सशक्त बनातीं हैं। श्रीमती सीमा फ़ारूखी ने सुधा जी की "एग्ज़िट" कहानी को अपनी ही कहानी बताते हुए कहा कि इन की कहानियाँ हमारी आम ज़िन्दगी से बहुत जुड़ी हुई हैं।

श्रीमती उषा देव ने पंकज सुबीर और अदिति मजूमदार ने अखिलेश शुक्ल की "कौन सी ज़मीन अपनी" पर लिखी समीक्षाएं पढ़ीं। अंत में सुधा जी की 'एग्ज़िट' कहानी का उन्हीं के द्वारा पाठ हुआ।  रंगमंच और रेडियो से जुड़े होने के कारण उनके कहानी पढ़ने के अंदाज़ से लोग मन्त्र -मुग्ध हो गए। रात्रि -भोज के साथ सभा का समापन हुआ।

"वेयर डू आई बिलांग" का विमोचन सम्पन्न

एशियन म्यूजिक संस्था डेनमार्क द्वारा आयोजित शास्त्रीय संगीत संध्या पर अर्चना पैन्यूली के उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ का लोकापर्ण डॉ कैनथ ज्यूस्क़, ऐशियन शिक्षा विभाग कोपनहेगन यूनीवर्सिटी के अध्यक्ष द्वारा किया गया। इस अवसर पर प्रबुद्ध श्रोताओं में डेनमार्क में बसे भारतीय समुदाय के कई साहित्य व संगीत प्रेमियों के अतिरिक्त स्थानीय डेन्स भी उपस्थित थे।

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास योरोपीय वातावरण में रह रहे एक ऐसे भारतीय परिवार की कहानी है, जिसके माध्यम से लेखिका ने भारतीय अप्रवासियों की जीवन शैली, संघर्ष, दुविधाएँ, कठिनाइयाँ, उनके सोच-विचार, दो संस्कृतियों के बीच उनकी जूझ व आप्रवासन समस्याओं को दर्शाया है। उपन्यास की प्रमुख पात्र नवयुवती रीना है। रीना के जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष 20 से 25 तक उपन्यास में वर्णित है। इन पाँच वर्षो के समय में आज के युग की किसी महत्वाकांक्षी नवयुवती को अपना कैरियर बनाने के अतिरिक्त एक विशेष आवश्यकता जीवन साथी की खोज भी होती है। आप्रवासी होने के कारण से कई द्विविधाएँ पैदा हो जाती हैं। उपन्यास आप्रवासन के सरोकारों एवं प्रवासित परिवार व समुदाय के विषय में बहुत कुछ बयाँ करता है।

लोकापर्ण समारोह में डा कैनथ ज्यूस्क के अतिरिक्त रितु कृष्णन, अखिला रमन, मैरी ओहारा, व गुरूचरण मिंगलानी ने उपन्यास पर अपने विचार प्रस्तुत किये। डा कैनथ ज्यूस्क ने कहा, “एक स्केन्डिनेवियन देश डेनमार्क में रह कर यहाँ के समाज पर हिन्दी में उपन्यास लिखना अपने आप में एक विशिष्टता है। डेनिश समाज को लेकर डेनमार्क में हिंदी में लिखा ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ पहला उपन्यास है। अक्सर यह चर्चा होती रहती है कि इस देश के मूल नागरिकों का प्रवासियों के प्रति क्या दृष्टिकोण है। वेयर डू आई बिलान्ग के द्वारा इमीग्रेन्टस का दृष्टिकोण पता लगता है कि वे जिस देश में रहते हैं उस देश के विषय में क्या सोचते हैं और उनकी क्या परेशानियाँ हैं।” इसके अतिरिक्त उन्होंने कोपनहेगन यूनीवर्सिटी में इंडोलोजी व आधुनिक भारत पर चल रहे शैक्षिक कार्यक्रमों पर भी प्रकाश डाला। ऋतु कृष्णन ने कहा- “हिन्दी पुस्तकें मैं कोई खास नहीं पढ़ती थी। ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ पढ़ते हुये मै इसमें इतनी रम गई कि इसके पात्रों व घटनाओं में खो गई। हिन्दी किताबों के प्रति मेरा रुझान बढ़ गया।” मूलतः तमिल प्रदेश की रहने वाली अखिला रमन ने कहा- ‘यह उपन्यास युवा पीढ़ी के लिये है। और इसकी सफलता तभी है जब यह अधिक से अधिक युवकों के पास पहुँचे।” अन्त में लेखिका ने ऐशियन म्यूजिक फोरनिंग संस्था, डॉ कैनथ ज्यूस्क़, अपने पाठकों व श्रोताओं का आभार व्यक्त करते हुये कहा- “किसी रचना विशेष पर पाठकों की टिप्पणी व किसी संस्था द्वारा उसकी पुस्तक का लोकापर्ण करवाना लेखक को नवीन ऊर्जा से भर देता है जिससे उसका साहित्य सर्जन थमता नहीं।”

लीडस, यूके से आयी भारतीय सांस्कृतिक संगीत मंडली ने सुर व ताल से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। कुल मिला कर समारोह में संगीत व साहित्य का बेजोड़ समन्यव था। ऐशियन म्यूजिक संस्था के व्यवस्थापक डॉली शैनाय व मनबीर सिंह ने कहा- “पहली बार हमारी संस्था के समारोह में किसी पुस्तक का लोकापर्ण हुआ है, नया अनुभव है…।”

- चाँद शुक्ला

नॉर्थ कैरोलाईना में कपूर परिवार को संगीत, दृश्य, नाटक, ध्वनि व प्रकाश का नज़राना

गत दिवस हिन्दी विकास मंडल एवं शिडोरी प्रोडक्शंज़ ने बालीवुड के कपूर परिवार को हिन्दू भवन (मोर्रिस्विल्ल, नॉर्थ कैरोलाईना) के सभागार में संगीत, दृश्य, नाटक , रौशनी एवं ध्वनी के सम्मिश्रण से सजा शो प्रस्तुत कर श्रद्धांजलि भेंट की। २५ कलाकारों ने इस शो में हिस्सा लिया। स्टेज पर आर. के. स्टूडियो का सेट बनाया गया था और शो का आरंभ आर. के. स्टूडियो का दरवाज़ा खुलने पर हुआ और साथ ही आरंभ हुई इसकी कहानी।

देवयानी नाम की फ़िल्म अभिनेत्री जो अपने समय में राज साहब को चाहती थी पर राज कपूर ने उसे स्वीकार नहीं किया था...उसकी रूह आर. के. स्टूडियो में भटकती रहती है और जब भी स्टूडियो के दरवाज़े खुलते हैं तो वह स्वयं को जिंदा महसूस करने लगती है। स्टेज पर वह यूवी लाईट में उभरती है यानि एक सफेद साड़ी दर्शकों के सामने आती है और बोलना शुरू करती है तभी आर. के. स्टूडियो में टंगे चाँद में से समय की आवाज़ उभरती है। इस तरह से दोनों के संवादों से चार पीढ़ियों की कहानी कही गई।

इसकी परिकल्पना की थी रवि देवराजन ने और निर्देशक भी वही थे। कपूर परिवार के बारे में शोध किया था बिंदु सिंह ने। सुधा ओम ढींगरा और बिंदु सिंह ने पटकथा और संवाद लिखे। आवाज़ दी रवि देवराजन और सुधा ओम ढींगरा ने। नाटकीय सहयोग था अफ़रोज़ ताज, जॉन काल्डवेल और रमेश कलाग्नानम का। रूह का रोल निभाया सुधा ओम ढींगरा ने। स्वरों का जादू बिखेरा -भारती जावलकर, रवि कल्मथ, श्रीराम कृष्णास्वामी, प्रशांति श्रीनिवासन, एवं जयशंकर स्वामीनाथन। आर. के. स्टूडियो का सेट और कॉस्टयूम डिज़ाईन किए हिमगौरी देशमुख, वनश्री सेलुकर, अनु वीरकर, विद्या अर्वपल्ली, भावना सिंह, बिंदु सिंह एवं अंनत सिंह ने। गीत- संगीत के परामर्श दाता थे -कृष्ण जोशी एवं सम्पदा जोशी। रौशनी, विडिओ एवं ध्वनी अभियंता क्रमशः थे -संजय भस्मे, वेणु रावी, शिवा रघुनानन, राजीव रामराजन, राज पटेल एवं मोहन वेंकटाचलम।

सुवास शाह, अतीश कटारिया, अदिति मजूमदार, समिता तोशनिवाल की सहायता और भावना सिंह, अर्जुन देवराजन और नफीसा शेख़ के नेतृत्व में युवा वर्ग का सहयोग सराहनीय था। करीना जावेलकर, अनामिका, अपर्णा एवं चिराग़ सत्संगी का साथ अतुलनीय था। कार्यक्रम का संयोजन किया था बिंदु सिंह ने। इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि हॉल खचाखच भर गया था और बहुत से लोगों को कार्यक्रम देखे बिना निराश लौटना पड़ा। यह कार्यक्रम स्थानीय कलाकारों ने मिल कर तैयार किया था और यह अपनी तरह का पहला कार्यक्रम नॉर्थ करोलाईना के ट्राईएंगल एरिया में हुआ। इससे प्राप्त धन हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में लगाया जायेगा।

महादेवी वर्मा जयंती, अनुदान वितरण एवं लघकथा कार्यशाला

पारामारिबो स्थित भारत के राजदूतावास और सूरीनाम हिन्दी परिषद ने प्रख्यात हिन्दी कवियित्री, एक स्वतंत्रता सेनानी, महिला कार्यकर्ता और शिक्षाविद महादेवी वर्मा जयंती पर एक विशेष शाम का आयोजन किया. कार्यक्रम का आरंभ वानिका क्षेत्र की परमानन्द हिन्दी पाठशाला के छात्रों द्वारा गाए गए भजनों से हुआ। स्थानीय हिन्दी शिक्षक श्रीमती कृष्णा भिखारी ने उत्साहपूर्वक महादेवी के जीवन पर और श्री धीरज कंधई ने उनकी साहित्यिक कृतियों पर वक्तव्य दिया श्रीमती सुषमा खेदू, श्रीमती कारमेन सोमाइ और श्रीमती भजन धनवंती ने महादेवी की कविताओं का पाठ किया जिसे प्रबुद्ध श्रोताओं ने खूब सराहा।

माननीय राजदूत श्री कंवलजीत सिंह सोढ़ी जी ने दर्शकों को संबोधित करते हुए महादेवी वर्मा के साहित्यिक गुणों की सराहना की। इस अवसर पर सूरीनाम हिन्दी परिषद के पुस्तकालय के लिए 30 पुस्तकें भी प्रदान की गयी और 15 हिन्दी शिक्षकों को 1500 अमरीकी डालर और 15 हिन्दी स्कूलों और संगठनों को 500 अमरीकी डालर और एक प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया, उन्होने कहा कि यह अनुदान सूरीनाम के हिन्दी शिक्षकों की नि:स्वार्थ सेवाओं को सम्मानित करने का प्रयास है. सूरीनाम हिन्दी परिषद के अध्यक्ष श्री भोलानाथ नारायण ने महादेवी जी के कथन कि "हर भाषा का सम्मान करना चाहिए लेकिन किसी अन्य भाषा को मातृभाषा के समान दर्जा नहीं दिया जाना चाहिए। सूरीनाम हिन्दी परिषद के पूर्व-अध्यक्ष श्री जानकी प्रसाद सिंह ने तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन में महादेवी वर्मा जी के साथ हुई भेंट की अपनी यादें साझा की।

श्रीमती भावना सक्सेना, अताशे (हिंदी एवं संस्कृति) ने सभा का संचालन करते हुए उल्लेख किया कि इस तरह के आयोजनों का उद्देश्य हिन्दी के प्रतिष्ठित कवियों और लेखकों को जानने और उनके साहित्य को पहचानने के अतिरिक्त लोगों को उनकी अपनी रचनात्मकता का एहसास दिलाना भी है।
भारत के राजदूतावास और सूरीनाम हिन्दी परिषद ने 14 मार्च 2011 को कथा-कहानी शृंखला में दूसरी कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें लगभग पचास प्रतिभागियों ने भाग लिया। इस कार्यशाला में स्थानीय हिन्दी अध्यापकों और छात्रों ने काफी उत्साह के साथ भाग लिया। हिन्दी और सांस्कृतिक अधिकारी श्रीमती सक्सेना कहानी लेखन की बुनियादी विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि एक श्रेष्ठ लघुकथा में कुछ आवश्यक तत्वों की आवश्यकता होती है जैसे वह आकार में बड़ी न हो, कम पात्र हों, समय के एक ही कालखंड को समाहित किए हो, अनावश्यक डिटेल्स न हों, शीर्षक रचना को पुष्ट और पुख्ता करता हो, उसकी गति अपने प्रारंभ-बिन्दु से अन्तिम बिन्दु(चरम बिन्दु) की ओर हो, विषय को लेकर किसी प्रकार का उलझाव न हों, और अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच कर अपनी मारक और असरदार शक्ति का प्रदर्शन करे।उपस्थित प्रतिभागियों को चार चित्रों को दिए गए थे और तीस मिनट के जो कुछ बहुत ही उपयोगी परिणाम सामने आए थे।

दिनकर की याद में एक विशेष शाम


पारामारिबो स्थित भारत के राजदूतावास ने 27 अप्रैल 2011 को एक विशेष शाम "दिनकर की याद में " का आयोजन किया जिसमें स्वतंत्रता पूर्व के विद्रोही कवि और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रकवि के नाम से पहचाने जाने वाले श्री रामधारी सिंह दिनकर के जीवन व साहित्य में उनके स्थान का उल्लेख किया गया। रामधारी सिंह दिनकर की ही कविताओं और काव्यांशों में पिरोते हुए संचालिका श्रीमती भावना सक्सेना ने श्रोताओं को दिनकर के काव्य के विभिन्न पक्षों से परिचित कराया. भारत के राजदूत श्री कंवलजीत सिंह सोढ़ी ने कहा कि दिनकर की कविताओं का प्रमुख उद्देश्य सामान्य जन में नवीन चेतना उत्पन्न करना रहा है, उनकी कविताएँ ऐसी हैं जो सोते हुए व्यक्ति में भी ऊर्जा संचारित कर देती हैं।

स्थानीय छात्रों ने अत्यंत उत्साह के साथ दिनकर के जीवन पर चर्चा की और उनकी कुछ कविताओं का वाचन किया। कुछ छात्रों ने स्थानीय प्रतिष्ठित कवियों श्री अमर सिंह रमण व बाबू चन्द्रमोहन रणजीत सिंह की कविताओं का भी वाचन किया।

इसके अतिरिक्त इस शाम चार छात्रों श्री गणेश अमित आजोध्या, श्री त्रिबेनी प्रसाद रामयाद, श्री धीरज कंधई, डॉ॰कार्मेन जगलाल को उनके राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा, भारत की राष्ट्रभाषा रत्न परीक्षा के प्रमाणपत्र दिये गए। ये प्रमाणपत्र वर्ष २००७ में उत्तीर्ण परीक्षा के लिए थे,वर्ष २००७ में सूरीनाम के पांच छात्रों ने राष्ट्रभाषा रत्न परीक्षा दी थी, उल्लेखनीय है कि यह पाँचों लोग अलग अलग कार्यक्षेत्र से हैं, सुश्री जगलाल एक चिकित्सक हैं तो श्री अजोध्या रसायनशास्त्र का अध्ययन कर रहे हैं और श्री रामयाद भूगोल के अध्यापक हैं, श्री धीरज कंधई भी अध्यापक हैं और हिंदी शिक्षण भी करते हैं। पांचवे छात्र श्री अंगद भवन कुछ समय से हौलैंड में कार्य कर रहे हैं। सभी सीमाओं का सामना करते हुए यह उपलब्धि प्राप्त करना निस्संदेह रूप से सराहनीय है।

इस अवसर पर स्थानीय गण्यमान्य व्यक्तियों के साथ साथ, शिक्षा विभाग के प्रतिनिधि श्री योहन रूजर और सूरीनाम हिंदी परिषद के अध्यक्ष श्री भोलानाथ नाराइन भी उपस्थित थे। श्री भोलानाथ नाराइन ने राजदूतावास द्वारा आयोजित ऐसे कार्यक्रमों की सराहना की और दूतावास से प्राप्त सहयोग के लिए भूरी भूरी धन्यवाद प्रकट किया ।

भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी पत्रकारिता कोश का विमोचन संपन्न

मुंबई : आज के समय में सभी पत्रकारों - रचनाकारों के एक मंच पर आने में ही पत्रकारिता का भला होगा और वैचारिक प्रतिबद्धता से पत्रकारिता समृद्ध होती है। यह उद्गार दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल ने व्यक्त किए। वह शनिवार की शाम विलेपार्ले पश्चिम स्थित शुभम हॉल में हमलोग संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम एक शाम साहित्य, संगीत व पत्रकारिता के नाम में भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी पत्रकारिता कोश के 11वें अंक के विमोचन में समारोह अध्यक्ष के रूप में बोल रहे थे। श्री शुक्ल ने आगे कहा कि समय के तमाम झंझावातों के बावजूद पत्रकारिता अपने उत्तरदायित्वों से भटकी नहीं है और यह समाज में हो रहे सभी प्रकार के बदलावों की साक्षी भी है।

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष व विधायक कृपाशंकर सिंह ने समस्त पत्रकारों से जागरूक रहने की अपील करते हुए कहा कि जागरूकता व सावधानी से हमें सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिलती है। मुंबई मित्र/वृत्त मित्र के समूह संपादक अभिजीत राणे ने इस मौके पर कहा कि पत्रकारिता कोश रचनात्मक सूचनाओं का अनुपम भंडार है। इससे मीडिया कर्मियों को काफी मदद मिलती है। लाइव इंडिया के महाराष्ट्र ब्यूरो चीफ रवि तिवारी ने कहा कि पत्रकारिता कोश न सिर्फ देश के साहित्यकारों व मीडिया कर्मियों के लिए उपयोगी है बल्कि समाज के प्रबुद्ध लोगों के लिए भी अति महत्वपूर्ण है।

मी मराठी चैनल के कार्यकारी संपादक सचिन परब ने पत्रकारिता कोश को प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तथा साहित्यिक समुदाय को जोड़ने वाले पुल की संज्ञा दी जबकि राष्ट्रीय औद्योगिक इंजीनियरी संस्थान (नीटी) के राजभाषा अधिकारी सुरेशचंद्र जैन ने पत्रकारिता कोश को सामाजिक महाकोश बताया। टीवी 9 के न्यूज को-ऑर्डिनेटर तुलसीदास भोईटे ने कहा कि भाषा को बेहतर संवाद व सद्भावना का माध्यम बनाया जाना चाहिए। पत्रकारिता कोश के संपादक आफताब आलम ने कहा कि पिछले एक दशक में पत्रकारिता का विस्तार बड़ी तेजी से हुआ है और इसमें नित नए परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में देश के समस्त मीडियाकर्मियों को एक सूत्र में पिरोने के साथ-साथ सूचनाएं देने का काम पत्रकारिता कोश के माध्यम से पिछले एक दशक से किया जा रहा है।

सभी मंचस्थ अतिथियों द्वारा मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्जवलन व गीतकार हरिश्चंद्र की सरस्वती वंदना से प्रारंभ हुए इस कार्यक्रम में हमलोग के अध्यक्ष एड. विजय सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया तथा हमलोग द्वारा साहित्यिक गतिविधियों के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराई। सुप्रसिद्ध गायक-संगीतकार सुरेश शुक्ला ने कुमार जैन के संचालन में हमलोग की मासिक-साहित्यिक गोष्ठी की चयनित रचनाओं की संगीतमय प्रस्तुति की। कार्यक्रम में इकबाल मोम राजस्थानी, मुरलीधर पांडेय, त्रिलोचन सिंह अरोरा, शकुंतला शर्मा, डॉ. रोहिदास वाघमारे, डॉ. इंद्रकुमार शर्मा, मरियम गजाला, आदि रचनापाठ किया। इस अवसर पर पत्रकारिता व साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए मी मराठी चैनल के कार्यकारी संपादक सचिन परब, टीवी 9 के न्यूज को-ऑर्डिनेटर तुलसीदास भोईटे, व्यंग्यकार-संचालक अनंत श्रीमाली व दैनिक सामना के भालचंद्र मेहेर को हमलोग गौरव सम्मान-2011 से सम्मानित किया गया।

समारोह में हमलोग साहित्यिक गोष्ठी की संयोजिका लक्ष्मी यादव का पत्रकारिता कोश परिवार की ओर से शॉल, श्रीफल देकर सम्मान किया गया। इसके साथ ही, मुंबई महानगर में साहित्य व पत्रकारिता में सक्रिय योगदान के लिए नवभारत टाइम्स के पत्रकार आनंद मिश्र, कवयित्री-गीतकार माया गोविंद, मीडिया समाचार के संपादक पवन दुबे, अनुपम मेल के संपादक दिनेश बैसवारी, मरूधर तहलका के पत्रकार रवि यादव, रचनाकार सलाम शेख, डॉ. कृष्णा खत्री, डॉ. रीता कमल गौतम, विकलांग की पुकार के कार्यकारी संपादक सरताज मेहदी, निडर राही के संपादक पप्पू वर्मा, सेंट्रल बैंक के राजभाषा अधिकारी डॉ. इंद्र कुमार शर्मा, यूको बैंक के राजभाषा अधिकारी सुनील कुमार, बाबाजी राणे, एड. मुरली पनीकर, आदि का पुष्पगुच्छ देकर सम्मान किया गया।

कार्यक्रम का संचालन संजीव निगम ने किया तथा आभार प्रदर्शन पत्रकारिता कोश के सहायक संपादक राजेश विक्रांत ने किया।

प्रो. दिलीप सिंह कृत ''अनुवाद की व्यापक संकल्पना'' लोकार्पित

चित्र- प्रो.दिलीप सिंह की पुस्तक 'अनुवाद की व्यापक संकल्पना ' के लोकार्पण के अवसर पर बाएँ से, डॉ. राधेश्याम शुक्ल, डॉ. सच्चिदानंद चतुर्वेदी, डॉ. दिलीप सिंह, डॉ. त्रिभुवन राय, डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी और डॉ. विष्णु भगवान शर्मा।


हैदराबाद| यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा 30 अप्रैल 2011 को आयोजित एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अवसर पर प्रमुख हिंदी भाषा चिंतक प्रो. दिलीप सिंह की वाणी प्रकाशन द्वारा सद्यःप्रकाशित पुस्तक ''अनुवाद की व्यापक संकल्पना'' को हिंदी दैनिक 'स्वतंत्र वार्त्ता' के संपादक डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने लोकार्पित किया।

लोकार्पित कृति का परिचय देते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने बताया कि लेखक ने भूमंडलीकृत दुनिया में अनुवाद की नई भूमिका पर समसामयिक सन्दर्भों में सार्थक चर्चा की है और साथ ही अनुवाद समीक्षा के नए प्रारूप खास तौर से भारतीय भाषाओँ के परिप्रेक्ष्य में सुझाए हैं। उन्होंने किताब को अनुवाद शास्त्र के अध्येताओं, विद्वानों और अनुवादकों के लिए समान रूप से उपयोगी माना।

लोकार्पण करते हुए डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने भारतीय बहुभाषिक स्थिति में अनुवाद के महत्त्व और स्वरुप की चर्चा करते हुए अनुवाद को विश्वविद्यालयीय स्तर पर भाषाविज्ञान के साथ साथ साहित्य विभागों का भी अनिवार्य हिस्सा बनाने की माँग की और कहा कि भारतीय साहित्य की सभी क्लासिक रचनाओं का अनुवाद परस्पर सभी भारतीय भाषाओँ में उपलब्ध कराने के लिए हिंदी का मध्यस्थ भाषा के रूप में व्यवहार किया जाना चाहिए। अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के आचार्य प्रो. जे.पी. डिमरी ने लेखक डॉ. दिलीप सिंह को बधाई देते हुए कहा कि हिंदी में अनुवाद चिंतन और समाजभाषाविज्ञान के क्षेत्र में उनकी सेवाएँ अभिनंदनीय हैं।

प्रो. दिलीप सिंह ने अपने संबोधन में बताया कि उन्हें अनुवाद विषयक अध्ययन-अध्यापन तथा चिंतन-मनन के दौरान जिन विषयों ने उद्वेलित किया, यह पुस्तक उन सबका समाधान खोजने का विनम्र प्रयास तो है ही, देश-विदेश के तमाम अनुवाद चिंतन को सार रूप में प्रस्तुत करने के अभियान का हिस्सा भी है। उन्होंने लोकार्पणकर्ता और वक्ताओं के प्रति आभार प्रदर्शित किया।

खामोश मुहूर्त में का लोकार्पण

समकालीन मलयालम कवियों में चर्चित कवि ए. अयप्पन की चुनिंदा कविताओं का संतोष अलेक्स द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद खामोश मुहूर्त में का लोकार्पण मद्रास विश्विदयालय के मलयालम विभाग में अंग्रेज़ी लेखक श्रीकुमार वर्मा द्वारा किया गया। वर्मा जी ने अनुवाद की अनिवार्यता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अनुवादक साहित्यिक सीमाओं पर सेतु बनाने का काम करते हैं, किताब के प्रकाशन पर उन्होंने संतोष अलेक्स को बधाई दी। कार्यक्रम की अध्यक्षता विभागाध्यक्ष डॉ राजेंद्र बाबू जी ने की। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ चिट्टी अन्नपूर्ण जी एवं कवि वासुदेवन पनंपल्लि ने किताब की समीक्षा की। कार्यक्रम में मात्रभूमि दैनिक के व्यूरो चीफ श्री के ए जोनी जी  और मलयालम मनोरामा के पत्रकार श्री विनोद गोपी ने बधाई वक्तव्य दिए। मलयालम कवि एवं अनुवादक संतोष अलेक्स ने कविताओं के अनुवाद के दोरान हुए अनुभव को श्रोताओं के साथ बाँटा। किताब का प्रकाशन दिल्ली के युक्ति प्रकाशन, ए 2, न्यू इंडिया अपार्टमेंट, प्लाट सं 6 , सेक्टर 9, रोहिणी, दिल्ली, 110 085 से हुआ है।

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में अज्ञेय जन्मशती समारोह संपन्न

चित्र में- दभाहिप्र सभा में संपन्न ''अज्ञेय जन्म शती समारोह'' के उदघाटन सत्र में मंचासीन प्रो. दिलीप सिंह, प्रो.त्रिभुवन राय, प्रो.सच्चिदानंद चतुर्वेदी, प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी, डॉ.राधेश्याम शुक्ल और एस.के हलेमनी।
हैदराबाद, १ मई २०११, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के 'साहित्य संस्कृति मंच' और स्टेट बैंक ऑफ़ हैदराबाद के संयुक्त तत्वावधान में शनिवार को अज्ञेय जन्म शती समारोह के अंतर्गत एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।


समारोह के उद्घाटन सत्र में मुम्बई से मुख्य अतिथि के रूप मे आए प्रो त्रिभुवन राय ने उद्घाटन भाषण में 'अज्ञेय की रस-चेतना' की व्याख्या करते हुए कहा कि अज्ञेय की साहित्य यात्रा सत्य की यात्रा है और वे मूलत आनंद की राह के अन्वेषी हैं। हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रो. सच्चिदानंद चतुर्वेदी ने बीज भाषण में याद दिलाया कि अज्ञेय ने अपने लेखन में जिन भी सिद्धांतों की स्थापना की, उन्हें अपनी रचनाओं द्वारा चरितार्थ करके भी दिखाया। डॉ. चतुर्वेदी ने प्रतिपादित किया कि अज्ञेय व्यंजन प्रधान साहित्य के समथक और सर्जक थे तथा मौन को शब्द से अधिक महत्त्व देते थे। विशेष अतिथि डॉ. विष्णु भगवान् शर्मा ने अज्ञेय के भाषा संबंधी विचारों की राजभाषा नीति के सन्दर्भ में चर्चा करते हुए उनके साहित्य के प्रयोजनमूलक हिंदी के निर्माण में योगदान की दृष्टि से भी पुनर्विचार की ज़रुरत बताई।

उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष के रूप में संबोधित करते हुए संस्थान के कुल सचिव प्रो. दिलीप सिंह ने कवि और कविता पर केन्द्रित अज्ञेय की कविताओं का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि वे शब्द से लेकर मौन तक के सजग प्रयोग से सम्प्रेषण की सिद्धि प्राप्त करने वाले अपनी तरह के इकलौते कवि हैं।

इस अवसर पर 'लोकार्पण अनुष्ठान' के अंतर्गत प्रो. दिलीप सिंह की वाणी प्रकाशन से सद्यः प्रकाशित पुस्तक ''अनुवाद की व्यापक संकल्पना'' का डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने विमोचन किया। इसके अतिरिक्त डॉ. एम. रंगय्या के कविता संग्रह ''स्मृति के फूल'' को प्रो. दिलीप सिंह तथा डॉ. रुक्माजी राव अमर के कविता संग्रह ''दुःख में रहता हूँ मैं सुख की तरह'' को डॉ. त्रिभुवन राय ने लोकार्पित किया। डॉ. जी नीरजा द्वारा संपादित 'स्रवंति' के ''शमशेर बहादुर सिंह विशेषांक'' का लोकार्पण प्रो. सच्चिदानंद चतुर्वेदी के हाथों संपन्न हुआ।

इसके पश्चात् दो विचार सत्रों में अज्ञेय के साहित्य के विविध पहलुओं को उजागर करते हुए ग्यारह शोध पात्र प्रस्तुत किए गए जिनमे मुख्य रूप से इस बात पर जोर दिया गया कि अज्ञेय के साहित्य का मूल्यांकन उनकी अपनी रस चेतना, शब्द चेतना और काल चेतना के सन्दर्भ में किया जाना चाहिए तथा उन्हें वादों और विचारधाराओं के चश्मों से देखना साहित्यिक अन्याय होगा जो बिलकुल भी वांछनीय नहीं है।

पहले विचार सत्र में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने ''क्रांतद्रष्टा साहित्यकार अज्ञेय'', डॉ. मृत्युंजय सिंह ने ''समकालीनों के संस्मरणों में अज्ञेय'', डॉ.जी. नीरजा के ''अज्ञेय के भाषा चिंतन के आलोक में उनकी काव्यभाषा'', डॉ.साहिर बानू बी. बोरगल ने ''साहित्य शास्त्री अज्ञेय : भूमिकाओं के विशेष सन्दर्भ में'' तथा प्रो. आलोक पाण्डेय ने ''हिंदी पत्र करीता की अज्ञेय को देन'' पर केन्द्रित शोधपत्र पढ़े ।अध्यक्शासन से बोलते हुए उस्मानिया विश्वविद्यालय में पूर्व आचार्य डॉ. मोहन सिंह ने क्रांतिकारी के रूप में अज्ञेय के सक्रिय जीवन और उनके कथा साहित्य के सम्बन्ध पर प्रकाश डाला।

दूसरे विचार सत्र में संस्कृति चेतना के दृष्टिकोण से प्रो.एम. वेंकटेश्वर ने ''शेखर : एक जीवनी का पुनर्पाठ'' , डॉ. बलविंदर कौर ने ''अज्ञेय के उपन्यासों में अस्मिता, जिजीविषा और मृत्युबोध'', डॉ. गोपाल शर्मा ने ''भाषा चिन्तक अज्ञेय : डायरी का सन्दर्भ'', डॉ. गोरखनाथ तिवारी ने ''अज्ञेय की कहानियाँ : संवेदना और शिल्प'', डॉ. पी. श्रीनिवास राव ने ''ललित गद्यकार अज्ञेय'' तथा डॉ.घनश्याम ने ''यात्रा साहित्य और अज्ञेय'' विषयक शोधपत्र प्रस्तुत किए। चन्दन कुमारी ने अज्ञेय के साहित्य को समझने की समस्या, एम राजकमला ने हैदराबाद के हिंदी विभागों में संपन्न अज्ञेय संबंधी शोध कार्य तथा मौ. कुतुबुद्दीन ने विविध पाठ्यक्रमों में अज्ञेय के स्थान पर सर्वेक्षणमूलक आलेख प्रस्तुत किए।

इस सत्र की अध्यक्षता 'स्वतंत्र वार्त्ता'' के सम्पादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने की । अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने कहा कि अज्ञेय पूर्ण समर्पण की संस्कृति में विश्वास रखने वाले रचनाकार थे तथा उनका काव्य व्यक्तित्व इतना विराट है कि उसे चाहे जितना समेटो कुछ न कुछ छूट ही जाता है। समापन सत्र में समाकलन भाषण में अंग्रेज़ी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी ने संगोष्ठी की सफलता के लिए बधाई देते हुए यह कहा कि अज्ञेय के साहित्य का पुनर्मूल्यांकन यदि भारतीय कसौटी पर किया जाए तो बहुत सटीक निष्कर्ष सामने आ सकते हैं। समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए अंग्रेज़ी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के ही हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो.एम. वेंकटेश्वर ने इस संगोष्ठी को सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की जन्मशती के अवसर पर उनके पुनर्मूल्यांकन की सार्थक पहल मानते हुए कहा कि रचनाकार की मूलभूत मान्यताओं के प्रकाश में रचनाओं का यह मूल्यांकन कृति और कृतिकार दोनों को ही बेहतर रूप में समझने में अत्यंत सहायक होगा।

समारोह के आरंभ में कोसनम नागेश्वर राव ने सरस्वती वन्दना की तथा अतिथियों ने मंगल-दीप प्रज्वलित किया। इस अवसर पर अज्ञेय के जीवन, रचनायात्रा , मान्यताओं और रचनाओं पर आधारित प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया गया। समारोह के विभिन्न सत्रों का संयोजन डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. बी. बालाजी, मंजु शर्मा तथा डॉ.मृत्युंजय सिंह ने किया। अतिथियों का स्वागत आंध्र सभा के सचिव डॉ. पी. ए. राधाकृष्णन,संपर्क अधिकारी एस के हलेमनी, डॉ. सीता नायुडू और ज्योत्स्ना कुमारी ने किया। प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने धन्यवाद प्रकट किया।