रविवार, 24 अक्टूबर 2010

चेखव की १५० वीं वर्षगाँठ पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न


(चित्र में: (बाएं से) प्रो.ऋषभ देव शर्मा, प्रो.वरयाम सिंह, प्रो.शंकर बसु एवं प्रो.आर.डी.अकेला)
हैदराबाद, २१ अक्टूबर २०१०, "वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अनुवाद का महत्व पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है। साहित्य के अनुवाद के माध्यम से हम केवल किसी अन्य भाषा के लेखन से ही परिचित नहीं होते बल्कि उस भाषा समाज की सामजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और विशेषताओं से भी परिचित होते हैं। अनुवादक एक भाषा में रचित साहित्य के अर्थ और रूप भर को नहीं बल्कि उसके मूल्यों और सरोकारों को भी दूसरी भाषा में प्रकट करने का दायित्व निभाता है। ऐसा करने के लिए उसका द्विभाषिक के साथ साथ द्विसांस्कृतिक होना भी अपरिहार्य शर्त है। इस स्तर पर साहित्य का अनुवादक मात्र अनुसरणकर्ता नहीं होता बल्कि मौलिक लेखक की भाँति ही सृजनकर्ता होता है।"

ये विचार अंग्रेजी और विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी अध्ययन संकाय के तत्वावधान में संपन्न 'चेखव का अनुवाद' विषयक द्वि-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन अवसर पर बोलते हुए प्रमुख चेखवविद लेखक और अनुवादक प्रो. योगेश चन्द्र भटनागर ने व्यक्त किये।

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी ने बताया कि इस संगोष्ठी-कार्यशाला में स्वीकृत किए गए विभिन्न भाषाओं के अनुवादों को शीघ्र ही पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा। उन्होंने इसे समारोह की उपलब्धि और सफलता माना कि इसमें जहाँ एक ओर २० वरिष्ठ अनुवादक सम्मिलित हुए वहीं इसके माध्यम से नए चेहरे के रूप में ११ युवा अनुवादक भी सामने आए जो हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में रूसी भाषा से सीधे अनुवाद की संभावनाओं के विस्तार का सूचक है।

उल्लेखनीय है कि दो दिन के इस समारोह में ६ अलग-अलग समूहों में ३२ अनुवादकों द्वारा विभिन्न भारतीय भाषाओं में किये गएचेखव के १२ छोटे-बड़े नाटकों के अनुवादों का विश्लेषण करके उन्हें अंतिम रूप दिया गया। इस कार्य में द्विभाषिक विद्वानों के साथ साथ लक्ष्य भाषाओं हिंदी, मलयालम, तेलुगु, मराठी, ओडिया और बांग्ला के मातृभाषा-भाषी विशेषज्ञों का भी सहयोग लिया गया।

चेखव के भारतीय विशेषज्ञ प्रो. शंकर बसु, प्रो. योगेश भटनागर, प्रो. वरयाम सिंह और प्रो. पंकज मालवीय की उपस्थिति सभी प्रतिभागियों के लिए अत्यंत प्रेरणा-दायक रही। कार्यशाला का निर्देशन प्रो. चारुमति रामदास तथा संयोजन डॉ. सत्यभान सिंह राजपूत ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रो. मोनिका ने किया।

अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय में द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित



हैदराबाद, २० अक्टूबर, विश्वप्रसिद्ध रूसी कथालेखक एवं नाटककार चेखव की १५० वीं वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में आज यहाँ अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के परिसर में रूसी भाषा विभाग के तत्वावधान में आयोजित ''चेखव का अनुवाद '' विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला का उद्घाटन प्रसिद्ध भारतीय चेखवविद तथा जेएनयू के अधिष्ठाता प्रो. शंकर बसु ने किया. उन्होंने चेखव की रचनागत विशेषताओं का उल्लेख करते हुए उन्हें मानवीय संवेदना के अप्रतिम चितेरे की संज्ञा दी .

उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता रूसी अध्ययन संकाय के डीन प्रो.आर.डी.अकेला ने की और बताया कि इस आयोजन में चेखव के एक पूर्णाकार तथा ११ एकांकी नाटकों के रूसी से सीधे हिंदी ,मराठी ,तेलुगु, बंगला,ओडिया और मलयालम भाषाओं में संपन्न अनुवादों का विश्लेषण करके उन्हें अंतिम रूप दिया जाएगा जो अपने आप में एक कीर्तिमान होगा.

बीज भाषण सुप्रसिद्ध कवि एवं अनुवादक प्रो. वरयाम सिंह , जेएनयू , ने दिया. प्रो. सिंह ने कहा कि चेखव केवल रूसी लेखक ही नहीं थे, वे अपने समय में ही भौगोलिक सीमाओं को लांघ चुके थे क्योंकि उनकी रचनाओं की विषयवस्तु और उनके पात्र चिरंतन हैं. इस अवसर पर संबोधित करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि हिंदीजगत के भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों की भाँति चेखव भी ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने अकालमृत्यु के बावजूद कालजयी सिद्ध हुए हैं।

समारोह की संयोजक डॉ. चारुमति रामदास ने बताया कि इस कार्यक्रम में ३२ अनुवादक भाग ले रहे हैं जिनमें ११ नए चेहरे हैं. विविध भारतीय भाषाओं में इनके द्वारा किए गए अनुवादों का विश्लेषण करने के लिए द्विभाषाविदों के साथ साथ विशेष रूप लक्ष्य भाषा के विद्वानों को भी आमंत्रित किया गया है ताकि अनूदित पाठों को लक्ष्य भाषाओं के मुहावरे में ढाला जा सके.

उद्घाटन सत्र के बाद छः समानांतर समूहों में कार्यशाला आरम्भ हुई. दो दिन में कार्यशाला के चार सत्र होंगे.

समापन गुरुवार को प्रो. जे. पी. डिमरी की अध्यक्षता में संपन्न होगा. समाकलन व्याख्यान प्रसिद्ध चेखवविद , लेखक और अनुवादक प्रो. योगेश भटनागर , भूतपूर्व आचार्य - जेएनयू, देंगे. समारोह में हैदराबाद के अतिरिक्त गुवाहाटी, नागपुर, पुणे ,लखनऊ, कोल्हापुर, आगरा , अमृतसर, चंडीगढ़, भंडारा, कोलकाता बनारस, रीवां, दिल्ली, तिरुवनंत पुरम, इलाहाबाद और औरंगाबाद आदि स्थानों से आए हुए अनुवादक और विशेषज्ञ विद्वान् सम्मिलित हैं

प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी को पण्डितराज सम्मान


१५ अक्टूबर २०१० ‘देववाणी परिषद्, दिल्ली’ द्वारा प्रतिवर्ष दिया जाने वाला पण्डितराज सम्मान संस्कृत के विश्रुत महाकवि एवं काव्यशास्त्र चिन्तक प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी को किया गया।

यह सम्मान १५ अक्टूबर २०१० को ४:०० बजे अपराह्न ५६-५७ इन्स्टीट्यूशनल एरिया जनकपुरी नई दिल्ली में स्थित राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के सम्मेलन कक्ष में आयोजित तेइसवें “पण्डितराज-महोत्सव” के उदघाटन समारोह में समर्पित किया गया। परिषद् के अध्यक्ष प्रो. रामकरण शर्मा इस सम्मान को अर्पित किया। संस्थान के कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी इस अवसर पर मुख्यअतिथि थे।

ध्यातव्य है कि प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी ने सीताचरितम् उत्तरसीताचरितम्, स्वातन्त्र्यसम्भवम् व कुमारविजयम् महाकाव्यों, सप्तर्षिकांग्रेसम् व यूथिका नाटकों, काव्यालंकारकारिका, नाट्यानुशासनम् व साहित्यशारीकम् काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों की रचना द्वारा संस्कृत साहित्य की श्रीवृद्धि की है। आपने सम्पूर्ण कालिदास साहित्य का “कालिदासग्रन्थावली” के रूप में संपादन तथा अनुवाद किया है। “संस्कृत काव्यशास्त्र का आलोचनात्मक इतिहास” आदि अनेक ग्रन्थ आपके काव्यशास्त्रीय चिन्तन के द्योतक है। इनके अतिरिक्त आपने शतपत्रम्, रेवाभद्रपीठकाव्यम्, संस्कृतहीरकम्, शरभंगम् मतान्तरम्, शरशय्या, अवदानलतिका, अंलब्रह्म आदि अनेक ग्रन्थों की भी रचना की हैं।

ध्यातव्य है कि “पण्डितराज-महोत्सव” संस्कृत के शाहजहाँ के समकालीन, गंगालहरी, रसगंगाधर, भामिनीविलास, यमुनालहरी आदि ग्रंथो के प्रणेता पण्डितराज जगन्नाथ की याद में प्रति वर्ष देववाणी परिषद् दिल्ली के द्वारा मनाया जाता है। इस अवसर पर विद्वत् सम्मान विभिन्न भाषा काव्य गोष्ठी, पण्डितराज जगन्नाथ के ग्रन्थों से श्लोक पाठ तथा विद्वानों के व्याख्यान आयोजित होते है। इस वर्ष यह महोत्सव १५ से २२ अक्टूबर तक मानाया जा रहा है।

पण्डितराज सम्मान प्रतिवर्ष किसी संस्कृत कवि और काव्यशास्त्री को दिया जाता है। सम्मान में शॉल, श्रीफल तथा ग्यारह हजार की नकद राशि अर्पित की जाती है। विगत दो वर्षों में संस्कृत के प्रसिद्ध कवि और काव्यशास्त्री अभिराज राजेन्द्र मिश्र, डॉ शंकरदेव शर्मा “अवतरे” इस सम्मान से सम्मानित हुए है। इस वर्ष (२०१०) पण्डित राज सम्मान संस्कृत के महाकवि एवं काव्यतत्त्वचिन्तक महामहोपाध्याय आचार्या रेवा प्रसाद द्विवेदी को अर्पित किया जा रहा है।

“पण्डितराज-महोत्सव” के पूर्व राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के सम्मेलन कक्ष में संस्थान का ४१ वां स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर हिन्दी-पक्षोत्सव का पुरस्कार वितरण एंव मुक्तस्वाध्यायपीठ का उदघाटन आदि कार्य सम्पन्न हुए। प्रो. रामकरण शर्मा सास्वतातिथि प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी मुख्य अतिथि एवं कुलपति प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी अध्यक्ष थे।

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार समारोह संपन्न


हैदराबाद, १७ अक्तूबर, २०१०, प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा के 94वें जयंती समारोह के अवसर पर श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा वर्ष २०१० के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। जयंती एवं पुरस्कार समारोह यहाँ रवींद्र भारती में प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। इस अवसर पर वरिष्ठ तेलुगु पत्रकार पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

स्मरणीय है कि ट्रस्ट द्वारा प्रति वर्ष तेलुगु साहित्य, हिंदी साहित्य और अभिनय जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए दस-दस हजार रुपये के तीन नकद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान किए जाते हैं। इस वर्ष तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार 83 वर्षीय वरिष्ठ साहित्यकार महामहोपाध्याय डॉ. पुल्लेल श्रीरामचंद्रुडु को प्रदान किया गया, जिन्होंने तेलुगु तथा संस्कृत साहित्य को अपनी मौलिक तथा अनूदित रचनाओं से सुसंपन्न किया है।

हिंदी साहित्य के लिए इस वर्ष ‘राष्ट्र नायक’ पत्रिका के संपादक ७५ वर्षीय डॉ. हरिश्चंद्र विद्यार्थी को हैदराबाद में हिंदी भाषा, साहित्य और पत्रकारिता के उन्नयन के लिए दिया गया। इसी प्रकार प्रसिद्ध तेलुगु रंगकर्मी ७५ वर्षीय डॉ. मोदलि नागभूषण शर्मा को अभिनय जगत में योगदान के लिए पुरस्कृत किया गया। इसके अतिरिक्त न्यास की ओर से विभिन्न छात्र-छात्राओं को 'प्रतिभा पुरस्कार' और ‘सरस्वती पुरस्कार’ भी वितरित किए गए।

आरंभ में मुख्य अतिथि पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने मट्टपर्ति वीरांजनेयुलु द्वारा चित्रित वेमूरि आंजनेय शर्मा के विशाल तैलचित्र को लोकार्पित किया। इस अवसर पर संबोधित करते हुए पोत्तूरि वेंकटेश्वर राव ने कहा कि वेमूरि आंजनेय शर्मा ने अपना पूरा जीवन हिंदी की सेवा और भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय के कार्य के लिए समर्पित कर दिया, अतः वे सही अर्थों में दक्षिण और उत्तर के सामाजिक-सांस्कृतिक सेतु के निर्माता थे। डॉ. पोत्तूरि ने आंजनेय शर्मा जी द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के माध्यम से राष्ट्रीय अखंडता और सामासिक संस्कृति के संरक्षण के लिए किए गए प्रयासों का स्मरण करते हुए उन्हें नई पीढ़ी के लिए अनुकरणीय और आदर्श बताया।

पुरस्कृत विद्वानों को समर्पित किए गए प्रशस्ति पत्रों का वाचन विद्यानाथ शास्त्री, कृष्णमूर्ति और ज्योत्स्ना कुमारी ने किया। समारोह का संचालन डॉ. पेरिशेट्टी श्रीनिवास राव ने किया।

डर्बी की पीयर-ट्री लायब्रेरी में मुशायरा


(बाएं से फ़रज़ाना ख़ान, श्री अख़्तर, बासित कानपुरी, तेजेन्द्र शर्मा, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, अक़ील दानिश, मारग्रेट जे, श्रीमती इफ़्फ़त ख़ान, श्री अहसन ख़ान)

ब्रिटेन के शहर डर्बी की पीयर-ट्री लायब्रेरी ने हाल ही में एक मुशायरे का आयोजन किया जिसमें लंदन के उर्दू शायरों अक़ील दानिश एवं बासित कानपुरी; हिन्दी और उर्दू की शायरा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, हिन्दी के शायर/कवि तेजेन्द्र शर्मा एवं नॉटिंघम की शायरा फ़रज़ाना ख़ान ने श्रोताओं को अपनी रचनाओं का रसास्वादन करवाया।

मुशायरे के संयोजक श्री अहसन ख़ान ने सभी शायरों का स्वागत किया। उनका मानना है कि बेशक मुशायरा मूलतः उर्दू शायरी को लेकर है मगर शायरों में मौजूद हिन्दी के कवि तेजन्द्र शर्मा और श्रोताओं में मौजूद मुसलमान, सिख, हिन्दू और ईसाई इस बात का सबूत है कि साहित्य का कोई मज़हब नहीं होता। भाषा किसी मज़हब से जुड़ी नहीं है।

पीयर-ट्री लायब्रेरी की लाइब्रेरियन मारग्रेट जे ने प्रसन्नता ज़ाहिर करते हुए कहा कि, “हमारी लायब्रेरी के लिये यह गर्व का विषय है कि यहां एक बहुभाषीय मुशायरा आयोजित किया जा रहा है। मार ग्रेट ने आगे कहा कि उन्हें उर्दू या हिन्दी भाषा समझ नहीं आती मगर यह सच है कि साहित्य भाषाओं की दीवारें तोड़ कर अपनी बात श्रोता को समझा देता है। ”
फ़रज़ाना ख़ान ने संचालक का पद संभालते हुए प्रत्येक शायर का परिचय दिया और एक एक कर उन्हें अपनी रचना सुनाने का आमंत्रण दिया।
वरिष्ठ शायर अक़ील दानिश ने पहले मां के सम्मान में अपनी एक ग़ज़ल पढ़ी -
"बच्चे बद भी हों तो सीने से लगा लेती है
मां के अंदाज़ में अंदाज़-ए-ख़ुदा मिलता है।"
फिर वे नॉस्टेलजिक हो कर अपने वतन को याद करते हुए कह उठे –


बेवतन हम हैं मगर यादे वतन आती है
इस अंधेरे में भी सूरज की किरण आती है।

बासित कानपुरी ने अपने मधुर स्वर में तरन्नुम से अपने रचनाएं पेश कीं। वे पहले तो शमां की लौ लगने और रात भर जलने की बात कहते रहे -
मालूम नहीं शम्मां की लौ किससे लगी है
शब भर दिले सोज़ां की तरह वो भी जली है।
और फिर दिल में शमा जला बैठे -
उनके आने की आस में बासित
दिल में शम्में जलाए बैठे हैं।

तेजेन्द्र शर्मा ने बात को नया मोड़ देते हुए नॉस्टेलजिया से बाहर आने की बात की और श्रोताओं से कहा कि हम लोग ब्रिटेन में ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आकर बसे हैं मगर इसे आजतक अपना मुल्क़ नहीं मान पाए। इसलिये ब्रिटेन हमें कहता है -
जो तुम न मानों मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है
यहां जो आ गया इक बार वो हमारा है।
उनका अगला शेर रिश्तों और दोस्ती की गहरी पड़ताल करता दिखा -
जग सोच रहा था कि है वो मेरा तलबगार
मैं जानता हूं उसने ही बरबाद किया है।

काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने अपनी दो नज़्मों का पाठ किया। पहली नज़्म में उन्होंने कांटेदार झाड़िंयों का बिम्ब इस्तेमाल करते हुए उनके ज़िन्दगी पर छा जाने की बात कही। तो वहीं दूसरी नज़्म में पाकिस्तान में हाल ही में आए सैलाब की तस्वीर खींच कर श्रोताओं की आंखों को नम कर दिया –
वो ख़ूंख़ार कांटों भरी झाड़ियां सब
मुंडेरों पे फैली दरख़्तों से लिपटीं
कि फूलों को ताक़त से अपनी कुचलतीं
हवाओं की लहरों में चीख़ें समोती
खड़ी हैं कतारें बनाए हुए अब
न जाने क्यों चुपचाप ख़ामोश हैं सब।
जब फ़रज़ाना ख़ान की बारी एक शायरा के तौर पर आई तो उन्होंने अपनी दो भावनात्मक नज़्मों का पाठ किया। दर्द की नीली रगों का बिम्ब एकदम नया और अनूठा था –
दर्द की नीली रगें, यादों में जलने के सबब
सारी चीख़ें रोक लेती हैं समझने के सबब

दर्द की नीली रगें तो शोर करती हैं बहुत
पैकर-ए-नाज़ुक में इस दिल के मचलने के सबब।

कार्यक्रम के अंत में मारग्रेट जे ने धन्यवाद ज्ञापन दिया, और सम्पन्न हुई ग़ज़लों की ख़ुशबू और नज़मों की अंतरात्मा लिये एक शाम।

मनोज भावुक को पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृति-युवा साहित्यकार सम्मान


मनोज भावुक ने बिहार, सिवान के एक छोटे से गाँव कौसड़ से अपनी साहित्यिक यात्रा शुरू की और अफ्रीका एवं लन्दन में जाकर भोजपुरी का प्रचार-प्रसार किया. उत्तर प्रदेश के हिन्डाल्को,रेनुकूट के मजदूर नेता एवं वरिष्ठ समाजसेवी रामदेव सिंह एवं गृहिणी सुनयना देवी के पुत्र मनोज कुमार सिंह उर्फ़ मनोज भावुक को साहित्यिक प्रतिभा विरासत में मिली है . मनोज के बड़े मामा छपरा निवासी प्रो० राजगृह सिंह हिन्दी -भोजपुरी के जाने-माने साहित्यकार हैं.

गत दिनों लखनऊ स्थिरत संस्थाज भाऊराव देवरस सेवा न्याहस ने भोजपुरी के इस लोकप्रिय कवि को भोजपुरी भाषा में उल्लेिखनीय योगदान के लिए पंडित प्रताप नारायण मिश्र स्मृभति-युवा साहित्युकार सम्मातन से नवाजा है। पहली बार किसी भोजपुरी साहित्य कार को यह सम्मायन मिला है। लखनऊ, उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक ‘माधव सभागार' में न्या‍स द्वारा आयोजित इस सोलहवें युवा-साहित्यतकार सम्माहन समारोह के दौरान मनोज भावुक को ये सम्मावन दिया गया। सेवानिवृत आई.ए.एस. विनोद शंकर चौबे, लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी जे.पी.सिंह और लखनऊ के महापौर डॉ. दिनेश शर्मा ने उन्हें सम्मा न प्रदान किया।

इस समारोह में श्री मनोज भावुक को सम्माहन स्व रूप पांच हजार रुपये, प्रशस्तिप पत्र, प्रतीक चिन्हा, माँ सरस्वसती की प्रतिमा, अंगवस्त्रप एवं न्यासस द्वारा प्रकाशित पुस्त्कों का सेट भेंट किया गया। मनोज भावुक की रचनाओं के बारे में टिप्पहणी करते हुए भाऊराव देवरस सेवा न्यातस के कार्यक्रम संयोजक डॉ. विजय कुमार कर्ण ने कहा ‘ मनोज भोजपुरी न्यू्ज चैनल ‘हमार टीवी' के क्रिएटिव हेड हैं और भोजपुरी के सुप्रसिद्ध युवा साहित्य कार हैं। पिछले १५ सालों से देश और देश के बाहर (अफ्रीका और यूके में) भोजपुरी भाषा, साहित्‍य और संस्कृशति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भावुक भोजपुरी सिनेमा, नाटक आदि के इतिहास पर किये गये अपने समग्र शोध के लिए भी पहचाने जाते हैं। अभिनय, एंकरिंग एवं पटकथा लेखन आदि विधाओं में गहरी रुचि रखने वाले मनोज दुनिया भर के भोजपुरी भाषा को समर्पित संस्था ओं के संस्थाऔपक, सलाहकार और सदस्ये हैं। ‘‘तस्वींर जिंदगी के''(गजल-संग्रह) एवं ‘‘चलनी में पानी''(गीत-संग्रह) मनोज की चर्चित पुस्त‍के हैं। ‘‘तस्वीार जिन्दंगी के'' के लिए मनोज को वर्ष २००६ के भारतीय भाषा परिषद सम्मातन से नवाजा जा चुका है। भाऊराव देवरस सेवा न्या्स मनोज भावुक को सम्मामनित करते हुए गौरवान्विात है।' विदित हो कि अभी हाल ही में मनोज भावुक को 'विश्वो भोजपुरी सम्मेहलन', दिल्लीर का अध्यतक्ष नियुक्तव किया गया है। यह भोजपुरी की एकमात्र अंतरराष्ट्रीय संस्था है.

सम्मान समारोह की अध्य्क्षता करते हुये विनोद शंकर चौबे ने मनोज भावुक की रचनाओं की जम कर तारीफ की और कहा कि मनोज ने रघुबीर नारायण के बटोहिया गीत की याद ताजा कर दी। इस मौके पर युवा कवि मनोज भावुक ने भोजपुरी में गजल पाठकर पूरा माहौल भोजपुरीमय कर दिया और कहा, ‘यह सम्माजन किसी एक व्याक्ति का नही है बल्‍कि भोजपुरी भाषा एवं साहित्य और देश-विदेश में फैले करोड़ों भोजपुरी भाषियों एवं भोजपुरी प्रेमियों का सम्मान है।'

लंदन में प्रथम हिंदी छात्र सम्मेलन


‘यू.के हिंदी समिति’ के २० वर्ष एवं ‘हिंदी ज्ञान प्रतियोगिता’ के दस वर्ष के उपलक्ष्य में लंदन के नेहरू केंद्र में में दिनांक २६ सितंबर को प्रथम हिंदी छात्र सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में यू.के. के विभिन्न शहरों से सैकड़ों हिंदी के विद्यार्थियों ने भाग लिया। सम्मेलन में ४ वर्ष की आयु से लेकर २५ वर्ष की आयु तक के छात्र उपस्थित थें।

इस अवसर पर विद्यार्थी कमलेश वालिया और कार्तिक सुब्बुराज ने इंटरनेट के माध्यम से हिंदी सीखने की विधा बताई और पावर प्वाइंट द्वारा अत्यंत रोचकता से अन्य छात्रों को हिंदी के विभिन्न वेबसाइट से परिचित कराया। ‘यू.के हिंदी समिति’ के अध्यक्ष डॉ. पदमेंश गुप्त ने कहा, ‘इस सम्मेलन का उद्देश्यहै कि ब्रिटेन के हिंदी छात्रों का एक नेटवर्क तैयार हो और इन विद्यार्थियों को एक ऐसा मंच मिले जिससे वे कम से कम साल में एक बार आपस में मिल सकें।’इस अवसर पर हिंदी बाल भवन- सरे, तथा बर्मिंघम के कुछ विद्यार्थियों ने लघु नाटक एवं नृत्य की प्रस्तुति कर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। हास्य-व्यंग्य से भरपूर यह नाटक छात्रों तथा उनकी शिक्षिकाओं ने मिल कर स्वयं रचा। हिंदी अध्यापिका सुश्री सुरेखा चोफला ने इस अवसर पर भारत के नक्शे पर आधारित छात्रों को समूह रचना का अभ्यास करवाया तथा साँप और सीढ़ी के खेल के माध्यम से हिंदी के प्रश्न-उत्तर के सत्र का संयोजन किया जिसमें हिंदी छात्रों ने जम कर भाग लिया।

श्रीमती देवीना रिशी ने ‘हिंदी सिनेमा वाह! वाह!, हिंदी सिनेमा छी! छी!’ पर मनोरंजक बहस का संयोजन किया जिसमें अनेक छात्रों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए। ‘यू.के.हिंदी समिति’ की उपाध्यक्ष और ‘पुरवाई’ पत्रिका की सह-संपादक श्रीमती उषा राजे ने छोटी उम्र के बच्चों को स्व रचित बाल कथा ‘जादूई बुलबुला’ के माधयम से भारतीय संस्कृति की महत्ता मनोरंजक ढंग से बताई। इस सत्र में बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी दत्तचित श्रोता थें। हिंदी सभी छात्रों एवं अभिवावकों ने इस अवसर पर अंताक्षिरी के माध्यम से हिंदी गानों की प्रस्तुति की। सम्मेलन के अंत में ब्रिटेन के इन छात्रों ने भारत के वरिष्ठ साहित्यकार स्व. कन्हैया लाल नंदन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की।

यू.के. हिंदी समिति के श्री वेद मोहला, डॉ. ऋषी अग्रवाल, इस्माइल चुनेरा, के.बी.एल. सक्सेना, उषा राजे सक्सेना, सुरेखा चोपला, अंजलि सुब्बुराज, शशि वालिया, देविना रिशि, पियूष गोयल, एवं कृति यू.के. की तितिक्षा शाह, अख्तर गोल्ड, मधु शर्मा, मीना कुमारी, और बाल भवन की शशि वालिया ने अपनी उपस्थिति से आयोजन को गरिमा प्रदान की।

दक्षिण में हिंदी की स्थिति, गति एवं प्रगति पर परिसंवाद आयोजित

नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, कोयंबत्तूर एवं डॉ. जी.आर.दामोदरन विज्ञान महाविद्यलय, कोयंबत्तूर के संयुक्त तत्वावधान में कोयंबत्तूर में ४ अक्तूबर, २०१० को विभिन्न दक्षिण भारतीय भाषाओं के विद्वानों उपस्थिति में राष्ट्रीय हिंदी संगोष्ठी का आयोजन किया गया । संगोष्ठी का उद्घाटन नराकास, कोयंबत्तूर के अध्यक्ष एवं क्षेत्रीय भविष्य निधि आयुक्त श्री एम.पी. वर्गीस ने दीप प्रज्वलन के साथ किया । उद्घाटन सत्र में अपने अध्यक्षीय भाषण में वर्गीस जी ने कहा कि राष्ट्रीय एकता की संकल्पना को साकार बनाने के लिए जहाँ एक संपर्क भाषा की जरूरत है, वहीं भारतीय सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए भारतीय भाषाओं का विकास जरूरी है । भारतीय संविधान इस संकल्पना के लिए प्रतिबद्ध है ।

समिति के सदस्य-सचिव एवं संगोष्ठी के संयोजक डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि दक्षिण के आंध्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल एवं पांडिच्चेरी प्रदेशों में शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक, आर्थिक, व्यावसायिक, वाणिज्यिक, औद्योगिक, प्रशासनिक क्षेत्रों के अलावा मीडिया एवं फिल्मी क्षेत्रों में भी आज हिंदी का विस्तृत प्रचार-प्रसार के आलोक में समग्र स्थिति का जायज़ा लेने के लिए आज इस एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है ।
तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी की महासचिव डॉ. मधुधवन ने नई पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि उन्हें आगे बढ़कर हिंदी प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालना चाहिए । वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. पी.के. बालसुब्रमणियन जी ने तमिल साहित्य को हिंदी में अनुवादित करने के लिए नई पीढ़ी को प्रेरित किया और जानकारी दी कि इसके लिए तमिलनाडु सरकार आर्थिक मदद देती है।

उद्घाटन सत्र में श्रीमती उषा वर्गीस, महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. ए. पोन्नुसामी ने भी अपने विचार प्रकट किए और बच्चों को हिंदी अवश्य पढ़ाने का आग्रह किया।

दक्षिण भारत में शिक्षा, साहित्य, संस्कृति एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी पर केंद्रित प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. पी.के. बालसुब्रमण्यन ने किया । विशिष्ट अतिथियों के रूप में डॉ. ना. गोपालकृष्णन, निदेशक, केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान, श्री ईश्वर चंद्र झा, मंडल प्रबंधक, दि न्यू इंडिया एश्योरेंस कं.लि., उपस्थित थे । इस सत्र में बीज वक्तव्य देते हुए श्री सुदर्शन मलिक विश्व के एक बड़े जनतंत्रात्मक राष्ट्र की प्रचलित हिंदी को आज विश्व की भाषा का स्तर दिलाना आवश्यक है, इसके लिए हर ढंग से हमें पहल की जानी चाहिए । इस सत्र का संचालन डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने किया ।

दूसरे सत्र का दक्षिण भारत में प्रशासनिक, व्यावसायिक एवं औद्योगिक क्षेत्रों में हिंदी की प्रगति पर केंद्रत रहा । इस सत्र में डॉ. एस. बशीर, डॉ. वासुदेवन शेष विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थे । डॉ. सी. जय शंकर बाबु ने बीज वक्तव्य देते हुए कहा कि दक्षिण भारत में हिंदी की प्रगति का कोई ऐसा आयाम नहीं है, जिस ओर हिंदीतर भाषियों का ध्यान नहीं गया हो । दक्षिण में हिंदी में पत्रकारिता आज विकसित स्थिति में है और आज दक्षिण में कई हिंदी ब्लागर हैं जो हिंदी को दुनिया की भाषा बनाने की पहल कर रहे हैं । इस सत्र का संचालन श्री डी. राम मोहन रेड्डी, शाखा प्रबंधक, न्यू इंडिया एश्योरेंस ने किया ।

दोनों सत्रों में लगभग चालीस विद्वानों ने अपने शोध-पूर्ण आलेख प्रस्तुत किए । अंत में काव्य गोष्ठी में वरिष्ठ कवियों ने अपनी कविताओं तथा गीतों से श्रोताओं का मन बहलाया । अंत में सभी विद्वानों का सम्मान, श्रीमती सी.आर. राजश्री, भाषा विभागाध्यक्ष, डॉ. जी. आर. डी. विज्ञान महाविद्यालय के धन्यवाद ज्ञापन तथा राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी सुसंपन्न हुई ।

लंदन की एक शाम – तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में


(बाएं से मीरा कौशिक, तेजेन्द्र शर्मा, दिव्या माथुर, डा. निखिल कौशिक, कैलाश बुधवार एवं. काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी )
कथा यू.के. एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने नेहरू सेंटर, लंदन में एक अनूठी शाम का आयोजन किया जिसमें वेल्स-निवासी नेत्र विशेषज्ञ, कवि, एवं फ़िल्मकार डा. निखिल कौशिक ने कथाकार-कवियत्री दिव्या माथुर, वरिष्ठ मीडिया हस्ती कैलाश बुधवार के साथ साथ कथाकार, फ़िल्म टीवी तथा मंच कलाकार, कवि व ग़ज़लकार तेजेन्द्र शर्मा पर निर्मित तीन डॉक्यूमेंटरी फ़िल्में दिखा कर नेहरू सेंटर में उपस्थित श्रोताओं को सम्मोहित कर दिया।

कार्यक्रम की शुरूआत में कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने हाल ही में दिवंगत हुए कवि-पत्रकार एवं मीडिया हस्ती डा. कन्हैया लाल नंदन को श्रद्धांजलि देते हुए उनके साथ अपने नज़दीकी संबंधों की चर्चा करते हुए उनके साथ अपनी बहामास, क्यूबा और त्रिनिदाद यात्राओं की चर्चा की। तेजेन्द्र शर्मा ने नंदन जी को नये रचनाकारों और ख़ासतौर पर प्रवासी लेखकों का मार्गदर्शक बताया। अपनी धीर गंभीर आवाज़ में तेजेन्द्र ने उनकी एक कविता का पाठ किया जो कि नंदन जी ने ३ अक्टूबर २००५ (यानि कि ठीक पांच वर्ष पूर्व) हस्पताल के बिस्तर पर डायलिसिस करवाने के बाद लिखी थी।
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए, / मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।
मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं / उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

प्रत्येक डाक्यूमेंटरी क़रीब क़रीब बीस से बाईस मिनट लम्बी थी। सबसे पहले दिव्या माथुर पर बनाई फ़िल्म दिखाई गई। दिव्या को निखिल ने एक ऐसे व्यक्तित्व की तरह पेश किया जो कि अपने काम के प्रति समर्पित, व्यवहार में विनम्र एवं परिवार के प्रति निष्ठा रखती हैं। दिव्या माथुर ने अपने लेखन के विषय में भी विस्तार से बात की और बताया कि जब एक विषय उनके दिमाग़ में पक्की तरह से बैठ जाता है तो वे लगातार उसी विषय पर लिखती चली जाती हैं। उनके क्ई एक कविता संकलन एक ही विषय पर आधारित हैं। डॉक्यूमेंटरी में डा. केसरी नाथ त्रिपाठी, डा. सत्येन्द्र श्रीवास्तव, डा. लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, मोनिका मोहता, रवि शर्मा और दिव्या के परिवार के सदस्यों सहित बहुत से लोगों ने दिव्या माथुर के प्रति अपने विचार व्यक्त किये।

कैलाश बुधवार पर बनाई डाक्युमेंटरी एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में है जिसे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं; जो कभी भी किसी के बारे में कुछ ग़लत नहीं कहता; और जो अपने से अधिक अपने से वरिष्ठ लोगों के बारे में बात करके ख़ुश हो लेता है। शायद इसीलिये कैलाश जी ने अपनी डॉक्यूमेंटरी में पापाजी पृथ्वीराज कपूर और पृथ्वी थियेटर के बारे में अधिक बातें की और अपने व्यक्तित्व को ठीक उसी तरह छिपाए रखा जैसा कि वे पिछले चार दशकों से करते आ रहे हैं। उन्होंने अपने वरिष्ठ रेडियो की हस्तियों के बारे में बातें कीं जिनमें आले हसन, ज्ञान कौशिक, महेन्द्र कौल जैसे बहुत से लोग शामिल थे। श्रोताओं में बैठे नरेश कौशिक ने स्वीकार किया कि कैलाश जी ही उन्हें बीबीसी लंदन में लाए थे। कैलाश जी ने माइक पर आकर कहा कि वे अपने आपको इस तरह की किसी भी डॉक्यूमेंटरी के क़ाबिल नहीं समझते। वे हैरान भी थे कि मेट्रो स्ट्राइक, बारिश और कॉमनवेल्थ खेलों के सीधे प्रसारण के बावजूद लोग उनके बारे में निर्मित डाक्युमेंटरी देखने पहुंच गये।

ड़ा. निखिल कौशिक ने तेजेन्द्र शर्मा को ब्रिटेन के हिन्दी साहित्य का राजकपूर घोषित किया। उनका कहना था जिस प्रकार दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के मुग़ल गार्डन में किसी फ़िल्म की शूटिंग करने वाले राजकपूर पहले फ़िल्मकार थे, ठीक उसी तरह ब्रिटेन की संसद के हाउस ऑफ़ कॉमन्स एवं हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कथा यू.के. सम्मान आयोजित करके तेजेन्द्र शर्मा ने हिन्दी का परचम अंग्रेज़ी के गढ़ में लहराया है। निखिल कौशिक ने अपनी डॉक्युमेंटरी के ज़रिये तेजेन्द्र शर्मा को एक कहानीकार, ग़ज़लकार, मंच एवं सिने कलाकार, नाटक निर्देशक, रेडियो पत्रकार एवं एक हिन्दी सेवी के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। तेजेन्द्र ने अपने अंग्रेज़ी एवं हिन्दी लेखन व टीवी सीरियल लेखन के बारे में बातचीत भी की है। तेजेन्द्र शर्मा की लिखी एक ग़ज़ल ‘जो तुम न मानो मुझे अपना, हक़ तुम्हारा है / यहां जो आ गया इक बार, वो हमारा है’ भी इस फ़िल्म में शामिल की गई। इस ग़ज़ल का संगीत बनाया अर्पण पटेल ने और स्वर दिया मीतल ने। तेजेन्द्र के व्यक्तित्व पर प्रो. अमीन मुग़ल, कैलाश बुधवार, डा. अचला शर्मा, मोनिका मोहता, रवि शर्मा, राकेश दुबे, आदि ने अपने अपने विचार रखे। अचला शर्मा के अनुसार तेजेन्द्र ने हिन्दी को मंदिरों से बाहर निकाल कर ब्रिटिश संसद में पहुंचा दिया है।

धन्यवाद ज्ञापन देते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा कि किसी भी देश या समुदाय की प्रगति उसकी सांसकृतिक गतिविधियों पर आधारित होती है। डा. निखिल कौशिक लेखक, पत्रकार एवं संस्कृति कर्मियों के कार्यों को उजागर करने के लिये एक नई विधा से हमारा परिचय करवाया है। मुझे उम्मीद है कि जल्दी ही हमें निखिल कौशिक पर निर्मित डाक्युमेंटरी भी देखने को मिलेगी। कार्यक्रम में निखिल कौशिक ने दर्शकों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।

अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मीरा कौशिक, उषा राजे सक्सेना, बीबीसी के नरेश कौशिक और शिवकांत, श्री इस्माइल चुनारा, श्रीमती अरुणा अजितसरिया, निखिल गौर, अरुण बेदी आदि भी शाम को सफल बनाने के लिये मौजूद थे।

: दीप्ति शर्मा

जलेस मासिक काव्ययगोष्ठीन हिंदी दिवस को समर्पित

कोटा २६ सितम्बर। जनवादी लेखक संघ की मासिक काव्यट गोष्ठी माह के अंतिम रविवार को हिंदी दिवस को समर्पित रही। जलेस कार्यकारिणी ने सर्वप्रथम तलवंडी स्थित अपने कार्यालय में प्रख्यात साहित्य कार कन्हैया लाल नंदन के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। जलेस की प्रगतिशील परम्परा की उदारता के चलते सर्वप्रथम जलेस और शहर के प्रिय क्रांतिकारी रचनाकार ब्रजेश सिंह झाला ‘पुखराज’ के महावीर नगर प्रथम पर स्थित निवास पर दोपहर ढाई बजे गोष्ठी का शुभारंभ ‘पुखराज’ की सरस्वरती वंदना से हुआ।

आरंभ में लाखेरी से पधारे शायर सुनील एस- उर्मिल मुख्यठ अतिथि और शहर के जाने माने साहित्यमकार सूरजमल जैन ने अध्यसक्ष के रूप में आसन ग्रहण किया। जलेस अध्यक्ष श्री रघुनाथ मिश्र ने पधारे अतिथियों का स्वागत करते हुए गोष्ठी को हिंदी दिवस (१४ सितम्बर) को समर्पित कर सभी पधारे साहित्य कारों रचनाकारों को हिंदी पर अपनी रचनाओं की प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया। उन्होंषने राष्ट्रभाषा के संवर्द्धन, प्रोत्साहन, और संरक्षण पर जोर देते हुए हिंदी की अथक यात्रा के बारे में अपना सारगर्भित वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का संचालन अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रिका ‘दृष्टिकोण’ के प्रबंध सम्पादक और कवि नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ‘मोती’ को सौंपा गया। काव्यरपाठ का आरंभ कवि महेंद्र शर्मा की कविता ‘गलत चुना तो पछताएगी, बोल जिंदगी किधर जाएगी’ से हुआ। इसी बीच जयपुर के जाने माने ग़ज़लकार अखिलेश तिवारी के आने से माहौल में ताजगी आ गयी। कविता के बाद श्री तिवारी को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। ‘पानी को तो पानी लिख’ काव्यत संग्रह के रचनाकार श्री आर सी शर्मा आरसी ने अपनी प्रख्यात रचना ‘एक अरसे की अनबुझी प्यास हूँ, पार्थ का दिग्भ्रमित आत्म विश्वास हूँ, जो महल मेरे सपनों का हो न सका, मैं उसी का अधूरा शिलान्या‍स हूँ’ सुना कर धीरे-धीरे गोष्ठी को ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। सतीश मीणा ने ‘हरियाली के बीच रंग गया, नंदकिशोर अनमोल ने ‘हम हिंदी हैं गर्व हमें कि हिंदुस्ताशन हमारा’ गीत से हिंदी और हिंदुस्तानी होने पर गर्व जताया, बीच-बीच में नवराचनाकारों को जोश दिलाते हुए संचालक नरेंद्रचक्रवती ‘मोती’ ने अपनी ग़ज़ल सुनाई ‘गाहे बगाहे क़लम चलाया करो, ‘गीतांकुर’ से फि‍र चर्चा में आये छोटी बहर के रचनाकार शायर डॉ0 नलिन ने ग़ज़ल सुनाई ‘यह सदा है चाक सीने की, तमन्नात है और जीने की’, शहर की उभरती कवयित्री प्रमिला आर्य ने अपना गीत ‘गर तू पाना चाहे मंजिल, आशाओं के दीप जला’ गाकर दाद बटोरी, शरद तैलंग की ग़ज़ल ‘बात दलदल की करे जो कंवल क्या, समझे, दर्द जिसने न सहा हो वो ग़ज़ल क्या समझे’ सुन कर तालियों से गोष्ठी गूँज उठी, महेंद्र नेह ने जनवादी कविता ‘उन्होंने हमारे हाथों से छीने औजार खाली हाथ रह गये, उन्हों ने हमें जलालत दी हम उसे भी सह गये ‘ सुना कर सफ़दर हाशमी की याद ताजा कर दी। डॉ0 गयास फ़ाईज़ ने शृंगार रस की ग़जल से माहौल को नई ऊँचाई प्रदान की ‘तेरी यादों तेरे खयालों में, खो गया हूँ मैं उजालों में, बन सँवरने की क्या ज़रूरत है, अच्छे लगते हो बिखरे बालों में’, राष्ट्रभाषा के प्रति सम्मान में क्रांतिकारी कवि पुखराज ने जहाँ सरस्वती वंदना हिंदी की सशक्त कविता से की, वहीं अपने काव्य पाठ में राष्ट्र के प्रति अपने प्रेम को ‘रक्त के कतरों से सींचा है जहॉं सारा चमन, अश्रुपूरित नयन करते उन शहीदों को नमन’ सुना कर जलेस की गरिमा को बढ़ाया। शायर इमरोज ने हिंदी दिवस को समर्पित ग़ज़ल सुनाई ‘तुम्हामरे सामने हिंदी ग़ज़ल एलान कर देगी, तेरी भाषा विवादों का सफ़ा मैदान कर देगी’ सुनाई। वयोवृद्ध और वरिष्ठ कवि निर्मल पाण्डेाय ने अपनी कविता से संकल्प की बात की ‘हो कठिन पर्वत मगर संकल्प हो, दृढ़ चरण धर कर किसी अंजाम को देंगे। पार्थ ने फि‍र रख दिया गांडीव धरती पर, यह खबर हम खासकर घनश्याम को देंगे’, प्रख्यात शायर पुरुषोत्तम यक़ीन ने आज की ग़रीबी और महंगाई पर व्यंग्य सुनाया ‘जिंदगी की व्यथायें क्यों लिख दीं, इतनी महंगी दवायें क्यों लिखदीं’। अन्यु रचनाकारों रघुनंदन हठीला, शकूर अनवर, अखिलेश तिवारी, सुनील उर्मिल, अखिलेश अंजुम, गोरस प्रचंड, आर सी गुप्ताघ, सुरेंद्र गौड़, हलीम आईना, चाँद शेरी, ओम नागर, वेद प्रकाश परकाश, इमरोज, शून्यारकांक्षी, वैभव सौमानी, आनंद हजारी ने भी अपनी अपनी रचनायें पढ़ीं।

कार्यक्रम के अंत में श्री मिश्र ने जयपुर से पधारे साहित्यहकार श्री अखिलेश तिवारी को ‘आकुल’ की पुस्तक ‘जीवन की गूँज’ और स्वयं की पुस्तजक ‘सोच ले तू किधर जा रहा है’ भेंट कर उन्हें सम्मानित किया। तीन घंटे चली गोष्ठी में शामिल शहर के साहित्यस संस्थानों विकल्प’, आर्यावर्त आदि के प्रतिनिधियों और लगभग ३५ रचनाकारों साहित्य कारों ने उपस्थित हो कर जलेस गोष्ठीन को समारोह का रूप दे दिया और समारोह को साहित्य रस से सराबोर कर अविस्मररणीय बना दिया।

गोपाल कृष्ण् भट्ट ‘आकुल’ नरेंद्र कुमार चक्रवर्ती ‘मोती’
शहर अध्यषक्ष जलेस, कोटा शहर सचिव जलेस, कोटा

संस्कार ने मनाया हिन्दी सप्ताह

(चित्र में- श्री धर्म प्रकाश जैन पुरस्कार प्राप्त करते हुए)
१९ सितम्बर २०१० को पूर्वी दिल्ली की साहित्यिक–सांस्कृतिक संस्था द्वारा हिन्दी दिवस का भव्य आयोजन किया गया । कार्यक्रम का शुभारंभ “असतो मा सदगमय” के उदघोष से हुआ। “ वर्षा की एक बूँद” विषय पर वक्ताओं ने काव्य अभिव्यक्तियाँ प्रस्तुत कीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. हेम भटनागर ने व संचालन रिया शर्मा ने किया। मुख्य अतिथि प्रख्यात लेखक श्री दिनेश मिश्र जी ने वर्ष २०१०-२०११ के लिये संगच्छध्वं हिन्दी सम्मान श्री धर्म प्रकाश जैन को प्रदान किया। मंगल अक्षत पुरस्कार श्रीमती मंजुला श्रीवास्तव को दिया गया । हिन्दी की पुस्तकों की प्रदर्शनी १८ चित्र विहार में सप्ताह भर आयोजित की गई। मुख्य अतिथि ने अपने अभिभाषण में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये संस्कार के योगदान की सराहना की।

मीना जैन