रविवार, 21 फ़रवरी 2010

हाइकु - २००९ का लोकार्पण

हाइकु -१९८९ और हाइकु-१९९९ के बाद हाइकु का तीसरा ऐतिहासिक संकलन "हाइकु-२००९" का लोकार्पण इनमेनटेक संस्था के सभागार में गीताभ संस्था के वार्षिक समारोह में हुआ। समारोह की अध्यक्षता हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा० शेरजंग गर्ग ने की, मुख्य अतिथि थे प्रसिद्ध नवगीतकार यश मालवीय, विशिष्ट अतिथि सुप्रसिद्ध साहित्यकार डा० वेदप्रकाश अमिताभ थे। मंच पर सुप्रसिद्ध कहानीकार से०रा०यात्री, बी०एल०गौड़, ओमप्रकाश चतुर्वेदी पराग तथा कमलेश भट्ट कमल भी उपस्थित थे। लगभग २०० श्रोताओं से खचाखच भरे सभागार में साहित्यकार गिरीश पाण्डे आयकर आयुक्त चेन्नई, प्रसिद्ध गीतकार देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, इन्दिरा मोहन, डा० कुँअर बेचैन, ओमप्रकाश यती, ब्रजकिशोर वर्मा "शैदी", डा० सुरेन्द्र सिंघल(सहारनपुर), कृष्ण शलभ(सहारनपुर), डा० वीरेन्द्र आजम(सहारनपुर), आजकल के सम्पादक डा० योगेन्द्र शर्मा, कृष्ण मित्र, डा० सोमदत्त शर्मा, डा० पंकज परिमल, डा० मधु भारती, डा० अंजू सुमन, प्रताप नारायण सिंह सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित थे।

दीप प्रज्ज्वलन के उपरान्त गान्धर्व महाविद्यालय की छात्राओं ने वन्दना प्रस्तुत की। सरस्वती वंदना कवयित्री अंजू जैन ने सुमधुर कंठ से प्रस्तुत कर सभी को भावविभोर कर दिया। हाइकु -२००९ का लोकार्पण समारोह के अध्यक्ष एवं मंचस्थ साहित्यकारों ने किया। कार्यक्रम का संचालन कमलेश भट्ट कमल ने किया। लोकार्पण के उपरान्त डा० जगदीश व्योम ने हाइकु-२००९ पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संकलन में वर्ष १९२५ से लेकर वर्ष १९८२ तक जन्मे ५७ वर्षों की लंबी अवधि से चुने गए ६० हाइकुकारों को समाहित किया गया है। प्रथम हाइकुकार हैं पद्मश्री गोपालदास नीरज और अन्तिम नवल बहुगुणा। पाँच प्रवासी भारतीय भी संकलन में शामिल हैं। प्रत्येक रचनाकार की ७ - ७ हाइकु कविताएँ इस संकलन में दी गई है। इस अवसर पर डा० व्योम ने संकलन से कुछ चुने हुए हाइकु भी पढ़कर प्रस्तुत किए। पुस्तक के विषय में जानकारी इस प्रकार है- हाइकु-२००९, सम्पादक- कमलेश भट्ट कमल, प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान, ४२६८ बी/३ अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-११०००२, ISBN81-7714-366-2, मूल्य- रु० २००

हंगरी में 'समकालीन भारतविद्या अध्ययन में अभिलेखीय अध्ययन का महत्त्व' विषय पर गोष्ठी

इत्वोस लोरांद विश्वविद्यालय (हंगरी) ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद एवं भारतीय दूतावास के सहयोग से भारत विद्या अध्ययन विभाग में 'समकालीन भारतविद्या अध्ययन में अभिलेखीय अध्ययन का महत्त्व' विषय पर ३ फरवरी से ६ फरवरी २०१० तक 'लेटिंग द टेक्स्ट स्पीक' नामक त्रिदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया। इस अवसर पर भारत के केंद्रीय उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री श्री आनंद शर्मा, हंगरी में भारत के राजदूत श्री रंजीत राय, भारतीय सांस्कृतिक संबध परिषद की सुश्री संगीता बहादुर, पद्मभूषण श्री लोकेश चंद्रा जैसे गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। एल्ते विश्वविद्यालय के डीन डॉ. देजो तमाश, विभागाध्यक्षा एवं हिंदी की प्रसिद्ध विदुषी डॉ. मारिया नज्यैशी एवं हिंदी के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. प्रमोद कुमार शर्मा के साथ बुदापेश्ट में रहने वाले न केवल भारतीय अपितु हंगरी के भारत-प्रेमी भी इस अवसर पर बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

अपने उद्घाटन भाषण में श्री आनंद शर्मा ने भारत एवं हंगरी के प्रगाढ़ एवं पुराने संबंधों पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध हंगरी भारत-विदों चोमा द कोरोश एवं ऑरेल स्टाइन के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होने हंगरी की जनता के भारतीय संस्कृति और साहित्य-विषयक प्रेम की चर्चा करते हुए बालाटन नामक स्थान पर स्थित गुरुदेव रवींद्रनाथ की प्रतिमा एवं उनके स्मृति भवन को भारत-हंगरी साहित्यिक सांस्कृतिक एकता का प्रतीक चिह्न माना। एल्ते विश्वविद्यालय के डीन डॉ. तमाश ने संगोष्ठी के आयोजन पर हार्दिक प्रसन्नता व्यक्त करते हुए विश्वविद्यालय एवं भारतीय अध्ययन विभाग का परिचय दिया। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी इसी प्रकार के आयोजन होते रहेंगे। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की उप-महानिदेशक सुश्री मान ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की गतिविधियों एवं नीतियों की जानकारी दी। विभिन्न यूरोपीय देशों में खोले जा रहे हिंदी एवं भारतीय भाषा-पीठों के बारे में बताते हुए उन्होंने भिन्न-भिन्न यूरोपीय देशों में अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों के आयोजन के माध्यम से साहित्य एवं सांस्कृतिक संबंधों की प्रगाढ़ता पर जोर दिया। डॉ. मारिया नज्यैशी ने उदघाटन समारोह के अंत में सबका धन्यवाद ज्ञापन करते हुए आशा व्यक्त की कि भविष्य में भी विभाग को इसी प्रकार भारत सरकार का सहयोग मिलता रहेगा और ऐसे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होते रहेंगे।

सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख विद्वानों में प्रोफेसर लोकेश चंद्रा के अतिरिक्त प्रो. माइकेल हॉन(मारबुर्ग), डॉ. जीन तुक शेविलाई(पेरिस), डॉ. इम्रै बंगा( ऑक्सफोर्ड एवं बुदापैश्ट), डॉ. जोविता क्रामर(म्यूनिख) प्रो. आर. के. मिश्रा (जम्मू), डॉ. गैरगै हिदास(बुदापैश्ट), डॉ. इवा दि क्लार्क(घेंट), डॉ. चाबा देस्जो(बुदापैश्ट एवं ऑक्सफोर्ड), डॉ. नीलिमा चितगोपेकर(दिल्ली), डॉ. हंस बॉकर(ग्रानिनजेन), श्री डेनियल बलोग(बुदापैश्ट), प्रो. निर्मला शर्मा(दिल्ली), श्री चाबा किस(बुदापैश्ट), डॉ. एस. ए. एस सरमा(पॉडिचेरी) एवं डॉ.पीटर बिश्कॉप (एडिनबर्ग) प्रमुख थे। सेमीनार में पढ़े जा रहे पर्चों में बौद्ध धर्म एवं दर्शन, भारतीय स्थापत्य कला, मूर्तिकला से लेकर कबीर आदि से संबंधित हस्तलिखित पुस्तकों, पुरालेखों, शिलालेखों एवं ताम्रपत्रों से संबंधित जानकारियों का शोधात्मक विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया गया। पूरे विश्व में भारतीय साहित्य, संस्कृति एवं दर्शन के क्षेत्र में हो रहे अत्यंत महत्वपूर्ण शोध-कार्यों की यह झलक बहुत अधिक ज्ञानवर्धक तथा उत्साह-वर्धक थी। तीसरे दिन समापन समारोह में महामहिम श्री रंजीत राय ने एल्ते विश्वविद्यालय एवं प्रतिभागी विद्वानों का धन्यवाद देते हुए इस प्रकार के सम्मेलनों के निरंतर आयोजन पर बल दिया। अंततः हंगरी के प्रसिद्ध भारतविद प्रो. गेजा के धन्यवाद भाषण के साथ समारोह समाप्त हुआ।


-- डॉ. गीता शर्मा

पुस्तक ’गुंजन’ का विमोचन समारोह

कवि कुलवंत सिंह, मुंबई एवं श्रीमती सी। आर। राजश्री कोयंबतूर द्वारा संपादित पुस्तक ’गुंजन’ का विमोचन समारोह मुंबई में श्री कीर्तन केंद्र, जुहू में प्रसिद्ध उद्योगपति एवं समाजसेवी श्री महावीर सराफ जी के कर कमलों द्वारा 2 फरवरी की संध्या को संपन्न हुआ। कार्यक्रम का प्रारंभ माँ सरस्वती का आवाहन करते हुए नमन कर, दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन देश की सुप्रसिद्ध बुद्धिजीवी, लेखिका, अध्यापक, चिंतक, संपादक (कुतुबनुमा - त्रैमासिक पत्रिका) डा। राजम नटराजम पिल्लई ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता की - प्रसिद्ध स्क्रिप्ट लेखक, कहानीकार श्री जगमोहन कपूर ने, जिनकी कई फिल्में सिल्वर जुबली रही हैं (नागिन, नगीना, निगाहें इत्यादि)। मंच पर उपस्थित अन्य विशिष्ट सम्माननीय व्यक्तित्व थे डा। गिरिजाशंकर त्रिवेदी (पूर्व मुख्य संपादक नवनीत), शायर एवं कवि श्री खन्ना मुजफ्फरपुरी, श्री कपिल कुमार (अभिनेता, कुंडलियों के सम्राट, उनका एक गीत हँसने की चाह ने इतना मुझे रुलाया है, जिसे मन्ना डे ने गाया था, बहुत प्रसिद्ध हुआ था)।

गुंजन पुस्तक की खास विशेषता यह है कि यह दक्षिण भारत के एक शहर कोयंबतूर के एक विद्यालय में पढ़ रहे विद्यार्थियों द्वारा लिखी रचनाओं का संकलन है। हिंदी को एक विषय के रूप में पढ़ रहे इन छात्रों की रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने वाली और कोई नही एक दक्षिण भारतीय हिंदी अध्यापिका ही हैं। जिनका नाम है श्रीमती सी आर राजश्री; जिनकी जितनी प्रशंसा की जाये, कम है। छात्रों की रचनात्मक प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिये एवं उनमें संवेदनशीलता को उभारने के लिये उन्होंने कालेज में एक रचनात्मक कार्यशाला आयोजित की और उनके सभी छात्रों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। साथ ही कालेज के प्रिंसिपल, सलाहकार (संस्थापक) एवं विभागाध्यक्ष भी अनुशंसा के पात्र हैं जिन्होंने इस कार्यशाला के आयोजन के लिये न ही केवल राजश्री को प्रोत्साहन ही दिया अपितु सभी सुविधायें भी प्रदान कीं।

इन छात्रों की रचनात्मकता देखते ही बनती है। उनमें कई त्रुटियां होंगी पर उन्हें नज़रअंदाज करके ही हमें देखना होगा। छात्रों की संवेदनशीलता देखते ही बनती है। 66 छात्रों की रचनओं में से लगभग 13 कविताएं माँ पर हैं। माँ एक विषय नही अपितु संसार है जिसमें सभी कुछ समाहित होता है। इससे सिद्ध होता है कि हम भारतीय अपनी संस्कृति के ह्रास को लेकर दिनरात जो रोना रोते हैं वह कितना खोखला है। जब तक भारतीय माँ जिंदा है, हमारी संस्कृति बहुत ही अच्छे तरीके से सहेजी हुई है, सुरक्षित है।

विमोचन कार्यक्रम के उपरांत काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसका सुंदर संचालन विख्यात श्री कुमार जैन ने अपने निराले अंदाज में किया। कवियों ने अपनी मधुर वाणी एवं विचारों से उपस्थित श्रोताओं का मन मोह लिया। उपस्थित प्रमुख कवि एवं विचारक थे - सर्वश्री त्रिलोचन अरोडा, नंदलाल थापर, रवि यादव, कुलदीप दीप, हरि राम चौधरी, सुरेश जैन, जयंतीलाल जैन, जवाहरलाल निर्झर, गिरीश जोशी, भजन गायक हरिश्चंद्र जी, राजेश्वर उनियाल, डा। जमील, लोचन सक्सेना, मुरलीधर पाण्डेय, डा। तारा सिंह, श्रीमती शुभकीर्ति माहेश्वरी, श्रीमती मंजू गुप्ता, श्रीमती नीलिमा पाण्डे, श्रीमती शकुंतला शर्मा, डा। सुषमा सेनगुप्ता।
कार्यक्रम के उपरांत कुलवंत सिंह ने माँ शारदा के साथ साथ सभी अतिथियों, श्रोताओं, संचालक एवं महानुभावों का तहे दिल से शुक्रिया अदा किया।

--कवि कुलवंत सिंह

'प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान' द्वारा त्रैमासिक पत्रिका 'पांडुलिपि' का प्रकाशन

प्रमोद वर्मा जैसे हिन्दी के प्रखर आलोचक की दृष्टि पर विश्वास रखनेवाले, मानवीय और बौद्धिक संवेदना के साथ मनुष्यता के उत्थान के लिए क्रियाशील छत्तीसगढ़ राज्य के साहित्य और संस्कृतिकर्मियों की ग़ैर-राजनीतिक संस्था 'प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान' द्वारा जनवरी,२०१० से प्रकाश्य त्रैमासिक पत्रिका 'पांडुलिपि' हेतु आप जैसे विद्वान, चर्चित रचनाकार से रचनात्मक सहयोग का निवेदन करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता हो रही है । हमें यह भी प्रसन्नता है कि 'पांडुलिपि' का संपादन 'साक्षात्कार' जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका के पूर्व संपादक, हिंदी के सुपरिचित कवि, कथाकार एवं आलोचक श्री प्रभात त्रिपाठी करेंगे।

हम 'पांडुलिपि' को विशुद्धतः साहित्य, कला, संस्कृति, भाषा एवं विचार की पत्रिका के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। आपसे बस यही निवेदन है कि 'पांडुलिपि' को प्रेषित रचनाओं के किसी विचारधारा या वाद की अनुगामिता पर कोई परहेज़ नहीं किन्तु उसकी अंतिम कसौटी साहित्यिकता ही होगी। 'पांडुलिपि' में साहित्य की सभी विधाओं के साथ साहित्येतर विमर्शों (समाज/ दर्शन/ चिंतन/ इतिहास/ प्रौद्योगिकी/ सिनेमा/ चित्रकला/ अर्थतंत्र आदि) को भी पर्याप्त स्थान मिलेगा है, जो मनुष्य, समाज, देश सहित समूची दुनिया की संवेदनात्मक समृद्धि के लिए आवश्यक है। भारतीय और भारतीयेतर भाषाओं में रचित साहित्य के अनुवाद का यहाँ स्वागत होगा। नए रचनाकारों की दृष्टि और सृष्टि के लिए 'पांडुलिपि' सदैव अग्रसर बनी रहेगी।

किसी संस्थान की पत्रिका होने के बावजूद भी 'पांडुलिपि' एक अव्यवसायिक लघुपत्रिका है, फिर भी हमारा प्रयास होगा कि प्रत्येक अंक बृहताकार पाठकों पहुँचे और इसके लिए आपका निरंतर रचनात्मक सहयोग एवं परामर्श वांछित है।

प्रवेशांक (जनवरी-मार्च, २०१०) हेतु आप अपनी महत्वपूर्ण व अप्रकाशित कथा, कविता (सभी छांदस विधाओं सहित), कहानी, उपन्यास अंश, आलोचनात्मक आलेख, संस्मरण, लघुकथा, निबंध, ललित निबंध, रिपोतार्ज, रेखाचित्र, साक्षात्कार, समीक्षा, अन्य विमर्शात्मक सामग्री आदि हमें २० फरवरी, २०१० के पूर्व भेज सकते हैं। कृति-समीक्षा हेतु कृति की २ प्रतियाँ अवश्य भेजें।

यदि आप किसी विषय-विशेष पर लिखना चाहते हैं तो आप श्री प्रभात त्रिपाठी से (मोबाइल - ०९४२४१८३४२७) चर्चा कर सकते हैं। आप फिलहाल समय की कमी से जूझ रहे हैं तो बाद में भी आगामी किसी अंक के लिए अपनी रचना भेज सकते हैं। हमें विश्वास है - रचनात्मक कार्य को आपका सहयोग मिलेगा। रचना भेजने का पता - जयप्रकाश मानस, कार्यकारी संपादक, एफ-३, छगमाशिम, आवासीय परिसर, छत्तीसगढ़ - ४९२००१। मोबाइल - ९४२४१८२६६४,
ई-मेल- pandulipipatrika@gmail.com

१४ फरवरी २०१० को वि‍शाखपटनम में 'सृजन' द्वारा पुस्‍तक वि‍मोचन और साहि‍त्‍य चर्चा आयोजि‍त

चित्र में- बायें से डॉ टी महादेव राव, प्रो पी आदेश्‍वर राव, नीरव कुमार वर्मा और संतांष अलेक्‍स
वि‍शाखपटनम में हि‍न्‍दी साहित्‍य, संस्‍कृति ‍और रंगमंच को समर्पि‍त संस्‍था 'सृजन' के तत्‍वावधान में क्षेत्र के प्रसि‍द्ध अनुवादक संतोष अलेक्‍स द्वारा हि‍न्‍दी में अनूदि‍त काव्‍य संग्रह 'कवि‍ता के पक्ष में नहीं' का वि‍मोचन और साहि‍त्‍य चर्चा कार्यक्रम का आयोजन कि‍या गया। अंग्रेजी के प्रसि‍द्ध कवि‍ और साहि‍त्‍य अकादमी पुरस्‍कार प्राप्‍त श्री जयंत महापात्रा की चुनी हुई ५० अंग्रेजी कवि‍ताओं का अनुवाद संतोष अलेक्‍स ने कवि‍ता के पक्ष में नहीं शीर्षक से कि‍या। पुस्‍तक का वि‍मोचन प्रसि‍द्ध हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यकार एवं वरि‍ष्‍ठ हि‍न्‍दी आचार्य प्रो। पी आदेश्वर राव जी ने कि‍या। उन्‍होंने अनुवाद को एक कठि‍न कार्य बताते हुए संतोष अलेक्‍स के अनुवादों की प्रशंसा की। प्रो. आदेश्वर राव ने कहा कि‍छंदहीन कवि‍ता में भी गेयता प्रभावि‍त करती है। कवि‍ता कि‍सी भी भाषा की हो, उत्‍पन्न ध्वनि ‍‍हमें प्रभावि‍त करती और वि‍चारशील बनाती है। उन्‍होंने जयंत महापात्रा की अंग्रेजी कवि‍ताओं की तुलना में अनुवाद को और भी सशक्‍त और मूलकृति‍ से भी अधि‍क अच्‍छा कहा। कुछ कवि‍ताओं का उन्‍होंने विश्लेषण भी कि‍या और अन्‍य कवि‍ताओं को सोदाहरण प्रस्‍तुत कि‍या। पुस्‍तक वि‍मोचन के लि‍ए संतोष अलेक्‍स, संस्‍था के संयुक्‍त सचि‍व, ने आभार माना।


कार्यक्रम की शुरुआत सृजन के सचि‍व डॉ टी महादेव राव के स्‍वागत एवं संस्‍था की गति‍वि‍धि‍यों की जानकारी देने के साथ हुई। उन्‍होंने सृजन द्वारा आयोजि‍त कार्यक्रमों के पीछे नव रचनाकारों को प्रोत्‍साहि‍‍त करने और पुराने लेखकों को लि‍खने के लि‍ए प्रेरि‍त करने को संस्‍था का उद्देश्‍य बताया। अध्‍यक्षता कर रहे सृजन के अध्‍यक्ष नीरव कुमार वर्मा ने अपने भाषण में उपस्‍थि‍तों को नवलेखन पर ध्‍यान देने और समसामयि‍क साहि‍त्‍य पढने को कहा ताकि‍वे बेहतर साहि‍त्‍य सृजन कर सकें। साहि‍त्‍य चर्चा का संचालन डॉ टी महादेव राव ने कि‍या। सबसे पहले श्रीमती सीमा वर्मा ने कवि‍ता 'उचकन' का पाठ कि‍या जि‍समें प्राचीन बिम्‍बों को आधार बनाकर अलगाववादी वि‍चारों के खि‍लाफ एकता की बात सशक्‍त ढंग से कही गई थी। श्रीमती ‍पारनंदी नि‍र्मला ने कहानी 'टोकन नंबर २०' पढा जि‍समें वर्तमान में अस्‍पतालों में जारी भ्रष्‍टाचार और नि‍र्दयी स्‍थि‍ति‍यों का वर्णन था। देश की अखंडता को रेखांकि‍त करती कवि‍ता 'नही मि‍टेगा हि‍न्‍दुस्‍तान' का पाठ कि‍या रजनीश ति‍वारी ने, जि‍समें भावुकता भरे संवेदनशील भारतीय की मनोवेदना थी। बिंबों के माध्‍यम से दि‍नचर्या की बातों को जोडती कवि‍ता 'नि‍रीह मन' तथा प्रेमानुभूति‍यों युक्‍त कवि‍ता 'नन्‍हीं बूँद' का प्रभावी प्रस्‍तुतीकरण कि‍या वीरेन्‍द्र राय ने।


जी अप्‍पाराव 'राज' ने कुछ सामयि‍क व्‍यंग्‍य कवि‍तायें सुनाईं, जि‍समें राजनीति ‍में हो रही छेड-छाड का वर्णन रहा। आरुधि ‍त्रि‍वेदी ने जीवन दर्शन की कवि‍ता 'पल दो पल में' का पाठ कि‍या जि‍समें जीवन के लक्ष्‍यों और मूल्‍यों की बात कही गई थी। दो कवि‍तायें 'नक्षत्र' और 'तुम्‍हारा क्‍या है' का पाठ कि‍या डॉ वि‍जय गोपाल ने जि‍समें मध्‍यवर्गीय मानव की व्‍यथा और वि‍चार थे। बी एस मूर्ति‍ ने दो पैरोडी कवि‍तायें सुनाई 'लिंग भेद' और ' बैक का कर्ज', जिनमें समाज में चल रही कुछ बातों पर करारा व्‍यंग्‍य छुपा था। कृष्‍ण कुमार ने 'जिंदगी' शीर्षक कवि‍ता प्रस्‍तुत की जि‍समें जीवन के बदलते पहलुओं का, जीवन मूल्‍यों का खुलासा था। नीरव कुमार वर्मा ने स्‍कूलों के खुलते ही अभि‍भावकों की परेशानि‍यों और समस्‍याओं पर करारा व्‍यंग्‍य सुनाया अपने व्‍यंग्‍य 'फि‍र खलना स्‍कूलों का' में। संतोष अलेक्‍स ने अनूदि‍त कवि‍ता 'कवि‍ता के पक्ष में नहीं' का पाठ कि‍या। डॉ टी मादेव राव ने आशावादी स्‍वर को रेखांकि‍त करती दो रुबाइयाँ और आज के आम आदमी की व्‍यथा का पक्ष लेती गजल 'आओ जीने का कोई नया बहाना ढूढें' प्रस्‍तुत कि‍या। इस कार्यक्रम में वि‍जयकुमार राजगोपाल, डॉ पी नरसा रेड्डी, डॉ के शांति‍, डॉ जीवीवी सत्‍यनारायणा ने भी सक्रि‍य प्रति‍भागि‍ता की। सभी रचनाओं पर चर्चा भी हुई और रचनाकारों को अच्‍छे सुझाव भी दि‍ए। डॉ टी महादेव राव के धन्‍यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्‍न हुआ।

कथा यू.के. के १५ वर्ष

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) द्वारा २९-३१ जनवरी २०१० को आयोजित तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी -कथा समय २०१० - के अवसर पर एक अनौपचारिक कार्यक्रम में कथा यू।के. के १५ वर्ष पूरे होने का उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर कथा यू.के. की ओर से अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान पाने वाले लेखकों के साथ एक अंतरंग संवाद संपन्न हुआ। उन्हें कथा यू.के. की ओर से एक प्रतीक चिन्ह एवं उपहार भेंट किया गया। ज्ञात रहे कि कथा यूके ने पिछले १५ वर्षों में हिन्दी के जिन पन्द्रह लेखकों को अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान प्रदान किया है वे इस समय हिन्दी साहित्य की मुख्य धारा के महत्वपूर्ण लेखक हैं।

इस समय कथा साहित्य को लेकर आयोजित होने वाली कोई भी संगोष्ठी या कार्यक्रम इन लेखकों की भागीदारी के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। इन लेखकों में असग़र वजाहत, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, संजीव, विभूति नारायण राय, ज्ञान चतुर्वेदी, भगवान दास मोरवाल, एस। आर. हरनोट, गीतांजलिश्री, अखिलेश, देवेन्द्र, धीरेन्द्र अस्थाना, प्रमोद कुमार तिवारी, मनोज रूपड़ा एवं महुआ माजी शामिल हैं।

महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कथा समय २०१० (हिन्दी कथा साहित्य के दो दशक) में उपरोक्त कथाकारों में से असग़र वजाहत, संजीव, विभूति नारायण राय, एस. आर हरनोट, भगवान दास मोरवाल और महुआ माजी कार्यक्रम में शामिल हुए। साथ ही कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा एवं भारतीय प्रतिनिधि सूरज प्रकाश और अजित राय भी कार्यक्रम में मौजूद थे। इस अवसर पर आत्मीय संवाद में तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि पिछले दो दशकों में जो भी श्रेष्ठ कथा साहित्य लिखा गया, उसे कथा यू।के. ने हमेशा रेखांकित किया। यही वजह है कि पिछले १५ वर्षों में कथा यू.के. ने हर वर्ष की एक श्रेष्ठ कृति का चुनाव कर उसके लेखक को सम्मानित किया है। यह ख़ुशी की बात है कि कथा यू.के. द्वारा चयनित कृतियों को व्यापक हिन्दी समाज का समर्थन हासिल होता रहा है। और अभी तक इसको लेकर कोई अनावश्यक विवाद खड़ा नहीं हुआ। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) के कुलपति एवं वरिष्ठ साहित्यकार विभूति नारायण राय की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से यहाँ साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम मिला है।

कथा समय २०१० का उद्धाटन २९ जनवरी की शाम सुप्रसिद्ध कथाकार से।रा. यात्री ने किया। इस सत्र की अध्यक्षता विभूति नारायण राय ने की जबकि बीज वक्तवय असग़र वजाहत ने दिया। कार्यक्रम का संचालन राकेश श्रीवास्तव ने किया और साहित्य विद्या पीठ के डीन सूरज पालीवाल ने स्वागत भाषण में इस संगोष्ठी की रूपरेखा प्रस्तुत की। इस अवसर पर विभूति नारायण राय ने तेजेन्द्र शर्मा के कहानी संकलन क़ब्र का मुनाफ़ा (सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली) का लोकार्पण किया।

विश्वविद्यालय परिसर में महात्मा गांधी हिल के प्राकृतिक परिवेश में वरिष्ठ कथाकार और हंस के सहायक संपादक संजीव की अध्यक्षता में एक कहानी पाठ का आयोजन हुआ। इसमें अमरीक सिंह दीप (प्रलय), एस। आर. हरनोट (नदी खो गई), महुआ माजी (चंद्र बिन्दु) और तेजेन्द्र शर्मा (क़ब्र का मुनाफ़ा) ने कहानी पाठ किया। संगोष्ठी के दूसरे दिन (३० जनवरी) वरिष्ठ साहित्यकार गंगा प्रसाद विमल की अध्यक्षता में दो दशक की हिन्दी कहानियों पर खुल कर चर्चा हुई जिसमें संजीव, महुआ माजी, राजेन्द्र राजन, विरेन्द्र मोहन, वंदना राग, सनत कुमार, सुशीला टाक भवरे आदि ने भाग लिया। तेजेन्द्र शर्मा ने 'भारत के बाहर हिन्दी कथा साहित्य' विषय पर अपना लिखित आलेख पढ़ा। उन्होंने दुनिया भर में लिखी जा रही हिन्दी की महत्वपूर्ण कहानियों पर विस्तार से चर्चा की।

३० जनवरी महात्मा गांधी का शहादत दिवस होता है। समारोह की शुरुआत में दो मिनट का मौन रख कर बापू को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इसी शाम कथा समय २०१० में सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत लिखित नाटक जिस लाहौर नइ वेख्या, ओ जमया हि नइ का मंचन राजेन्द्र नाथ के निर्देशन में श्रीराम सेंटर रंगमण्डल दिल्ली के कलाकारों ने किया। नाटक के मंचन से पहले विश्वविद्यालय के कुलपुति विभूति नारायण राय ने सांस्कृतिक पत्रकार अजित राय द्वारा संपादित पुस्तक 'जिस लाहोर... नाटक के दो दशक' का लोकार्पण किया।

३१ जनवरी को पिछले दो दशकों की कथा आलोचना पर चर्चा हुई। कथा समय २०१० में उपरोक्त लेखकों के अतिरिक्त अब्दुल बिस्मिल्लाह, विरेन्द्र यादव, सूरज प्रकाश, भगवान दास मोरवाल, वसन्त त्रिपाठी, मीनाक्षी जोशी, मृदुला शुक्ल सहित विश्वविद्यालय के अध्यापकों, और शोध छात्रों ने शामिल हुए।
- सूरज प्रकाश

महासमर (नौ खंड) रजत संस्करण तथा वाणी प्रकाशन का बेस्ट सेलर पुरस्कार की घोषणा

चित्र में बाएँ से दाएँ- प्रभाकर श्रोत्रिय, श्रीमती मधुरिमा कोहली, श्री नरेन्द्र कोहली, श्रीमती मीरा सीकरी, श्री देवेन्द्र राज अंकुर व वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण कोहली
नई दिल्ली। श्री नरेंद्र कोहली द्वारा लिखे गए उपन्यास आठ खंडों के महासमर के आज पुस्तक मेले में रजत संस्करण का लोकार्पण किया गया। इस कार्यक्रम में श्री प्रभाकर श्रोत्रिय, श्री देवेंद्र राज अंकुर, श्री अरुण माहेश्वरी व श्री नरेंद्र कोहली ने भाग लिया।

'महासमर' महाभारत कथा पर आधारित रजत संस्करण अब नौ खंडों में नई साज सज्जा के साथ प्रकाशित किया गया है। यह ऐसी कथा है जिसे पाठकों ने लगातार पिछले २५ वर्षों से सराहा और पढ़ा है। आज भी इसकी लोकप्रियता इस तरह से ही बरकरार है जैसे की २५ वर्ष पहले इस के शुरुआती प्रकाशन वर्ष में थी। इस संदर्भ में अपना वक्तव्य देते हुए श्री प्रभाकर श्रोत्रिय ने पुस्तक के भीतर के सौंदर्य को सराहते हुए कहा कि प्रकाशन वर्षों की कल्पना करने से बेहतर है कि हम कथा की सौंदर्यता को देखें और जो कथा सफल हो और लोकप्रिय हो कथा का वही अंति सौंदर्य है और वही रजत संस्करण कहलाने की योग्यता रखता है।

श्री देवेंद्र राज अंकुर ने पुस्तक की प्रशंसा में कहा कि महाभारत और राम कथाएँ तो हमारे भारतीय जनमानस में और हमारे रक्त में रची बसी है परंतु यह रामकथा और महाभारत कथा आधुनिक रूप, जो नरेंद्र कोहली ने हमें दिया है, वह आधुनिक समय, समाज और सभ्यता को जानने और समझने के लिए पूरा स्पेस देता है। उन्होंने भी महासमर के आरंभिक दिनों से इसे पढ़ा है। उनका मानना है कि भाषाओं की आधुनिकता उसके विकास और संप्रेषण में छिपी है जबकि पौराणिक कथाओं को समाज में उपस्थित रखने के लिए उनके संदर्भ हमारे समय के साथ बने रहने चाहिए।

नरेंद्र कोहली ने अपने गुरु डॉ. नगेंद्र को याद करते हुए कहा कि उनका एक स्वप्न था कि हिंदी पुस्तकों का विषय विश्व स्तर का हो परंतु उसकी प्रस्तुति और लेखक प्रकाशक का संबंध श्रेष्ठ होना चाहिए। महासमर को वाणी प्रकाशन ने उनके स्वप्न के अनुरूप प्रकाशित कर आज यह साबित किया है कि भारतीय पुस्तकें अब आपके घर अथवा पुस्तकालय की शोभा उसी तरह बढ़ा सकती है जिस तरह से आपके ही बाग के सुंदर खिले हुए फूल। आज तक हम हिंदी लेखक प्रशंसा करने में और तुलना करने में चुप्पी साधकर ही अपने आप को बचाते हैं। परंतु अपने आप को साबित करने के लिए भारतीय तथा विश्व साहित्य में चुप्पी साधने से काम नहीं चलेगा। यह पुस्तक सुंदर प्रकाशित हुई है। महंगी ज़रूर है परंतु हम संकोच छोडें और समकालीन समय से हाथ मिलाए। भारतीय भाषाओं और हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए सुंदर की चर्चा करनी चाहिए। साथ ही उन्होंने लेखक-प्रकाशक और रॉयल्टी जैसे मुद्दों पर भी प्रकाश डालते हुए कहा कि महासमर पर उन्हें सर्वाधिक रॉयल्टी आज भी प्राप्त होती है। हालाँकि हिसाब कितना सही है वह नहीं जानते फिर भी जो उन्हें प्राप्त होता है वह ठीक है और वे प्रसन्न है। इस पर श्री देवेंद्र राज अंकुर की टिप्पणी थी कि वे भी अपने प्रकाशकों से खुश हैं। इस पर प्रकाशक अरुण माहेश्वरी की टिप्पणी थी कि अब हमें लेखक-प्रकाशक के संबंध मज़बूत डोर से बँधे होते हैं। बीच-बीच में जो हल्की-फुल्की टिप्पणी सुनने में आती है परंतु विवाद कहाँ नहीं होते। सौहार्द्रपूर्ण वातावरण ही लेखक-प्रकाशक और पाठक का स्वास्तिक है।

श्री माहेश्वरी ने वाणी प्रकाशन में प्रकाशित बेस्ट सेलर पुस्तकों को प्रत्येक वर्ष सम्मानित करने की घोषणा की। और कहा कि क्लासिक और बेस्ट सेलर के बीच में दूरियाँ यह उपन्यास खत्म करता है। यह उपन्यास क्लासिक भी है और बेस्ट सेलर भी। क्योंकि बहुत से बेस्ट सेलर चंद दिनों के बाद लुप्त हो जाते हैं लेकिन क्लासिक पीढ़ी दर पीढ़ी पाठकों के ह्रदय में जगह बनाए रहता है।

प्रसार व्यवस्थापक
वाणी प्रकाशन