रविवार, 25 अप्रैल 2010

डॉ.अजय जन्मेजय के सम्मान में काव्य संध्या


कोटा : बाल साहित्य पर अनेक सम्मान प्राप्त चर्चित साहित्यकार, ग़ज़लकार एवं चिकित्सक डॉ, अजय जन्मेजय के सम्मान में कोटा में एक काव्य संध्या का आयोजन गज़ल एवं गीतकार आर.सी.शर्मा ने निवास पर किया गया जिसमें कोटा के अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। डॉ. जन्मेजय ने भी कुछ बाल गीत एवं ग़ज़लें सुनाकर रंग जमाया।

कार्यक्रम का प्रारम्भ काव्य संध्या की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार रमेश चन्द्र गुप्त रेल्वे के मण्डल परिचालन प्रबंधक श्री सुवीर श्रीवास्तव तथा डॉ. जन्मेजय ने माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण करके एवं द्वीप प्रज्वलित कर के किया। आर.सी.शर्मा ’आरसी’ ने सरस्वती वन्दना प्रस्तुत की। काव्य संध्या में डॉ.इन्द्र बिहारी सक्सेना, नरेन्द्र कुमार शर्मा, आर.सी.शर्मा ’आरसी’, शरद तैलंग, वीरेन्द्र विद्यार्थी, आर.सी.गुप्ता, तथा सुवीर श्रीवास्तव ने भी अपनी रचनाएं सुनाई। इस अवसर पर डॉ. जन्मेजय द्वारा कन्या भ्रूण ह्त्या के विरोध में उनकी रचना पर निकाले गए पोस्टर का भी प्रदर्शन किया। काव्य संध्या का संचालन वीरेन्द्र विद्यार्थी ने किया।

संलग्न चित्र : बाएँ से :- साहित्यकार नरेन्द्र कुमार शर्मा, वीरेन्द्र विद्यार्थी, डॉ.इन्द्र बिहारी सक्सेना, रमेश चन्द्र गुप्त, डॉ. अजय जन्मेजय, आर.सी.शर्मा ’आरसी’, एवं शरद तैलंग।

शरद तैलंग

सोलहवें कथा यू.के. सम्मान की घोषणा

कथा (यू के) के महा सचिव एवं प्रतिष्ठित कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा ने लंदन से सूचित किया है कि वर्ष 2010 के लिए अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान कहानीकार और रंगकर्मी हृषीकेश सुलभ को राजकमल प्रकाशन से 2009 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह वसंत के हत्यारे पर देने का निर्णय लिया गया है। इस सम्मान के अन्तर्गत दिल्ली-लंदन-दिल्ली का आने-जाने का हवाई यात्रा का टिकट (एअर इंडिया द्वारा प्रायोजित) एअरपोर्ट टैक्स़, इंगलैंड के लिए वीसा शुल्क़, एक शील्ड, शॉल, लंदन में एक सप्ताह तक रहने की सुविधा तथा लंदन के खास-खास दर्शनीय स्थलों का भ्रमण आदि शामिल होंगे। यह सम्मान श्री हृषीकेश सुलभ को लंदन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 08 जुलाई 2010 की शाम को एक भव्य आयोजन में प्रदान किया जायेगा। सम्माीन समारोह में भारत और विदेशों में रचे जा रहे साहित्यय पर गंभीर चिंतन भी किया जायेगा।

इंदु शर्मा मेमोरियल ट्रस्ट की स्थापना संभावनाशील कथा लेखिका एवं कवयित्री इंदु शर्मा की स्मृति में की गयी थी। इंदु शर्मा का कैंसर से लड़ते हुए अल्प आयु में ही निधन हो गया था। अब तक यह प्रतिष्ठित सम्मान चित्रा मुद्गल, संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, विभूति नारायण राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी, नासिरा शर्मा और भगवान दास मोरवाल को प्रदान किया जा चुका है।

15 फ़रवरी 1955 को बिहार के छपरा में जनमे कथाकार, नाटककार, रंग-समीक्षक हृषीकेश सुलभ की विगत तीन दशकों से कथा-लेखन, नाट्‌य-लेखन, रंगकर्म के साथ-साथ सांस्कृतिक आन्दोलनों में सक्रिय भागीदारी रही है। आपके तीन कहानी संग्रह बँधा है काल, वधस्थल से छलाँग और पत्थरकट - एक जिल्द में तूती की आवाज़ के नाम से प्रकाशित।
आपको अब तक कथा लेखन के लिए बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, नाट्‌यलेखन और नाट्‌यालोचना के लिए डा. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, और रामवृक्ष बेनीपुरी सम्मान मिल चुके हैं। इस कार्यक्रम के दौरान भारत एवं विदेशों में रचे जा रहे हिन्दी साहित्य के बीच के रिश्तों पर गंभीर चर्चा होगी।

वर्ष 2010 के लिए पद्मानन्द साहित्य सम्मान इस बार संयुक्तन रूप से श्री महेन्द्र दवेसर दीपक को मेधा बुक्सन, दिल्ली् से 2009 में प्रकाशित उनके कहानी संग्रह अपनी अपनी आग के लिए और श्रीमती कादम्बारी मेहरा को सामयिक प्रकाशन से प्रकाशित उनके कहानी संग्रह पथ के फूल के लिए दिया जा रहा है। दिल्लीु में 1929 में जन्मेल श्री महेन्द्रन दवेसर ‘दीपक’ के इससे पहले दो कहानी संग्रह पहले कहा होता और बुझे दीये की आरती प्रकाशित हो चुके हैं। दिल्ली में ही जन्मीक श्रीमती कादम्बलरी मेहरा अंग्रेज़ी में एम.ए. हैं और उन्हें वेबज़ीन एक्सेलनेट द्वारा साहित्य सम्मान मिल चुका है। इससे पहले उनका एक कहानी संग्रह कुछ जग की प्रकाशित हो चुका है।

इससे पूर्व इंगलैण्ड के प्रतिष्ठित हिन्दी लेखकों क्रमश: डॉ सत्येन्द श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेन्दु विमल, डा.अचला शर्मा, उषा राजे सक्से ना,गोविंद शर्मा, डा. गौतम सचदेव, उषा वर्मा और मोहन राणा को पद्मानन्द साहित्य सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

कथा यू.के. परिवार उन सभी लेखकों, पत्रकारों, संपादकों मित्रों और शुभचिंतकों का हार्दिक आभार मानते हुए उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करता है जिन्होंने इस वर्ष के पुरस्कार चयन के लिए लेखकों के नाम सुझा कर हमारा मार्गदर्शन किया और हमें अपनी बहुमूल्य संस्तुतियां भेजीं।

सूरज प्रकाश

हंगरी में हिंदी का वसंतोत्सव- हिंदी दिवस

(चित्र में- महामहिम रंजीत राय जी प्रधानमंत्री का संदेश पढ़ते हुए)
27 मार्च 2010 को बुदापैश्त, हंगरी के ओत्वोश लोरांद विश्विद्यालय के भारतीय विद्या अध्ययन विभाग एवं भारतीय दूतावास के सहयोग से विश्व हिंदी दिवस का आयोजन किया गया। भारत व हिंदी- प्रेमी हंगेरियन व हंगरी में रहनेवाले भारतीय जन इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए बुदा की पहाड़ियों में स्थित मोरित्स जिगमौंड जिमनेजियम के हॉल में एकत्रित हुए। इस उत्सवी माहौल को हंगारी लड़कियों की भारतीय वेशभूषा और अधिक रंगीन बना रही थी। कहीँ उनकी चूड़ियाँ खनक रही थीं तो कहीं उनके दुपट्टे लहरा रहे थे। एक दो महिलाएँ तो साड़ी भी पहने थीं जो पिनें लगी होने के बाद भी उनसे मुश्किल से सँभल रही थीं। यह इस अवसर का ही महत्व था कि इसके लिए कुछ छात्रों ने विशेष रूप से भारतीय पोशाकें खरीदीं थीं।

शिवशक्ति कलानंद तानसिन्हाज़ की हंगारी नृत्यांगनाओँ द्वारा प्रस्तुत गणेश वंदना के साथ कार्यक्रम का प्रारंभ हुआ। इसके बाद श्रीमती गरिमा मोहन द्वारा गाई सरस्वती वंदना पर दो छोटी बालिकाओं ने नृत्य प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि हंगरी में भारत के राजदूत महामहिम रंजीत राय ने इस अवसर पर प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी का हिंदी दिवस के अवसर पर विश्व को दिया संदेश पढ़कर सुनाया। महामहिम जी ने हंगारी लोगों में बढ़ते हिंदी प्रेम की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने हंगरी में बढ़ते हिंदी के दायरे को सराहा। उन्होंने ऐल्ते में प्रतिनियुक्त अतिथि प्राचार्य प्रमोद कुमार शर्मा द्वारा संपादित हिंदी- भित्ति पत्रिका ‘प्रयास’ का उल्लेख करते हुए उसको निरंतर चलाए रखने के लिए विभाग को बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि दूतावास की ओर से इस तरह के कार्यक्रमों के आयोजन के लिए भविष्य में भी पूरा-पूरा सहयोग मिलता रहेगा।। हंगरी में ऐल्ते विश्वविद्यालय के अलावा दूतावास की ओर से भी दो स्तरों पर सांध्यकालीन हिंदी कक्षाएँ चलाई जाती हैं और एक व्याख्यानमाला का भी आयोजन किया जाता है। इन कक्षाओं का संचालन प्रसिद्ध हिंदी-विदुषी डॉ. मारिया नज्यैशी करती हैं। इन सभी कक्षाओं में हंगेरियन या अन्य देशों के छात्र ही अध्ययन करते हैं भारतीय नहीं।
अतिथि प्राचार्य डॉ. शर्मा ने विभाग की हिंदी संबंधी गतिविधियों के बारे में संक्षिप्त रूप से बताया। (चित्र में- शिवशक्ति कलानंद समूह की नर्तकियाँ गणेश वंदना प्रस्तुत करते हुए।)

इसके बाद आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में हंगेरियन व भारतीय छात्रों और हिंदी प्रेमियों ने गीत-संगीत, कविताओँ और नृत्य से समाँ बाँध दिया। कार्यक्रम का सबसे बड़ा आकर्षण था हंगरी के प्रसिद्ध उपन्यासकार मोरित्स जिगमोंड के लोकप्रिय हंगेरियन किशोर उपन्यास ‘पॉल स्ट्रीट फ्यूक’ के एक अंश ‘पुटी क्लब’ का हिंदी में मंचन। इसका अनुवाद एवं नाट्य-रूपांतरण अतिथि प्राचार्य ने किया था। नाटक के पात्रों वैईज, कोल्नई, प्रो. रात्ज़ द्वारा हिंदी में बोले गए संवादों ने दर्शकों का मन मोह लिया।
महामहिम रंजीत राय जी के हंगरी में कार्यकाल की समाप्ति का अवसर निकट होने के कारण अध्यापकों व छात्रों ने एक पारंपरिक हंगारी विदाई गीत गाकर उन्हें भावभीनी विदाई दी।

विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओँ के विजेताओँ व विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कार प्रदान किए गए। मंच संचालन का कार्य श्री यशपाल और सुश्री दाविद क्रिस्टी ने किया था। कार्यक्रम का समापन दूतावास के द्वितीय सचिव (संस्कृति)श्री वी. वी. मोहन के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ।

--डॉ. गीता शर्मा, बुदापेश्त, हंगरी

अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का लोकार्पण

कोलकाताः भारतीय भाषा परिषद सभागार में 6 अप्रैल 2010 मंगलवार की शाम अभिज्ञात के कहानी संग्रह 'तीसरी बीवी' का लोकार्पण करते हुए कथाकार संजीव ने कहा- अभिज्ञात के रूप में कहानी का फिर एक तारा चमका है। एक जीवंत कथाकार की पुस्तक 'तीसरी बीवी' के लोकार्पण में मैं खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। वे उम्र में छोटे हैं, लेकिन उनके अनुभव की एक बड़ी दुर्जेय दुनिया है जो उनके डेग और डग को विरल और विशिष्ट बनाती है।

उन्होंने कहा कि मैंने उनकी दो कहानियां हंस में छापी हैं। उनकी कहानियों के जो पारिवारिक दायरे हैं उनमें द्वंद्व के नये क्षेत्र, आस्था के नये बिन्दु हैं। उन्होंने समकालीन कथासंसार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे धन्य हैं जो प्रयोग के लिए प्रयोग और कला के कला का सहारा लेते हैं। पुनरुत्थानवाद फिर आ गया है जिसके परचम लहराये जा रहे हैं। नये कथाकारों की फौज़ आयी है। भाषा के एक से एक सुन्दर प्रयोग हो रहे हैं। अगर अपनी आत्ममुग्धता को सम्भाल लें तो बहुत है। अभिज्ञात की राह उनसे अलग है। मेरे पास हंस में प्रकाशनार्थ रोज दस से बाहर कहानियां आती हैं। भूमंडलीकरण का प्रकोप मुझ पर भी पड़ा है और कनाडा से लेकर स्पेन तक से फ़ोन आते हैं कि मुझे बताइये मेरी कहानी क्यों नहीं छपेगी। मैं विनम्र निवेदन करता हूं कि साहित्य कूड़ेदान नहीं है। इसमें युयुत्सा व घृणा के लिए जगह नहीं है। मैं कहता हूं साहित्य की शर्त पर आओ। लोग पूछते हैं तो शर्त बतायें क्या शर्त है साहित्य की। मैं कहता हूं-एक ही शर्त है साहित्य की, वह है उदात्तता। वह नहीं है तो शर्त पूरी नहीं होती। अभिज्ञात ने धीमे अन्दाज में उधर कदम बढ़ाये हैं। धन्यवाद के पात्र हैं। क्रेज़ी फ़ैण्टेसी की दुनिया, मनुष्य और मत्स्यकन्या, देहदान जैसी कहानियां बिल्कुल निराले अन्दाज़ की कहानियां हैं। देहदान कहानी में लाश को टुकड़े-टुकड़े काटकर बेच दिया जाता है और बता दिया जाता है कि लाश को चूहे खा गये। संजीव ने कहा कि दलित, नारी, शोषण तक कहानी का दायरा सिमटा हुआ था। अभिज्ञात ने दायरे का विस्तार किया है। आस्मां और भी हैं। उनसे मुक्त नहीं हो सकते। पीछे मुड़ के मत देखिये। द्वंद्व, आस्था के नये दिगंत खोले हैं। नये अनछुए दिगंत खोले हैं। कहानी में बिम्ब कैसे बनते हैं और किस प्रकार के निर्वाह से वे अलंकरण नहीं रह जाते इसका निर्वाह बड़ी कला है। इससे भाषिक संरचनाएं दीर्घजीवी हो जाती हैं। अभिज्ञात जी ने विज्ञान को लेकर मिथ बनाया है। कैसे मिथ बनता है यह उनकी कहानी में देखने लायक है।

कार्यक्रम की शुरुआत हितेन्द्र पटेल के वक्तव्य से हुई। उन्होंने कहा तीसरी बीवी की कहानियों पर कहा कि वे कई बार असुरक्षित परिवेश में रह रहे लोगों की ज़िन्दगी से अपनी कहानियां एक संवेदनशील तरीके से उठाते हैं। 'उसके बारे में' कहानी ऐसी ही कहानी है। जिसमें दर्द के रिश्ते की शिनाख्त की गयी है। असुरक्षित होते लोगों की बेचैन कहानियां ऐसी हैं जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा होनी चाहिए। जबकि 'क्रेजी फैंटेसी की दुनिया' इससे भिन्न एक क्लासिक फलक वाली है। इन कहानियों में वह तत्व है जिसे निर्मल वर्मा के शब्दों में 'मनुष्य से ऊपर उठने का साहस' कहा है।

जीवन सिंह ने कहा कि क्रैजी फैंटेसी की दुनिया में कहा गया है कि शासन बदलता है लेकिन तंत्र नहीं बदलता। यह वस्तुस्थिति की गहरी पड़ताल से उन्होंने जांचा परखा है। लेखक जिन स्थितियों में जी रहा है उससे लिखने की रसद कैसे प्राप्त करता है उसका उदाहरण कायाकल्प जैसी कहानियां हैं। अभिज्ञात की 'जश्न' जैसी कहानियों में एक विद्रोह है, जो थमना नहीं चाहता है, नजरुल की तरह-'आमी विद्रोही रणक्रांत'। अरुण माहेश्वरी ने कहा कि 'तीसरी बीवी' संग्रह की कहानियां पढ़कर राजकमल चौधरी की याद आती है। इन्हें पढ़कर एक गहरा व्यर्थताबोध, डिप्रेशन पैदा होता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ बंगला कवि अर्धेन्दु चक्रवर्ती ने की। कार्यक्रम का संचालन भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ.विजय बहादुर सिंह ने किया।

लंदन में सचिन देव बर्मन – यादों के साये में कार्यक्रम का आयोजन


लंदन, एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स, लंदन एवं कथा यू.के. द्वारा नेहरू सेन्टर, लदन में आयोजित कार्यक्रम सचिन देव बर्मन – यादों के साये में आयोजित किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजन्द्र शर्मा ने कहा, “अराधना में पहली बार राजेश खन्ना पर किशोर कुमार की आवाज़ का इस्तेमाल करके सचिन देव बर्मन ने हिन्दी सिनेमा के संगीत को एक नई राह दिखाई। इस फ़िल्म के बाद एक नहीं दो दो सुपर स्टारों ने जन्म लिया – राजेश खन्ना ने एक्टर के तौर पर और किशोर कुमार ने गायक के तौर पर।”

अपने पौने दो घन्टे के पॉवर पाइण्ट प्रेज़ेन्टेशन में तेजेन्द्र शर्मा ने सचिन देव बर्मन द्वारा संगीत बद्ध गीतों के विडियो भी दिखाए जिनमें मेरा सुन्दर सपना बीत गया (भाई भाई), ठण्डी हवाएं लहरा के गाएं (नौजवान), जलते हैं जिसके लिये... (सुजाता), ओ रे मांझी... (बंदिनी), तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले (सज़ा), सर जो तेरा चकराए (प्यासा), इक लड़की भीगी भागी सी (चलती का नाम गाड़ी), इक घर बनाऊंगा (तेरे घर के सामने), कांटों से खींच कर ये आंचल (गाईड), होंठों में ऐसी बात (ज्वैल थीफ़), मेरे सपनों की रानी (अराधना)।

तेजेन्द्र शर्मा ने दिल की रानी (1947) का गीत ऐ दुनिया के रहने वालो बोलो कहाँ गया वो चोर दिखा कर दर्शकों को चकित कर दिया जब उन्होंने राज कपूर को अपनी ही आवाज़ में सचिन देव बर्मन के संगीत में झूम झूम कर गाते हुए देखा।
बर्मिंघम के जाने माने गायक डा. अजय त्रिपाठी ने मंच पर आकर जाने वो कैसे लोग थे जिनके (प्यासा) और बड़ी सूनी सूनी है.. (मिली) के गीत कैरिओकी संगीत पर गा कर दर्शकों का मन जीत लिया।

अपने शोधपूर्ण संचालन में तेजेन्द्र शर्मा ने दर्शकों को बहुत सी ऐसी जानकारी दी कि दर्शक विस्मित हुए बिना नहीं रह पाए। राहुल देव बर्मन द्वारा बचपन में बनाई गई दो धुनों का सचिन देव बर्मन का फ़ंटूश एवं प्यासा फ़िल्मों में इस्तेमाल; ऑल इंडिया रेडियो के प्रख्यात बांसुरी वादक पन्ना लाल घोष द्वारा अपनी धुन जीना है इस जहान में तो मुस्कुराइये की चोरी का बर्मन दादा पर आरोप; सचिन देव बर्मन द्वारा फ़िल्मों में कैबरे गीतों की शुरूआत; साहिर लुधियानवी, शैलेन्द्र, कैफ़ी आज़मी और मजरू सुल्तानपुरी जैसे साहित्यिक शायरों एवं गीतकारों की रचनाओं का अपनी फ़िल्मों के लिये इस्तेमाल जैसी बहुत सी जानकारी तेजेन्द्र शर्मा के अनूठे संचालन से श्रोताओं को मिली।

नेहरू सेन्टर के उप-निर्देशक श्री राजेश श्रीवास्तव ने कार्यक्रम का परिचय दिया। एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के उपाध्यक्ष श्री शमील चौहान ने श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा, “बंगाल के रवीन्द्र संगीत की मिठास, शास्त्रीय संगीत की गहराई और मॉडर्न संगीत की थाप मिल कर सचिन देव बर्मन का संगीत बनाते हैं।”

कार्यक्रम में लंदन, बर्मिंघम, वूलवरहैम्पटन एवं मैन्चैस्टर शहरों के संगीत प्रेमियों ने भाग लिया जिनमें डा. मधुप मोहता, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार, प्रो. मुग़ल अमीन, प्रो. श्याम मनोहर पाण्डे, डा. बोस, बीबीसी हिन्दी की पूर्व अध्यक्ष डा. अचला शर्मा, दिव्या माथुर, ग़ज़ल गायक सुरेन्द्र कुमार, कथाकार महेन्द्र दवेसर, नाटककार इस्माइल चुनारा, रक्षा संघानी, पत्रकार मंजी पटेल वेखारिया आदि शामिल थे।

--दीप्ति शर्मा

उपन्यासकार श्री अभिमन्यु अनत के मुंबई आगमन पर कथा यू.के. द्वारा गोष्ठी का आयोजन


मॉरीशस के प्रख्यात कथाकार, उपन्यासकार श्री अभिमन्यु अनत के मुंबई आगमन पर कथा यू.के. ने एक अनौपचारिक गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी के आरंभ में पुष्पा भारती जी ने भारतीयों लोगों के मारिशस में जाने, वहाँ सषंर्घ करने और पीढि़यों तक हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद वहाँ के समाज, संस्कृति और राजनीति में अपनी जगह बनाने की रोचक लेकिन लोमहर्षक कथा सुनाई। पुष्पा जी की बात से अपनी बात शुरू करते हुए अनत जी ने बताया कि वहाँ गए लोगों पर जो अत्याचार किये गए, वे उन्हें ले जाने वाले पानी के जहाजों से ही शुरू हो गये थे लेकिन हर तरह की तकलीफें भोगते हुए भी उन अनपढ़, भले और भोले भारतीयों ने मारीशस के खेतों से सचमुच चीनी के रूप में व्हा़इट गोल्ड पैदा करके दिखाया और मारीशस की अर्थ व्यवस्था को बदल कर रख दिया। अनत जी ने बताया उन्होंने खुद खेतों में काम किया है और मार खायी है। उन्होंने ये भी बताया कि लाल पसीना के नायक उनके सगे मामा थे। इस उपन्यास का अनुवाद फ्रेंच सहित कई भाषाओं में हुआ है।

अनत जी ने मारीशस में भारतीयों की दशा, भाषा के प्रति उनके प्रेम और भारतीयता के प्रति उनके आदर की बात बतायी और इस बा‍त पर दुख प्रकट किया कि उन्हें भारत में लोग भाषाओं के प्रति ज्य़ादा ही लापरवाह लगे और कहा कि यहाँ कोई भी भाषा न तो सही बोली जाती है और न ही लिखी ही जाती है जबकि मारीशस के लोग भाषा की शुद्धता के प्रति सतर्क हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वे भारत आ कर, भाषा, संस्कृ ति और समाज के बदलते मूल्यों को ले कर निराश होते हैं तो अनत जी ने कहा कि अब वे इस तरह के बदलावों के लिए तैयार हो कर आते हैं और मन पर कोई बोझ नहीं रखते। उन्होंने इस बात पर अवश्य दुख प्रकट किया कि यह अवमूल्यन सब जगह है और मारीशस की फिल्मों , टीवी के कार्यक्रमों में भी और भोजपुरी भाषा में भी इस तरह की गिरावट और बाज़ारूपन आने लगा है। कवि रमन जी ने बताया कि भारत में तो भोजपुरी भाषा का यह आलम है कि वह पूरी तरह से अश्लील गीतों, फिल्मों और लटकों, झटकों में फंस गयी है। कभी पंजाबी और गुजराती भाषाएँ भी इस तरह के दौर से गुजर चुकी हैं। एक और सवाल के जवाब में अनत जी ने बताया कि मारीशस में पहली कक्षा से ले कर शोध के स्तार तक हिंदी का पठन पाठन हो रहा है और मुफ्त में हो रहा है।

यह पूछे जाने पर कि वे अपनी किस किताब पर फिल्म बनवाया जाना पसंद करेंगे और क्यों तो उन्होंने लहरों की बेटी का नाम लिया। उनके विचार से इसमें मछुआरों के जीवन को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने ये भी बताया कि वे अब तक 72 पुस्तकें लिख चुके हैं और इनमें से कई रेडियो और टीवी पर प्रसारित होती रही हैं। अपने बाद की पीढ़ी के हिंदी लेखन के प्रति अनत जी आश्वस्त नज़र आये और उन्होंने कई नाम गिनाये लेकिन वहाँ के हिंदी प्रकाशनों को ले कर वे संतुष्ट‍ नहीं थे। ये पूछे जाने पर कि उनका साहित्य समाज को क्या संदेश देता है तो उन्होंने जवाब दिया कि अगर संदेश ही देने का काम करना होता तो वे डाकिया बनना पसंद करते। साहित्यकार का काम सवाल उठाना होता है और वे ये काम बखूबी कर रहे हैं।

लगभग ढाई घंटे चली इस गोष्ठी में मुंबई का लगभग पूरा कथा साहित्य समुदाय उपस्थित था। गोविंद मिश्र, आबिद सुरती, विश्वनाथ सचदेव, पुष्पा भारती, सूर् बाला, आर के पालीवाल, धीरेन्द्र अस्थागना, हरियश राय, रमेश राजहंस, रमन मिश्र, शैलेंद्र गौड, कुलदीप, अनूप सेठी, दिनेश लखनपाल, संजय उपाध्याय, राजम नटराजम पिल्लै, रत्ना झा, प्रतिमा शर्मा आदि ने उपनी उपस्थिति से इस गोष्ठी को गरिमा प्रदान की।

मधु अरोड़ा,
मुंबई।