रविवार, 30 अगस्त 2009

राज्य शैक्षिक तकनीकी संस्थान, लखनऊ द्वारा वीडियो निर्माण पर बच्चों की कार्यशाला

राज्य शैक्षिक तकनीकी सस्थान, लखनऊ में, सी आई ई टी, नई दिल्ली के सहयोग से २० से ३० जुलाई ०९ तक एक वीडियो कर्यक्रम निर्माण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में कस्तूरबा गांधी विद्यालय माल, मलीहाबाद एवं काकोरी के लगभग १५ बच्चों ने हिस्सा लिया। इस कार्यशाला का उद्देश्य बच्चों को वीडियो कार्यक्रमों के निर्माण की पूरी प्रक्रिया से परिचित कराना था इस दृष्टि से यह वर्कशाप पूरी तरह सफल रही। कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान के निदेशक डा. दलजीत सिंह पुरी ने किया। संस्थान की डिप्टी प्रोडक्शन इन्चार्ज श्रीमती ललिता प्रदीप ने बच्चों से दूरदर्शन के विभिन्न धारावाहिकों के बारे में चर्चा करने के साथ ही उन्हें चैनलों के विस्तार के साथ ही मीडिया में आते जा रहे बदलावों के बारे में बताया और सी आई ई टी नई दिल्ली से आये विशेषज्ञ डा. लाल सिंह एवम श्री पदम सिंह ने भी बच्चों को शैक्षिक फ़िल्मों के बारे में जानकारी दी।

संस्थान के लेक्चरर प्रोडक्शन डा. हेमन्त कुमार तथा प्रस्तु्तकर्ता श्रीमती मृदुला सुशील ने वीडियो फ़िल्मों की स्क्रिप्ट लिखने, प्रस्तुतकर्ता राकेश निगम ने समचार बुलेटिन तैयार करने, सीनियर प्रोड्यूसर श्री विनोद धस्माना ने स्टूडियो एवम आउट्डोर शूटिंग तथा संस्थान के सीनियर कैमरामैन श्री दिनेश जोशी एवम श्री चिक्का मुनियप्पा ने इन बच्चों को कैमरा संचालन के साथ ही एडिटिंग एवम साउन्ड रिकार्डिंग की बारीकियों से परिचित कराया। संस्थान की प्रस्तुतकर्ता मृदुला सुशील एवम अमरेन्द्र सहाय के निर्देशन में बच्चों ने शुद्ध उच्चारण, संवाद बोलना, संवादों में स्वरों का उतार चढ़ाव तथा शारीरिक अभिनय के साथ चेहरे पर लाये जाने वाले भावों और भंगिमाओं को भी सीखा।


बच्चों के एक समूह ने समाचारों पर आधारित कार्यक्रम "बाल समाचार" का निर्माण किया तथा दूसरे समूह ने अपने शिक्षकों की शिक्षण पद्धति पर आधारित एक हास्य नाटक "अद्भुत विद्यालय" का। २५-२६ जुलाई दो दिनों तक बच्चे अपने दोनों कार्यक्रमों के गहन रिहर्सल में जुटे रहे। २७ जुलाई को बच्चों ने संस्थान के मिनी स्टूडियो में अपने समाचार बुलेटिन की और २८ को मुख्य स्टूडियो में अपने नाटक अद्भुत विद्यालय की रिकार्डिंग पूरी की। २९ जुलाई को सभी बच्चे एडीटिंग रूम में इकट्ठा हुये जहाँ नान लीनियर एडीटिंग सेटप पर श्री चिक्का मुनियप्पा ने इनका संपादन किया।

--हेमन्त कुमार

वाशिंग्टन में जिस लाहौर नइ देख्या का मंचन

विगत 14-15 अगस्त की शाम वॉशिंग्टन में भारत तथा पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर असगर वजाहत के नाटक जिस लाहौर नइ देख्या के मंचन किया गया। अभी तक इन दोनों देशों के लोग अपने-अपने दूतावासों में ध्वजवंदन के साथ अपना राष्ट्रगीत गाते हुए अपने अपने स्वतंत्रता दिवस अलग अलग मनाते आए हैं। लेकिन इस बार यह समारोह सामूहिक रूप से केनेडी सेंटर में 'जिसने लाहोर नहीं देखा' का आयोजन द्वारा मनाया गया। मध्यांतर में दोनों देशों के लोगों का मिलना हुआ। केनेडी सेंटर में मंचित होने वाला यह हिंदी का पहला नाटक है। नाटक की कथावस्तु दर्शकों को १९४७ में ले जाती है जब अखंड भारत का विभाजन होकर भारत और पाकिस्तान नामक देश बने। दुनिया का सबसे बड़ा स्थलांतरण हुआ। खाली हाथ लोग सीमा रेखा से इधर या उधर हो गए, इस सोच में कि जिधर भी जा रहे हैं, उन्हें निवाला मिलेगा।

यह कहानी एक ऐसे मु्स्लिम परिवार की है जो विभाजन के दौरान भारत के लखनऊ से पाकिस्तान के लाहोर पहुँच जाता है। जहाँ एक हिंदू महिला अपने परिवार से बिछड़कर पाकिस्तान में रह जाती है जबकि उसका परिवार भारत पहुँच जाता है। इस महिला की मृत्यु पर मुस्लिम लोगों के अथक प्रयास से हिंदू रीतिरिवाजों के अनुसार एक मौलवी के हाथों उसकी अंतिम क्रिया करवायी जाती है। पर इस कृत्य की परिणति दंगे फसाद का रूप ले लेती है और मौलवी की हत्या कर दी जाती है। नाटक का निर्देशन वॉशिंग्टन के जाने माने हिंदी साहित्यकार व रंगकर्मी उमेश अग्निहोत्री ने किया। प्रस्तुति पाकिस्तान के प्रसिद्ध रंगकर्मी नूर नग़मी द्वारा स्थापित फिनिक्स मिडिया ग्रूप की थी। पाकिस्तानी और भारतीय दोनो देशों के कलाकारों ने इसमें हिस्सा लेकर नाटक को सफल बनाया।

"हिन्दी चेतना" का फ़ादर कामिल बुल्के विशेषांक


हिन्दी प्रचारिणी सभा कैनेडा की त्रैमासिक पत्रिका "हिन्दी चेतना" का जुलाई विशेषांक हिन्दी भाषा एवं साहित्य के महान साधक फ़ादर कामिल बुल्के जैसे विशिष्ट साहित्यकार को उनकी जन्मशती के अवसर पर समर्पित किया गया है। बेल्जियम मूल के फ़ादर बुल्के ने विदेशी धरती पर हिन्दी भाषा तथा साहित्य के उत्थान एवं प्रचार-प्रसार के लिए एक कर्मठ योद्धा की तरह जो अविस्मरणीय योग दान किया, वह अतुलनीय है। "हिन्दी चेतना" के इस विशेषांक में डॉ. बुल्के के जन्म, जीवन, कार्यक्षेत्र, धर्मक्षेत्र, जीवन दर्शन तथा उनके द्वारा रचे विविध साहित्य से जुड़े आलेखों को समाहित करके उनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए सामग्री को न केवल पठनीय अपितु संग्रहणीय भी बनाया गया है। डॉ. दिनेश्वर प्रसाद के आलेख "डॉ. कामिल बुल्के-जीवन रेखाएँ" के साथ संलग्न चित्रों के द्वारा इस महान संत के जन्म, परिवार, परिवेष, अध्ययन एवं धर्म की ओर उन्मुख होने की परिस्थितियों का बहुत ही रोचक वर्णन मिलता है। डॉ. पूर्णिमा केडिया के संस्मरण "बीसवीं शताब्दि का ऋषि" में फ़ादर बुल्के के द्वारा समय-समय पर अपने शिष्यों का मार्गदर्शन कराते हुए उनके अनमोल विचार समाहित हैं। संत तुलसी दास के अनन्य भक्त फ़ादर बुल्के के विषय में अपने आलेख में श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं, "बाबा बुल्के के रोम-रोम में राम और साँस-साँस में तुलसी बस गए और यह कहा जाए कि वे तुलसीमय हो गए तो कोई अतिरेक नहीं।"

इस विशेषांक में फ़ादर बुल्के के प्रिय कवि ग़ज़ेले की कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी है, जिससे पाठक उनके कवि हृदय से परिचित होते हैं। प्रो० हरिशंकर आदेश के लेख "एक महान हिन्दी प्रेमी" में फ़ादर के साथ उनकी भेंट के संस्मरणों का समावेश एक आधुनिक युग के महाकवि के द्वारा बाबा के प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि है। श्री आत्मा राम तथा श्री महेन्द्र पाल जैन के आलेखों में हमें बाबा के व्यक्तित्व एवं प्रतिभा के दर्शन होते हैं। हिन्दी भाषा के उत्थान एवं प्रचार-प्रसार के विषय में बाबा के विचार उनके स्वयं के लिखे लेख में मिलते हैं। एक सम्मेलन में अपने भाषण में उन्होंने कहा, "हमें प्राचीन एवं नवीन का समावेश करना चाहिए। मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि हमारे साहित्यकार अपने पाठकों को देश की कीर्त्ति एवं गौरव पूर्ण अतीत का स्मरण दिला कर उनमें आत्म सम्मान का भाव संचारित करें।" उनके ये शब्द देश और विदेश में रहने वाले हिन्दी भाषा एवं संस्कृति प्रेमियों के लिए सदैव मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। "हिन्दी चेतना" के मुख्य सम्पादक श्री श्याम त्रिपाठी ने अपने सम्पादकीय में लिखा है, "फ़ादर बुल्के के सम्मान में यह अंक विश्व के लिए एक अदभुत उपहार होगा, विशेषकर उन हिन्दी साहित्यकारों के लिए जो सुदूर विदेशी धरती पर बसे हुए हैं।" ऐसे अनमोल उपहार को ग्रहण करते हुए हम सभी हिन्दी प्रेमी सम्पादक मंडल की मुख्य सदस्य डॉ. सुधा ओम ढींगरा तथा डॉ. इला प्रसाद को कोटिश: धन्यवाद देना चाहते हैं, जिन्होंने इतनी विविध सामग्री के द्वारा एक महान विभूति के बहु आयामिक व्यक्तित्व से परिचित करवा कर हम पाठकों को भी इस संत की जन्मशती पर श्रद्धा सुमन चढ़ाने का अवसर दिया।
--शशि पाधा

शरद तैलंग और डॉ.सी.एल.गंगन ’सृजन रतन’ सम्मान से सम्मानित


चित्र : स्व. डॉ. रतन लाल शर्मा जयन्ती के अवसर पर उनके पुत्र स्वप्नेश रतन, शरद तैलंग, डॉ. सी.एल.गंगन, मुख्य अतिथि डॉ. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी एवं संचालक महेन्द्र नेह
कोटा : दिवंगत शिक्षाविद एवं साहित्यकार स्व. डॉ. रतन लाल शर्मा की जयन्ती समारोह में साहित्य और संगीत के क्षैत्र में विशेष योगदान के लिए शरद तैलंग तथा साहित्य और शिक्षा के क्षैत्र के लिए डॉ. सी.एल.गंगन को 'सृजन रतन सम्मान' २००९ से सम्मानित किया गया। कोटा राजस्थान के प्रेस क्लब में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता साहित्यकार श्रीमती कमला कमलेश ने की। मुख्य अतिथि डॉ. नरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी थे। उन्होने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. रतन लाल शर्मा का जैसा व्यक्तित्व था ऐसे ही विचारकों की आज आवश्यकता है जो नई पीढी़ को सही दिशा प्रदान कर सकें।शायर फ़ारूख बख्शी ने शर्मा के बारे में कहा कि वे एक मनोवैज्ञानिक की तरह सोचते थे तथा फ़िलोसफर की तरह ज़िन्दगी गुज़ारते थे। वे गंगा जमुनी तहज़ीब का आईना थे। मुख्य अतिथि डॉ. चतुर्वेदी तथा अध्यक्ष कमला कमलेश ने शरद तैलंग तथा डॉ. गंगन को शाल ओढ़ा कर तथा स्मृति चिन्ह दे कर सम्मानित किया। शरद तैलंग ने डॉ. शर्मा की काव्य कृति 'कसक' में से दो ग़ज़लों की संगीतमय प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार महेन्द्र नेह ने किया तथा सहयोग डॉ. शर्मा के पुत्र स्वप्नेश रतन तथा धैर्य रतन ने दिया। सम्मान समारोह के पश्चात काव्य संन्ध्या का आयोजन भी किया गया जिसमें कोटा के अनेक रचनाकारों जिनमें डॉ. इन्द्र बिहारी सक्सेना, रमेश चन्द्र गुप्त, महेन्द्र कुमार शर्मा, राम नारायण 'हलधर', किशन लाल वर्मा, डॉ. उदय मणि, लक्ष्मी दत्त 'तरुण', अरुण सेदवाल, महेन्द्र नेह, शकूर अनवर, आनन्द हज़ारी, आदि रचनाकारों ने काव्यपाठ किया। संचालन विजय जोशी ने किया। कार्यक्रम में स्व. डॉ. शर्मा की पत्नी श्रीमती कैलाश शर्मा भी उपस्थित थीं।

लन्दन के नेहरू केन्द्र में बी.आर. चोपड़ा का अभिनंदन


एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स एवं कथा यू.के. द्वारा लन्दन के नेहरू केन्द्र में आयोजित एक रंगारंग कार्यक्रम में हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा के महत्वपूर्ण निर्माता निर्देशक बी.आर.चोपड़ा की उपलब्धियों का लेखा जोखा श्रोताओं के सामने रखा गया। कथा यू.के. के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि बी.आर. चोपड़ा अपने समय से बहुत आगे की फ़िल्में बनाने वाले निर्देशक थे। उन्होंने हमेशा सामाजिक सच्चाइयों से जुड़ी फ़िल्मों का निर्माण किया; आम आदमी की समस्याओं को अपनी फ़िल्मों का विषय बनाया मगर मनोरंजन का दामन नहीं छोड़ा। उनकी पत्रकारिता की पृष्ठभूमि उन्हें विषयों की तलाश में मदद करती थी। नया दौर (१९५७) संभवतः उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कही जा सकती है। मनुष्य बनाम मशीन जैसे ज्वलंत विषय को बी.आर.चोपड़ा ने बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है साथ ही ओ.पी.नैय्यर के पंजाबी लोक धुनों पर आधारित सुरीले संगीत ने विषय को सार्थक सहयोग दिया है।''

नेहरू केन्द्र की निदेशिका मोनिका मोहता ने कार्यक्रम की शुरुआत में श्रोताओं का स्वागत करते हुए एशिय कम्यूनिटी आर्ट्स की अध्यक्षा काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी एवं तेजेन्द्र शर्मा को कार्यक्रम के लिए धन्यवाद दिया। तेजेन्द्र शर्मा, जो नेहरू सेंटर से लंबे अरसे से जुड़े हैं, ने बी.आर. चोपड़ा द्वारा निर्मित फ़िल्म वक़्त (१९६५) के कुछ दृश्य दिखाए और अनेक फ़िल्मों के पीछे की कहानियाँ दर्शकों को सुनाईं। कार्यक्रम में एक नया रंग भरने के लिए युवा गायक (रॉयल कॉलेज और म्यूज़िक) जटानील बैनर्जी ने फ़िल्म गुमराह की साहिर लिखत नज़म गा कर सुनाई – 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।' गिटार पर उनका साथ दिया निखिल ने।त्रिनिदाद की बहनों कृष्णा एवं कैमिलिता ने 'रेश्मी शलवार कुर्ता जाली का...' पर मज़ेदार नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया।शायद बी.आर चोपड़ा की सोच के अनुसार कार्यक्रम में मनोरंजन का पुट डाला गया था। कार्यक्रम की समाप्ति में महाभारत का वह अंश दिखाया गया जिस में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं, ''यदा यदा ही धर्मस्य ग्लनिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य स्वात्मानं सृजाम्यहम, परित्राणाय साधूनाम विनाशाय च दुष्कृताम, धर्मसंस्थापनार्थाय, संभवामि युगे युगे।'' उपस्थित दर्शक समूह एकमत से कह उठे कि इस कार्यक्रम से इस से बढ़िया समाप्ति हो ही नहीं सकती थी।

- दीप्ति कुमार

'प्रवास में पहली कहानी' का लंदन में लोकार्पण


कथा यू.के. ने लंदन के नेहरू केन्द्र में उषा वर्मा एवं चित्रा कुमार द्वारा संपादित ब्रिटेन की हिन्दी-उर्दू की महिला कथाकारों द्वारा लिखी गई पहली कहानी के संग्रह प्रवास में पहली कहानी का लोकार्पण समारोह आयोजित किया। समारोह की अध्यक्षता बीबीसी हिन्दी सेवा रेडियो की पूर्व-अध्यक्ष अचला शर्मा ने की जबकि संचालन का भार सँभाला भारतीय उच्चायोग के हिन्दी एवं संस्कृति अधिकारी श्री आनंद कुमार ने। बर्मिंघम से पधारी विदुषी डॉ. वन्दना मुकेश शर्मा ने कहानी संग्रह पर एक लम्बा लिखित लेख पढ़ा। कहानी संग्रह की संपादिका उषा वर्मा ने आने वाली पीढ़ी को सम्बोधित करते हुए कहा, ''यदि मैं तुम्दारी पीढ़ी में इन किताबों के माध्यम से जीवित रहूँ तो यही मेरी मुक्ति है।'' काउंसलर ग्रेवाल ने सुझाव दिया कि इन कहानियों का अंग्रेज़ी में अनुवाद करवाकर ब्रिटेन के पुस्तकालयों में पहुँचाया जाना चाहिए। भारत से पधारे प्रो. अब्दुल सत्तार दलवी (मुम्बई) ने इस पूरी परियोजना की प्रशंसा करते हुए कहा कि इससे अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य को भी बढ़ावा मिलेगा और इस तरह के अन्य संकलन भी निकलने चाहिये। समारोह में कीर्ति चौधरी की कहानी का पाठ बर्मिंघम निवासी कृति यू.के. की अध्यक्ष तितिक्षा शाह ने किया।

अध्यक्ष अचला शर्मा ने इस गरिमापूर्ण कार्यक्रम के लिए संपादक द्वय एवं कथा यूके को बधाई देते हुए कहा कि इस प्रकार के संकलन साहित्य को एक अलग दृष्टि से देखने में सहायक होते हैं। कथा यू.के. के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि इस प्रकार के संकलन विदेश में बसे भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने सूचित किया कि जल्दी ही एक और कहानी संकलन का विमोचन नेहरू केन्द्र में होगा जिसमें ब्रिटेन के उर्दू कहानीकारों की कहानियों हिन्दी साहित्य-जगत के सामने अनुवाद के माध्यम से प्रस्तुत की जाएँगी। कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, डॉ. कृष्ण कुमार (बर्मिंघम), डॉ. महेन्द्र वर्मा (यॉर्क), कैलाश बुधवार, गौतम सचदेव, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, नरेश भारतीय, महेन्द्र दवेसर, कादम्बरी मेहरा, स्वर्ण तलवाड़, रमा जोशी, सफ़िया सिद्दीक़ि, बानो अरशद, पद्मेश गुप्त, डॉ. श्याम मनोहर पाण्डे, चाँद शर्मा, हमीदा मोइन रिज़वी (हैदराबाद, भारत), डॉ. ख़ूबचन्दानी (पुणे), डॉ. वशीमी शर्मा, डॉ. मुज़फ्फ़र शमीरी, डॉ. सुरेश अवस्थी, डॉ. जयकिशन, डॉ. फ़ातिमा परवीन, मोहम्मद क़ासिम दलवी भी उपस्थित थे।

- नूपुर अहूजा

शनिवार, 29 अगस्त 2009

संतोष अलेक्स को द्विवागीश पुरस्कार


मलयालम कवि व अनुवादक संतोष अलेक्स को भारतीय अनुवाद परिषद द्वारा प्रदान किए जाने वाले वर्ष २००८-०९ के राष्ट्रीय सम्मान व पुरस्कार- द्विवागीश पुरस्कार के लिए चुना गया। अनेक भाषाओं की रचनाओं का हिंदी अनुवाद कर चुके संतोष अलेक्स हिंदी से मलयालम और मलयालम से हिंदी अनुवाद के लिए विशेषरूप से जाने जाते हैं। उनका चयन मलयालम से हिंदी में अनुवाद हेतु किया गया है। संतोष इस पुरस्कार को पानेवाले सबसे कम वय के अनुवादक हैं। द्विवागीश पुरस्कार नई दिल्ली में ११ सितंबर २००९ को प्रदान किया जाएगा। पुरस्कार में ११,००० रुपए की राशि का चेक, शाल, प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिह्न प्रदान दिया जाता है। संतोष अलेक्स विशाखापटणम में मत्स्य विभाग के एक शोध संस्थान में हिंदी अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं। यह पुरस्कार उन्हें 11 सितंबर 2009 को नई दिल्ली के त्रिवेणी सभागार में आयोजित एक समारोह में दिया गया। कार्यक्रम में श्रीमती अनिता भटनागर जैन, मुख्य अतिथि थीं।