रविवार, 28 मार्च 2010

लंदन में रमा पाण्डेय की डी.वी.डी. का लोकार्पण

हाल ही में लंदन के नेहरू सेंटर में निर्माता, निर्देशिका व लेखिका रमा पाण्डेय की भारतीय मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी पर लिखे नाटक संकलन फ़ैसले एवं उन नाटकों पर बने डी.वी.डी. का लोकार्पण समारोह कथा यूके द्वारा आयोजित किया गया। इस अवसर पर बोलते हुए काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी ने कहा, “रमा पाण्डेय की नायिकाएं दबी कुचली नारियां नहीं हैं। वे सब अपने अपने परिवेश में विद्रोह का बिगुल बजाने की क्षमता रखती हैं। ज़कीया ज़ुबैरी ने आगे कहा, “रमा पाण्डेय केवल ग़रीब तबक़े की महिलाओं के बारे में बात नहीं करती हैं। वे पूरी शिद्दत से महसूस करती हैं कि मुसलमानों के पढ़े लिखे वर्ग में भी औरत की हैसियत दोयम दर्जे की ही है। एक तरफ़ सुलताना, हाजरा और शाइस्ता ग़रीब और पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं तो वहीं सियासत, रेड और परवीन की नायिकाएं मुस्लिम समाज के पढ़े लिखे तबक़े से आती हैं।... रमा पाण्डेय का हर नाटक समाज को सच्चा आइना दिखाता है।”

कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रतिष्ठठित पत्रकार, साहित्यकार एवं कथा यू.के. की उपध्यक्षा डा. अचला शर्मा ने रमा पाण्डेय के नाटकों एवं टेलिफ़िल्म पर सारगर्भित टिप्पणी करते हुए कहा, “हीरो बनने के लिए कोई बहुत बड़ा काम करने की ज़रूरत नहीं होती. छोटे छोटे क़दम, छोटी छोटी कोशिशें, छोटे छोटे फ़ैसले भी एक आम व्यक्ति को, अपनी नज़र में और कुछ लोगों की नज़र में हीरो बना सकते हैं. ऐसी ही कुछ हीरोइनें रमा पांडे की किताब फ़ैसले और उस पर आधारित फिल्म श्रृंखला की नायिकाएँ हैं. फ़ैसलों तक पहुँचने का सफ़र एक परंपरावादी परिवार में जन्मी, पली-बढ़ी किसी भी लड़की के लिए आसान नहीं होता. इसके लिए बड़ी हिम्मत जुटानी पड़ती है, कुछ बग़ावत भी करनी पड़ती है. और फिर लड़की अगर ग़रीब, अपढ़, मुस्लिम परिवार की हो तो उसे दुगुनी-चौगुनी हिम्मत की ज़रूरत होती है. रमा पांडेय ने ऐसी ही कुछ आम मुस्लिम लड़कियों के साहसी फ़ैसलों को किताब और फ़िल्म की शक्ल दी है. और इस नाते वे ख़ुद किसी हीरोईन से कम नहीं हैं.”
कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने रमा पाण्डेय की फ़िल्म सुल्ताना पर टिप्पणी करते हुए कहा, “रमा जी की फ़िल्म मुस्लिम औरत की दो स्थितियों का चित्रण करती है। पहली स्थिति जिसके विरुद्ध वे टिप्पणी करना चाहती हैं और दूसरी स्थिति जिसमें वे अपनी नायिका को देखना चाहती हैं। उनके सभी नाटक सकारात्मक अंत लिये हैं।” पश्तो की लेखिका सोफ़िया हलीमी का कहना था कि इस किताब के पृष्ठों का अनुवाद जरूरी है, ताकि यह बात उन सभी लोगों तक पहुंचे जिनके बारे में यह सीरियल बना है.

प्रश्न काल के दौरान रमा पाण्डेय ने दर्शकों को बताया कि उनके सभी नाटकों की नायिकाएं हाड़-मांस की जीती जागती नारियां हैं। अपने नाटकों में मुस्लिम चरित्रों के बारे में उन्होंने बताया कि वे चाहती थीं कि दुनियां को दिखा सकें कि मुस्लिम औरतें भी विद्रोह करना जानती हैं। अपने 26 एपिसोड के सीरियल के बारे में उन्होंने आर्थिक समस्याओं का भी ज़िक्र किया। अपनी रंगरेज़ नायिका सुल्ताना द्वारा बनाए हुए दुपट्टे एवं अन्य सामग्री दर्शकों के ख़रीदने के लिये उपलब्ध करवाई गईँ थीं। पूरे सभागार को जयपुर के रंगरेजों द्वारा बनाये गए रंगीन दुपट्टों से सजाया गया था।

कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त जाने-माने अग्रेज़ी उपन्यासकार लारेंस नारफ़ॉक, कैलाश बुधवार, यावर अब्बास, प्रो. मुग़ल अमीन, मधुप मोहता, रज़ा अली आबिदी, ममता गुप्ता, विजय राणा, ललित मोहन जोशी, मीरा कौशिक, के.सी. मोहन, विभाकर बख़्शी, हिना बख़्शी, दिव्या माथुर, सोहन राही, महेन्द्र दवेसर, रमेश पटेल, मंजी पटेल, क्लासिकल गायक सुरेन्द्र कुमार (सभी लंदन से), डा. कृष्ण कुमार, चित्रा कुमार, शैल अग्रवाल, डा. नरेन्द्र अग्रवाल, स्वर्ण तलवाड़, अनुराधा शर्मा (सभी बरमिंघम से), नीना पॉल (लेस्टर), जय वर्मा, डा. महिपाल वर्मा (नॉटिंघम), महेन्द्र वर्मा, उषा वर्मा (यॉर्क), एवं शमील चौहान (मेडनहेड) शामिल थे।

बाएं से तेजेन्द्र शर्मा, रमा पाण्डेय, काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, मोनिका मोहता, यावर अब्बास, कैलाश बुधवार, अचला शर्मा)

नार्वे में भारतीय राजदूत सम्मानित

२६ जनवरी २०१० को भारतीय गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर भारतीय दूतावास ओस्लो में भारतीय राजदूत बोन्बित ए राय जी को भारतीय-नार्वेजीय सूचना और सांस्कृतिक फोरम की ओर से भारतीय दूतावास द्वारा की जा रही सेवाओं के लिए दिया गया। इस सम्मान में भारतीय राजदूत बोन्बित ए राय जी को उन्हें पदक और सम्मानपत्र संस्था के अध्यक्ष सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' ने प्रदान किया।

१० फरवरी को ओस्लो के वाइतवेत सेंटर में नार्वेजीय लेबर पार्टी के नेता और क्षेत्रीय मेयर (बीरोद्स्लेदर) थूर स्ताइन विन्गेर की अध्यक्षता में संपन्न हुई। इस लेखक गोष्ठी में नार्वेजीय, हिंदी और पंजाबी भाषा में कवितापाठ किया गया। कविता पाठ करने वालों में इंगेर मारिये लिल्लेएन्गेन, राज कुमार भट्टी, इन्दरजीत पाल, राय भट्टी, नीलम, अलका भरत और अनुराग विद्यार्थी प्रमुख थे। १० फरवरी को लेखक सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक' का ५६ वाँ जन्मदिन भी था। राय भट्टी ने अपनी कविता पढ़ते हुए कहा कि 'शरद आलोक जी' हुए हैं छप्पन पर अब भी है उनमें युवापन। इंदरजीत पाल ने कहा कि जिस साहित्यिक मशाल को गोष्ठियों और साहित्यिक कार्यक्रम के माध्यम से शरद आलोक ने ३० साल से ओस्लो नार्वे में जलाये रखी है और इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक कि शुरुआत भी लेखक गोष्ठी से हुई यह नार्वे में भारतीयों के लिए गर्व और इतिहास के लिए मील का पत्थर है।

जन्मदिन पर स्पाइल-दर्पण पत्रिका की बच्चों और युवा सेक्शन की संपादक और हिंदी स्कूल की संचालिका संगीता सीमोनसेन, दिव्या और वासुदेव भारत ने अपने विचार रखे और शुभकामनाएँ दी। भारतीय दूतावास और नार्वेजीय लेखक संघ कि तरफ से भी शुभकामनाएँ दी गईं।

वर्ष २०१० का प्रतिष्ठित ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार सीहोर के पंकज सुबीर को

सीहोर के युवा कहानीकार पंकज सुबीर को उनके उपन्यास के लिए इस वर्ष का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया जा रहा है। भारतीय ज्ञानपीठ ने २००९ को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उनके उपन्यास 'ये वो सहर तो नहीं' के लिये दिये जाने की घोषणा की थी। इसके लिए एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी। जिसमें शीर्ष कथाकार तथा नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे। देश भर से प्राप्त पांडुलिपियों में से चयन करके ये पुरस्कार प्रदान किया जाना था।

भारतीय ज्ञानपीठ ने इस नवलेखन के देश के सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए इकसठ हजार रुपए की पुरस्कार राशि प्रदान किए जाने का निर्णय लिया था। तथा चयनित पांडुलिपि को भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित करने का भी फैसला लिया गया था। गत दिवस चयन समिति की बैठक में वर्ष २०१० के ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार के लिए सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर तथा दिल्ली के कथाकार कुणाल सिंह को संयुक्त रूप से ये पुरस्कार प्रदान करने का निर्णय लिया गया। दोनों संयुक्त विजेताओं को पुरस्कार की राशि का आधा आधा प्रदान किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी पंकज सुबीर का एक कहानी संग्रह ईस्ट इंडिया कम्पनी भारतीय ज्ञानपीठ के नवलेखन पुरस्कार योजना के अंतर्गत प्रकाशित होकर आया था, जो साहित्यिक हलकों में काफी चर्चित रहा था।

मध्य प्रदेश के जिला मुख्यालय सीहोर के युवा कथाकार पंकज सुबीर की पचास से भी अधिक कहानियाँ देश भर की साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। व्यवसाय से स्वतंत्र पत्रकार पंकज सुबीर अपनी विशिष्ट शैली तथा शिल्प के लिए जाने जाते हैं। युवा पीढी क़े नए कथाकारों में अपनी व्यंग्य निहित भाषा से वे अपनी अलग ही पहचान बना चुके हैं। 'ये वो सहर तो नहीं' में उन्होंने १८५७ से लेकर २००८ तक की कथा को व्यंग्य निहित भाषा में समेटा है। निर्णायकों के अनुसार इस उपन्यास में व्यंग्य का जो भाव है वह राग दरबारी की याद दिला देता है।

रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती द्वारा जुहू में काव्य संध्या का आयोजन


अमेरिका से पधारी कवयित्री रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती फाउंडेशन, मुम्बई की ओर से जुहू में एक काव्य संध्या का आयोजन किया गया। अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री माया गोविंद ने की। रेखा जी का परिचय कराते हुए कवि-संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा कि बनारस (उ.प्र.) में जन्मीं रेखा मैत्र की उच्च शिक्षा सागर (म.प्र.) में हुई। मुम्बई में कुछ साल अध्यापन करने के बाद मेरीलैण्ड (अमेरिका) में बस गईं। यहाँ भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ी संस्था 'उन्मेष' के साथ सक्रिय हैं। रेखा जी के अब तक दस कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।

रेखा मैत्र ने अपने जीवंत व्यहार और संवेदनशील कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कवयित्री माया गोविंद ने तरन्नुम में ग़ज़लें पढ़ीं और समकालीन हिंदी कविता के जाने-माने हस्ताक्षर डॉ.बोधिसत्व ने 'तमाशा' कविता का पाठ किया। इस अवसर पर प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखक राम गोविंद, युवा शायर हैदर नज़्मी, कवि-गीतकार देवमणि पाण्डेय, कथाकार अरुण अस्थाना. श्रीमती सुमीता केशवा और कविता गुप्ता ने ने अपनी अपनी काव्य रचनाओं का पाठ किया। अनंत श्रीमाली ने व्यंग्य कविता और अरविंद राही ने ब्रजभाषा के छंद सुनाए। जीवंती फाउंडेशन की ओर से श्रीमती बॉबी ने रेखा मैत्र का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। श्रीमती माया गोविंद ने रेखा जी को अपना काव्य संकलन भेंट किया। इस अवसर पर श्रीमती उमा अरोड़ा और श्रीमती कुमकुम मिश्रा अतिथि के रूप में उपस्थित थीं।

चित्र-में बाएँ से: राम गोविंद, अरविंद राही, बोधिसत्व, अरुण अस्थाना, रेखा मैत्र, हैदर नज़्मी, देवमणि पाण्डेय

मीना चोपड़ा की चित्रकला प्रर्दशनी और पुस्तकों का लोकार्पण संपन्न

फरवरी २८, २०१० - मिसिसागा सेंट्रल लाइब्रेरी के सभागार में रविवार की दोपहर के बाद मिसिसागा की चित्रकार और कवयित्री मीना चोपड़ा की चार पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। काव्य संकलन 'सुबह का सूरज अब मेरा नहीं है' का हिन्दी, हिन्दी, रोमन-हिंदी और उर्दू संस्करणों का और उनकी अंग्रेज़ी कविताओं के संकलन 'इग्नाईटिड लाईन्ज़' के दूसरे संस्करण का विमोचन हुआ। मीना चोपड़ा चित्रकार भी हैं। इस अवसर पर उनकी कला की प्रदर्शनी भी आयोजित की गई थी। यह प्रदर्शनी ५ मार्च के बाद मेडोवेल लाईब्रेरी में देखी जा सकती है।

कार्यक्रम का आरम्भ मिसिसागा सेंट्रल लाईब्रेरी की कला और इतिहास विभाग की प्रबंधक सुश्री मैरियन कुटरना ने स्वागत वाक्य से किया। यह कार्यक्रम लाईब्रेरी के तत्वावधान में हिन्दी राइटर्स गिल्ड के सहयोग से किया जा रहा था। मुख्य भूमिका मिसिसागा लाईब्रेरी की ही थी। कार्यक्रम के संचालन का भार बिनॉय टॉमस (संपादक – वॉयस समाचार पत्र) ने सँभाला। इस अवसर पर उपस्थित सांसद नवदीप सिंह बैंस ने मीना चोपड़ा की द्विभाषीय पुस्तक का विमोचन किया, हिन्दी की पुस्तक का लोकार्पण भारतीय काउंसलावास के एम.पी. सिंह के करकमलों से, उर्दू की पुस्तक को लोकार्पित डॉ. सलदानाह और इग्नाइटिड लाइन्ज़ को मैरियम कुटरना ने लोकार्पित किया। अगले चरण में मीना चोपड़ा ने कुछ अंग्रेज़ी और हिन्दी की कविताएँ सुनाईं।

नवदीप सिंह बैंस ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि वह इस अवसर पर एक सांसद के रूप में नहीं बल्कि एक पारिवारिक मित्र की तरह उपस्थित हुए हैं। उन्होंने मिसिसागा लाईब्रेरी को इस कार्यक्रम के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि कैनेडा के बहुसांस्कृतिक समाज का यह उत्सव है। उन्होंने यह भी कहा कि शायद ही पहले कभी हुआ होगा कि एक ही पुस्तक का अनेक भाषाओं में एक ही दिन और एक ही दिन लोकार्पण हुआ हो। उन्होंने सभा में विभिन्न समाज के लोगों की उपस्थिति को रेखांकित करते हुए कहा कि मीना चोपड़ा न केवल एक कवयित्री हैं बल्कि वह सेतु निर्माता भी हैं। काउंसुलेट श्री एम.सी. सिंह ने इसे कैनेडा की बहुसांस्कृतिक नीति की सफलता कहते हुए बधाई दी। उन्होंने भारत और कैनेडा की तुलना करते हुए कहा कि दोनों देशों यही समानता है कि हम लोग अपनी अनेकता का उत्सव मनाते हैं और यही हमारे समाजों की शक्ति है। उन्होंने कहा कि वह यही तथ्य मीना की चित्रकारी और कविताओं में पाते हैं – भारतीय थाती में कैनेडियन अनुभव की झलक। डॉ. सलदानाह ने अपने संबोधन में मीना जी को बधाई दी और लाइब्रेरी सिस्टम को इस कार्यक्रम के लिए साधुवाद दिया।

कार्यक्रम के अगले चरण में मीना जी हिन्दी की पुस्तक 'सुबह का सूरज अब मेरा नहीं है' की समीक्षा सुमन कुमार घई ने करते हुए कहा कि मीना की कविताएँ आंतरिक हैं। मीना एक चित्रकार है और अपने आसपास के बिखरे रंगों और प्राकृतिक सुंदरता को आत्मसात कर लेती हैं और वह प्रकृति उनके अंदर जीवित रहते हुए उनकी कविताओं में उतरती है। क्योंकि वह अंग्रेज़ी की भी कवयित्री हैं इसलिए हिन्दी कविता में अंग्रेज़ी से आयतित प्रतीकों से कविता में और निखार आ गया है। उन्होंने कहा, 'मीना सीमाओं से परे हैं – उनका अनुभव वैश्विक है।'

नसीम सैय्यद, जिन्होंने मीना चोपड़ा की कविताओं को ऊर्दू लिपी में लिखा है, ने ऊर्दू की पुस्तक की समीक्षा करते हुए, मीना की कविताओं के उर्दू रूपांतर को सुनाया। नसीम सय्यैद ने कहा, 'वह लिखते हुए चित्रकारी करती हैं, वह लिखती हैं जब प्रभावशाली प्रतीकों को अपनी चित्रकारी में उतारती हैं। उनका संबोधन भावपूर्ण और कवितामय था। उन्होंने भी कहा कि मीना की कैनवास के रंग मीना की कविता पर बिखर गए हैं।

अंग्रेज़ी की पुस्तक पर शेरल ज़ैवियर बोलीं। वह कैनेडियन फेडरेशन ऑफ पोएट्स की संस्थापिका हैं। कार्यक्रम के अंत में मीना चोपड़ा ने हिन्दी और उनके अंग्रेज़ी रूपांतर सुनाए। धन्यवाद ज्ञापन टिया विरदी और मेरियन कुटरना ने दिया। मेरियन ने कहा, 'यह मिसिसागा लाइब्रेरी में पहला बहुभाषी लोकार्पण था।' उन्होंने हिन्दी भाषा को न समझने पर टिप्पणी करते हुए कहा, 'भाषा का स्वर ही कविता है, मानवीय हृदय हम सबमें एक सा है और आज हम उसे साझा कर रहे हैं। इस अवसर पर सौ के लगभग लोग उपस्थित थे। मिसीसागा के विभिन्न मीडिया ने भी इस कार्यक्रम को कवरेज़ दी। इसी शृंखला में ११ अप्रैल को मेडोवेल लाईब्रेरी में मीना की कविताओं पर खुली चर्चा होगी। समय दोपहर के दो से चार बजे तक का है।

भोजपुरिया शिखर सम्मेलन में मनोज भावुक का चर्चित ग़ज़ल संग्रह लोकार्पित


२० फरवरी की शाम एयरपोर्ट ऑथोरिटी ऑफ इण्डिया, दिल्ली के आफिसर्स इंस्ट्यूशनल क्लब में अन्तरराष्ट्रीय स्तर के भोजपुरी के चिन्तकों की एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता भोजपुरी समाज, दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दूबे, संचालन डॉ. रमाशंकर श्रीवास्तव एवं संयोजन मनोज भावुक और कुलदीप श्रीवास्तव ने किया। मुख्य अतिथि अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकाश मंच जमशेदपुर के बी.एन. तिवारी उर्फ भाई जी भोजपुरिया एवं ख़ास मेहमान सात समुन्दर पार से आए मारीशस की डॉ. सरिता बुद्वू एवं ट्रिनिडाड की रिसर्च स्कॉलर पेंगी मोहन थी। कार्यक्रम तीन चरणों में बँटा था- लोकार्पण, परिचर्चा व होली मिलन।
लोकार्पण - मॉरिशस भोजपुरी संस्थान की संस्थापक डॉ. सरिता बुद्वू, भोजपुरी समाज के अध्यक्ष अजीत दूबे एवं अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकाश मंच जमशेदपुर के बी एन तिवारी उर्फ भाई जी भोजपुरिया ने संयुक्त रूप से युवा कवि मनोज भावुक के लोकप्रिय व बहुचर्चित गजल संग्रह 'तस्वीर जिन्दगी के' के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण किया। इस पुस्तक के लिए मनोज भावुक को गीतकार गुलजार एवं ठुमरी साम्राज्ञी गिरजा देवी के हाथो वर्ष २००६ के भारतीय भाषा परिषद सम्मान से नवाजा गया था। एक भोजपुरी पुस्तक को पहली बार यह सम्मान दिया गया है। हिन्द युग्म से प्रकाशित इस पुस्तक की उपस्थित विद्वानों ने प्रशंसा की और भावुक को बधाई दी।

परिचर्चा- परिचर्चा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए मनोज भावुक ने कहा कि होली के पावन अवसर पर विश्व भर में फैले भोजपुरी की तमाम महत्त्वपूर्ण संस्थाओं का यह महामिलन समारोह है। लगभग सभी संस्थाओं के अध्यक्ष उपस्थित है। आज की बैठक का मुख्य उदेश्य है कि हम सब मिलकर संयुक्त रूप से भोजपुरी को उसका उचित अधिकार दिलाने के लिए एक ठोस व कारगर रणनीति तैयार करे और उसे यथाशीघ्र कार्यान्वित करें। अध्यक्षीय भाषण देते हुए अजीत दूबे ने कहा कि देश में और देश के बाहर तमाम संस्थाएँ अच्छा प्रयास कर रही है। लेकिन हमें एक छत के नीचे आना होगा जिसका केंद्रीय कार्यालय दिल्ली होगा। हम सब में बहुत ताकत है लेकिन इस तरह के संयुक्त प्रयास से हमारी ताकत हजार गुनी बढ जाएगी। भोजपुरी को अष्ठम सूची में शामिल कराना, भोजपुरी के स्वाभिमान की रक्षा करना व दिल्ली के स्कूलो में भोजपुरी पाठ्यक्रम लागू कराना हमारा मुख्य एजेण्डा होगा। हालाँकि दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जयप्रकाश अग्रवाल पहले ही दिल्ली के स्कूलो में भोजपुरी पाठ्यक्रम को लागू करने कि घोषणा कर चुके हैं। लेकिन हम लोग इसको कार्यान्वित करने का प्रयास करेंगे।

मॉरिशस से आई सरिता बुद्वू, ट्रिनिडाड की रिसर्च स्कॉलर पेंगी मोहन एवं मुख्य अतिथि अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकास मंच, जमशेदपुर के अध्यक्ष बीएन तिवारी उर्फ भाईजी भोजपुरिया ने अपने-अपने प्रयासों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज भोजपुरी को एक साझा मंच और मजबूत नेटवर्किंग की जरूरत है। पूर्वांचल एकता मंच के अध्यक्ष श्री शिवजी सिंह ने कहा कि हमे अपना पीठ थपथपाने की आदत व छोटी-छोटी बातों के लिए मुँह फुलौवल छोडकर बडे व ठोस प्रयास के लिए साधना करनी होगी। कुलदीप श्रीवास्तव ने बडे ही सहज ढंग से कहा कि हमें सिर्फ भाषणबाजी न कर किसी ठोस निष्कर्ष की ओर बढना चाहिए। रंगकर्मी व फिल्म निर्माता उमेश सिंह ने कहा कि हमे जातिवाद, क्षेत्रवाद व राजनीति से ऊपर उठकर केवल भाषा की लडाई लडनी होगी। इग्नू में भोजपुरी के प्रणेता प्रो शत्रुघ्न कुमार, नाटककार महेन्द्र प्रसाद सिंह, लोकदृष्टि संपादक राजेश पाण्डेय, महिला सेवा अर्पण केन्द्र की संचालिका पूनम सिंह, वेबवार्ता संपादक सईद अहमद, भोजपुरी समाज के उपाध्यक्ष प्रभुनाथ पाण्डेय, प्रदीप कुमार पाण्डेय, बिहारी खबर के मुन्ना पाठक, सन्तोष पटेल एवं भोजपुरी काँग्रेस के अध्यक्ष सुधीर सिंहा ने ऐसे प्रयास का पुरजोर सर्मथन किया। सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि सार्थक प्रयास हेतु शीघ्र ही अजीत दूबे के नेतृत्व में एक कोर कमेटी का गठन किया जाएगा।

होली मिलन- अन्त में फागुन का उत्पात चालू हो गया। डॉ. सरिता बुद्वू ने गाया- होली खेले रघुबीरा अवध में तो भाईजी भोजपुरिया ने गाया - पिया काहे अइल होली के बिहान! पूरा महफ़िल फगुआ गयी! सबको अबीर गुलाल लगाया गया और इस प्रकार यह ऐतिहासिक भोजपुरिया शिखर सम्मेलन सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया।

स्व. श्रीमती मिथिलेश श्रीवास्तव स्मृति समारोह

झाँसी में स्व. श्रीमती मिथलेश श्रीवास्तव की स्मृति में चित्रांश ज्योति द्वारा साहित्यिक/सांस्कृतिक एवं सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रही समाज की विभिन्न प्रतिभाओं सहित लघु पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय से काम कर रहे लघु समाचार पत्रों के दो संपादकों सर्वश्री विनोद बब्बर (संपादक-राष्ट्रकिंकर, नई दिल्ली) एवं श्री वाई. के. बंसल (संपादक-निधि मेल, झाँसी) को मिथिलेश-रामेश्वर पत्रकारिता सम्मान भी प्रदान किया गया। इस अवसर पर समाज के मेधावी छात्र-छात्राओं का भी अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम के प्रारंभ में समारोह के अति विशिष्ट अतिथि केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री श्री प्रदीप जैन आदित्य एवं विशिष्ट अतिथि श्री करुणेश श्रीवास्तव (डिप्टी सीएमई-रेलवे) व श्री हरि बल्लभ खरे (राष्ट्रीय मंत्री, अ. भा. कायस्थ सभा), श्रीमती रमा श्रीवास्तव (संचालक-मदर टेरेसा स्कूल) आदि अतिथियों ने स्व. श्रीमती मिथलेश श्रीवास्तव के चित्र पर पुष्प चढ़ाकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके पश्चात माननीय मंत्री महोदय ने दिल्ली के श्री किशोर श्रीवास्तव की २५वें वर्ष में चल रही कार्टून एवं लघु रचनाओं की जन चेतना पोस्टर प्रदर्शनी 'खरी-खरी' का उद्घाटन किया।

बाद में अपने वक्तव्य में श्री प्रदीप जैन आदित्य ने स्व. श्रीमती मिथलेश श्रीवास्तव के कार्यों को याद करते हुए प्रतिभाओं को आगे लाने में चित्रांश ज्योति के निरन्तर चल रहे प्रयासों की प्रशंसा की व समारोह के संयोजक श्री अरुण श्रीवास्तव 'मुन्नाजी' की, सादा जीवन बिताते हुए समाज के लिए किए जाने वाले उच्च व सार्थक कार्यो की सराहना की। उन्होंने खरी-खरी प्रदर्शनी में कार्टूनों आदि के माध्यम से विभिन्न सामाजिक विसंगतियों की तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करने की भी प्रशंसा की। समारोह का संचालन दूरदर्शन अधिकारी श्री मुकेश सक्सेना ने किया एवं अंत में चित्रांश ज्योति की संपादक श्रीमती विजय लक्ष्मी श्रीवास्तव व संयोजक श्री अरुण श्रीवास्तव ने अतिथियों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर चित्रांश परिवार के सैकड़ों सदस्यों ने उपस्थित होकर समारोह को विशेष गरिमा प्रदान की।

चित्र में केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री श्री प्रदीप जैन आदित्य के साथ मंच पर विभिन्न प्रतिभाओं सर्वश्री मुकेश बच्चन, विजयलक्ष्मी श्रीवास्तव, अरुण श्रीवास्तव, किशोर, राकेश श्रीवास्तव एवं अतुल सिन्हा।

'शाश्वती' द्वारा अज्ञेय स्मारक व्याख्यान २०१० का आयोजन

जम्मू के अज्ञेय प्रेमी हिन्दी साहित्यकारों की संस्था 'शाश्वती' ने ७ मार्च २०१० को के.एल. सहगल हॉल जम्मू में अज्ञेय स्मारक व्याख्यान २०१० का आयोजन किया जिसमें हिन्दी के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार और व्यंग्ययात्रा के सम्पादक प्रेम जन्मेजय ने 'बदलते सामाजिक परिवेश में व्यंग्य की भूमिका' विषय पर अपना व्याख्यान दिया। संस्था का पहला अज्ञेय स्मारक व्याख्यान ७ मार्च १९९८ को आयाजित किया था।

बदलते सामाजिक मूल्यों की पड़ताल करते हुए प्रेम जन्मेजय ने कहा कि मैं उस पीढ़ी का हूँ जिसने स्वतंत्रता शिशु की गोद में अपनी आँखें खोली हैं और जिसने लालटेन से कंप्यूटर तक की यात्रा की है। मेरी पीढ़ी ने युद्ध और शांति के अध्याय पढ़े हैं, राशन की पंक्तियों में डालडा पीढ़ी को देखा है तो चमचमाते मॉल में विदेशी ब्रांड के मोहपाश में फँसी पागल नौजवान भीड़ को भी देख रहा हूँ। मैंने विश्व में छायी मंदी के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती देखी है, पर साथ ही ईमानदारी, नैतिकता, करुणा आदि जीवन मूल्यों की मंदी के कारण गरीब की जी. डी. पी. को निरंतर गिरते देखा है। हमारा आज बहुत ही भयावह है। हमारे शहरों का ही नहीं आदमी के अंदर का चेहरा भी बदल रहा है। पूंजीवाद हमारा मसीहा बन गया है। उसने हमारा मोहल्ला, हमारा परिवार सब कुछ जैसे हमसे छीनकर हमें संवादहीनता की स्थिति में ला दिया है। एक अवसाद हमें चारों ओर से घेर रहा है। हमारी अस्मिता, संस्कृति और भाशा पर निरंतर अप्रत्यक्ष आक्रमण हो रहे हैं। हर वस्तु एक उत्पाद बनकर रह गई है। सामयिक परिवेश विसंगतिपूर्ण है तथा विसंगतियों के विरुद्ध लड़ने का एक मात्र हथियार व्यंग्य है। सार्थक व्यंग्य ही सत्य की पहचान करा सकता है, असत्य पर प्रहार कर सकता है और उपजे अवसाद से हमें बाहर ला सकता है। व्यंग्य एक विवशताजन्य हथियार है। व्यंग्य का इतिहास बताता है कि विसंगतियों के विरुद्ध जब और विधाएँ अशक्त हो जाती हैं तो कबीर, भारतेंदू, परसाई जैसे रचनाकार व्यंग्यकार की भूमिका निभाते हैं। निरंकुश व्यंग्य लेखन समाज के लिए खतरा होता है, अत: आवश्यक है कि दिशायुक्त सार्थक व्यंग्य का सृजन हो जो वंचितों को अपना लक्ष्य न बनाए। व्यंग्य के नाम पर जो हास्य का प्रदूषण फैलाया जा रहा है उससे बचा जाए और बेहतर मानव समाज के लिए व्यंग्य की रचनात्मक भूमिका उपस्थिति की जाए।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. ओम प्रकाश गुप्त ने अपने अध्यक्षीय भाषण में हिन्दी साहित्य को अज्ञेय के अवदान पर चर्चा करते हुए उनको एक महान व्यंग्यकार बताया। डॉ. गुप्त ने प्रेम जन्मेजय को धन्यवाद दिया कि उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विषय को उठाकर आने वाले खतरों के प्रति सावधान किया है। कार्यक्रम के आरम्भ में अज्ञेय की आवाज़ में उनकी दो कविताओं का पाठ भी सुनाया गया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए रमेश मेहता ने कहा कि अज्ञेय के सौवें जन्म दिन को लेकर जम्मू में खासा उत्साह देखा जा रहा है और वर्ष २०११ में इस संदर्भ में बड़े पैमाने पर कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा। डॉ. चंचल डोगरा ने अज्ञेय का और डॉ. आदर्श ने प्रेम जन्मेजय का परिचय प्रस्तुत किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निर्मल विनोद ने किया।

- प्रस्तुति : बृजमोहिनी
रिहाड़ी, जम्मू - १८०००५