रविवार, 28 नवंबर 2010

गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह का विमोचन


व्यंग्य लेखन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है और युवा व्यंग्यकार गुरमीत बेदी ने सरकारी नौकरी की लक्ष्मण-रेखाओं, विवशताओं व सीमाओं के बावजूद अपने धारदार व्यंग्य लेखन से जिस तरह सामाजिक विद्रुपताओं व भ्रष्टाचार पर तीखे प्रहार करने का हौसला दिखाया है, वह अनुकरणीय है। यह उद्गार योग गुरू बाबा रामदेव ने आज यहाँ गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह ‘नाक का सवाल’ के कुछ अंश उदृत करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज का आईना व धड़कन होता है और व्यंग्य लेखन साहित्य की एक ऐसी कठिन व महत्वपूर्ण विधा है जो विसंगतियों स टकरा कर समाज का पथ प्रदर्शन करती है। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि गुरमीत बेदी के व्यंग्य लेख राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए हैं और इन व्यंग्य लेखों में व्यंग्यकार ने भ्रष्ट तंत्र, सामाजिक बुराइयों और मूल्यों के हनन पर चुटीले और अर्थ पूर्ण अंदाज़ में तंज कसकर व्यवस्था को झकझोरने की हिम्मत दिखाई है। योग गुरू बाबा रामदेव ने आशा व्यक्त की कि गुरमीत बेदी भविष्य में भी किसी दबाव में आए बिना अपने सकारात्मक लेखन से व्यवस्थागत खामियों व भ्रष्टाचार पर चोट करके अपने लेखकीय धर्म का पालन करते रहेंगे। इस अवसर पर गुरमीत बेदी ने बाबा रामदेव का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनके इन आशीर्वचनों से उन्हें नई ऊर्जा मिली है। उन्होंने योग गुरू को बताया कि उनका तीसरा व्यंग्य संग्रह ‘खबरदार जो व्यंग्य लिखा’ शीर्षक से दिल्ली के एक प्रतिष्ठित प्रकाशन से शीघ्र ही प्रकाशित होकर आ रहा है और इस व्यंग्य संग्रह में उन्होंने देश के राष्ट्रीय समाचार पत्रों के संपादकीय पृष्टों पर छपे अपने व्यंग्य लेखकों को संकलित किया है।

उल्लेखनीय है कि ऊना में जिला लोक संपर्क अधिकारी के पद पर कार्यरत गुरमीत बेदी ने दो व्यंग्य संग्रहों सहित साहित्य की विभिन्न विधाओं में आधा दर्जन पुस्तकें व तीन उपन्यास लिखे हैं और उन्हें हिमाचल साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित देश-विदेश के कई साहित्यिक पुरस्कार मिले हैं। गुरमीत बेदी के व्यंग्य संग्रह ‘नाक का सवाल’ को गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों की लाईब्ररियों के लिए भी स्वीकृत किया गया है और इसी व्यंग्य संग्रह पर कनाडा की ‘विरसा’ संस्था भी उन्हें पुरस्कृत करने का ऐलान कर चुकी है। गुरमीत बेदी ने बाबा रामदेव को उनके ऊना प्रवास के दौरान ‘नाक का सवाल’ की प्रति भेंट की थी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में मीडिया कर्मी व गणमान्य लोग उपस्थित थे।

वरिष्ठ कथाकार तथा कलासमीक्षक मनमोहन सरल को प्रेमचन्द पुरस्कार तथा अमृत सम्मान


महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने एक भव्य समारोह में वर्ष २००८-०९ के साहित्य पुरस्कार प्रदान किए जिसके अंतर्गत कथा साहित्य में मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार वरिष्ठ कथाकार एवं कला-समीक्षक मनमोहन सरल को प्रदान किया गया और उन्हें श्रीफल, स्मुतिचिह्न, पुष्पगुच्छ तथा २५००० रुपए की नगद राशि प्रदान करके शाल उढा कर सम्मानित किया गया। यह विशेष अलंकरण समारोह महाराष्ट्र राज्य की स्वर्ण जयंती के अवसर पर महाराष्ट्र के विशिष्ट शासकीय अतिथिगृह सह्याद्रि में संपन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता राज्य के माननीय मुख्यमंत्री के व्यस्त होने के कारण सांस्कृतिक विभाग के सचिव ने की और मंच पर अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष श्री नंदकिशोर नौटियाल तथा गुजराती साहित्य अकादमी के अध्यक्ष उपस्थित थे। इस अवसर पर अखिल भारतीय हिंदी सेवा पुरस्कार एवं राज्य स्तर के हिंदी सेवा पुरस्कार भी प्रदान किए गए। विधा पुरस्कारों में कथा साहित्य के अतिरिक्त काव्य, नाटक रिपोर्ताज तथा अनुवाद पर भी पुरस्कार दिए गए। अकादमी गत १५ वर्षों से हिंदी साहित्यकारों को प्रतिवर्ष पुरस्कार देकर सम्मानित करती है। कविता के लिए ह्रदयेश मयंक, नाटक के लिए आशकरण अटल, लोक साहित्य के लिए डॉ. मालती शर्मा, रिपोर्ताज के लिए विमल मिश्र, बाल साहित्य के लिए बानो सरताज और अनुवाद के लिए मुरलीधर बंसीलाल शाह आदि को भी पुरस्कृत किया गया।

कला को समर्पित मुंबई की नॉन प्रोफिट ऑर्गनाइजेशन ग्लोबल आर्ट फाउंडशन ने पिछले चार दशक से कला के विकास और उसे जनमानस तक पहुँचाने के महत कार्य में रत प्रसिद्ध कला समीक्षक, पत्रकार और कथाकार श्री मनमोहन सरल के सम्मान में उनके ७५ वर्ष परिपूर्ण होने पर रवींद्र नाट्य मंदिर की पु.ल. देशपांडे आर्ट गैलरी में एक भव्य समारोह का आयोजन किया जिसके साथ ही ३५ कलाकारों के काम की प्रदर्शनी का उद्घाटन भी संपन्न हुआ। आयोजन में पूर्व शेरिफ एवं फिल्मकार श्री किरण शांताराम ने श्री सरल को शाल उढा कर सम्मानित किया। सामाजिक कार्यकर्ती एवं उद्योगपति श्रीमती निशा सुमन जैन समारोह की विशिष्ट अतिथि थीं। फाउंडेशन के सक्रिय सदस्य गीतकार-चित्रकार किरण मिश्र ने श्री सरल की कला-विषयक सेवाओं का परिचय दिया जबकि फाउंडेशन के प्रेसिडेंट चित्रकार नरेंद्र बोरलेपवार ने ग्लोबल आर्ट फाउंडेशन के बारे में बताया। चित्रकार रामजी शर्मा, पृथ्वी सोनी, घनश्याम गुप्ता और किशन अग्रवाल ने भी श्री सरल के योगदान की चर्चा की कि किस प्रकार उन्होंने सदैव नए और प्रतिभावान युवा चित्रकारों को प्रोत्साहित किया।

श्री सरल ने ग्लोबल फाउंडशन के इस आयोजन का आभार मानते हुए कला-प्रदर्शनी के थीम पर चर्चा की कि ‘लव एंड पीस’ की परिकल्पना आज के इस माहौल की ज़रूरत है। किंतु दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। बिना प्रेम के शांति नहीं हो सकती और शांति होने पर ही परस्पर प्रेम पलता है। उन्होंने कला क्षेत्र के कुछ निजी संस्मरण भी सुनाए। अंत में किशन अग्रवाल ने आभार प्रदर्शन किया।

मुंबई और महाराष्ट्र के ही नहीं, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, मध्य प्रदेश और दक्षिण भारत के भी कई चित्रकार और मूर्तिकारों के काम से समृद्ध इस प्रदर्शनी में पश कई चित्रों और मूर्तियों को श्री किरण शांताराम और श्रीमती निशा जैन ने बहुत पसंद किया। इसमें पैरिस से आई चित्रकार जोसेफिन द सेंट सीन के कई चित्र भी शामिल हुए। मुंबई के पृथ्वी सोनी, अनन्या बनर्जी, पं. किरण मिश्र, सत्यजित शेरगिल, रामजी शर्मा आदि के अलावा बाहर से भी कई कलाकार इस आयोजन के लिए विशेषतः आए।

पं. किरण मिश्र

दक्षिण में हिंदी की स्थिति, गति एवं प्रगति पर परिसंवाद

नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, कोयंबत्तूर एवं डॉ. जी.आर.दामोदरन विज्ञान महाविद्यलय, कोयंबत्तूर के संयुक्त तत्वावधान में कोयंबत्तूर में ४ अक्तूबर, २०१० को राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का उद्घाटन नराकास, कोयंबत्तूर के अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त श्री एम.पी. वर्गीस ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। उद्घाटन सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में वर्गीस जी ने कहा कि राष्ट्रीय एकता की संकल्पना को साकार बनाने के लिए जहाँ एक संपर्क भाषा की जरूरत है, वहीं भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए भारतीय भाषाओं का विकास जरूरी है। भारतीय संविधान इस संकल्पना के लिए प्रतिबद्ध है।

समिति के सदस्य-सचिव एवं संगोष्ठी के संयोजक डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि दक्षिण के आंध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल एवं पांडिच्चेरी प्रदेशों में शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक, आर्थिक, व्यावसायिक, वाणिज्यिक, औद्योगिक, प्रशासनिक क्षेत्रों के अलावा मीडिया एवं फिल्मी क्षेत्रों में भी आज हिंदी का विस्तृत प्रचार-प्रसार के आलोक में समग्र स्थिति का जायज़ा लेने के लिए आज इस एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी की महासचिव डॉ. मधुधवन ने नई पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें आगे बढ़कर हिंदी प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालना चाहिए। वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. पी.के. बालसुब्रमणियन जी ने तमिल साहित्य को हिंदी में अनुवादित करने के लिए नई पीढ़ी को प्रेरित किया और जानकारी दी कि इसके लिए तमिलनाडु सरकार आर्थिक मदद देती है। उद्घाटन सत्र में श्रीमती उषा वर्गीस, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए. पोन्नुसामी ने भी अपने विचार प्रकट किए और बच्चों को हिंदी अवश्य पढ़ाने का आग्रह किया। दक्षिण भारत में शिक्षा, साहित्य, संस्कृति एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी पर केंद्रित प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. पी.के. बालसुब्रमण्यन ने किया। विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. ना. गोपालकृष्णन, निदेशक, केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, श्री ईश्वर चंद्र झा, मंडल प्रबंधक, दि न्यू इंडिया एश्योरेंस कं.लि., उपस्थित थे। इस सत्र में बीज वक्तव्य देते हुए श्री सुदर्शन मलिक विश्व के एक बड़े जनतंत्रात्मक राष्ट्र की प्रचलित हिंदी को आज विश्व की भाषा का स्तर दिलाना आवश्यक है, इसके लिए हर ढंग से हमें पहल की जानी चाहिए। इस सत्र का संचालन डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने किया।

दूसरे सत्र का दक्षिण भारत में प्रशासनिक, व्यावसायिक एवं औद्योगिक क्षेत्रों में हिंदी की प्रगति पर केंद्रत रहा। इस सत्र में डॉ. एस. बशीर, डॉ. वासुदेवन शेष विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे। डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि दक्षिण भारत में हिंदी की प्रगति का कोई ऐसा आयाम नहीं है, जिस ओर हिंदीतर भाषियों का ध्यान नहीं गया हो। दक्षिण में हिंदी में पत्रकारिता आज विकसित स्थिति में है और आज दक्षिण में कई हिंदी ब्लागर हैं जो हिंदी को दुनिया की भाषा बनाने की पहल कर रहे हैं। इस सत्र का संचालन श्री डी. राम मोहन रेड्डी, शाखा प्रबंधक, न्यू इंडिया एश्योरेंस ने किया।
दोनों सत्रों में लगभग चालीस विद्वानों ने अपने शोध-पूर्ण आलेख प्रस्तुत किए। अंत में काव्य गोष्ठी में वरिष्ठ कवियों ने अपनी कविताओं तथा गीतों से श्रोताओं का मन बहलाया। अंत में सभी विद्वानों का सम्मान, श्रीमती सी.आर. राजश्री, भाषा विभागाध्यक्ष, डॉ. जी. आर. डी. विज्ञान महाविद्यालय के धन्यवाद ज्ञापन तथा राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी सुसंपन्न हुई।

हिन्दू सोसाईटी द्वारा मौरिसविल (नार्थ कैरोलाईना) के हिन्दू भवन के खुले मैदान में दशहरा


अक्तूबर १७, २०१० को हिंदी विकास मंडल एवं हिन्दू सोसाईटी (नार्थ कैरोलाईना) ने मौरिसविल (नार्थ कैरोलाईना) के हिन्दू भवन के खुले मैदान में दशहरा उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया। ३८ फुट का रावण (जिसका शरीर ३० फुट का, सिर ६ फुट का, मुकुट १.८ फुट का और कलगी ०.२ फुट की थी) सबके आकर्षण का केंद्र था। अमेरिका में यह सबसे बड़ा रावण था। इसका डिजाइन और ढांचा स्वयं-सेवकों की टीम (अशोक एवं मधुर माथुर, रमणीक कामो, अजय कौल, डॉ. ध्रुव कुमार, सतपाल राठी, डॉ. ओम ढींगरा, मदन एवं मीरा गोयल, ममता एवं प्रदीप बिसारिया, तुषार घोष, उत्तम डिडवानिया, लुईस और रमेश माथुर) ने तीन महीने की मेहनत और लगन से तैयार किया।

रावण दहन से पहले राम और रावण के द्वन्द्व युद्ध का मंचन किया गया। ध्वनी और प्रकाश के प्रयोग ने इसे बहुत प्रभावित बना दिया। राम जी की भूमिका (अतीश कटारिया), सीता जी (स्मिता कटारिया), लक्ष्मण (रमेश कलाज्ञानम), हनुमान (डॉ. ध्रुवकुमार), ब्राह्मण (रमेश माथुर ) और रावण (डॉ. अफ़रोज़ ताज) ने किया। रामलीला के इस अंश को लिखा और प्रस्तुत किया डॉ. सुधा ओम ढींगरा ने और निर्देशन दिया रंगमंच के प्रसिद्ध कलाकार और निर्देशक हरीश आम्बले ने। बिंदु सिंह और डॉ. सुधा ओम ढींगरा ने पात्रों का मेकअप कर उन्हें सजीव कर दिया। प्रकाश का सञ्चालन किया शिवा रघुनानन ने और ध्वनी का संयोजन किया जॉन कालवेल ने। राम और रावण को आवाज़ें दीं रवि देवराजन और डॉ. अफ़रोज़ ताज ने। राम जी की शांत और ठहराव वाली आवाज़, रावण की विद्रूप हँसी के मिश्रण पर बच्चों और बड़ों ने बहुत तालियाँ बजाईं।

राम-लक्ष्मण तथा हनुमान जी के तिलक से उत्सव का आरंभ हुआ। स्टेशन वैगन को सजा कर "इन्द्र वाहन" बनाया गया और उसकी छत पर बैठ कर पूरा काफिला रामलीला मैदान में पहुँचा। पीछे छोटे बच्चों की बानर सेना, हनुमान जी की तरह सजे- धजे "जय सिया राम" का उच्चारण करते चले। अमेरिका की धरती पर समय बँध गया। हज़ारों लोग राम जी की सवारी, रामलीला और रावण दहन में शामिल हुए। इस सारे कार्यक्रम को हिंदी विकास मंडल की अध्यक्ष श्रीमती सरोज शर्मा के मार्ग दर्शन में तैयार किया गया।

कोटा महिला साहित्य क्लब द्वारा हिन्दी दिवस समारोह आयोजित


कोटा महिला साहित्य क्लब के तत्वाधान में प्रेस क्लब सभागार में हिन्दी भाषा-विमर्श समारोह मनाया गया। समारोह की अध्यक्षता कथाकार एवं साहित्यकार डा.क्षमा चतुर्वेदी ने की। समारोह के मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि जयपुर से आए अखिल भारतीय साहित्य परिषद राजस्थान के प्रदेशाध्यक्ष डा. मथुरेश नन्दन कुलश्रेष्ठ थे। क्लब की सदस्या श्रीमती सावित्री व्यास द्वारा सरस्वती वन्दना के पश्चात अध्यक्षा डा. प्रेम जैन ने स्वागत वक्तव्य के साथ विषय का प्रवर्तन किया। उन्होंन कहा कि राष्ट्रभाषा हिन्दी इतनी व्यापक है कि उस पर विविध दृष्टिकोणों से विचार होना चाहिए। उन्होंने हिन्दी के आत्मसंघर्ष और वैभव के सन्दर्भों की भी चर्चा की।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि , मुख्य वक्ता और हिन्दी के विद्वान डा. मथुरेश नन्दन कुलश्रेष्ठ ने हिन्दी के अद्यतन रुप और नागरी लिपी पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के युग में कम्प्यूटर सम्बंधी हिन्दी की रुकावटों को दूर करने के प्रयास होने चाहिएँ। जिसमें पारिभाषिक शब्दावली के मूलभूत आधार को सही करने हेतु तकनीकी शब्दावली आयोग की सहायता प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने विश्व के हिन्दी परिदृश्य पर गर्व करते हुए कहा कि आज विश्व के १५० विश्वविद्यालयों में हिन्दी-शिक्षण चल रहा है, मारीशस, फिजी, अफ्रीका, सूरीनाम, उज्बेकिस्तान,आदि देशों में हिन्दी का प्रचलन है। उन्होंने कहा कि जन-जागरण व राजनीतिक इच्छा शक्ति द्वारा शीध्र ही हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का वैधानिक दर्जा प्राप्त होगा।

समारोह अध्यक्षा प्रख्यात कथाकार डा. क्षमा चतुर्वेदी ने कहा कि राष्ट्रभाषा की अंगुली पकड़ कर यदि छोटे छोटे देश शिखर पर हैं तो क्यों नहीं हम शिखरस्थ हो सकते। हमे हिन्दी प्रेम दर्शाते हुए उसके प्रति दायित्व निभाने होंगे । डा. गीता सक्सेना ने हिन्दी को संस्कार युक्त भाषा बताया जो शिक्षा ही नही संस्कार भी देती है। पत्रकार एवं साहित्यकार पुरुषोŸाम पंचोली ने बताया कि न केवल भारत के दक्षिणी प्रदेशों में अपितु विदेशों में भी हिन्दी के सुखद अनुभवों को उन्होंने महसूस किया है। श्री भगवती प्रसाद गौतम ने कहा कि हिन्दी से जुड़कर ही कोई भी हिन्दी भाषी श्रेष्ठ सृजन कर सकता है। उन्होंने कहा कि हम सपना अंग्रेजी में क्यों नहीं देखते,क्योंकि हिन्दी हमारी मात्र भाषा है और सपनों में संवाद मात्र भाषा में ही होता है। अ्रग्रेजी में सपना हम चाहकर भी नहीं देख सकते। डा. मनीषा शर्मा ने हिन्दी की चुनौतियां पर दृष्टिपात किया और हिन्दी को गरिमापूर्ण पद की अधिकारिणी बताया। उन्हांेनेे कहा कि आज के कम्प्यूटर युग में हिन्दी फोन्ट व की-बोर्ड पर हिन्दी शब्दावली की विविधता को एकात्म रुप देने का प्रयास करने से ही हम हिन्दी का समूचे विश्व में संचार कर सकते हैं। ऐसा नहीं हो पाने के बावजूद भी इंटरनेट पर आज भी हिन्दी भाषा अ्रग्रेजी को चुनौती दे रही है। साहित्यकार महेन्द्र नेह ने कहा कि हमें हिन्दी के श्रेष्ठ रुप को ग्रहण करना होगा। अंग्रेजी भाषा के साथ फूहड़ता,भद्देपन और नग्नता आती है, जबकि हिन्दी शिष्टता की पर्याय है।

अ.भा. साहित्य परिषद कोटा इकाई के अध्यक्ष श्री अरविन्द सोरल ने कहा कि हिन्दी भाषा बौनी नहीं है, अपितु इसका कद बहुत लम्बा है। उन्होंने कहा कि हिन्दी का विरोध दुराग्रहपूर्ण है। दोहाकार एवं आकाशवाणी के उद्धोषक श्री रामनारायण ‘हलधर’ ने कहा कि हिन्दी को जीवित रखने में आकाशवाणी के कार्यक्रमों का प्रारंम्भ से ही योगदान रहा है। उन्होंने हिन्दी के उच्चारण सम्बंधी मानकों की सूक्ष्मताएं बताईं। राजभाषा विभाग से जुड़े शिवनन्दन चतुर्वेदी ने कहा कि हिन्दी विरोधी मानसिकता हिन्दी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है। हमारी मानसिकता हिन्दीमयी होनी चाहिए। इस हेतु प्रयास आवश्यक है। अन्त में महिला साहित्य क्लब सचिव रचना गौड़ ‘भारती’ ने काव्यात्मक पंक्तियों द्वारा हिन्दी के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने विषय का समाहार करते हुए समस्त अतिथियों एवं हिन्दी-प्रेमियों का आभार जताया । उन्होंने कार्यक्रम का अन्त इन पंक्तियों से किया-

वो आदमी है, हुआ कीजे ,वो आदमी है, हुआ कीजे।
सिर्फ होने से कुछ नहीं होता,अपने होने का हक अदा कीजे।।
और
जब तक हौसला नहीं होगा,एक भी फैसला नहीं होगा।
सभी अपने भले की सोचेंगे, तो किसी का भला नहीं होगा।। कार्यक्रम का संचालन डा. श्रीमती वीणा छंगाणी ने किया।

रचना गौड़ ‘भारती’ के काव्य संग्रह ‘‘नई सुबह’’ कई समीक्षा

अखिल भारतीय साहित्य परिषद,राजस्थान एवं अमरनाथ कश्यप फाउंडेशन,बीकानेर के तत्वाधान में आयोजित अखिल भारतीय नारी साहित्यकार सम्मेलन होटल मरुधर हेरिटेज बीकानेर में सम्पन्न हुआ। इसमें केन्द्रीय विषय संस्कृति और जीवन मूल्य की केन्द्रीय धुरी, नारी पर चर्चा हुई । कार्यक्रम में अखिल भारतीय साहित्य परिषद,राजस्थान के नारी प्रकोष्ठ की प्रदेशाध्यक्ष कोटा की श्रीमती रचना गौड़ ‘भारती’के काव्य संग्रह नई सुबह पर समीक्षा कार्यक्रम में इ.के. के. शर्मा एवं प्रो. चक्र्रवर्ती श्रीमाली नें भारती की कविताओं को प्रकाश से पूर्ण, बहती नदी सा प्रवाह लिए,उत्प्रेरक,ऊर्जावान एवं प्रेरणादायक बताया । कार्यक्रम में नारी प्रकोष्ठ प्रदेशाध्यक्ष रचना गौड़ भारती ने पुस्तक पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए धन्यवाद प्रेषित किया ।

(रचना गौड़ ‘‘भारती’’), सचिव, कोटा महिला साहित्य क्लब

सृजन ने आयोजि‍त की पुस्तक वि‍मोचन व साहि‍त्यक चर्चा


वि‍शाखपट्टणम की प्रसि‍द्ध साहि‍त्यक संस्था‍ सृजन के तत्वातवधान में डाबा गार्डेन्स स्थित पवन एनक्ले व में ३१ अक्टूबर २०१० को पुस्तक वि‍मोचन और साहि‍त्य चर्चा का आयोजन कि‍या गया। सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और कार्यक्रम का संचालन सृजन के संयुक्त सचि‍व डॉ. अलेक्स ने कि‍या। स्वागत भाषण करते हुए सृजन के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव ने संस्था की गति‍वि‍धि‍यों का वि‍वरण प्रस्तुत कि‍या और कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि‍ नये कवि‍यों और रचनाकारों को प्रोत्साहि‍त करने के उद्देश्य से ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन सृजन कर रही है। इससे न केवल नई रचनाओं का जन्म होता है बल्किद हमारा हि‍न्दी साहि‍त्य भी नए सौंदर्य से अलंकृत होता है। सृजन के अध्यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने कहा कि‍ वि‍गत ८ वर्षों से साहि‍त्य सृजन करने वाले कवि‍यों और लेखकों को संबल प्रदान करने वाली संस्था सृजन सही मार्गदर्शन दे रही है। उन्होंने वि‍श्वास व्याक्त कि‍या कि‍ सभी रचनाकार ऐसी संस्था में आकर कार्यक्रमों को और अधि‍क स्तरीय बनाने में सहयोग करेंगे। इस अवसर पर श्रीमती पारनंदी नि‍र्मला रचि‍त दो अनूदि‍त पुस्तिकों तेलुगु की प्रति‍नि‍धि कहानि‍याँ भाग-१ और २ का वि‍मोचन कि‍या गया। वि‍मोचन कार्यक्रम में पुस्तकों और लेखि‍का का परि‍चय डॉ. टी. महादेव राव ने दि‍या जबकि‍ पुस्तकों का वि‍मोचन नीरव कुमार वर्मा ने कि‍या। अपने समीक्षा आलेख में श्री वर्मा ने पारनंदी नि‍र्मला की रचनाधर्मि‍ता और अनुवाद के प्रति‍ समर्पण की बात कहीं। उन्हों ने कहा कि‍ समसामयि‍क पुरानी तेलुगु कहानि‍यों का अनुवाद पढते समय नहीं लगता कि‍ ये आज के समय की नहीं हैं। उन्होंने राचकोंडा बहनों द्वारा अनूदि‍त कहानि‍यों में कई वि‍शेषताओं के होने की बात बतायी। पहली पुस्तहक केवल श्रीमती पारनंदी नि‍र्मला की अनूदि‍त कहानि‍यों की है जबकि‍ दूसरे भाग की सभी कहानि‍याँ राचकोंडा बहनों डॉ. राचकोंडा स्वतराज्य लक्ष्मीक, पारनंदी नि‍र्मला, मुनुकुटला पद्मा राव और गुंटूर रत्नलप्रभा द्वारा अनूदि‍त हैं। ये अनूदि‍त पुस्तकें मौलि‍क रचनाओं का आभास देती हैं। गौरतलब है कि‍ श्रीमती पारनंदी नि‍र्मला अब तक १२ लेखकों की २६ कहानि‍यों और ६५ पुस्त्कों का अनुवाद कर चुकी हैं। इसी तरह श्रीमती मुनुकुटला पद्मा राव १३ पुस्तकों, गुंटूर रजनी प्रभा ११ पुस्तकों और डॉ. राचकोंडा स्वलराज्यरलक्ष्मीप ने १० पुस्तुकों का अनुवाद कि‍या है।

साहि‍त्यर चर्चा में सबसे पहले श्रीमती सीमा वर्मा ने प्रदूषण के वि‍रोध में आवाज उठाते पीपल के वृक्ष को बिं‍ब बनाकर अपनी कवि‍ता पीपल का पेड़ सुनाई। श्रीमती सीमा शेखर ने पुरानी पीढी की स्मृतति‍यों और उनकी प्रगाढ संबंधों की कवि‍ता दादी माँ प्रस्तुजत कि‍या। साथ चलने की ओर वि‍श्व शांति‍ के वि‍चार लि‍ये डॉ. एम. वि‍जय गोपाल ने अपनी कवि‍ता आते हो क्या पढी। जी. अप्पाराव राज ने व्यं‍ग्य कवि‍ता सुनाई। ईश्वर वर्मा ने वेमना के तेलुगु पद्यों का और हाडकु कवि‍ताओं का अनुवाद पेश कि‍या। टी. चंद्रशेखर राव ने प्रदूषण पर क्षणि‍का आज के परि‍वेश में कवि‍ता सदाबहार बारि‍श और एक प्रयोगवादी गजल प्रस्तुत की। एसवीआर नायडु ने व्यं‍ग्यक सुनाये। डॉ. टी. महादेव राव ने पौराणि‍क प्रतीकों के माध्यम से दो लघुकथाएँ रहस्य और लेकतंत्र पढ़ीं, जि‍नमें आज की राजनीति‍ की सड़ी गली हालत बतायी गई। डॉ. सन्तोष अलेक्स ने प्रवासी कवि‍ता "आज के कांक्रीट जंगल में" पढ़ी और मानवता पर अपनी रचना पर चर्चा की। इस कार्यक्रम में ल. अशोक, प्रो. पारनंदी वेंकट रमणमूर्ति, कि‍रण जीवी सत्यनारायण, बी अनुराधा सि‍ह, कु. वी. वि‍जयकुमार राजगोपाल और ईश्च‍र राव ने भी सक्रि‍य रूप से भाग लि‍या। संस्था के सचि‍व डॉ. टी. महादेव राव के धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम समाप्त हुआ।

रामजी यादव द्वारा सपादित तीन संचयनों का लोक परिचय


२० नवम्बर को काफी हाउस, मोहन सिंह प्लेस में रामजी यादव द्वारा सपादित तीन संचयनों का लोक परिचय हुआ और एक अनौपचारीक बातचीत फुले संचयन, भारतेंदु संचयन और रामचंद्र शुक्ल संचयन के रूप में इन तीनों रचनाकारों कि प्रतिनिधि रचनाओं के माध्यम से उनके कृतित्व, सामाजिक -सांस्कृतिक अवदानों और समकालीनता को परखने कि कोशिश कि गयी है।

आनंद प्रकाश कि अध्यक्षता में संपन्न हुयी इस गोष्ठी में पकज बिष्ट और प्रेमपाल शर्मा ने इनका लोक परिचय कराया। इसके बाद सम्पादकीय प्रक्रिया पर रामजी यादव को अपनी बात रखने का मौका दिया गया। रामजी ने कहा कि संचयन का मुख्य उद्देश्य इन रचनाकारों को अपने समय के आलोक में अपनी परम्पराओं को जाँचने कि कोशिश है कि हमारे पूर्ववर्ती और महान रचनाकारों ने हमारे समाज के साथ अपना क्या रिश्ता बनाया और उस समाज का क्या दायरा था। इन संचयनों के न होने से इन पर उपलब्ध सामग्री में बेशक कोई फर्क नहीं पड़ा है लेकिन उन सामग्रियों को देखने का नजरिया ज़रूर अलग है। तीनों क्रमश भारतीय इतिहास में एक बड़ी लकीर का निर्माण करते हैं लेकिन इनका बुनियादी फर्क बहुत ज्यादा है, ज्योतिबा फुले इनमे सबसे वरिष्ठ है और इनमे सबसे ज्यादा समकालीन भी, जबकि मुख्यधारा खास तौर से हिंदी मुख्यधारा में उनपर गंभीरता से विचार नहीं हुआ है। वे हाशिये के समाजों के रचनाकार हैं और इसी समाज ने उनकी खोजखबर ली और अपने संघर्षों का महापुरुष बनाया। फुले का नाता भारत के वृहत्तर और संघर्षशील समाजों से है इसीलिए वे मुझे हमेशा आकर्षित करते रहे हैं। भारतेंदु संभवतः अपने द्वाद्वों कि वजह से हमेशा आसपास के रचनाकार लगते रहे लेकिन उनके अंतर्विरोध इतने गहरे हैं कि उनका मिथक नकली लगता है। वस्तुतः वे वैष्णव हिन्दू थे जो भारत कि सामासिक संस्कृति के मेयार से उच्चतम मान नहीं प्रस्तुत करते बल्कि उनकी सीमाओं को अधिक गहराई से तब देखा जा सकता है जब तत्कालीन भारत के लोकजीवन के ग्रामीण और कस्बाई हिस्से को देखा जाय। इसके बावजूद उनमे मौलिक रूप से सामंतवाद के खिलाफ औपनिवेशिक पूँजीवाद के प्रति स्पष्ट रुझान है जो उन्हें एक महत्वपूर्ण रचनाकार बनाता है। उनकी इस विशेषता ने उन्हें फिर से पढ़ने कि प्रेरणा दी। जबकि रामचंद्र शुक्ल बीसवीं शताब्दी में भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर का होने के बावजूद ब्राह्मणवाद और चातुर्वर्ण्य जैसे पतन शील मूल्यों के पोषक रचना कर हैं। वे महाकाव्यात्मक आस्था के कायल हैं और इस प्रक्रिया में उन सभी रचनाकारों को लगभग ख़ारिज करते हैं जिनमे कथानक नहीं हैं बल्कि जीवन के अनुभवों और बोध का सहज बयान है। हालाँकि शुक्ल जी ने हिंदी आलोचना का व्यवस्थित पैटर्न सेट किया लेकिन उनके समाज का दायरा अत्यंत सीमित है और कुल मिलकर वे जिनका लोक मंगल चाहते हैं वे भारत के सवर्ण हैं जो आज़ाद भारत कि सारी संस्थाओं में कुंडली मार कर बैठे हैं।

पंकज बिष्ट ने कहा कि किताबें अभी अभी मिली हैं इसलिए पढना तो संभव नहीं है लेकिन मैं समझता हूँ कि अपनी साहित्यिक परम्परों को जानने के लिए ऐसे प्रयास बहुत जरूरी हैं। हिंदी में गंभीर आलोचना कि प्रक्रिया ख़त्म होती जा रही है जिसमे अपने समाज को साहित्य और साहित्यकारों को देखने कि सम्पूर्ण दृष्टि हो। इससे हो यह रहा है कि साहित्य अपनी भूमिका से लगातार कट रहा है। रामचंद्र शुक्ल आदि आलोचकों को नए सिरे से देखने कि ज़रुरत है। हालाँकि उनके समय से उन्हें काटकर देखना उनके साथ अन्याय होगा परन्तु इसका मतलब यह भी नहीं कि नहीं कि उनकी सीमाओं को नज़रंदाज़ कर के उनकी मूर्तिपूजा कि जाय। आज वस्तुनिष्ठ आलोचना का एक मजबूत पैटर्न बनाना बहुत ज़रूरी है। ज़ाहिर है कि बिना इसके न साहित्य की परम्परा को जाना जा सकता है और न ही आज को।

कहानीकार प्रेमपाल शर्मा ने अपनी बात रखते हुए आलोचना कि इमानदार और तटस्थ परंपरा की खोज को एक ज़रुरत बताया। आनंद प्रकाश ने कहा कि शुक्ल जी ऐसे आलोचक हैं जो दूसरों को अपनी बात कहने का मौका देते हैं। वे लोक मंगल के रचनाकार हैं और तुलसी के रूप में उन्होंने एक ऐसे लोक कवि को चुनते हैं जो एक बोली में महाकाव्य लिख रहा था और वह साधारण शब्दों और भाषा का रचनाकार है, जिसने सीता जैसी स्त्री को आधुनिक सन्दर्भ में चित्रित किया। रामचंद्र शुक्ल ने सबसे बड़ा कम इतिहास लिखने का किया। वे आलोचना को एक महत्त्वपूर्ण विधा के रूप में स्थापित करने वाले आलोचक हैं। रामजी यादव ने इन तीनों रचनाकारों को सामाजिक न्याय के परिप्रेक्ष्य में देखने परखने का काम किया है। यह एक आलोचक कि दृष्टि से किया गया काम है जो विश्वविद्यालयों के दयारे में संभव नहीं है। यहाँ किसी भी ढंग से अपनी बात को साबित करने का कौशल नहीं बल्कि अपने समाज कि कसौटी पर परम्परा को देखने का प्रयास है। आनंद जी ने शुक्ल जी के सन्दर्भ में कहा कि कि वे इ अ रिचर्ड से प्रभावित रहे हैं और रचना को सामाजिक सन्दर्भों से कट कर देखते थे। उनपर नए सिरे से बात होनी चाहिए। भारतेंदु मिश्र ने कहा कि आज समाज बहुत आगे बढ़ चुका है और उसकी चुनौतियाँ गंभीर होती जा रही हैं। साहित्य कि भूमिका को प्रभावशाली बनाने के लिए बड़ी निर्ममता और इमानदारी से अपने पूर्व वर्ती लेखकों और आलोचकों पर बात होनी चाहिए। गोष्ठी का सञ्चालन करते हुए वेद प्रकाश ने कहा कि शुक्ल जी 'विश्व प्रपंच' और 'बुद्ध चरित' जैसी पुस्तकों को पहली बार हिंदी में ले आये। वे विज्ञान के प्रति सकारात्मक रुख रखते थे। उनके इस पक्ष को भी पुस्तक में रखा जाना चाहिए था। गोष्ठी में अनेक रचनाकार उपस्थित थे जिनमे अजय सिंह, सुल्तान सिंह त्यागी, शुक्राचार्य, उपेन्द्र कुमार, कुमार मुकुल, अच्युता नन्द मिश्र, रूबल मित्तल, जय कृष्ण, क्षितिज शर्मा, अशोक मिश्र, आलोक शर्मा, रणजीत वर्मा, कमलेश, अंजू, पूजा और दीपक आदि हैं।